life is celebration

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23.5.14

बिहार के बहादुरशाह जफर बन गए नीतीश कुमार!

बिहार के बहादुरशाह जफर बन गए नीतीश कुमार!
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संजय मिश्र
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लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद नीतीश ने जब सीएम पद छोड़ने की घोषणा की तो एकबारगी लोग चौंक गए... नौटंकी है... हार पर मंथन नहीं करना चाहते... वगैरह, वगैरह... उस वक्त धूंध घनी थी... कहीं से मास्टर स्ट्रोक की अनुगूंज तो किसी तरफ से रमई राम की पिटाई पर शोक के स्वर ... तिसपर शरद यादव की बेईज्जती की कराह ...बावजूद इसके शरद ठसक से बयान देते रहे... अचरज के बीच खबर ये है कि जेंटलमैन का तगमा पहनने वाले नीतीश कुमार ने जंगल राज वाले लालू प्रसाद से हाथ मिला लिया है........आरजेडी ने जीतन राम मांझी की सरकार को समर्थन दे दिया है।

बुद्ध मुस्करा रहे होंगे... शरद यादव यही कहेंगे.... वे इस बात के आग्रही रहे हैं कि जनता नामधारी पार्टियों को एक हो जाना चाहिए... शरद इसलिए भी मुस्करा रहे होंगे कि नीतीश से उनके रिश्ते की खटास के बीच उन्होंने वो कर दिखाया जो बिहारवासियों के लिए दो ध्रुव के मिलने के समान है... राजनीतिक नजरिए से देखें तो ये नीतीश की घर वापसी मतलब मंडल राजनीति की तरफ वापसी है... लेकिन बिहार की मांझी सरकार को मिला कांग्रेसी समर्थन इसे खिचड़ी बनाती है... तो क्या नीतीश राजनीतिक रूप से इतने कमजोर हुए कि राह बदल ली?

इतिहास में झांकें तो दिल्ली की तख्त पर बैठे आखिरी मुगल शासक बहादुरशाह जफर एक समय इतने कमजोर हुए कि उनके राज की सीमा दिल्ली से महरौली तक सिमटने की बात कही गई... सिद्धांत की लड़ाई उन्होंने भी लड़ी थी ...१८५७ में... तब क्या हिन्दू...क्या मुसलमां... सब एक वेवलेंथ पर आ गए थे... लेकिन क्या नीतीश उस तरह की गौरव गाथा के हकदार हैं... उनके साथ जुड़े परसेप्सन और उनकी कार्यशैली की हकीकत की पड़ताल करेंगे तो जानेंगे कि वे उस तरह की फसल काटने के हकदार कभी नहीं रहे।

हर समाजवादी की तरह नीतीश भी लोकतंत्र में विश्वास की बात करते... लोहिया का नाम लेते... लेकिन नीतीश के आदर्श साम्राज्यवादी मौर्य शासक रहे... चंद्रगुप्त का नाम लेना उनका शगल रहा... बड़ी ही चतुराई से वे चाणक्य भी बनते रहे...खासकर तब जब गठबंधन के खेबनहार होने की बात पर जोर देने की बारी आती थी... अहंकारी पर डेमोक्रैटिक होने की छवि...बिहार के एडिटर इन चीफ भी कहलाए...  परसेप्सन का कमाल देखिए... जंगल राज के बरक्स महज पटरी पर बिहार को लाने के कौशल के बूते चीन से अधिक विकास करने की छवि पसारने में कामयाब हुए।    

वोटरों से रूठ तो ऐसे रहे हैं कि मानो लोगों ने अपने दुलारे नेता के साथ अन्याय किया हो... रूठ कर बदला लेने से मन नहीं भरा तो लालू से हाथ मिला कर जंगल राज की याद दिला-दिलाकर मानसिक यातना देने की कोशिश कर रहे... जनादेश को कबूल करने में इतना कष्ट?...  ... बावजूद इस बेरूखे हठ के चाहत यही कि दुनिया डेमोक्रैटिक कहती फिरे ...दिल में झांक कर देखें कि बिहार के वोटरों ने किस बुनियाद पर उन्हें सर पर चढ़ाया था... नीतीश ने उसे भुलाकर दिल्ली की आबोहवा के मुताबिक चुनावी एजेंडा नहीं बदला था क्या?

नीतीश गमजदा हैं ...ब्लोअर की हवा में उड़ जाने के अहसास से भींगे हुए और मर्सिया गाने को मजबूर... भले वो कुछ भी कहें गठबंधन तोड़ने की गलती का अहसास उन्हें चुनाव से पहले ही हो गया था... लिहाजा नतीजा उन्हें मालूम था... जिस आस में मंसूबे बांध रखे थे नीतीश ने...वो पूरे नहीं हुए... मजे खिलाड़ी की तरह बाल नोच नहीं सकते... पर मजे खिलाड़ी की तरह नैतिकता के नाम पर अपनी कमी को शक्ति के रूप में दिखाने की कवायद तो कर ही सकते। और वो वही कर भी रहे। उन्हें मान लेना चाहिए कि वो उतने महान नहीं जितना वो लोगों से मनवाना चाहते।

वो चंद्रगुप्त जितना महान होते तो अपना राज पटना से राजगीर तक सिमटा कर नहीं रख देते... बहुत खुश हुए तो मगध की सीमा तक पहुंच जाते... आप सोच रहे होंगे कि ये कैसी पहेली है? ...दिल्ली से महरौली और फिर ये पटना से राजगीर... पर ये सच है... यकीन न हो तो कुछ आंकड़े देख लें... साल २०१२ की ही बात है... १९ जनवरी को मधुबनी के लिए करीब ४.३ अरब की योजनाओं के शिलान्यास किए गए... नीतीश के चारण पत्रकारों ने हेडलाइन दी—मधुबनी की भर गई झोली--- वहीं नालंदा जिले के लिए इससे भी अधिक खर्च की राज्य सरकार की योजनाओं के अलावा इसी जिले में स्थाई महत्व की करीब ७५० अरब की योजनाओं पर काम चल रहा है...दिल पर हाथ थाम कर नीतीश और उनके लगुए पत्रकार कहें कि नालंदा के लिए उन्होंने कभी मधुबनी जैसी हेडलाइन दी है?

चलिए आंकड़ों को समझने में दिक्कत आ रही हो तो कुछ देश स्तरीय संस्थानों के नाम ही सुन लें.......आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय, आईआईटी, एम्स, महिला विश्वविद्यालय(वीमेंस कॉलेज परिसर), आईटी सिटी, नालंदा विश्वविद्यालय, परमाणु परियोजना, अंतर्राष्ट्रीय स्तर का शूटिंग रेंज.... आप नाम लेते चले जाएं और पता चलेगा कि ये सारे नाम पटना से लेकर राजगीर के बीच पसरे हैं या पसरने वाले हैं... इतना ही नहीं पटना एयरपोर्ट भी नालंदा ही शिफ्ट होगा... चंपारण में बनने वाले सेंट्रल यूनिवर्सिटी पर ऐसा पेंच फसाया कि कपिल सिब्बल गया में भी सेंट्रल यूनिवर्सिटी का जुगाड़ कर गए। मधुबनी में मिथिला पेंटिंग संस्थान की स्थापना की बात जरूर कही पर वो अधर में ही लटका हुआ है। चुनाव से ऐन पहले किराए के मकान में संस्थान का ऑफिस खोलने की घोषणा की गई।  

ये वही नीतीश हैं जो कहते कि देश में क्षेत्रीय असमानता न हो। थिंक इंडिया डायलॉग में उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय असंतुलन से देश में रोष है। बिहार के अंदर फैले क्षेत्रीय असंतुलन पर उन्हें कोई रोष है? जिस आरजेडी से उन्होंने समर्थन का जुगाड़ किया है उसके वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने नीतीश के नालंदा प्रेम पर झल्लाते हुए कह दिया था कि--- बिहार की राजधानी फिर से राजगीर में स्थापित कर दी जाए तो उन्हें हैरानी नहीं होगी.....

बहुत कम लोगों को पता है कि नालंदा पहले से ही विकसित जिला रहा है... नीतीश के राजनीतिक पटल पर उभरने से पहले से... यानि विकसित को विकसित बनाने का स्वार्थ... याद होगा आपको कि नीतीश कुमार जब-तब विकसित गुजरात के विकास की गाथा को नकारने की कोशिश में बयान देते रहते हैं... पर यही काम वो बिहार में करते हैं... लोकसभा चुनाव में मिली पराजय से खार खाए नीतीश ने अपना जो उत्तराधिकारी चुना है वो भी मगध से ही हैं... जी हैं गया जिले के जीतन राम मांझी उनकी पसंद बने हैं।

चाणक्य के प्रेमी नीतीश गंगा के उस तट पर कुछ समय बैठें जिसे वो मरीन ड्राइव की शक्ल देने की चाहत रखते... गंगा नदी के थपेरों की कौंध के बीच मंथन करें कि वोटरों ने उन्हें सचेत ही किया है...राह दिखाई है... वो खूब आत्मालाप करें... गंगा की लहरों के संगीत उनसे यही कहेंगे कि पूरे बिहार का होकर जीने की ख्वाहिश पालें... सही अर्थ वाले समावेशी चिंतन की ओर मुड़ें...।
 


17.5.14

ये इंडिया का भारत से कनेक्ट है...

ये इंडिया का भारत से कनेक्ट है...
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संजय मिश्र
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मोदी, मोदी.... मोदी, मोदी.... की चांटिंग..... जी हां, उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम... हर तरफ यही गूंज... गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद नरेन्द्र मोदी की धन्यवाद सभा से जो ये ध्वनि इंडिया के लोगों तक पहुंची तो ...फिर इसे देश के लोगों के मानस के साथ शिंक ( sync… ) होने में देर नहीं लगा... मोदी के पीएम उम्मीदवार बनने के बाद ये कदमताल आकार लेता गया... लेकिन कांग्रेस की अगुवाई वाली राजनीतिक जमात इसे पढ़ने और कबूल करने को तैयार न हुई... लिहाजा ... १६ मई २०१४ को जब नतीजे आए तो इस देश की सबसे बूढ़ी राजनीतिक पार्टी यानि कांग्रेस लीडर आफ अपोजिशन के लायक भी न बची... नरेन्द्र मोदी के नायकत्व में बीजेपी ने अपने बूते मेजोरिटी हासिल कर इतिहास रच दिया है...
देश चलाने की खातिर एनडीए की ही सरकार बनेगी.. सत्ता में आने वालों के इस संदेश पर समर्थक विहुंसि रहे हैं और वो भी संतोष कर रहे होंगे जो मोदी को रोकने के लिए हर जायज और निर्लज्ज कदम उठाते रहे... जनता के इस फैसले के संकेत स्पष्ट हैं... क्षत्रपों खासकर हिन्दी क्षेत्रों के जातीए नेताओं की ब्लैकमेल की राजनीति के दिन अब लदने वाले हैं... उन लोगों को भी झटका लगा है जो विशफुल थिंकिंग के आसरे पारंपरिक राजनीति को बनाए रखना चाहते थे... मुसलमानपरस्ती के जवाब में धर्म से भींगी राजनीति ( यहां बीजेपी पढ़ें) और इसे कम्यूनल बताकर और उसे चेक करने के चलते जातीए राजनीति को बढ़ावा देने की हरसंभव कोशिश... हिन्दू धर्म में यकीन रखने वालों को बांटने की इस मंशा पर वोटरों ने खींज उतारा है..
ये नतीजे कांग्रेस की उस कोशिश को करारा जवाब है जिसके तहत सेक्यूलरिज्म को चुनावी मुद्दा बनाने का दांव खेला गया। देश दुखी होता रहा कि वोट पाने की खातिर शासन चलाने के मिजाज(यानि सेक्यूलरिज्म ) को ही बलि क्यों बनाया जा रहा... लेकिन सत्ता पाने के स्वार्थ में अंधी हो चली कांग्रेस और उनके वामपंथी, प्रगतिवादी और समाजवादी समर्थकों को ये चिंता नजर न आई.. सोनिया ने जब शाही इमाम से अपील कर सेक्यूलर वोट बिखड़ने से रोकने की गुहार लगाई तो संजीदा लोगों को सर पीटने के अलावा कोई चारा न बचा। संदेश ये गया कि मुसलमान सेक्यूलर हुए और बाकि आबादी पर चुप्पी... इस बची आबादी को लगा उसे कम्यूनल ही माना गया।
शाजिया इल्मी जी हां आम आदमी पार्टी की नेता ने फरमाया कि मुसलमान बहुत सेक्यूलर हुए और उसके सांसारिक हितों की रक्षा के लिए उसे कम्यूनल होना होगा... मतलब ये कि उसे मुसलमान होकर वोट करना होगा... बेशक जीवन की जद्दोजहद से परेशान लोग बुनियादी सुविधाए चाहें तो इसमें हर्ज नहीं... बतौर शाजिया इन बुनियादी हकों के चलते वो धार्मिक ब्लॉक की तरह व्यवहार करे ... इस चाहत में न तो नफरत की जगह है और न ही हिंसा... जब इस मासूम सी अभिलाषा को शाजिया कम्यूनल कह सकती हैं तो फिर इस महीन परिभाषा से इतर पीएम मनमोहन सिंह के पाकिस्तान की शह पर काम करने वाले एक आतंकवादी के लिए रात भर सो नहीं सकने की वेदना को किस श्रेणी के कम्यूनलिज्म का दर्जा देती इस देश की जनता...
एक अल्पसंख्यक की पीड़ा मीडिया के लिए न्यूज सेंस के हिसाब से बड़ी खबर हो सकती है... पर शासन चलाने वाले के लिए देश के हर व्यक्ति का दुख चिंता का कारण होता है... उसे नफरत फैला कर या डराकर न्याय नहीं करना चाहिए...मनमोहन और दिग्विजय सिंह के कई बयान बहुसंख्यकों को उद्वेलित और अपमानित करने वाले रहे... आरएसएस के विरोध की अंधी दौर में ये होश न रहा कि बहुसंख्यकों को नीचा दिखाने की चूक हो रही। सैफ्रोन टेररिज्म यानि केसरिया आतंकवाद यानि इंडिया के झंडे में उपयोग किए जाने वाले केसरिया रंग का अपमान कर बैठे।
बीजेपी के लिए खुश होने का समय रहा जब ये शाब्दिक हमले होते रहे...चुनाव प्रचार के दौरान इस पार्टी के नेता को पाशविक साबित करने की होड़ मची रही... बीजेपी के लिए वोट में इजाफा होने की सूरत बन रही थी... उसे ये भी अहसास रहा कि बीजेपी के हिन्दुत्व को निशाना बनाने के चक्कर में हिन्दू हित और हिन्दू चेतना पर भी कांग्रेसी निशाना साध रहे ... फायदा बीजेपी को ही मिलना था... कांग्रेस भूलती रही कि आजादी के आंदोलन के दिनों में उसकी कोख में ये हिन्दू चेतना भी समाहित रही... विभाजन के बाद वो इसे धीरे-धारे अच्छी तरह भूल बैठी... इंदिरा के समय वाम सोच के साथ मिल कर ऐसे इंडिया के कंसेप्ट को पल्लवित करने में सफल हुई जिसमें भारत के साथ कंटिनुइटी नहीं रहे... उसी इरादे का इजहार कांग्रेसी करते रहते जब वे कहते हैं कि इंडिया महज ६५ साल का नौजवान देश है... नरेन्द्र मोदी का उभार उसी भारत और इंडिया के बीच पुल बनाने की दस्तक है।
मोदी विरोधी नादान नहीं है ... वे इस मर्म को समझ रहे। यही कारण है कि कांग्रेस का बौद्धिक समर्थक वर्ग बहुसंख्यक उभार के खतरे की तरफ ध्यान खींचने लगा है... उसे अहसास है कि ६५ साला देश की विशफुल थिंकिंग दरकने वाली है... कांग्रेस के कई नेता चुनाव अभियान के दौर में बहुसंख्यक कम्यूनलिज्म के खतरे से यूं ही आगाह नहीं कर रहे थे... ये आत्ममंथन का भाव नहीं था बल्कि इस नाम पर अपने वैचारिक पाप को ढकने की कोशिश ज्यादा प्रबल थी... हां कांग्रेस इस बात से खुश हो सकती है कि मेनस्ट्रीम पार्टी के शासन के चलते रहने की जो आकांक्षा उसने भी पाली थी उसे बीजेपी ने साकार कर दिखाया...क्षत्रपों के कमजोर होने से कांग्रेस अपने पारंपरिक जनाधार फिर से हासिल करने की हसरत पाल सकती है।

मुसलमानों के वोट कमोबेश कांग्रेस के पाले में आ गए हैं... आम जनता बने रहने की मानसिकता विकसित करने के लिए कांग्रेस मुसलमानों को समय दे दे यही वक्त की मांग है...मुसलमानपरस्ती से तौबा करने से रूटलेस इंडिया की जद्दोजहद नहीं करनी पड़ेगी... कुछ सालों तक शानदार विपक्ष की भूमिका निभाए कांग्रेस ताकि लोकतांत्रिक फिजा में योगदान हो। इससे उसके उस अहंकार का भी नाश होगा कि इंडिया को सिर्फ वही चला सकती है। नरेन्द्र मोदी कुछ सालों तक देश को ढंग से चला गए तो इस देश को पुनर्जीवित कांग्रेस भी मिल सकता है।          

21.4.14

मराठियों को भी समझने की जरूरत है

मराठियों को भी समझने की जरूरत है
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संजय मिश्र
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कई टीवी चैनलों में एक के बाद एक राज ठाकरे के साक्षात्कार विस्मयकारी थे ... इसके पीछे की राजनीति और मंसूबों पर किसी तरह की टिप्पणी इस पोस्ट का लक्ष्य नहीं... इससे पहले तक मीडिया में राज की एकरंग छवि छाई रही है... उम्मीद है राज के जो विचार सामने आए उससे एकरंग छवि बदले... 
क्या ये सच नहीं है कि अन्य राज्यों में बिहार से पलायन कर जाने वाले लोगों के साथ हुई नाइंसाफी पर मीडिया और बिहार के राजनेता कमोवेश चुप्पी साध लेते... महाराष्ट्र या बम्बई का नाम आते ही बिहार-यूपी के तमाम नेता और दिल्ली के हिन्दी पत्रकार मोर्चा संभाल लेते?
क्या ये सच नहीं है कि बिहार या यूपी के हुक्मरानों की नाकामी के कारण पलायन की भीषण रफ्तार बनी हुई है?
क्या ये सच नहीं है कि पलायनकर्ता इंडिया के संविधान की रक्षा करने महाराष्ट्र नहीं जाते बल्कि मजबूर होकर रोजी-रोटी की तलाश में वहां या कहीं पर भी जाते? 
इंडिया के लोग बिहार की भावनाओं को जितना समझें उतना ही महाराष्ट्र को जानना भी उनका फर्ज है... मराठियों को राज के बगैर भी समझा जा सकता....
आपने गौर किया होगा कि बिहार सहित देश के तमाम राज्यों के लोग दूसरे राज्यों में काम की तलाश कर पेट की आग बुझा लेते.... लेकिन आपने ये भी गौर किया होगा कि महाराष्ट्र और मराठी संस्कृति के असर वाले सीमावर्ती राज्यों जैसे एमपी आदि के किसान विपत्ति आते ही आत्महत्या कर लेते... विदर्भ(महाराष्ट्र) में तो लाखो किसानों ने अपनी इहलीला समाप्त कर ली है.... वे दूसरे राज्यों में जाकर अपना पेट पाल सकते थे.. पर मराठियों की मानसिकता थोड़ी अलग है... बड़ी नौकरियों में मराठी आपको देश के किसी कोने में मिल जाएं लेकिन आम तौर पर वहां के लोग कष्ट काटकर भी अपने सांस्कृतिक क्षेत्र में ही जीवन जीना पसंद करते... यही कारण है कि उनके लिए अपने ही राज्य में रोजगार मिलने की आकांक्षा पालना बड़ा मुद्दा है..... इस सोच को ही राज ठाकरे जैसे लोग आवाज देते हैं ... बिहार जैसे राज्य के लोग कह सकते कि हे मराठी लोगों जान गंवाने से अच्छा है अपने ही देश के अन्य हिस्सों में रोजगार खोजने में संकोच न करें... पर क्या आपने कभी प्रभावकारी राजनीतिक दलों के नेताओं को अपने ही देश के मराठियों को महाराष्ट्र में ही रहने के मोह को विशेष परिस्थिति में त्यागने के लिए मलहम लगाते सुना है? लालू, नीतीश, मुलायम, शरद .. या फिर कांग्रेस, बीजेपी के लाट साहबों के मुंह से?..

19.4.14

मीडिया पर हो रहे चौतरफा हमले

मीडिया पर हो रहे चौतरफा हमले
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संजय मिश्र
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मीडिया में साख की कमी है ये तो जानी हुई बात है.. लेकिन पिछले कई दिनों से मीडिया(खासकर टीवी चैनल्स) पर जिस तरह आरोपों के हमले हो रहे हैं वो असहजता पैदा करने वाले हैं... ... शनिवार को भी राज ठाकरे और उसके बाद आजम खान ने जिस अंदाज में भड़ास निकाले वो ध्यान खींचने के लिए काफी है..... राज के बयान में उदंडता का भाव है वहीं आजम ने लगातार नरेन्द्र मोदी से पैसे खाने का आरोप मीडिया पर लगाया है... एबीपी न्यूज के एक कार्यक्रम में आजम ने बदमिजाज लहजे में एंकर अभिसार को मोदी से पैसे मिलने का जिक्र किया... इस चैनल ने कोई प्रतिकार नहीं किया... बेशक पत्रकारिता की परिपाटी है कि सवाल पूछने के बाद पत्रकार को जवाब सुनना होता है चाहे जवाब कितना भी उत्तेजना पैदा करने वाला क्यों न हो... लेकिन केजरीवाल की तरफ से पत्रकारों को जेल भेजने वाली धमकी के बाद से ये सिलसिला सा बन गया है... ऐसा लगता है एक एजेंडे के तहत मीडिया पर मोदी से पैसे पाने के आरोप लगाए जा रहे हैं ... राजनीतिक मकसद ये कि पत्रकार सेक्यूलर-कम्यूनल चुनावी अभियान में सेक्यूलरिस्टों का गुलाम की तरह साथ दें... मकसद जो भी हो कई सवाल उभरते हैं...मीडिया आरोपों को नकारता क्यों नहीं है? मीडिया ये क्यों नहीं पूछता कि आरोप लगाने वाले पुष्ट तथ्य पेश करें ? मीडिया आरोप लगाने वालों को मानहानि के मुकदमें की चेतावनी क्यों नहीं देता? पीसीआई और एनबीए चुप क्यों है? मान लें कि सभी हिन्दी टीवी चैनल बिकाउ हैं तो सभी ने इकट्ठे मोदी से ही पैसे क्यों खाए? चैनलों ने कांग्रेस से पैसे क्यों नहीं लिए? बिन पैसे के तो समाजवादी पार्टी भी एक दिन नहीं चल सकती... तो आजम की पार्टी ने पत्रकारों को क्यों नहीं खरीद लिया? क्या पिछले ६५ सालों में राजनीतिक दलों ने पत्रकारों या चैनलों को कभी भी प्रभावित नहीं किया है... सत्ता या पैसों के जरिए? मान लें कि पैसों का खेल पहले भी हुआ तो उन चुनावों के समय मीडिया पर आरोप क्यों नहीं लगे? क्या बीजेपी को छोड़ बाकि सभी राजनीतिक दल राजा हरिश्चंद्र की तरह जीने का दावा कर सकने की हिम्मत रखते हैं? असल में साल २००९ से पत्रकारों ने जिस तरीके का व्यवहार किया है उसने कांग्रेस और अन्य कथित सेक्यूलर राजनीति वाले दलों को उन्हें गुलाम की तरह इस्तेमाल करने योग्य हथियार मानने के लिए लुभाया है। पहले भी इंडिया का मीडिया विचारधाराओं की प्रतिबद्धता में उलझने की भूल करता रहा है... और इस चक्कर में बेईमानी भी करता रहा है। आजादी के आंदोलन में लगे लोगों को मीडिया का सहयोग कुछ हद तक मिलता रहा। विदेशी दासता से मुक्ति के लिए इसे जायज भी माना जा सकता था। लेकिन आजादी के बाद मीडिया को अपने रूख में जो तब्दीली करनी चाहिए थी वो चाहत नहीं दिखी। सुनियोजित तरीके से वाम कार्ड होल्डरों और लोहियावादियों का मीडिया में प्रवेश और इन विचारधाराओं के हिसाब से जनमत को प्रभावित करने का खेल चलता रहा। फिर भी कुछ मर्यादाएं रख छोड़ी गई... न्यूज सेंस से खिलवाड़ नहीं किया गया। लेकिन हाल के समय में न्यूज सेंस से भी छेड़छाड़ की गई है... ... एंटी इस्टैबलिस्मेंट मोड में होने की मनोवृति को भुलाकर सत्ताधारी दल की बजाए विपक्ष को लताड़ने की परिपाटी को पुष्ट किया गया.... मुजफ्फरनगर दंगों की रिपोर्टिंग दिलचस्प तथ्य पेश करने योग्य हैं..... भड़काउ भाषण देने वाले नेताओं की फेहरिस्त से कांग्रेसी नेता का नाम एबीपी न्यूज के पैकेज से गायब होना नतमस्तक होने की पराकाष्ठा थी... बाबा रामदेव के समर्थकों पर हुए लाठीचार्ज के विजुअल केन्द्र की सत्ता की धमकी पर उपयोग नहीं करने जैसे पत्रकारिए अपराध किए गए... जाहिर है सत्ताधीशों का मन चढ़ेगा ही...  आरोपों की बौछार के बीच मीडिया को अपने अंदर झांकने का वक्त आ गया है... साख पर बट्टा न लगे इसके लिए वे फौरी तौर पर आरोप लगाने वालों को जवाब दें साथ ही पत्रकारों को पानी में डूब कर नहीं भींगने की कला की ओर रूख करने के बारे में सोचना चाहिए .. 

5.4.14

विकास पुरूष लौटे मंडल राजनीति की गोद में

विकास पुरूष लौटे मंडल राजनीति की गोद में 
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संजय मिश्र
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५ अप्रैल को नीतीश कुमार को सुनना उन लोगों के लिए कसैला स्वाद वाला मेनू साबित हुआ होगा जो उन्हें खांटी विकास पुरूष के रूप में देखना पसंद करते... मौका था जेडीयू घोषणा पत्र के जारी होने का... पार्टी सुप्रीमो नीतीश ने ठसक से ऐलान किया कि निजी क्षेत्र में देश भर में आरक्षण की व्यवस्था की वे पैरोकारी करेंगे... ये आफिसियल है...घोषणापत्र का वादा है... यानि ये नहीं कह सकते कि चुनावी फिजा के बीच कोई बात यूं ही कह दी गई... नीतीश अब अपने मूल राजनीतिक प्रस्थान बिंदू की तरफ लौट रहे हैं...यानि मंडल राजनीति की आगोश में फिर से समा जाना चाहते.. उनके विरोधी अरसे से कहते आ रहे हैं कि जेडीयू का आरजेडीकरण हो रहा है... लेकिन अब ये पक्की बात है... राजनीतिक परिदृष्य पर गौर करें... निजी क्षेत्र में आरक्षण के सबसे बड़े पैरोकार एलजेपी सुप्रीमो राम विलास पासवान एनडीए में जा चुके हैं और माना जा सकता कि इस स्पेस को नीतीश भरना चाहते... उधर नरेन्द्र मोदी लगातार कह रहे कि अगला दशक पिछड़ों और दलितों के उत्कर्ष का समय होगा... तो क्या इस राजनीतिक चुनौती को देख नीतीश सर्वाइवल के लिए मंडल राजनीति की ओर मुड़ने को बाध्य हुए हैं? ... राजनीतिक समीक्षक कह सकते कि हाल के चुनावी सर्वेक्षणों के नतीजों से नीतीश हिल चुके हैं लिहाजा ऐसे कदम उठाना हैरान नहीं करना चाहिए... पर याद करने की जरूरत है कि इन्हीं सर्वेक्षणों में नीतीश बिहार में सबसे पसंद किए जाने वाले व्यक्ति हैं... पसंद करने वालों की फेहरिस्त में बीजेपी समर्थक बड़ी तादाद में हैं... तो क्या ये माना जाए कि गठबंधन तोड़ने के निर्णय के समय पसंद करने वाले इस तबके की इच्छा की अनदेखी करनेवाले नीतीश अब फिर से इनकी अनदेखी कर रहे और लालू शैली की ओर मुड़ रहे? ...दरअसल नीतीश विरोधाभासी व्यक्तित्व के दर्शन करा रहे हैं जो कि राजनीति में अनयुजुवल नहीं है... ... एक तरफ वे कहते कि उन्होंने सिद्धांत की कीमत चुकाई है... दूसरी तरफ जनाधार खिसकने की आशंका की व्याकुलता भी दिखा रहे... सत्ता के खेल का चरित्र निर्मोही होता है... इसे समझने में बिहार के मौजूदा राजनीति के इस चाणक्य से भूल हुई होगी ...ऐसा बिहार के बाहर के राजनीतिक पंडित मान रहे होंगे... वे ये भी सोच रहे होंगे कि नीतीश के लिए रास्ता बदलना आसान नहीं होगा... पर नीतीश ने पहले से ही गुंजाइश रख छोड़ी है... उनके कई पसंदीदा शब्द हैं जिनमें - इनक्लूसिव ग्रोथ- सबसे अहम है... नीतीश के इंक्लूसिव ग्रोथ में आरक्षण का तड़का ज्यादा घनीभूत है जो कि कांग्रेस के इंक्लूसिव ग्रोथ से अलग है .... नीतीश ने महादलित कार्ड को अपने इनक्लूसिव ग्रोथ के दायरे में अक्सर भुनाया है... लिहाजा जातीए राजनीति की ओर सरकना उनके लिए उतना भी मुश्किल नहीं होगा...

18.3.14

नेहरू...नरेन्द्र मोदी....और राहुल

नेहरू...नरेन्द्र मोदी....और राहुल
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संजय मिश्र
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नरेन्द्र मोदी भव्य भारत बनाने का सपना देख और दिखा रहे हैं। उनकी तमन्ना है कि ये देश इतना ऐश्वर्यशाली बने कि वो विकसित देशों की कतार में हो और उसे नेतृत्व दे सके। देश के कोने-कोने में रैलियां कर वे अपने मंसूबों का इजहार कर रहे। आम चुनाव माथे पर है लिहाजा राहुल गांधी दम-खम के साथ सुदूर इलाकों में जाकर राजनीतिक प्रयोग की नई मीमांसा में लगे हैं। वहीं उनकी पार्टी का थिंक टैंक कांग्रेस ब्रांड सेक्यूलरिज्म और कम्यूनलिज्म के दो खांचे में इंडिया को आबद्ध करने में लीन हैं। जाहिर है साल २०१४ के आम चुनाव रोचक बन गए हैं।

वैभवशाली इंडिया की बात चले ... निर्माण के सपने हों.. तो नेहरू का नाम अनायास ही जेहन में कौंधेगा... उनकी राजनीतिक विरासत की धड़कन सुनाई देगी। इंडिया के पहले पीएम विकासशील और तकनीक संपन्न देश बनाना चाहते थे। हर तरफ निर्माण की गूंज थी तब। फैक्ट्रियों को वे आधुनिक मंदिर कहा करते। आज नरेन्द्र मोदी अतुल्य विकसित भारत की कल्पना में गोता लगा रहे। एक तरफ दुनिया की सबसे उंची प्रतिमा निर्माण की ख्वाहिश तो दूसरी तरफ देवालय से पहले शौचालय की वकालत। साथ ही सिस्टम में दक्षता और चुस्त डेलिवरी की पैरोकारी।

मोदी का इशारा है कि व्यवस्था लचर तरीके से चलती रही नतीजतन चीन जैसे देश तेजी से आगे बढ़ गए और इंडिया पिछड़ गया। शासक वर्ग में देश के लिए निष्ठुर लापरवाही का नतीजा राहुल भी देख और गुन रहे। इसलिए ऐसे वर्ग समूहों से नुक्कड़ शैली में मिल रहे जो कांग्रेसी नेताओं की राजनीतिक संस्कृति कभी न रही। राहुल को अहसास हो चला है कि छह दशक का विकास समग्रता लिए हुए नहीं है। राहुल उस वाकये को भूल नहीं सकते जब गुजरात के सुरेन्द्रनगर जिले में नमक बनाने वाले मजदूरों की वे व्यथा सुन रहे थे... और उन्हें कहा गया कि हेल्थ हेजार्ड की वजह से मरने पर इन मजदूरों की लाश भी पूरी तरह नहीं जल पाती।

यानि कमियां हर तरफ हैं और लोगों की दिक्कतों पर संवेदनशीलता का घोर अभाव है। नेहरू इस तरह की चुनोती की अहमियत जानते थे तभी उन्होंने कहा था कि- .... सरकार के प्रयासों को लोक हित के पैमाने पर ही कसा जा सकता...असल मकसद लोगों की खुशी हैं। नेहरू ने अपने को – फर्स्ट सर्वेंट ऑफ इंडियन पीपुल – यूं ही नहीं कहा था। तो क्या राहुल सचेत होकर उस तरह की कमी को पाटने की हसरत पाले आगे बढ़ रहे हैं जो देश की प्रगति की राह में रोड़ा बन खड़ी रही। इन बाधाओं की फेहरिस्त लंबी हो सकती है। मसलन सहकर्मियों के लाख मना करने के बावजूद नेहरू का आईसीएस को जारी रखना, कांग्रेस के अहंकारी नेताओं का वो भाव कि इनके सिवा इस देश को कोई नहीं चला सकता, सत्ता से जुड़े सब तरह के भ्रष्ट आचरण को वैद्य मानते जाना, शासन प्रणाली में पनपी सड़ांध के प्रति निर्विकार रूख अपनाना...

राहुल विविध समूहों से मिल रहे और वहां जाति और धर्म वाली राजनीति का खयाल नहीं करते। ये संतोष देने लायक अभीष्ठ हो सकता है। लेकिन नेहरू को बरबस याद करने वाले कांग्रेसी दिग्गज चुनाव को सेक्यूलर बनाम कम्यूनल रखने पर अड़े हुए हैं। चुनावी रणनीति के नाम पर राहुल भी उनके लपेटे में आ रहे। राहुल बार बार गुजरात दंगों पर बयान दे रहे हैं। कभी राजा अशोक और अकबर से अपनी तुलना करते तो औरंगजेब का नाम ले मोदी की तरफ इशारा कर जाते। इस बीच सच्चर कमिटी पर चर्चा थम सी गई है...इस रिपोर्ट की तल्ख सच्चाई का सामने आना उन्हें गवारा नहीं लिहाजा दंगा केन्द्रित चुनाव अभियान पर फोकस है।

कांग्रेस ब्रांड सेक्यूलरिस्ट नेहरू को जितना याद करते... बीजेपी वाले इंदिरा के पराक्रम की प्रशंसा कर और नरेन्द्र मोदी खास तौर पर पटेल का गुणगान कर उन्हें छका जाते। मोदी के लिए पटेल महज चुनावी तिलिस्म नहीं हैं। रह रह कर चीन से मिली पराजय की चर्चा तो हो ही रही है साथ ही पटेल की अप्रतिम सबसे उंची प्रतिमा बनाने की कवायद चल रही है। मोदी कहते निर्माण का बेजोड़ नमूना होगा ये। वही – निर्माण – शब्द जो नेहरू को प्रिय था। खांचे में बांट कर सियासी फायदा लेने की चाहत वाला कांग्रेसी तबका आरएसएस पर पटेल की राय का हवाला दे रहा है पर पटेल के उस बयान से कन्नी काटने की कोशिश भी दिखती जिसमें इंडिया के पहले गृह मंत्री ने नेहरू को – द ओनली नेशनलिस्ट मुसलिम आई नो – कह कर संबोधित किया था। अब राहुल क्या करें... जनसंवाद और अपने वरिष्ठों के दंगा केन्द्रित अभियान के बीच के कशमकश से कैसे पार पाएं? क्या नेहरू से संबल पाने की अभिलाषा करें वे?

आजादी के बाद का समय... गंभीर अन्न संकट के चलते अनाज आयात की नौबत। साल १९५२ की ही बात है जब नेहरू कह उठे - ... मुझे खेद है कि मेरे वचन झूठे साबित हुए हैं और मैं बेहद शर्मिंदा महसूस कर रहा हूं कि देश के लिए जो संकल्प मैंने लिए वो गलत साबित हो रहे...

ये उन्हीं नेहरू के शब्द हैं जिनकी सोच सिंथेटिक होने की बात गाहे-बगाहे उठती रही। साल १९४२ में ही महात्मा गांधी ने नेहरू पर जो टिप्पणी की थी उसे गौर करें - ... हमारे मतभेद तभी से सामने आने लगे जबसे हम सहकर्मी बने... और मैं सालों से कह रहा कि राजाजी नहीं बल्कि नेहरू मेरे उत्तराधिकारी होंगे... नेहरू मेरी भाषा(विचार) नहीं समझते और वो जो भाषा(विचार) बोलते वो मेरे लिए भदेसी है... लेकिन मैं जानता हूं कि जब मैं नहीं रहूंगा... तब वो मेरी भाषा बोलेंगे...

राहुल अपनी भाषा की तलाश में हैं। ये भी कहा जाता है कि काफी ना-नुकुर के बाद उन्होंने कमान संभाली है। यूपीए के दस साल की एंटी इनकंबेंसी का बैगेज है उनपर। सुदूर इलाकों की खाक छानने से मिला अनुभव उन्हें इंडिया के साथ भारत के भी दर्शन करा रहा है। लोगों को अधिकार संपन्न बनाने जैसे राजनीतिक मुहाबरे का साथ है उनके पास। ऐसा मानने वाले बहुत हैं जो उनको साल २०१९ आम चुनावों में फेवरिट पीएम मैटेरियल साबित होने वाला बताते। वे कहते कि तब तक - राहुल कांग्रेस - आकार ले चुका होगा जो उनके पीछे खड़ा होगा।

नेहरू ने भारत को जानने की कोशिश की और डिस्सकवरी ऑफ इंडिया लिख डाली। राहुल भारत और उसकी जनआकांक्षा को डिस्कवर कर रहे। वे कहते कि इस आकांक्षा की झलक कांग्रेस के मेनिफेस्टो में दिखेगी। अब नेहरू के एक और बयान से गुजरिए-
... हम आधुनिक युग से तभी तालमेल बिठा पाएंगे जब हम लेटेस्ट टेक्नीक का इस्तेमाल करेंगे... चाहे वो बड़ी फैक्ट्रियां हों या छोटी या फिर ग्रामीण उद्योग....
न जाने नेहरू यहां पर गांधी की भाषा किस हद तक बोल रहे थे...दिलचस्प है कि नरेन्द्र मोदी के भाषणों में नेहरू के इस समझ की प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है। चुनाव प्रचार के शोर के बीच याद रखना जरूरी है कि हाल के समय में औद्योगिक विकास में इंडिया काफी पिछड़ा है।

साल १९६४...स्थान- भुवनेश्वर.... नेहरू का आखिरी भाषण...इसके कुछ अंश देखें-
... केवल भौतिक उन्नति मानव जीवन को मूल्यवान और सार्थक नहीं बना सकता... आर्थिक विकास के साथ नैतिक और आध्यात्मिक मूल्य को बढ़ावा देना होगा... ये मानव संपदा को पूरी तरह सुखी और चारित्रिक बनाए रखेगा...
संभव है सोच के ऐसे रंग देश के एक बड़े वर्ग और बीजेपी के चुनिंदा बुजुर्ग नेताओं के उद्गार में दिखें। जहां नैतिकता और चरित्र जैसे शब्द हों ... ऐसी समझ को मौजूदा प्रगतिशील यथास्थितिवादी कह कर खारिज करते रहते। राहुल जब अपने वरिष्ठों और प्रगिशीलों की दंगा केन्द्रित अभियान की बातें सुनते हैं तो क्या उन्हें नेहरू के इस कथन का अख्यास रहता है?  

डिस्कवरी ऑफ इंडिया के एक और अंश को देखें-
... आधुनिक मानस... व्यावहारिक और विवेकसम्मत, नैतिक और सामाजिक है.... ये तबका सामाजिक बेहतरी के लिए व्यावहारिक आदर्श से संचालित है... यही आदर्श जो उसे प्रेरित करते...- युगधर्म – है... इसके लिए मानवता ही ईश्वर है और समाज सेवा ही इसका धर्म है...
यहां हुक्मरानों के लिए उस बड़प्पन से सरोकार जताने की ओर संकेत है कि सत्ता में यांत्रिक सोच न हो। नेहरू के इस- युग धर्म - की पटेल को याद करने वाले नरेन्द्र मोदी और कशमकश से जूझ रहे राहुल गांधी कितनी गरमाहट महसूस करने को तैयार हैं...ये तो वे ही बता सकते...?  


19.2.14

देश ऐसे नहीं चलाई जाती ... केजरीवालजी

देश ऐसे नहीं चलाई जाती ... केजरीवालजी
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संजय मिश्र
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२१ जनवरी २०१४ की सुबह... इंडिया के लोगों ने जब अस्त-व्यस्त हालत में केजरीवाल को देखा तो वे फक्र से तर-बतर हो गए ... सर्द मौसम में.... सड़क पर.... देश का एक सीएम अपने कैबिनेट के साथ बीती रात गुजार कर उठा था ... केजरीवाल से लाख असहमतियों के बावजूद ये दृष्य निश्चय ही ऐतिहासिक रहे। एक तरफ राजा-महराजा और भोग-विलास वाली मानसिकता...तो दूसरी ओर इस मानसिकता से संघर्षरत नई किस्म की राजनीति... एक तरफ राज करने की ठसक तो दूसरी ओर सीधे प्रजातंत्र के तत्वों को स्थापित करने की अभिलाषा। अन्ना ने मौजूदा प्रजातांत्रिक रूख को जो आक्सीजन दी ... उसी का ये विराट रूप आस लगाने वालों को संतोष दे रहा था।

उस दिन जनमानस इस बात को इग्नोर करने के लिए भी तैयार दिखा कि रेल भवन के सामने दिए जा रहे धरना का लक्ष्य कितना मामूली था। एक मंत्री के विवादों से ध्यान बटाने की कोशिश। उम्मीद बंधी कि ये कदम दिल्ली राज्य के अधिकार बढ़ाने की ओर रूपायित हो जाएगा। संतोष इस बात का कि ऐसे कदमों से आखिरकार नई राजनीति के सपनों को पंख लगेंगे। धरने का अंत निराशाजनक साबित हुआ। निराशा संताप में उस दिन बदल गई जब शासन के ४९ वें दिन केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया।  

आम आदमी पार्टी की सरकार के ४९ दिनी कार्यकाल पर सरसरी नजर दौड़ाएं तो उस तरह के लक्षण दिखते जो आशावानों में क्षोभ पैदा कर सकते। बतौर सरकार के मुखिया अरविंद केजरीवाल की खतरनाक मंसूबों वाली तस्वीर हुलकी मारने लगती। सत्ता को एडवेंचर की मानिंद चलाने की उत्कट कोशिश। परसेप्सन बना कि न तो इस रोमांच को वे न्यायसंगत बना पाए और न ही इंडियन पालिटिक्स को शासन के जरिए कोई नया अवदान देने में कामयाब हो सके। उल्टे इंडिया सहम सा गया है। कई कई बार केजरीवाल शासन की जतन से पड़ताल कर लेने की अकुलाहट सभी तरफ पसर गई है।

नई राजनीति का सपना इस दौर में आकार ले पाने से पहले ही कुम्हलाने लगा। ऐसा पहली दफा हुआ कि कोई राजनीतिक दल लोकसभा चुनाव लड़ने की लालच में राज्य सरकार की जिम्मेदारी छोड़ भाग खड़ी हुई। बेशक ऐसा कहने वाले मिल जाएंगे जो इस तरह की छवि को केजरीवाल के खिलाफ नकारात्मकता अभियान करार दे दे। पर याद रखना चाहिए कि केजरीवाल ने गुमान से कहा था कि वो एनार्किस्ट हैं। हालांकि उनके उस बयान से सहमति नहीं जताई जा सकती पर आआप नेताओं के कार्यकलापों में अधीरता, महत्वाकांक्षा, बात से पलटना, हकीकत से उलट दावे करना परेशान करने वाले संकेत तो हैं ही। ये संकेत तो पारंपरिक राजनीति को पहले से ही लहुलुहान किए हुए हैं।  

ये नहीं भूलना चाहिए कि केजरीवाल सरकार के अधिकांश कदम अनूठे नहीं हैं और इस देश में पहले भी उठाए गए हैं। सीएम का धरने पर बैठना और फौरी राहत मिलते ही धरने से उठ जाना, जनता दरबार लगाना और फिर उससे तौबा करना, एलीट संस्कृति से दूरी बनाना और बाद में उसका लाभ ले लेना, सत्ता में जाने के लिए रेफरेंडम करना लेकिन सत्ता छोड़ने के लिए ऐसा नहीं करना... ये विरोधाभास मुंह बाए खड़े हैं। नई राजनीति के बिंदु ये तब बनते जब इन्हें अधिक रूचिकर बनाया जाता साथ ही इसके लिए दीर्घकालिक ललक दिखाई जाती। जिस दिल्ली जनलोकपाल बिल और स्वराज बिल को आआप के दिल के करीब बताया गया उन्हीं बिलों की बलि लेकर सत्ता से छुटकारा पाया गया।

सत्ता छोड़ने की इस कवायद को क्लासिकल राजनीतिक पलायन के रूप में दर्ज करेगा इतिहास। उपराज्यपाल के संदेश पर मतविभाजन में पिटी थी सरकार लेकिन झूठी दलील दी गई कि जनलोकपाल पेश नहीं होने के कारण छोड़ी सत्ता। असली मंशा तब खुल कर सामने आई जब दावा किया गया कि बहुमत की सरकार ने विधानमंडल भंग करने की सिफारिश की है लिहाजा चुनाव कराए जाएं। नजर इस बात पर कि लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव भी करवा लिए जाएं।

केजरीवाल ने अरमान जगाया था कि वे सर्जक की भूमिका निभाएंगे। लेकिन दिल्ली जनलोकपाल बिल उपराज्यपाल को नहीं भेजने की जिद हैरत में डाल गया। संदेश दिया गया कि ये ड्यूटी आफ डिसओबेडिएंस है। किस खातिर? जवाब आया कि दिल्ली विधानसभा के अधिकार वापस दिलाने की खातिर। पर इसके लिए केजरीवाल ने कोई पहल नहीं की। अधिकार दिलाने के उभर-खाबर राह के बावजूद वे सर्वदलीय शिष्टमंडल लेकर राष्ट्रपति और पीएम से मिल सकते थे। कुछ हासिल नहीं होता तो एक बार फिर बतौर सीएम धरने पर ही बैठ जाते। विपक्षी दलों के नेताओं को अपने साथ धरने पर बैठने के लिए नैतिक दबाव बनाते। ऐसा कुछ न हुआ।

न तो दिल्ली राज्य को अधिकार मिले और न ही जनलोकपाल। हां, केजरीवाल को सुर्खियां जरूर मिलती रही। कभी नई घोषणाएं कर तो अगले दिन किसी नामी व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगाकर। उसी आरोप को अधर में छोड़ अगले ही दिन किसी दूसरे व्यक्ति पर आरोप। सिलसिला चलता रहा लेकिन आरोपों पर कोई फालोअप नहीं। हिट एंड रन का ऐसा नंगा नाच इस देश ने पहली बार देखा। घोषणाओं के अमल की फिकर नदारद। डेलिवरी सिस्टम दुरूस्त करने की पलखत नहीं। तो फिर मौजूदा सिस्टम से अविश्वास जताने का क्या मतलब?

न तो केजरीवाल मासूम हैं और न ही मीडिया भोला। मीडिया का अपना एजेंडा है २०१४ तक के लिए। केजरीवाल इस उर्वर मौके की फसल काटने में मशगूल हैं। केजरीवाल लगातार कहते हैं कि वो नेताओं को राजनीति सिखा रहे। उन्हें भले परवाह न हो पर राजनीति सिखाने के इस अंदाज में जो अहंकार टपकता है वो नई राजनीति का मुंह जरूर चिढ़ा रहा। तो क्या नई राजनीति के पहरूए झूठ बोलना सिखा रहे... बात से मुकड़ने की नसीहत दे रहे.. आरोप लगाने की ट्रेनिंग दे रहे हैं?


इन प्रवृतियों का महिमामंडन हुआ तो पारंपरिक राजनीति इसे हाथों-हाथ लेगी। तब इंडिया को बिचलित होने से रोका नहीं जा सकेगा। नई राजनीति के पैरोकारों के लिए ये गंभीर चुनौती है। ये महज संयोग नहीं कि हर राजनीतिक आंदोलन की सफलता के तत्काल बाद इंडिया सिसकने लगता है। गांधी उतने निराश नहीं हुए होंगे जितने की जेपी ... और जेपी उतने निराश नहीं हुए होंगे जितने की अन्ना हो सकते हैं। क्या इंडिया इस तरह की निराशा का जोखिम ले सकेगा? २०१४ चुनावों तक सब्र करें... अरसा बिताने की जरूरत कहां। 

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