life is celebration

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27.10.13

धमाकों के साए में हुंकार रैली

धमाकों के साए में हुंकार रैली .... 
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संजय मिश्र
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पटना का गांधी मैदान २७ अक्टूबर को राजनीति के एक और ऐतिहासिक पल का गवाह बना...नरेन्द्र मोदी की रैली में जुटे हुजूम के बीच एक के बाद एक बम धमाके होते रहे... ये पल इतिहास में इसलिए दर्ज होंगे कि बीजेपी समर्थकों ने धमाका स्थलों को छोड़ बाकि किसी जगह से हिलना गवारा नहीं समझा... मौत के साए में अपने प्रिय नेता का भाषण सुनने की ऐसी मिसाल शायद ही दिखे... और राज्य के आला अधिकारियों की ओर से रैली स्थल न जाने की सलाह के बावजूद नरेन्द्र मोदी का गांधी मैदान जाकर तकरीर करना...ये रैली इसलिए भी ऐतिहासिक कही जाएगी कि इसे रोकने की कोशिशों का सिलसिला देश में संभवतह इतना लंबा कभी नहीं खिंचा होगा....
संख्या के लिहाज से हुंकार रैली जेपी और लालू की रैली की श्रेणी में आती है... विषम माहौल में मोदी का भाषण कई कारणों से स्पष्टता लिए हुए था... ये तय हो गया कि बिहार और देश के लिए बीजेपी की सोशल इंजिनीयरिंग का कैसा रूप होगा... जहां बिहार और यूपी में मोदी की नजर पिछड़ों के वोट में सेंध लगाने पर है वहीं मुसलमानों के संबंध में बीजेपी के पीएम उम्मीदवार ने अपना नजरिया बेहतर तरीके से खोला... उन्होंने साफ कर दिया कि सबका साथ और सबका विकास की उनकी तमन्ना में हिन्दू-मुसलिम सहभागिता की गुंजाइश है... गरीबी के खिलाफ लड़ाई में इस एकता की वकालत... राष्ट्रीय पटल पर आने के बाद से मोदी की तरफ से पांच मौकों पर गुजरात दंगों के लिए अफसोस जताने की अगली कड़ी के रूप में ही देखा जाना चाहिए..
दिलचस्प है कि बीजेपी नेता ने सरदार पटेल की मूर्त्ति प्रकरण पर जोर नहीं दिया... उम्मीद थी कि इसके बहाने वो कोइरी-कुर्मी वोट बैंक में एंग्जाइटी पैदा करेंगे... रैली के दौरान हुए सीरियल बम ब्लास्ट के संबंध में बड़े ही रोचक पहलू सामने आ रहे हैं... नीतीश कहते हैं कि इस तरह का वाकया बिहार में नहीं हुआ था लिहाजा कोई चूक नहीं मानी जानी चाहिए... बेशक दुनिया की हर घटना अपने आप में अनूठी ही होती पर उन्हें याद रखना चाहिए कि बिहार के ही समस्तीपुर जंक्शन पर लोगों को संबोधित करने के दौरान राज्य के पहले विकास पुरूष एल एन मिश्र को बम ब्लास्ट में उड़ा दिया गया था... सात धमाके रिकार्ड हुए और चूक न हुई ये हजम करने वाली थ्योरी नहीं हो सकती..
ये कहना मुनासिब न भी हो कि राजनीतिक विरोधी की ये चाल है ... पर जिस तरीके से पिछले कई महीनों से रैली को नहीं होने देने की नीचता दिखाई जा रही थी उसका नाजायज फायदा अवांछित तत्वों ने उठाया होगा इससे नीतीश कैसे इनकार कर सकते....? वैसे भी इस राज्य में राजनीतिक पटखनी देने के लिए असामाजिक तत्वों का सहयोग लेने की परंपरा रही है... नीतीश कुमार को मलाल हो रहा होगा कि इतने लोगों को जुटा लेने की हैसियत उनकी नहीं बन पाई है...वे रिजनल क्षत्रप ही बने रह गए.. ये भी चिंता सता रही होगी कि पीएम की रेस में वो कोसों पीछे हो गए हैं... पर उनकी असल चिंता इस बात में निहित होनी चाहिए कि चापलूसों के कारण जिस राजनीतिक नीचता की संस्कृति को ढो रहे हैं उसके कारण उनकी जेंटलमैन पॉलिटिशियन की यूएसपी पूरी तरह छिजती जा रही है...


7.10.13

मोदी से बेचैन क्यों है कांग्रेस?

मोदी से बेचैन क्यों है कांग्रेस?
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संजय मिश्र
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आंध्र-प्रदेश जल रहा है और इसकी आंच दिल्ली तक आ गई है। इससे बेफिक्र कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी राग अलाप रहे हैं कि नरेन्द्र मोदी के पीएम उम्मीदवार बनने से सेक्यूलर वोट के पक्ष में ध्रुवीकरण होगा न कि इसके विरोध में। मुजफ्फरनगर के हृदयविदारक दंगों के बाद का कांग्रेसी मंशे का ये गंभीर इजहार है। ये सत्तारूढ़ दल के जेहन को उघारता है। ये उस समय के बयानों की कंटिनियुटी है जब नरेन्द्र मोदी को बीजेपी की तरफ से सेंटरस्टेज पर लाने की खबरें छन कर निकली थी। तब दिग्विजय सिंह, कपिल सिब्बल सरीखे कांग्रेसी नेता जश्न की मुद्रा में कहते फिर रहे थे कि कांग्रेस की २०१४ की आधी चुनावी फतह इसी से हो जाएगी। देशवासी हैरान हुए थे।

सतह पर आई उस खबर से बीजेपी में जो तल्खी बेपर्द हुई वो अब जाकर थमी है। पार्टी को - समय आने पर सब साफ होगा - जैसे जुमलों का सहारा लेना पड़ा था तब। मोदी आज बीजेपी के विधिवत पीएम उम्मीदवार के तौर पर सभाएं कर रहे हैं। कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार की घोषणा टाल दी है। जश्न की उसकी मुद्रा खो सी गई है। मोदी के एक बयान पर औसतन आधे दर्जन कांग्रेसी नेता मैदान में कूद पड़ते हैं। वे भाषाई मर्यादा भूलने लगे हैं। कभी उज्जड शैली में मोदी पर भड़ास निकाल लेते तो कभी आडवाणी से दरियादिली दिखा बैठते। मुसलमान वोटों की आस पूरी होने की कल्पना के बावजूद बेचैनी किस बात की है? गाहे-वगाहे बीजेपी को शिष्ट राजनीति की नसीहत क्यों दी जा रही है? 

लंदन की वेस्ट-मिंस्टर शैली की राजनीति के चाहने वाले इंडिया में धकियाए हुए हैं... यहां रोबस्ट और राजा-महराजा के दरबार की मानिंद साम, दाम, दंड, भेद वाली रीति-नीति का ही जोर है... ये खुरदरा है... और नफासत वाली संसदीय परिपाटी के पैरोकारों को चिढ़ाने के लिए काफी है... सुविधा के हिसाब से कांग्रेस इस सुसंस्कृत डिबेटिंग परिपाटी की बीजेपी को अक्सर याद दिलाती रहती है। जब चिदंबरम बीजेपी के जसवंत सिंह को पत्रकारों के सामने जेंटलमैन पॉलिटिसियन कह कर पुकारते हैं तो वहां एक मकसद होता है। भले जसवंत इस कांग्रेसी उद्गार से फूले नहीं समाते हों।

लाल कृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरूण जेटली, यशवंत सिन्हा जैसे सांसद जब सदन में उसी वेस्टमिंस्टर शैली में कांग्रेस की बखिया उघेरते हैं तो सोनिया के एक इशारे पर कांग्रेसी विशुद्ध भारतीय शैली में उधम मचाने को आमादा हो जाते। तो फिर बीजेपी में आडवाणी को हाशिए पर धकेले जाने और इस बुजुर्ग नेता के बीजेपी अध्यक्ष को लिखे पत्रों पर आंसू बहाने वाले कांग्रेसी नेताओं का इरादा सवाल खड़े करता है। ये महज मजा लेने के लिए नहीं होता। और न ही ऐसे मौकों पर मीडिया की दिलचस्पी सिर्फ चिकोटी काटने तक सीमित रहती है।

दरअसल कांग्रेस राजनीतिक दाव-पेंच में इतनी माहिर है कि बीजेपी के इन शालीन कहे जाने वाले सितारों का मनमर्जी सहयोग ले लेती है। और फिर कुछ ही समय में ऐसे पछाड़ती है कि बीजेपी को कड़वा घूंट पीने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता है। ये सदन का जाना पहचाना नजारा होता है। बीजेपी भी मानती है कि उससे भद्रलोक राजनीति की कांग्रेसी अपेक्षा एक चाल होती है। और इसी चाल से संदेश पाकर देश के सार्वजनिक जीवन में फैले कांग्रेस के मोहरे मोर्चा संभाल लेते हैं। बीजेपी के लिए ये जाल में फसने जैसा होता है। अब जबकि बीजेपी ने आक्रामक तेवर वाले नरेन्द्र मोदी को मैदान में उतारा है तो कांग्रेस की सांस फूली हुई है।

कांग्रेस उन नेताओं से खार खाती है जो अक्खर और रूखड़े छवि वाले होते हैं। नरेन्द्र मोदी ऐसे ही राजनेता हैं। बड़बोले लालू प्रसाद भी इसी तरह के नेता रहे हैं। याद करिए लालू युग को जब बिहार में कांग्रेस की हैसियत आरजेडी की पिछलग्गू की तरह थी। लालू तय करते थे कि कांग्रेस की तरफ से चुनाव में किसको टिकट मिलेगा। लालू के रूतबे का असर तो सीपीआई पर भी था। आरजेडी सुप्रीमो के कहने पर ही लोकसभा चुनाव में भोगेन्द्र झा की टिकट कटी और चतुरानंद मिश्र उम्मीदवार बनाए गए... साथ ही लालू के सहयोग से जिताए भी गए।

नरेन्द्र मोदी की खासियत है कि वो कांग्रेस को चौंकाते हैं... छकाते भी हैं... और बार-बार ऐसा करते हैं। ये अदा आडवाणी-सुषमा ब्रांड राजनीति से अलग होती है। कांग्रेस की रणनीति धरी की धरी रह जाती है। वे अनुमान नहीं लगा पाते कि मोदी की अगली चाल क्या होगी? पारंपरिक राजनीति के हिसाब से रणनीति बनाने वाली कांग्रेस को सपने में भी अहसास नहीं था कि मोदी की सभा में उनके समर्थक टिकट खरीदकर आएंगे। कांग्रेस का बुद्धिजीवी और मेनस्ट्रीम मीडिया वाला मोर्चा फासीवाद की परिभाषा के हिसाब से मोदी के भाषण के शब्दों की पोस्टमार्टम करता रह जाता है।


पर कांग्रेस को अपनी उस लोच पर यकीन है जिससे वो पिछलग्गू भी बन जाती और मौका आने पर विरोधी को पैरों में भी झुकाती है। लालू, मुलायम और मायावती इसके क्लासिक उदाहरण हैं। इससे कांग्रेस को सहयोगी मिल जाएंगे। कांग्रेस इस ताक में भी है कि बीजेपी के उमंग में खूब इजाफा हो ताकि वो गलतियां करे। उसकी उम्मीद मोदी के पिछड़ा कार्ड पर भी टिकी है जो रिजनल क्षत्रपों को कमजोर बना सकता है। कांग्रेस को अहसास है कि मोदी फैक्टर स्थापित समीकरणों को बेपहचान बना रहा है। फिलहाल नरेन्द्र मोदी के चलते चुनावी फिजा अभी से रोमांचक हो गई है।              

3.10.13

सजा नहीं... नीतीश का प्रदर्शन लिखेगा लालू एरा के खात्मे की पटकथा

सजा नहीं... नीतीश का प्रदर्शन लिखेगा लालू एरा के खात्मे की पटकथा
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संजय मिश्र
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लालू एरा अब ढलान पर सरकने लगा है.... ११ साल तक चुनाव नहीं लड़ पाने की सजा मास्टर स्ट्रोक है... पर इस युग की कहानी का अंत सबसे ज्यादा नीतीश पर निर्भर है...नीतीश जिस तेजी से लोगों का आह्लाद खो रहे वो लालू के आभामंडल के सरकने की गति को थाम भी सकती है...बिहार के सीएम ने बड़ी राजनीतिक-प्रशासनिक गल्तियां की तो संभव है २०१४ के चुनाव तक आरजेडी के प्रभाव में कोई कमी न आए... इसलिए कि लालू की मुश्किलों के वक्त यादव जाति के लोग चट्टानी एकता दिखाते हैं... ये देखना दिलचस्प होगा कि मुसलमान क्या करते हैं..?   मुसलमान बड़े ही रणनीतिक अंदाज में वोटिंग पैटर्न दिखाते हैं... इन्हें अहसास होगा कि अब लालू का साथ छोड़ दूसरों का दामन थामने में भलाई है तो वे लालू का साथ छोड़ देंगे.... यहां याद दिलाना उचित होगा कि जगन्नाथ मिश्र कभी मुसलमानों के सबसे चहेते हुआ करते थे.... देश भर में...इस कांग्रेसी मुख्यमंत्री को मुहम्मद जगन्नाथ तक कहा जाने लगा था.... लेकिन बाद में मुसलमानों ने उनका साथ छोड़ दिया ... वो दौर भी दिखा जब जगन्नाथ मिश्र अपने बेटे की चुनावी जीत के लिए मुसलमानों की चिरौरी करते पाए गए.... ये देखना दिलचस्प होगा कि अल्पसंख्यक समाज लालू का साथ किस गति से छोड़ना चाहता है... भरोसा तोड़ने की उनकी रफ्तार धीमी हुई तो फिर लालू के पुत्रों को अनुभव हासिल करने और एक तिरस्कृत नहीं किए जा सकने वाले राजनीतिक शक्ति बना लेने का मौका मिल जाएगा... ये इस बात पर भी निर्भर करेगा कि आरजेडी के बड़े नाता बगावत कर पार्टी को न तोड़ें...जो लोग लालू की लोकप्रियता के कायल रहे हैं वे भूल जाते हैं कि लालू को कभी थंपिंग मेजोरिटी हासिल नहीं हुई... कभी जेएमएम तो कभी कांग्रेस का साथ लेना पड़ा सरकार बनाने में... ऐसा क्यों हुआ..? उन्होंने अपने समर्थकों को बेकाबू हद तक जगाया... जातीए वैमनस्य पैदा कर... पर उनकी ताजपोशी किसी आंदोलन का प्रतिफल नहीं थी... रघुनाथ झा के मैदान में कूद पड़ने के कारण वो सीएम बन गए थे... और रामसुंदर दास हार गए... कर्पूरी ठाकुर की तरह जमीनी स्तर पर काम करते-करते उंचाई पर नहीं पहुंचे थे वे... क्राति की उपज(जेपी आंदोलन की विरासक का श्रेय लालू या नीतीश को नहीं दिया जाना चाहिए)  नहीं थे सो पराभव संभव है... कोई पारदर्शी विजन नहीं था... और न ही उसके अनुरूप कार्यनीति...प्रशासन को हड़काया... पर उसके डेलिवरी सिस्टम को असरदार बनाने के लिए नहीं... उल्टे उनके राज में यही प्रशासन लूटखसोट में नेताओं का खूंखार साझीदार बन बैठा.....  करिश्मा और देसी अंदाज के बल पर चमके ... लिहाजा सीएम बनने के बाद जिन पिछड़ों को जगाया वो अपना हिस्सा लेने किसी भी सोशल इंजीनियारिंग का हिस्सा बन सकते थे और ऐसा हुआ भी... लालू कहते कि राजनीति में कोई मरता नहीं... पर उन्हें पता है कि हाशिए पर जरूर धकेल दिया जाता है... खुद उन जैसों ने वीपी सिंह को धकेला था... ये तो सत्ता का निष्ठुर चरित्र है... लालू जितना जल्द इसे समझ अपनी वागडोर सौंपें उतना ही अच्छा रहेगा उनकी राजनीतिक विरासत के लिए...बिहार की राजनीति में तीसरा कोन बने रहने के लिए...पर एक क्रेडिट लालू प्रसाद को जरूर मिलना चाहिए... अन्ना के आंदोलन के बाद से जो माहौल बना... लालू के जेल जाने के कारण हुक्मरानों को सबक जरूर मिलेगा...  

28.9.13

ये कशमकश है जो राहुल के बयान में छलका...

ये कशमकश है जो राहुल के बयान में छलका...
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संजय मिश्र
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दागी मंत्रियों पर लाए गए आर्डनेंस के खिलाफ राहुल के गुब्बार को हल्के में नहीं लेना चाहिए...इसलिए भी कि कांग्रेस इस देश की डेस्टिनी को प्रभावित करता है... लगातार सत्ता में रहने के कारण गवर्नेंस, शिक्षा, अर्थनीति, सामाजिक व्यवहार... पर ये दल अच्छा और बुरा दोनों तरह का असर डालता रहा है... ये महज किसी दल के अंदर का मामला नहीं है...लोगों के मानस में कांग्रेस रहती है इसलिए उस दल में क्या हो रहा है उससे इस देश को चिंतित होना चाहिए....  बिल को फार कर फेंक देने जैसे बयान दरअसल कांग्रेस की उस कशमकश का नतीजा है जो पार्टी में चल रहा है...  कांग्रेस में दो धारा है इस समय... एक राहुल की अगुवाई में जो कुछ बेहतर करने की दिशा में बढ़ना चाहता... दूसरा धरा उन नेताओं का है जो सब चलता है वाली पारंपरिक राजनीति (जिसमें साम, दाम, दंड, भेद से मोहब्बत है) के हिसाब से चलता है... ये धरा चलना तो चाहता है अपने तरीके से लेकिन नाम भुनाना चाहता है राहुल का... इन्हीं दो धरों की टकराहट का गुस्सा राहुल के उद्गार में झलका था उस दिन...राहुल जानते हैं कि ये पुराने खिलाड़ी किसी भी तरह सत्ता में बने रहना चाहते हैं और उन्हें नाटक के स्टेज पर रोल प्ले करने के लिए अक्सर पेश करते हैं...असल में -पक्ष भी हम और विपक्ष भी हम-  की नीति इतनी मारक है कि राहुल इससे बच नहीं पाते... इस नीति से राहुल के एंग्री यंग मैन की छवि में निखार आता है लिहाजा वे घाघ पार्टी नेताओं के कहे पर चल पड़ते हैं... पर उनका अंतर्मन इसके लिए तैयार नहीं होता रहता... बकौल राहुल उन्होंने अपने निज सपने को कुचला है पार्टी की खातिर... जानकार कहते हैं कि विदेशी महिला मित्र के साथ जीवन गुजारने की दशा में वे पीएम नहीं बन सकते... अपने इस सपने को किनारे कर वो राजनीति के रेस में आ गए हैं ऐसा लगता है... निज जीवन की इतनी बड़ी कीमत चुकाने के बाद इस देश की राजनीति में वो अपने लिए कुछ सकारात्मक लाइन लेना चाहते तो उसमें बाधा पार्टी के अंदर से ही आ रही है... जरा याद करें उस चर्चित प्रेस कंफरेंस को... राहुल ने अन्य राजनीतिक दलों का भी नाम लिया था और अपील भरे अंदाज में उन दलों को याद किया था... उन्हें संभव है राजीव के शुरूआती दिनों की याद न हो पर देश के समझदार लोगों को याद होगा... राजीव को - ए जेंटलमैन इन पॉलिटिक्स- कहा गया ... लेकिन कुछ ही समय बाद घाघ पार्टी नेताओं ने उन्हें रास्ते से भटकाया... कुछ सालों बाद राजीव को समझ आया तब तक देर हो चुकी थी... राहुल देर न करें... कांग्रेस के मिजाज को बदलना चाहते तो लग जाएं... देश के युवाओं के गुस्से को देखते हुए - एंग्री यंग मैन- की छवि ओढ़ना बुरा नहीं....बदनाम कांग्रेस के शुद्धिकरण से यहां की राजनीति को फायदा होगा... तैयार नेता नरेंद्र मोदी को चुनोती देने के लिए राहुल को भी तैयार होना चाहिए... तभी ये देश अच्छी चुनावी प्रतिस्पर्धा देख सकेगा... 

21.9.13

आत्महत्या करने वाले किसानों के लिए देश छोड़ें अनंतमूर्ति ...

आत्महत्या करने वाले किसानों के लिए देश छोड़ें अनंतमूर्ति ...
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संजय मिश्र
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यू आर अनंतमूर्ति इस बात से आहत हैं कि नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बन सकते हैं... इसलिए उन्होंने ऐलान कर दिया है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद वे इस देश में नहीं रहना चाहेंगे... उनका कहना है कि तब देश में भय का माहौल पसर जाएगा... अब... वो ज्योतिषी तो हैं नहीं कि बता दें कि मोदी राज के इंडिया में क्या सब होगा लिहाजा मान कर चला जाए कि अपने अनुभव के आधार पर और मोदी की कार्यशैली को देखकर लोगों को चेता रहे हैं।

बेशक बतौर साहित्यकार उन्हें ये अख्तियार है और बेलौस अंदाज में उन्होंने अपना रूख स्पष्ट किया है। वे किस देश में रहना पसंद करेंगे इसमें लोगों की रूचि नहीं होनी चाहिए... मकबूल फिदा हुसैन की तरह दुबई जाएं या फिर अमर्त्य सेन की तरह एक पैर इंडिया में और दूसरा पैर विदेशों में रखें। उनके ऐसे किसी फैसले की उन्हें आजादी है। उनके बयान पर अधिकांश लोग चकित हैं। बीजेपी वाले इसलिए कि दस साल से मोदी जिस हेट केंपेन से घिरे हैं उससे भी मारक है अनंतमूर्ति के उद्गार। कांग्रेस खुश है कि मोदी को अपमानित करने और बौखलाहट पैदा करने वाला इस तरह का अचूक निशाना उसके बदले किसी और ने ही साध दिया। लगे हाथ अपनी सफाई में अनंतमूर्ति ने राहुल की प्रशंसा भी कर दी।

बहुत से लोगों को इस बात का रोष है कि अनंतमूर्ति ने देश का अपमान किया है। ऐसा सोचनेवालों में गैर-मोदी दायरे के लोग अधिक हैं। ये तबका प्रगतिशील है साथ ही वाम और कांग्रेस ब्रांड सेक्यूलर राजनीति का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष पैरोकार भी। ऐसे लोग कह रहे हैं कि अनंतमूर्ति को मोदी के खिलाफ मुहिम छेड़नी चाहिए न कि देश के खिलाफ। यकीनन कन्नड साहित्यकार पर मुहिम चलाने का दबाव देना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। उनकी मर्जी है अपने अंदाज में जीएं। पर सवाल उठने लाजिमी हैं।

मुश्किल ये है कि अपने बयान से उन्होंने ये मान लिया है कि मोदी और इंडिया एक हो जाएंगे। उसी तर्ज पर जैसे देवकांत बरूआ ने कहा था कि इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा। यानि लोग पूछ सकते हैं कि क्या इंदिरा के उस उत्कर्ष काल में वे इस देश को छोड़ किसी दूसरे मुल्क में चले गए? ये सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि इमरजेंसी को जब इसी देश के लोग झेल और उखाड़ फेक सकते तो मोदी के किसी तानाशाही शासन को क्यों नहीं? पर अनंतमूर्ति का कथन ये मान कर चलता है कि इस देश के लोगों में वो कूवत नहीं रह जाएगी। माने ये कि लोगों की क्षमता पर वो संदेह कर रहे हैं।

देश छोड़ने की धमकी देकर वो शर्त रखना चाहते कि उन्हें रखना है तो मोदी को वोट न दें। क्या ये बैद्धिक तानाशाही फरमान की श्रेणी में नहीं आता? उत्तर भारत के लोग उन्हें नहीं के बराबर जानते थे.... अब वे सुर्खियों में आ गए हैं। लिहाजा विभिन्न मसलों पर उनका नजरिया इस देश के लोग जानना चाहेंगे। मसलन मुजफ्फरनगर दंगों पर उनका नजरिया क्या है? जब इस देश में कोई आफत आती है तो राहुल और सोनिया से पहले किसी भी राजनीतिक व्यक्ति को प्रभावित स्थल पर नहीं जाने दिया जाता है। यानि इन दोनों के लिए अलग नियम और अन्य लोगों के लिए अलग। ये पहले उत्तराखंड और अब मुजफ्फरनगर त्रासदी में देखी गई। क्या इस संविधानिक देश में अपनाए जा रहे दो तरह के नियम पर अनंतमूर्ति कुछ बोलेंगे।

वे कहते कि इंदिरा का विरोध किया फिर भी उन्हें नहीं धमकाया गया..... क्या उन्हें इल्म है कि इमरजेंसी के दौरान कितने साहित्यकारों और लेखकों को जेल की हवा खिलाई गई... तो क्या वे देश छोड़ कर चले गए? क्या उन्हें याद है कि जेपी पर डंडे चले थे उस दौर में? अनंतमूर्ति को दुख है कि इस विस्फोटक वचन के बाद मोदी समर्थक सोशल साइट्स पर उनकी भयावह खातिर कर रहे हैं। पर क्या उन्हें उस वक्त ऐतराज होता है जब हिन्दू धर्म के भगवानों पर उन्हीं साइट्स पर न सुनने लायक गालियां पढ़ी जाती हैं? बेशक दक्षिणपंथी भी उसी अंदाज में जनवादियों, प्रगतिशीलों और उन्मादी सेक्यूलर राजनीति के चैंपियनों को गरियाते हैं। इन मंचों पर फ्री फार आल है जो चिंताजनक है।

बंगलोर में एक साहित्यिक समारोह में प्रकट किए अपने विचारों से अनंतमूर्ति ने पलटी मारी है। अब वे कहते हैं कि वो उस जहां में नहीं रहेंगे जहां मोदी होंगे। बावजूद इसके उनके विचार इनटालरेंट किस्म के हैं... यानि साधारण भाषा में कहा जाए तो ये फासीवादी सोच है। यहां संवाद की गुंजाइश नहीं है उल्टे व्यक्ति विशेष के लिए नफरत का पैगाम है। ये तब और अर्थपूर्ण हो जाता है जब वे कहते हैं कि आरएसएस का दर्शन हिन्दू दर्शन नहीं है। वे ऐसा मानते हैं तो फिर उन्होंने हिन्दू दर्शन और बीजेपी के हिन्दुत्व में भेद बताने के लिए लोगों से संवाद क्यों नहीं किया है? हजारो मुद्दे हैं जिनपर मोदी और बीजेपी की खिलाफत की जा सकती है।

अनंतमूर्ति ब्राम्हण परिवार से आते हैं... संभव है उन्होंने संस्कृत भी घोंट कर पिया हो... जहां उन्हें बताया गया हो कि इस देश में भारत माता की जगह पृथ्वी माता की अहमियत है। लिहाजा इस समझ के बूते वे पृथ्वी के किसी कोने को अपना बना लें। पर पृथ्वी माता का संदेश बीजेपी को जरूर बता के जाएं। अपने वचन में वे विद्वानों वाली ठसक और धाक का अहसास कराना चाहते हैं पर आजाद इंडिया में उद्दात विद्वानों के सूखे पर चिंता नहीं जताते। उन्हें तब शर्म नहीं आती जब इस देश के तथाकथित बुद्धिजीवी नोअम चोम्सकी के भारत आने पर उन्हें सुनने के लिए भेड़ियाधसान करने लगते। क्या अनंतमूर्ति के मौजूदा देश में ऐसा कोई मार्गदर्शन देने वाला विद्वान है जिसे सुनने चोम्सकी भारत पधारें?

भ्रष्टाचार को जायज ठहराने वाले स्वनामधन्य विद्वानों पर उन्हें कुछ कहना है? क्या कोई ऐसा विद्वान है देश में जो अपनी आभा की बदौलत मुजफ्फरनगर जाकर शांति स्थापित करने की हैसियत रखता हो...  उसी मुजफ्फरनगर में जहां सेक्यूलर राजनीति के उन्माद का प्रदर्शन और कम्यूनल राजनीति के फसल काटने का खुला खेल चल रहा हो? क्या उन्हें मोदी राज में लोकतंत्र के बिलट जाने का डर सता रहा है? ऐसे विश्लेषक भरे परे हैं इस देश में जो हर चुनाव के बाद लोकतंत्र की रक्षा हो जाने की बात करते। मानो उन्हें लोकतंत्र की गहरी पैठ पर शक हो। ऐसे शक जाहिर होने पर अनंतमूर्ति को गुस्सा क्यों नहीं आता? 

ऐसे माहौल में जब संविधानिक इंडिया की उपलब्धियों पर ६५ साल का कुरूप और श्रीहीन सच उघार होकर हावी है ... लेखकों को क्या करना चाहिए? लेखकों का छोटा सा तबका है जो आमजनों को इमानदारी से सचेत करने में लगा है। उससे बड़ा तबका है जो आपाधापी में है... जो समझता है कि मोदी की खिलाफत से इतिहास में नाम दर्ज होने का चांस मिलेगा। और इन सबसे बड़ा तबका है जो सबक सिखाने में माहिर कांग्रेस की अगुवाई में मोदी के खिलाफ जंग के मैदान में फौजी दस्ते की तरह कूद चुका है। अनंतमूर्ति क्या करें? विदर्भ में किसानों की आत्महत्या करने के दर्द को महसूस कर सकते हैं। वो चाहें तो इस टीस से आहत होकर इंडिया छोड़ने का फैसला करें। देश छोड़ने के लिए मोदी के आने का इंतजार क्यों?  


29.8.13

दभोलकर की हत्या के मायने

दभोलकर की हत्या के मायने
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संजय मिश्र
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विज्ञान हार गया ! आप सोच रहे होंगे कैसी पहेली समझाई जा रही है?….जी हां,ये चीत्कार है उन तमाम लोगों की जिनकी संवेदनाएं नरेन्द्र दभोलकर की हत्या किए जाने से हिल गई हैं। जो आहत हुए वे प्रगतिशील,आधुनिक और संविधानिक इंडिया के हितों के समझदार कहे जाते हैं। इन्हें रंज है कि हत्यारे पकड़े नहीं गए हैं लिहाजा जादू-टोने और अंधविश्वास के उभार की आशंका में ये दुबले हुए जा रहे हैं। बौद्धिक जगत,मेनस्ट्रीम और सोशल मीडिया में इस मुतल्लिक बहस जारी है। इनके सुर में सुर मिला रहे हैं राजनीतिक जमात के वे लोग जो इस वारदात के बहाने दक्षिणपंथियों को घेरने की जुगत में हिन्दू धर्म पर हमले किए जा रहे हैं।
क्या वाकई विज्ञान हार गया है? या फिर नेहरू की चाहत वाली साइंटिफिक टेंपर की कोशिशें हारी हैं। विलाप करने वाले ये तय नहीं कर पा रहे हैं कि कौन हारा है? जिसे आप पढ़ाई का विषय समझते आए हैं उस विज्ञान के हारने का मतलब है कि इसे राजनीतिक-सामाजिक लक्ष्य को पूरा करने का हथियार बनाया गया था और ये हथियार चूक गया। या फिर हिन्दू जीवन शैली की हर नई परिस्थितियों में परिमार्जन करने की खूबी, इसके निमित जरूरी समाजिक बदलाव और वैज्ञानिक मिजाज के सम्मिलित चित के परिष्कार की जो आभा संविधान में प्रकट हुई थी ........ वो प्रयास निष्फल हुए? क्या प्रगतिशील तबका ऐसे किसी परिष्कार में यकीन रखता है?
पश्चिम के देशों से लेकर अमेरिका तक में क्रिस्टियन इवेंजेलिज्म सर उठा रहा है... उधर मुसलमानों में इंडिया सहित अधिकांश मुसलमान बहुल देशों में धर्म के लिए गतिविधियों बढ़ी हैं ... वहीं हाल के दशकों में हिन्दुओं में धर्म के साथ बाबाओं के लिए आकर्षण बढ़ा है। ऐसी सूरत में मर्सिया गाया जाना जायज है। लेकिन सवाल ये कि आखिरकार प्रगतिशीलों की कामना क्या थी? इंडिया में तो नेहरू की अगुवाई में नए सवेरे की तरफ बढ़े थे यहां के लोग... फैक्ट्रियां आधुनिक मंदिर कहलाई...आधुनिक जीवन शैली में रंगने लगे लोग...उपर से इस देश में सक्रिय वाम, समाजवादी, मध्यमार्गी और अन्य जमातों के लोग उन्नतिकामी विचारों को बढ़ावा देने में लगे रहे हैं। फिर क्या हुआ कि दभोलकरों की हत्या हो जाती है? संभव है तेज आधुनिक जीवन शैली ने इस देश के तमाम धार्मिक समुदायों को डराया, सहमाया होगा... उन्हें लगा हो कि उनके पारंपरिक जीवन के तत्व खतरे में पड़ रहे हैं।  
प्रगतिशीलों की छटपटाहट की वजहों को खोजा जाना जरूरी है। अक्सर जो तर्क परोसे जाते हैं उसके मुताबिक इंडिया ६५ साल का नौजवान देश है और भारत रूपी सनातन विरासत की ये कंटिनियूटी नहीं है। माने ये कि उस पुरातन संस्कृति का लोप हुआ और नेहरू के सपनों के अनुरूप एक नए देश ने आकार लिया। प्रगतिशील तबके के अधिकांश लोग ६५ साला कंसेप्ट में यकीन रखते हैं। तो फिर वे किस आबादी की किस समझ में वैज्ञानिक चेतना का संचार करना चाहते थे? देश चलाने वाले भले नेहरू के संकल्प के साथ चले होंगे पर यहां की बहुसंख्य आबादी सनातन परंपरा का निर्वाह पिछली शताब्दी के छठे दशक के आखिर तक करती रही। उसके बाद इंदिरा युग में वाम असर वाले प्रगतिशीलों के संरक्षण में जो शिक्षा दी गई उसने संस्कृति के लिहाज से रूटलेस पीढ़ी को जन्म दिया। मदरसा और संस्कृत संस्थानों में पढ़नेवालों को छोड़ दें तो इस पीढ़ी से धर्म की जानकारी दूर ही रखी गई। इधर-उधर से मिली जानकारी के कारण उनकी धार्मिक समझ अधकचरी बनी रही। 
उस पीढ़ी में अपने धर्म के लिए हीनता बोध का संचार हुआ। यही कारण है कि आठवें दशक में जब दूरदर्शन ने रामायण सिरियल का प्रसारण किया तो इन्होंने काफी उत्सुकता दिखाई। पर वामपंथियों को ये नहीं सुहाया और उन्होंने प्रसारण का तीखा विरोध किया। नब्बे के दशक में बाजार का असर बढ़ा तो संचार के क्षेत्र ने नया आयाम देखा। निजी टीवी चैनल खुले साथ में धार्मिक सिरियलों की बाढ़ आई। ऐसा क्यों हुआ कि लोग प्यासे की तरह धार्मिक कार्यक्रम देखने लगे? टीआरपी के बहाने जादू-टोने, तंत्र-मंत्र और अंधविश्वास से भरे कार्यक्रमों की बाढ़ आई।  
बाजार के असर ने लोगों को मतलबी बनाया साथ ही इसने बाबाओं(ढ़ोंगी सहित) की मार्केटिंग के द्वार भी खोले। इनकी चमक-दमक से वशीभूत होने वालों की तादाद कई गुणा बढ़ गई। यहां तक कि विभिन्न धर्म के अलग अलग चैनलों के पट भी खुल गए। एक निजी चैनल है जो बच्चों को कुरान की आयतों का अर्थ समझाता है। जाहिर है निशाना वे बच्चे हैं जो मदरसों में नहीं जाते बल्कि सरकारी या फिर महंगे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं।
बेशक बाबा टाइप के लोग चमत्कार की भाषा बोलते। ऐसा लगता मानो असंभव को संभव कर लेने की छुपी हुई इनसानी अतृप्त आकांक्षा का द्वार ये बाबा अपने भक्तों के लिए खोल देंगे। कई लोग बेमन से इन बाबाओं के पास जाते। तमाम तरह की असुरक्षा के डर से सहमे लोग इनकी शरण में जाते। अंगूठी, ताबीज... जैसी चीजें उन्हें संबल देती। उपर से प्राकृतिक आपदा झेलने की मजबूरी तो कमोबेश रहती ही है। जापान के सुनामी और उत्तराखंड के तांडव के सर्वाइवरों की मनहस्थिति को याद करें। क्या इंडिया के हुक्मरान सुरक्षा जगाने में कामयाब हुए हैं? जवाब नकारात्मक ही दिखता है। तो फिर दुखी मन कहां जाए? सरकार से आस नहीं... एक जरिया समाज थी जिसमें इन्हीं राजनीतिज्ञों ने दरार पैदा कर दिए। ले-देकर धर्म बचता है।
जब धर्म के ज्यादा करीब आएंगे तो कुरीतियों का असर भी पड़ेगा। कुरीतियों से बचने की आकांक्षा वालों का साथ निभाने के लिए प्रगतिशील तबके ने क्या किया? अवैज्ञानिकता दूर करने की उत्कट अभिलाषा थी तो धार्मिक आबादी के साथ ठोस संवाद कायम करने की जहमत उठानी चाहिए थी। हर काल के संदर्भ के अनुरूप अपने ही ग्रंथों पर नए सिरे से टीका लिखने और मीमांसा करने की परंपरा वालों से इस तरह का संवाद अवसर पैदा कर सकता था। यहां भी नतीजा सिफर ही दिखता है। उल्टे हिन्दू धर्म के भगवानों को विभिन्न माध्यमों से जब अश्लील गालियां दी जाती है तो वे चुप रहते। ये चलन सोशल मीडिया में चरम पर है। नेताओं पर अमर्यादित टिप्पणी हो तो मामला दर्ज होता पर हिन्दू धर्म के ईश की निंदा होती तो कुछ नहीं होता।
दिलचस्प है कि कांसीराम ने वाम नेताओं के लिए -हरे घास में छुपे हरे सांप- की संज्ञा दी थी। बावजूद इसके जातीए राजनीति से दूरी रखने वाले वाम राजनेता अपने फायदे के लिए दलित राजनीति से मिलकर खुलेआम एनीहिलेशन ऑफ कास्ट सिस्टम की बात करते नजर आते। रोचक है कि समाजवादियों के अलावा कई दक्षिणपंथी राजनेता भी इससे सहमति जताते हैं। पर इस देश ने कभी भी इन राजनीतिज्ञों को मुसलमानों में पनपे कास्ट सिस्टम के एनीहिलेशन की चर्चा करते नहीं देखा है।  
यानि प्रगतिशीलों का दुराग्रह है कि जिस धर्म के खास अवयव का अंत वे चाहते उसी समाज से वैज्ञानिक चेतना जगाने के लिए सरोकार भी जताने को कहते। ये अजीबोगरीब स्थिति है इस देश की। प्रगतिशील तबका ये आरोप तो लगाता है कि धर्म से जुड़े लोगों ने समय के बहाव के साथ चिंतन करना छोड़ दिया है। पर धर्म की परिधि में जो बदलाव हो रहे उसे देखना नहीं चाहता। हिन्दू और बौद्ध धर्म में कई धाराएं हैं जिनमें तंत्र के असर वाली धारा भी है। कर्मकांड में जटिल प्रक्रियाओं के अलावा पशु बलि चढ़ाने की पिपाशा है। कुछ लोग मानते कि तंत्र वेद विरोधी धारा है जबकि कई मानते कि ये ट्रांस वैदिक परंपरा है। तमिल सिद्ध परंपरा से लेकर असम तक में तंत्र का असर है।
वैदिक धारा और बुद्ध के शांति की धारा वालों से संवाद बनाकर अंध विश्वास को हताश किया जा सकता था। बिहार के कोसी इलाके के यादवों की तरह देश के कई हिस्सों में ब्राम्हण पुरोहितों के वर्चस्व को हतोत्साहित करने के लिए विभिन्न जातियों ने अपनी ही जाति के पुरोहितों से सरल कर्मकांड की राह चुनी है। इसी तरह बीजेपी के कई नेता गैर-द्विजों के उपनयन संस्कार की मुहिम चलाते रहे हैं। इस तरह की मुहिम को समर्थन दिया जा सकता था। प्रगतिशील तबका ये क्यों मानता कि धार्मिक लोग विचारवान नहीं हो सकते? दभोलकर की हत्या के बहाने जो सुखद आत्मनिरीक्षण चल रहा है उसे इन सवालों से भी जूझना चाहिए।                                                                                                                                                                

  

6.8.13

नेहरू... तानाशाही.....और मोदी

नेहरू... तानाशाही.....और मोदी
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संजय मिश्र
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आप सोच रहे होंगे कि नेहरू पर तानाशाह बन जाने की तोहमत कौन लगा रहा है? देश के पहले पीएम... और इस तरह की आशंका। ज्यादा संभावना यही है कि इस तरह की बातें इंडिया के आज के नागरिकों ने सुनी न हो और उसे ये हजम भी न होगा। और जब आपसे कहा जाए कि ये डरावनी तस्वीर खुद जवाहरलाल नेहरू ने अपने बारे में पेश की थी... आप हैरान हुए बिना नहीं रहेंगे। जी हां ये सच है ... नेहरू छद्म नाम -चाणक्य- से ऐसे आलेख लिखा करते थे। मकसद होता कि विभिन्न मुद्दों पर देश की नब्ज टटोली जाए।

मौजूदा समय में जबकि नरेन्द्र मोदी को लेकर – तानाशाह के हाथ में देश की बागडोर सरक जाने – की आशंका जोर-शोर से उछाली जा रही है... नेहरू की ये बातें प्रासंगिक तो लगेंगी ही साथ ही कई सवालों को सतह पर ला देंगी। सीमित दायरे में देखें तो आपका ध्यान लालू राज, मायावती राज, जयललिता राज और नीतीश राज पर अक्सर लगने वाले तानाशाही रवैये के आरोप की ओर चला जाए। रोचक है कि लालू और नीतीश वो चेहरे हैं जो देश के पहले तानाशाह शासन यानि इमरजेंसी की खिलाफत करने वाले आंदोलन का हिस्सा रहे। आज नीतीश राज में हाकिमों के हाथों जनप्रतिनिधि अपमान और दुर्गति झेलने को अभिषप्त हो रहे हैं।  

तो क्या नेहरू का डर पहले पहल इमरजेंसी के समय आकर सच साबित हुआ? उनके आलेख का एक और अंश देखें--  
--- जवाहरलाल फासिस्ट नहीं हो सकता... फिर भी उसमें तानाशाह होने के तमाम लक्षण मौजूद हैं...प्रचंड लोकप्रियता, स्पष्ट और निश्चित उद्देश्य के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति, उर्जा, स्वाभिमान, संगठन क्षमता, योग्यता, कठोरता और भीड़ से लगाव के बावजूद दूसरों के प्रति असहनशीलता का भाव.......
जाहिर है मोदी के व्यक्तित्व में इस तरह के कई लक्षण मौजूद हैं। और आपको लगेगा कि कई और नेता और दल इन लक्षणों से अछूते नहीं हैं। यानि बकौल नेहरू, तानाशाही के उभार का भय करिश्मा और धीमी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के मेल में छुपा है। यानि ये माना जाए कि इमरजेंसी के समय तक लोकतात्रिक प्रक्रिया धीमी ही रही? और आज जब फिर से तानाशाही के सर उठाने के खौफ का इजहार किया जा रहा है तो क्या ये माना जाए कि छह दशक के बाद भी इंडिया जनतांत्रिक मूल्यों की ठोस बुनियाद नहीं रख पाया? ऐसे में सवाल उठता है कि व्यक्ति के तानाशाह होने पर जो तबका हाय-तोबा मचा रहा है वो धीमी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के कारणों पर फोकस क्यों नहीं करना चाहता? वो ये कहने में क्यों हिचकता है कि फासीवाद का जन्म समाजवाद के कोख से हुआ था? 

फासीवाद में अन्य बातों के अलावा प्रचंड राष्ट्रवाद, वर्ग संघर्ष की जगह समुदायों के बीच टकराव, मिक्स्ड इकोनोमी, अर्थ प्रबंधन में संरक्षणवाद, साम्राज्यवादी सोच आदि तत्व दिखते हैं। जानकारों का कहना है कि आर्थिक सोच में कांग्रेस और बीजेपी एक जैसी प्राथमिकता रखती। देश के लिए मोदी के सपने हैं। पर प्रचंड राष्ट्रवाद का उनका मेनू क्या उन्हें खतरनाक बनाता? फिर जब कहते कि इंदिरा तानाशाही की ओर मुड़ी तो क्या उस समय प्रबल राष्ट्रवाद के तत्व मौजूद थे? इंदिरा की तरह मोदी पड़ोसी मुल्कों के संबंध में साम्राज्यवादी विचार रखते हैं क्या? क्या उनका उदय आज की कांग्रेस के देश हित और सुरक्षा मामले में हद से ज्यादा लापरवाह रवैये से पनपी है?

मान्य सोच है कि गहरी लोकतांत्रिक मनोवृति तानाशाही विचार को कुंद करने का असरकारी हथियार है। इस हथियार को पुष्ट करने में चूक कहां हुई? ऐसा कहने वाले कम नहीं कि लोकतांत्रिक मिजाज भारत के पांच हजार साल के सफर में रचा-बसा है। वो बताएंगे कि मगध साम्राज्य से पहले इस देश में दर्जनों गणतंत्र चले। तो क्या उस परंपरा के भाव की अनदेखी कर संविधानिक इंडिया में पश्चिमी प्रजातांत्रिक अवधारणा को अहमियत मिलने के कारण ये संकट उपजा? ये भी दिलचस्प है कि १९१७ के बाद रूस ने जार के प्रशासन तंत्र से तौबा कर लिया। माओ ने चियांग के प्रशासन तंत्र को किनारा किया। पर नेहरू ने आईसीएस तंत्र को बनाए रखा। इंडिया में प्रजातांत्रिक निष्ठा के जड़ जमाने में असफलता में नेहरू के इस कदम की किसी भूमिका पर आज के बौद्धिक विमर्श करेंगे? फिलहाल देश के बौद्धिक जमात में एक व्यक्ति को राकने की आतुरता है... वे किसी सवाल में उलझना नहीं चाहते...तानाशाही प्रवृति पर विमर्श में तो बिल्कुल नहीं।




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