life is celebration

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18.3.14

नेहरू...नरेन्द्र मोदी....और राहुल

नेहरू...नरेन्द्र मोदी....और राहुल
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संजय मिश्र
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नरेन्द्र मोदी भव्य भारत बनाने का सपना देख और दिखा रहे हैं। उनकी तमन्ना है कि ये देश इतना ऐश्वर्यशाली बने कि वो विकसित देशों की कतार में हो और उसे नेतृत्व दे सके। देश के कोने-कोने में रैलियां कर वे अपने मंसूबों का इजहार कर रहे। आम चुनाव माथे पर है लिहाजा राहुल गांधी दम-खम के साथ सुदूर इलाकों में जाकर राजनीतिक प्रयोग की नई मीमांसा में लगे हैं। वहीं उनकी पार्टी का थिंक टैंक कांग्रेस ब्रांड सेक्यूलरिज्म और कम्यूनलिज्म के दो खांचे में इंडिया को आबद्ध करने में लीन हैं। जाहिर है साल २०१४ के आम चुनाव रोचक बन गए हैं।

वैभवशाली इंडिया की बात चले ... निर्माण के सपने हों.. तो नेहरू का नाम अनायास ही जेहन में कौंधेगा... उनकी राजनीतिक विरासत की धड़कन सुनाई देगी। इंडिया के पहले पीएम विकासशील और तकनीक संपन्न देश बनाना चाहते थे। हर तरफ निर्माण की गूंज थी तब। फैक्ट्रियों को वे आधुनिक मंदिर कहा करते। आज नरेन्द्र मोदी अतुल्य विकसित भारत की कल्पना में गोता लगा रहे। एक तरफ दुनिया की सबसे उंची प्रतिमा निर्माण की ख्वाहिश तो दूसरी तरफ देवालय से पहले शौचालय की वकालत। साथ ही सिस्टम में दक्षता और चुस्त डेलिवरी की पैरोकारी।

मोदी का इशारा है कि व्यवस्था लचर तरीके से चलती रही नतीजतन चीन जैसे देश तेजी से आगे बढ़ गए और इंडिया पिछड़ गया। शासक वर्ग में देश के लिए निष्ठुर लापरवाही का नतीजा राहुल भी देख और गुन रहे। इसलिए ऐसे वर्ग समूहों से नुक्कड़ शैली में मिल रहे जो कांग्रेसी नेताओं की राजनीतिक संस्कृति कभी न रही। राहुल को अहसास हो चला है कि छह दशक का विकास समग्रता लिए हुए नहीं है। राहुल उस वाकये को भूल नहीं सकते जब गुजरात के सुरेन्द्रनगर जिले में नमक बनाने वाले मजदूरों की वे व्यथा सुन रहे थे... और उन्हें कहा गया कि हेल्थ हेजार्ड की वजह से मरने पर इन मजदूरों की लाश भी पूरी तरह नहीं जल पाती।

यानि कमियां हर तरफ हैं और लोगों की दिक्कतों पर संवेदनशीलता का घोर अभाव है। नेहरू इस तरह की चुनोती की अहमियत जानते थे तभी उन्होंने कहा था कि- .... सरकार के प्रयासों को लोक हित के पैमाने पर ही कसा जा सकता...असल मकसद लोगों की खुशी हैं। नेहरू ने अपने को – फर्स्ट सर्वेंट ऑफ इंडियन पीपुल – यूं ही नहीं कहा था। तो क्या राहुल सचेत होकर उस तरह की कमी को पाटने की हसरत पाले आगे बढ़ रहे हैं जो देश की प्रगति की राह में रोड़ा बन खड़ी रही। इन बाधाओं की फेहरिस्त लंबी हो सकती है। मसलन सहकर्मियों के लाख मना करने के बावजूद नेहरू का आईसीएस को जारी रखना, कांग्रेस के अहंकारी नेताओं का वो भाव कि इनके सिवा इस देश को कोई नहीं चला सकता, सत्ता से जुड़े सब तरह के भ्रष्ट आचरण को वैद्य मानते जाना, शासन प्रणाली में पनपी सड़ांध के प्रति निर्विकार रूख अपनाना...

राहुल विविध समूहों से मिल रहे और वहां जाति और धर्म वाली राजनीति का खयाल नहीं करते। ये संतोष देने लायक अभीष्ठ हो सकता है। लेकिन नेहरू को बरबस याद करने वाले कांग्रेसी दिग्गज चुनाव को सेक्यूलर बनाम कम्यूनल रखने पर अड़े हुए हैं। चुनावी रणनीति के नाम पर राहुल भी उनके लपेटे में आ रहे। राहुल बार बार गुजरात दंगों पर बयान दे रहे हैं। कभी राजा अशोक और अकबर से अपनी तुलना करते तो औरंगजेब का नाम ले मोदी की तरफ इशारा कर जाते। इस बीच सच्चर कमिटी पर चर्चा थम सी गई है...इस रिपोर्ट की तल्ख सच्चाई का सामने आना उन्हें गवारा नहीं लिहाजा दंगा केन्द्रित चुनाव अभियान पर फोकस है।

कांग्रेस ब्रांड सेक्यूलरिस्ट नेहरू को जितना याद करते... बीजेपी वाले इंदिरा के पराक्रम की प्रशंसा कर और नरेन्द्र मोदी खास तौर पर पटेल का गुणगान कर उन्हें छका जाते। मोदी के लिए पटेल महज चुनावी तिलिस्म नहीं हैं। रह रह कर चीन से मिली पराजय की चर्चा तो हो ही रही है साथ ही पटेल की अप्रतिम सबसे उंची प्रतिमा बनाने की कवायद चल रही है। मोदी कहते निर्माण का बेजोड़ नमूना होगा ये। वही – निर्माण – शब्द जो नेहरू को प्रिय था। खांचे में बांट कर सियासी फायदा लेने की चाहत वाला कांग्रेसी तबका आरएसएस पर पटेल की राय का हवाला दे रहा है पर पटेल के उस बयान से कन्नी काटने की कोशिश भी दिखती जिसमें इंडिया के पहले गृह मंत्री ने नेहरू को – द ओनली नेशनलिस्ट मुसलिम आई नो – कह कर संबोधित किया था। अब राहुल क्या करें... जनसंवाद और अपने वरिष्ठों के दंगा केन्द्रित अभियान के बीच के कशमकश से कैसे पार पाएं? क्या नेहरू से संबल पाने की अभिलाषा करें वे?

आजादी के बाद का समय... गंभीर अन्न संकट के चलते अनाज आयात की नौबत। साल १९५२ की ही बात है जब नेहरू कह उठे - ... मुझे खेद है कि मेरे वचन झूठे साबित हुए हैं और मैं बेहद शर्मिंदा महसूस कर रहा हूं कि देश के लिए जो संकल्प मैंने लिए वो गलत साबित हो रहे...

ये उन्हीं नेहरू के शब्द हैं जिनकी सोच सिंथेटिक होने की बात गाहे-बगाहे उठती रही। साल १९४२ में ही महात्मा गांधी ने नेहरू पर जो टिप्पणी की थी उसे गौर करें - ... हमारे मतभेद तभी से सामने आने लगे जबसे हम सहकर्मी बने... और मैं सालों से कह रहा कि राजाजी नहीं बल्कि नेहरू मेरे उत्तराधिकारी होंगे... नेहरू मेरी भाषा(विचार) नहीं समझते और वो जो भाषा(विचार) बोलते वो मेरे लिए भदेसी है... लेकिन मैं जानता हूं कि जब मैं नहीं रहूंगा... तब वो मेरी भाषा बोलेंगे...

राहुल अपनी भाषा की तलाश में हैं। ये भी कहा जाता है कि काफी ना-नुकुर के बाद उन्होंने कमान संभाली है। यूपीए के दस साल की एंटी इनकंबेंसी का बैगेज है उनपर। सुदूर इलाकों की खाक छानने से मिला अनुभव उन्हें इंडिया के साथ भारत के भी दर्शन करा रहा है। लोगों को अधिकार संपन्न बनाने जैसे राजनीतिक मुहाबरे का साथ है उनके पास। ऐसा मानने वाले बहुत हैं जो उनको साल २०१९ आम चुनावों में फेवरिट पीएम मैटेरियल साबित होने वाला बताते। वे कहते कि तब तक - राहुल कांग्रेस - आकार ले चुका होगा जो उनके पीछे खड़ा होगा।

नेहरू ने भारत को जानने की कोशिश की और डिस्सकवरी ऑफ इंडिया लिख डाली। राहुल भारत और उसकी जनआकांक्षा को डिस्कवर कर रहे। वे कहते कि इस आकांक्षा की झलक कांग्रेस के मेनिफेस्टो में दिखेगी। अब नेहरू के एक और बयान से गुजरिए-
... हम आधुनिक युग से तभी तालमेल बिठा पाएंगे जब हम लेटेस्ट टेक्नीक का इस्तेमाल करेंगे... चाहे वो बड़ी फैक्ट्रियां हों या छोटी या फिर ग्रामीण उद्योग....
न जाने नेहरू यहां पर गांधी की भाषा किस हद तक बोल रहे थे...दिलचस्प है कि नरेन्द्र मोदी के भाषणों में नेहरू के इस समझ की प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है। चुनाव प्रचार के शोर के बीच याद रखना जरूरी है कि हाल के समय में औद्योगिक विकास में इंडिया काफी पिछड़ा है।

साल १९६४...स्थान- भुवनेश्वर.... नेहरू का आखिरी भाषण...इसके कुछ अंश देखें-
... केवल भौतिक उन्नति मानव जीवन को मूल्यवान और सार्थक नहीं बना सकता... आर्थिक विकास के साथ नैतिक और आध्यात्मिक मूल्य को बढ़ावा देना होगा... ये मानव संपदा को पूरी तरह सुखी और चारित्रिक बनाए रखेगा...
संभव है सोच के ऐसे रंग देश के एक बड़े वर्ग और बीजेपी के चुनिंदा बुजुर्ग नेताओं के उद्गार में दिखें। जहां नैतिकता और चरित्र जैसे शब्द हों ... ऐसी समझ को मौजूदा प्रगतिशील यथास्थितिवादी कह कर खारिज करते रहते। राहुल जब अपने वरिष्ठों और प्रगिशीलों की दंगा केन्द्रित अभियान की बातें सुनते हैं तो क्या उन्हें नेहरू के इस कथन का अख्यास रहता है?  

डिस्कवरी ऑफ इंडिया के एक और अंश को देखें-
... आधुनिक मानस... व्यावहारिक और विवेकसम्मत, नैतिक और सामाजिक है.... ये तबका सामाजिक बेहतरी के लिए व्यावहारिक आदर्श से संचालित है... यही आदर्श जो उसे प्रेरित करते...- युगधर्म – है... इसके लिए मानवता ही ईश्वर है और समाज सेवा ही इसका धर्म है...
यहां हुक्मरानों के लिए उस बड़प्पन से सरोकार जताने की ओर संकेत है कि सत्ता में यांत्रिक सोच न हो। नेहरू के इस- युग धर्म - की पटेल को याद करने वाले नरेन्द्र मोदी और कशमकश से जूझ रहे राहुल गांधी कितनी गरमाहट महसूस करने को तैयार हैं...ये तो वे ही बता सकते...?  


19.2.14

देश ऐसे नहीं चलाई जाती ... केजरीवालजी

देश ऐसे नहीं चलाई जाती ... केजरीवालजी
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संजय मिश्र
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२१ जनवरी २०१४ की सुबह... इंडिया के लोगों ने जब अस्त-व्यस्त हालत में केजरीवाल को देखा तो वे फक्र से तर-बतर हो गए ... सर्द मौसम में.... सड़क पर.... देश का एक सीएम अपने कैबिनेट के साथ बीती रात गुजार कर उठा था ... केजरीवाल से लाख असहमतियों के बावजूद ये दृष्य निश्चय ही ऐतिहासिक रहे। एक तरफ राजा-महराजा और भोग-विलास वाली मानसिकता...तो दूसरी ओर इस मानसिकता से संघर्षरत नई किस्म की राजनीति... एक तरफ राज करने की ठसक तो दूसरी ओर सीधे प्रजातंत्र के तत्वों को स्थापित करने की अभिलाषा। अन्ना ने मौजूदा प्रजातांत्रिक रूख को जो आक्सीजन दी ... उसी का ये विराट रूप आस लगाने वालों को संतोष दे रहा था।

उस दिन जनमानस इस बात को इग्नोर करने के लिए भी तैयार दिखा कि रेल भवन के सामने दिए जा रहे धरना का लक्ष्य कितना मामूली था। एक मंत्री के विवादों से ध्यान बटाने की कोशिश। उम्मीद बंधी कि ये कदम दिल्ली राज्य के अधिकार बढ़ाने की ओर रूपायित हो जाएगा। संतोष इस बात का कि ऐसे कदमों से आखिरकार नई राजनीति के सपनों को पंख लगेंगे। धरने का अंत निराशाजनक साबित हुआ। निराशा संताप में उस दिन बदल गई जब शासन के ४९ वें दिन केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया।  

आम आदमी पार्टी की सरकार के ४९ दिनी कार्यकाल पर सरसरी नजर दौड़ाएं तो उस तरह के लक्षण दिखते जो आशावानों में क्षोभ पैदा कर सकते। बतौर सरकार के मुखिया अरविंद केजरीवाल की खतरनाक मंसूबों वाली तस्वीर हुलकी मारने लगती। सत्ता को एडवेंचर की मानिंद चलाने की उत्कट कोशिश। परसेप्सन बना कि न तो इस रोमांच को वे न्यायसंगत बना पाए और न ही इंडियन पालिटिक्स को शासन के जरिए कोई नया अवदान देने में कामयाब हो सके। उल्टे इंडिया सहम सा गया है। कई कई बार केजरीवाल शासन की जतन से पड़ताल कर लेने की अकुलाहट सभी तरफ पसर गई है।

नई राजनीति का सपना इस दौर में आकार ले पाने से पहले ही कुम्हलाने लगा। ऐसा पहली दफा हुआ कि कोई राजनीतिक दल लोकसभा चुनाव लड़ने की लालच में राज्य सरकार की जिम्मेदारी छोड़ भाग खड़ी हुई। बेशक ऐसा कहने वाले मिल जाएंगे जो इस तरह की छवि को केजरीवाल के खिलाफ नकारात्मकता अभियान करार दे दे। पर याद रखना चाहिए कि केजरीवाल ने गुमान से कहा था कि वो एनार्किस्ट हैं। हालांकि उनके उस बयान से सहमति नहीं जताई जा सकती पर आआप नेताओं के कार्यकलापों में अधीरता, महत्वाकांक्षा, बात से पलटना, हकीकत से उलट दावे करना परेशान करने वाले संकेत तो हैं ही। ये संकेत तो पारंपरिक राजनीति को पहले से ही लहुलुहान किए हुए हैं।  

ये नहीं भूलना चाहिए कि केजरीवाल सरकार के अधिकांश कदम अनूठे नहीं हैं और इस देश में पहले भी उठाए गए हैं। सीएम का धरने पर बैठना और फौरी राहत मिलते ही धरने से उठ जाना, जनता दरबार लगाना और फिर उससे तौबा करना, एलीट संस्कृति से दूरी बनाना और बाद में उसका लाभ ले लेना, सत्ता में जाने के लिए रेफरेंडम करना लेकिन सत्ता छोड़ने के लिए ऐसा नहीं करना... ये विरोधाभास मुंह बाए खड़े हैं। नई राजनीति के बिंदु ये तब बनते जब इन्हें अधिक रूचिकर बनाया जाता साथ ही इसके लिए दीर्घकालिक ललक दिखाई जाती। जिस दिल्ली जनलोकपाल बिल और स्वराज बिल को आआप के दिल के करीब बताया गया उन्हीं बिलों की बलि लेकर सत्ता से छुटकारा पाया गया।

सत्ता छोड़ने की इस कवायद को क्लासिकल राजनीतिक पलायन के रूप में दर्ज करेगा इतिहास। उपराज्यपाल के संदेश पर मतविभाजन में पिटी थी सरकार लेकिन झूठी दलील दी गई कि जनलोकपाल पेश नहीं होने के कारण छोड़ी सत्ता। असली मंशा तब खुल कर सामने आई जब दावा किया गया कि बहुमत की सरकार ने विधानमंडल भंग करने की सिफारिश की है लिहाजा चुनाव कराए जाएं। नजर इस बात पर कि लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव भी करवा लिए जाएं।

केजरीवाल ने अरमान जगाया था कि वे सर्जक की भूमिका निभाएंगे। लेकिन दिल्ली जनलोकपाल बिल उपराज्यपाल को नहीं भेजने की जिद हैरत में डाल गया। संदेश दिया गया कि ये ड्यूटी आफ डिसओबेडिएंस है। किस खातिर? जवाब आया कि दिल्ली विधानसभा के अधिकार वापस दिलाने की खातिर। पर इसके लिए केजरीवाल ने कोई पहल नहीं की। अधिकार दिलाने के उभर-खाबर राह के बावजूद वे सर्वदलीय शिष्टमंडल लेकर राष्ट्रपति और पीएम से मिल सकते थे। कुछ हासिल नहीं होता तो एक बार फिर बतौर सीएम धरने पर ही बैठ जाते। विपक्षी दलों के नेताओं को अपने साथ धरने पर बैठने के लिए नैतिक दबाव बनाते। ऐसा कुछ न हुआ।

न तो दिल्ली राज्य को अधिकार मिले और न ही जनलोकपाल। हां, केजरीवाल को सुर्खियां जरूर मिलती रही। कभी नई घोषणाएं कर तो अगले दिन किसी नामी व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगाकर। उसी आरोप को अधर में छोड़ अगले ही दिन किसी दूसरे व्यक्ति पर आरोप। सिलसिला चलता रहा लेकिन आरोपों पर कोई फालोअप नहीं। हिट एंड रन का ऐसा नंगा नाच इस देश ने पहली बार देखा। घोषणाओं के अमल की फिकर नदारद। डेलिवरी सिस्टम दुरूस्त करने की पलखत नहीं। तो फिर मौजूदा सिस्टम से अविश्वास जताने का क्या मतलब?

न तो केजरीवाल मासूम हैं और न ही मीडिया भोला। मीडिया का अपना एजेंडा है २०१४ तक के लिए। केजरीवाल इस उर्वर मौके की फसल काटने में मशगूल हैं। केजरीवाल लगातार कहते हैं कि वो नेताओं को राजनीति सिखा रहे। उन्हें भले परवाह न हो पर राजनीति सिखाने के इस अंदाज में जो अहंकार टपकता है वो नई राजनीति का मुंह जरूर चिढ़ा रहा। तो क्या नई राजनीति के पहरूए झूठ बोलना सिखा रहे... बात से मुकड़ने की नसीहत दे रहे.. आरोप लगाने की ट्रेनिंग दे रहे हैं?


इन प्रवृतियों का महिमामंडन हुआ तो पारंपरिक राजनीति इसे हाथों-हाथ लेगी। तब इंडिया को बिचलित होने से रोका नहीं जा सकेगा। नई राजनीति के पैरोकारों के लिए ये गंभीर चुनौती है। ये महज संयोग नहीं कि हर राजनीतिक आंदोलन की सफलता के तत्काल बाद इंडिया सिसकने लगता है। गांधी उतने निराश नहीं हुए होंगे जितने की जेपी ... और जेपी उतने निराश नहीं हुए होंगे जितने की अन्ना हो सकते हैं। क्या इंडिया इस तरह की निराशा का जोखिम ले सकेगा? २०१४ चुनावों तक सब्र करें... अरसा बिताने की जरूरत कहां। 

30.12.13

मोदी, केजरीवाल और मीडिया

मोदी, केजरीवाल और मीडिया
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संजय मिश्र
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दिल्ली में राजनीतिक शतरंज की गोटियां बिठाने की चाल हद से ज्यादा चली जा रही है...राजनीतिक खिलाड़ी पर्दे के पीछे हैं और वहां का मीडिया खुद मोहरा बन इसकी अगुवाई कर रहा है... इंडिया में जो वर्ग केजरीवाल के उभार से व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीदें पाले बैठा है वे सुखद अनुभूति से भर उठे होंगे कि अब नरेन्द्र मोदी के बरक्स केजरीवाल को राजनीतिक क्षितिज पर पेश किया जा रहा है... नगर निगम से थोड़ी ही ज्यादा पावर वाले दिल्ली के विधानसभा के सत्ताधीशों से देश में राजनीतिक क्रांति का ज्वार पैदा करने वाले मीडिया में केजरीवाल वर्सेस राहुल गांधी जैसे जुमले का नहीं होना संदेह जगाने के लिए काफी है। आप फेनोमेना के मुरीदों को इस पर चौंकना चाहिए।

ध्यान उस खबर की तरफ भी जानी चाहिए कि दिल्ली सचिवालय से पत्रकार बाहर कर दिए गए... उससे भी बड़ी खबर है कि वे आप की सरकारी टीम पर चीख कर अपनी हैसियत बघार रहे थे... वही पत्रकार जो चिदंबरम की एक अदद एडवाइजरी पर सांसें थाम लेते थे... वही लोग जो कपिल सिब्बल के इशारे पर रामलीला मैदान में रामदेव के समर्थकों पर देर रात हुए बर्बर लाठी चार्ज की विजुवल अपनी बुलेटिनों से गायब कर देते रहे... उनकी वो कारस्तानी याद होगी आपको जब कोर्ट के संज्ञान लेते ही उस लाठी चार्ज के विजुवल बुलेटिनों में छा गए थे... और अगले दिन से ही विजुवल के गायब होने का सिलसिला फिर से शुरू...फिर सचिवालय के बाहर का ये आक्रोश और स्टूडियो में केजरीवाल वंदना दोनों साथ-साथ चलने के क्या मायने हैं? 

मीडिया का क्या है?... उसने अपनी गत पेंडूलम की बना रखी है... उसकी डिक्सनरी में निर्लज्जता जैसे शब्द नहीं हैं... लिहाजा दिल्ली के सत्ता केन्द्रों की मादक आंच के आदी वहां के पत्रकार सयाना बन रहे हैं। पर लालू प्रसाद के बयान ने उनकी पोल-पट्टी को उघार कर रख दिया है। लालू प्रसाद की मानें तो राहुल का कोई मुकाबला नहीं है... मोदी और केजरीवाल की राहुल के सामने कोई राजनीतिक हैसियत नहीं... ये तो बस मीडिया की उपज हैं... यानि राहुल सर्वमान्य हैं और बाकि लोगों की बाकि लोगों से तुलना हो... मीडिया इसी पैटर्न पर आगे बढ़ रहा है...

अब वरिष्ठ कांग्रेसी जनार्दन द्विवेदी के बयान की तरफ मुड़ें... इसमें कहा गया कि केजरीवाल के पास विचारधारा नहीं है... साथ ही ये भी कहा गया कि बिन विचारधारा आम आदमी पार्टी लंबी राजनीतिक पारी नहीं खेल सकती। यानि आप पर चालाकी से हमले भी हो रहे साथ ही सहृदयता दिखा कर केजरीवाल की मोदी से तुलना भी की जा रही है। यानि मोदी की हैसियत को कमतर बताकर बीजेपी को श्रीहीन साबित करने की कवायद भी हो रही। यहां गौर करने वाली बात है कि केजरीवाल की तुलना न तो नीतीश, ममता, पटनायक से हो रही है और न ही लालू, मुलायम से..द्रविड पार्टियां तो उनके कैनवास पर ही नहीं... .

इतना ही नही... फर्ज करिए आप लोकसभा चुनावों में ३०० सीटों पर चुनाव लड़कर इतनी सीटें हासिल करे कि वो तीसरी शक्ति बन जाए तो मौजूदा थर्ड फ्रंट वाले कहां होंगे?... यानि वे चौथी शक्ति बनने को मजबूर होंगे... क्या आपने थर्ड फ्रंट को केजरीवाल रूपी चुनौती की कोई मीमांसा देखी है... .. मीडिया इन संभावनाओं पर चुप्प क्यों है? जाहिर है मीडिया उसी राह पर चलने की होशियारी कर रहा है जिस राह पर वो अन्ना आंदोलन के समय चला...याद करें अन्ना के आंदोलन की अत्यधिक कवरेज कर ये जताया जा रहा था कि विपक्ष है ही कहां? ये भी समझाया जा रहा था कि विपक्ष का रोल तो मीडिया अदा कर रहा है और अन्ना वो खाली राजनीतिक स्पेस भरने आए हैं...


मीडिया की उस समय की चतुराई जिसे खुश करने के लिए थी उसका प्रतिफल दिल्ली चुनाव के नतीजों के रूप में सामने आए हैं... जिसे खुश होना चाहिए उसका लगभग सफाया.... अब फिर से वही चालाकी...उधर बीजेपी के नेता मीडिया के झांसे में आने की लगातार नादानी कर रहे हैं...लिहाजा इस देश के आम लोग जो व्यवस्था परिवर्तन के विमर्श के फोकस में आने की उम्मीद पाले बैठे हैं उन्हें आने वाले समय में घोर निराशा होगी...आप कितने भी वायदे निभाए... अब चर्चा राजनीतिक शुचिता के प्रतीकों को बनाए रखने पर नहीं होगी.... और न ही ग्राम स्वराज के आदर्शों की बारीकियों पर कहीं नजर जमाई जाएगी... जिस कारण आप के होने का महत्व है वो दृष्य से ओझल रहेगा।   

24.12.13

अथ हवा कथा---पाकिस्तान से होकर आती है पछिया हवा

अथ हवा कथा---पाकिस्तान से होकर आती है पछिया हवा 
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संजय मिश्र
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नीतीश कुमार हवा से परेशान हैं... एलर्जी की हद तक... रह रह कर उलाहना...उद्योगपतियों को संबोधित करते हुए भी अपने इस दुख का इजहार कर गए वे....  प्रकृति भी सोच में पड़ गई हो कि बेचारे हवा से ऐसा कौन सा अपराध हो गया है... जब तक मामला मशीनी हवा (ब्लोअर वाली) में उलझा था तब तक वो इसे इनसानी लीला समझती होगी... पर अबकी निशाना पछवा (पछिया) हवा पर है... प्रकृति का संशय में आना स्वाभाविक... चलिए कुछ पल के लिए उन्हें छोड़ते हैं....

बात समाचार ये है कि नीतीश कुमार ने पहले इतिहास के प्रोफेसर की भूमिका ओढ़ ली थी... और अब वे भूगोल या फिर पर्यावरण विज्ञान पढ़ाने निकले हैं देश को. ...सच में गर्मी में ये पछिया हवा लू बनकर डराती है... और जब जाड़े का समय हो तो कोल्ड स्ट्रोक का खतरा मंडराता है... इतना तक तो ठीक है पर चिकित्सा विज्ञानी ये भी कहते कि पछिया हवा निरोगी है... इस बात को नीतीश छुपा ले जाते हैं ...नीतीश इस बात को भी छुपा लेते हैं कि पछिया हवा पाकिस्तान से होकर आती है.... 

अब आप सोच रहे होंगे कि पुरबा हवा की बारी कब आएगी? इत्मिनान रखिए चुनाव तक ऐसा होने वाला नहीं है... लिहाजा आपसे ये नहीं कहा जाएगा कि पुरबा हवा रोग लेकर आती है... अब आप क्लाइमेक्स सुनें.... जब पुरबा और पछवा हवा मिलती है तो बारिश होती है... खूब अनाज उपजता है... भुखमरी से निजात का मंसूबा बांधा जाता है... देश ...समाज उत्फुल्ल हो उठता है... खर्च करने का मन भी करने लगता है... ये सब देख उद्योग जगत मुस्कराता है.... 

आप सोच रहे होंगे कि ये कौन सी पहेली है... खुद निर्णय ले लीजिए आप.... बस पछिया की तरफ से मोदी समझिए और पुरबा का प्रतीक नीतीश को मान लें... चुनाव २०१४ तक नीतीश ज्ञान की मीमांसा करते रहें... खुदा-न-खास्ता त्रिशंकु की नौबत आई तो पछिया हवा से पुरबा हवा का मिलन तो न हो पर लिव इन रिलेशन की आकुलता के दर्शन होंगे... आखिर समझदार लोग कहते फिरते हैं कि राजनीति संभावना का खेल है ... हिम पर्वत पर विराजमान इंडिया के लोगों के धर्म वाले अराध्य पुरूष और प्रकृति राजनीति रूपी पछिया और पुरबा हवा की मचलती इस केलि क्रीड़ा को तब निहार रहे होंगे... बस शेष इस पोस्ट को पढ़नेवाले अनुमान लगा लें... जोड़ लें और घटा भी लें...

8.12.13

अहंकार का पराभव...

अहंकार का पराभव (त्वरित टिपण्णी) 
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संजय मिश्र 
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गैरकांग्रेसवाद (नरेन्द्र मोदी के शब्दों में कांग्रेस मुक्त भारत) एक बार फिर दस्तक दे चुका है... विभिन्न राज्यों के चुनावी नतीजे यही संकेत कर रहे हैं... कांग्रेस के हौसले पस्त हैं.... हाल के सालों में बीजेपी की जो डाउनस्लाइड देखी गई वो थमी है और इसके उपर जाने के आसार बन रहे हैं... .. कांग्रेस की घटत और बीजेपी की बढ़त उन जगहों पर हुई है जहां कांग्रेस ब्रांड सेक्यूलरिस्ट ये आरोप नहीं लगा सकते कि ये दंगों से उपजे पोलराइजेशन का कमाल है। 

एक बड़ा सबक जेडीयू को मिला है... नीतीश और उनका पूरा मंत्रीमंडल कई दिनों तक दिल्ली में कैंप किए रहा... आम आदमी पार्टी से ज्यादा खर्च और केंपेन के बावजूद जनता ने उन्हें खारिज किया है... संदेश यही कि कांग्रेस के साथ नीतीश जाएंगे तो नकारे जाएंगे... दिलचस्प है कि दिल्ली में बिहार के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं और वहां वोटर हैं...बिहारियों का ये मानस चौंकाता है... बिहार के अधिकांश लोग लालू एरा के शुरूआती चरण में ही दिल्ली चले गए थे और इनमें कांग्रेस के लिए वो तल्खी नहीं रही जो बिहार में रह रहे उनके परिजनों की रहती है... बावजूद इसके नीतीश की महत्वाकांक्षा को पर लगने का मौका नहीं दिया दिल्ली के लोगों ने... नीतीश की पराजय इस मायने में भी है कि वो मायावती की बीएसपी वाली परफारमेंस (दिल्ली के पिछले चुनाव में) तक नहीं पहुंच सके। 

महंगाई का डंक और उपर से कांग्रेसी नेताओं के जले पर नमक छिड़कने वाले बयानों का हिसाब चुकता करने वाली जनता ने केजरीवाल को सर आंखों पर बिठाया है...कांग्रेस के अहंकार को शिकस्त मिली है...  अप्रत्याशित और पॉलिटिकल क्लास को डराने वाले आंदोलनों का गवाह रही दिल्ली की जनता ने उन आंदोलनों को निर्ममता से कुचलने की कांग्रेसी निरंकुशता का जवाब भी दिया है... न जाने राजबाला की आत्मा कैसा महसूस कर रही हो.... जो पॉलिटिकल अनालिस्ट उन आंदोलनों को मीडिया का क्रिएशन बता कर खारिज कर रहे थे उन्हें भी सीमित संदर्भ में वोटरों ने जवाब दिया है। 

निश्चय ही केजरीवाल ने भारतीय राजनीति को नया नजरिया और नई ग्रामर दी है... ये आंदोलन के समय से लेकर चुनावी समर के नतीजों तक में उन्होंने दिखाया है... सभी जानते हैं कि अन्ना को केजरीवाल की मेहनत से वो शोहरत मिली जिसने उनमें गांधी का अक्स ताकने के लिए आज की युवा पीढ़ी को ललचाया...राष्ट्रीय फलक पर अन्ना सबके चहेते बने...नतीजों के बीच केजरीवाल को जो पॉलिटिकल पंडित सेहरा देने को मजबूर हुए हैं वो कल तक आम आदमी पार्टी को नकारते रहे... आज भी ये वर्ग यही साबित करने पर तुला है कि आप ने सेक्यूलर स्पेस को मजबूती दी है... बावजूद इसके कि आप राष्ट्रवादी स्पेस की शक्ति है... यही लोग आरएसएस से आप के लिंक को खोजते रहते थे... इस बात को छुपाते हुए कि आंदोलन के समय अन्ना के लोगों को माओवादियों ने भी ऑन रिकार्ड समर्थन दिए थे।

दिल्ली सिटी एस्टेट जैसा है... संभव है लोकसभा चुनावों के समय केजरीवाल ग्रामीण भारत में वैसा चमत्कार नहीं दुहरा पाएं... पर राजनीति को बदलने लायक मिजाज लोगों में विकसित जरूर कर दिया है...उनके आलोचक कहते कि मुद्दों के आधार पर लंबी पारी नहीं खेली जा सकती.... यानि विचारधारा या फिर वैचारिक आधार होना जरूरी है...आप के नेताओं पर यकीन करें तो उनका वैचारिक आधार ग्राम स्वराज की कल्पना को नए संदर्भ में परिभाषित करना है... ग्राम स्वराज शब्द पर फोकस पड़ेगा और ये कांग्रेस को डराएगा जबकि बीजेपी को सचेत रखेगा...  सोनिया नतीजों के बाद ये कहने को मजबूर थीं कि सही समय पर पीएम उम्मीदवार का एलान होगा तो राहुल ने आप से सबक सीखने की शालीनता दिखाई....आप के कारण राजनीति का तात्विक अंतर बीजेपी को दिल्ली की तरह (हर्षवर्द्धन को सीएम उम्मीदवार बनाने जैसे कदम) मजबूर करेगा कि ये - पार्टी विद अ डिफरेंस - की अपेक्षाकृत ज्यादा स्वीकार्य छवि की ओर लौटे... गडकरी ने आठ दिसंबर की शाम जब कहा कि बीजेपी विपक्ष में बैठना पसंद करेगी... तो एक अर्थ में ये आप की राजनीति के असर को स्वीकारना भी है...बरना कांग्रेस की नापसंदगी का फायदा तीसरे मोर्चे का समूह भी उठा ले जाएगा।





19.11.13

शह और मात के बीच चुनावी समर

शह और मात के बीच चुनावी समर
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संजय मिश्र
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बड़े ही रोचक दौर में आ गया है चुनावी समर.... एक तरफ बयान और आरोप नीचता की पराकाष्ठा की तरफ सरक रहे हैं तो दूसरी ओर राजनीतिक शुचिता और नैतिकता पर भी विमर्श हो रहा है... पहली श्रेणी की तल्ख सच्चाई है कि ये इस देश के लोगों को उस हद तक शर्मशार करेगी कि उन्हें कान बंद करने पड़ेंगे.... माधुरी प्रकरण पर जिस तेजी से कांग्रेस आगे बढ़ रही है... वो खतरनाक ही नहीं है बल्कि किसी दिन यूपी से लेकर स्पेन तक के पट खुलने की क्षमता रखते... ... दोनों प्रमुख दलों के अलावे क्षेत्रीय दलों ने मुंह खोला तो फिर पेंडोरा बॉक्स खुल जाएगा... बिहार के लोग नीतीश के संबंध में राबड़ी के बयानों को याद करवाएंगे तो कर्पूरी ठाकुर के संजय गांधी बोटेनिकल गार्डेन तक की यात्रा आपको करनी पड़ सकती है... ऐसा अन्य राज्यों में भी हो सकता है... आप पर नेताओं को रहम न आया तो बात बढ़ते-बढ़ते नेहरू से गांधी तक पहुंच जा सकता है... ये अत्यधिक खतरनाक खेल होगा... न जाने कांग्रेस को ऐसी सलाह कौन दे रहा है?... 

दूसरी तरफ का नजारा थोड़ी उम्मीद जगाता है... अन्ना की चिट्ठी प्रकरण से लोगों को गांधी और नेहरू के बीच के रिश्ते जैसी महक आ रही होगी... ... गांधी ने कहा था कि कांग्रेस राजनीति छोड़े और गांवों में जाकर काम करे... अन्ना और केजरीवाल के बीच का मतभेद उसी तरह का है....बेशक जिस तरह कांग्रेस और समाजवादी दलों के नेताओं को गांधी और जेपी के आंदोलन को याद करने का अधिकार है उसी तरह आप पार्टी के नेताओं को अन्ना के आंदोलन की विरासत को याद करने का अधिकार है..... लेकिन इसकी आशंका भी हो सकती है कि कांग्रेस और समाजवादी दलों ने जिस तरह उन आंदोलनों की आत्मा से खिलवाड़ किया उसी तरह आप पार्टी भी अन्ना आंदोलन की विरासत से बाद में भटक जाए...

इन दोनों परिदृष्य के बीच चिंताजनक पहलू ये है कि २०१४ के चुनाव में अभी लंबा वक्त है और उम्मीद के पहलू कहीं कीटड़ उछाल राजनीति में दब न जाएं... वोटर के लिए बड़ी चुनौती है सामने ...

27.10.13

धमाकों के साए में हुंकार रैली

धमाकों के साए में हुंकार रैली .... 
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संजय मिश्र
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पटना का गांधी मैदान २७ अक्टूबर को राजनीति के एक और ऐतिहासिक पल का गवाह बना...नरेन्द्र मोदी की रैली में जुटे हुजूम के बीच एक के बाद एक बम धमाके होते रहे... ये पल इतिहास में इसलिए दर्ज होंगे कि बीजेपी समर्थकों ने धमाका स्थलों को छोड़ बाकि किसी जगह से हिलना गवारा नहीं समझा... मौत के साए में अपने प्रिय नेता का भाषण सुनने की ऐसी मिसाल शायद ही दिखे... और राज्य के आला अधिकारियों की ओर से रैली स्थल न जाने की सलाह के बावजूद नरेन्द्र मोदी का गांधी मैदान जाकर तकरीर करना...ये रैली इसलिए भी ऐतिहासिक कही जाएगी कि इसे रोकने की कोशिशों का सिलसिला देश में संभवतह इतना लंबा कभी नहीं खिंचा होगा....
संख्या के लिहाज से हुंकार रैली जेपी और लालू की रैली की श्रेणी में आती है... विषम माहौल में मोदी का भाषण कई कारणों से स्पष्टता लिए हुए था... ये तय हो गया कि बिहार और देश के लिए बीजेपी की सोशल इंजिनीयरिंग का कैसा रूप होगा... जहां बिहार और यूपी में मोदी की नजर पिछड़ों के वोट में सेंध लगाने पर है वहीं मुसलमानों के संबंध में बीजेपी के पीएम उम्मीदवार ने अपना नजरिया बेहतर तरीके से खोला... उन्होंने साफ कर दिया कि सबका साथ और सबका विकास की उनकी तमन्ना में हिन्दू-मुसलिम सहभागिता की गुंजाइश है... गरीबी के खिलाफ लड़ाई में इस एकता की वकालत... राष्ट्रीय पटल पर आने के बाद से मोदी की तरफ से पांच मौकों पर गुजरात दंगों के लिए अफसोस जताने की अगली कड़ी के रूप में ही देखा जाना चाहिए..
दिलचस्प है कि बीजेपी नेता ने सरदार पटेल की मूर्त्ति प्रकरण पर जोर नहीं दिया... उम्मीद थी कि इसके बहाने वो कोइरी-कुर्मी वोट बैंक में एंग्जाइटी पैदा करेंगे... रैली के दौरान हुए सीरियल बम ब्लास्ट के संबंध में बड़े ही रोचक पहलू सामने आ रहे हैं... नीतीश कहते हैं कि इस तरह का वाकया बिहार में नहीं हुआ था लिहाजा कोई चूक नहीं मानी जानी चाहिए... बेशक दुनिया की हर घटना अपने आप में अनूठी ही होती पर उन्हें याद रखना चाहिए कि बिहार के ही समस्तीपुर जंक्शन पर लोगों को संबोधित करने के दौरान राज्य के पहले विकास पुरूष एल एन मिश्र को बम ब्लास्ट में उड़ा दिया गया था... सात धमाके रिकार्ड हुए और चूक न हुई ये हजम करने वाली थ्योरी नहीं हो सकती..
ये कहना मुनासिब न भी हो कि राजनीतिक विरोधी की ये चाल है ... पर जिस तरीके से पिछले कई महीनों से रैली को नहीं होने देने की नीचता दिखाई जा रही थी उसका नाजायज फायदा अवांछित तत्वों ने उठाया होगा इससे नीतीश कैसे इनकार कर सकते....? वैसे भी इस राज्य में राजनीतिक पटखनी देने के लिए असामाजिक तत्वों का सहयोग लेने की परंपरा रही है... नीतीश कुमार को मलाल हो रहा होगा कि इतने लोगों को जुटा लेने की हैसियत उनकी नहीं बन पाई है...वे रिजनल क्षत्रप ही बने रह गए.. ये भी चिंता सता रही होगी कि पीएम की रेस में वो कोसों पीछे हो गए हैं... पर उनकी असल चिंता इस बात में निहित होनी चाहिए कि चापलूसों के कारण जिस राजनीतिक नीचता की संस्कृति को ढो रहे हैं उसके कारण उनकी जेंटलमैन पॉलिटिशियन की यूएसपी पूरी तरह छिजती जा रही है...


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