life is celebration

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21.5.13

गौ-मांस भक्षण और कांग्रेस ब्रांड सेक्यूलरिज्म


गौ-मांस भक्षण और कांग्रेस ब्रांड सेक्यूलरिज्म
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संजय मिश्र
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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बड़े प्यार से कहा कि कर्नाटक चुनाव का नतीजा कांग्रेस की विचारधारा की जीत है। वे सेक्यूलरिज्म का ही जिक्र कर रहे थे। मुख्यमंत्री बनते ही सिद्धारमैया ने गौ-हत्या पर राज्य में लगे प्रतिबंध को उठा लिया। बतौर सीएम ये उनका पहला निर्णय था। यानि कांग्रेस ब्रांड सेक्यूलरिज्म की कोर कंसर्न में गौ-मांस भक्षण को बढ़ावा देना शामिल है। कर्नाटक से बहुत दूर नहीं है गोवा। वहां भी कांग्रेसजन अपने सहयात्री एनसीपी नेताओं के सहारे लोगों को सस्ता भोजन उपलब्ध कराने के लिए गौ-हत्या पर प्रतिबंध उठाने के लिए उतावले हो राजनीतिक और कोर्ट-कचहरी के मोर्चों पर सक्रिय हैं।
क्या कांग्रेस ने मान लिया है कि फुड सेक्यूरिटी बिल के सहारे देश को दो जून की रोटी देना संभव नहीं है? तो क्या इसी खातिर कांग्रेस सरकार गौ-मांस परोसने की चिंता में दुबली होती जा रही है? आप कहेंगे कि इस देश के एफसीआई गोदामों में अनाज सड़ रहे हैं जिन्हें कोर्ट की फटकार के बावजूद जरूरत मंदों के बीच यूपीए सरकार नहीं बांट पाई है। आप सोच रहे होंगे कि बाबरी विध्वंस के बाद से नाराज चल रहे मुसलमानों के वोट हासिल करने के लिए गौ-मांस के प्रबंध की सारी कवायद हो रही है। पर मुसलमानों की खुशामद तो एक पक्ष है... इस एक तीर से अनेक निशाना साधा जाता है और ये खेल पुराना है।
कांग्रेस के अलावा वामपंथियों, समाजवादियों, दलितवादियों और पिछड़ावादियों के सामुहिक राजनीतिक हित इस बात पर कंवर्ज करते कि हिंदू आस्था कमजोर पड़ी रहे। इनका आकलन है कि गौ-हत्या जारी रखने और ब्राम्हणों पर गौ-भक्षी होने का इल्जाम लगाते रहने से इस देश के हिन्दू हतोत्साहित रहेंगे। पर इस मुद्दे से पिछड़ावादी दूरी बना लेते और इसका समर्थन नहीं करते। पिछड़ावादी मोटे तौर पर कृष्ण के गौ-प्रेम को भुला नहीं पाते। लेकिन इस देश के दलितवादी हिंदू धर्म को अपने पतन का कारण बता इसे नेस्त-नाबूत करने की अभिलाषा रखते। दलितवादी अंबेदकर के कारण बुद्ध धर्म में आस्था रखते हैं लिहाजा कई विश्वविद्यालयों में गौ-भक्षण उत्सव मनाने की जिद पर विवाद उठता रहता है। अंबेदकर खुद ब्राम्हणों की अहिंसा पर जोर देने की नीति को साजिश बताते रहे।
कांग्रेसी मानते हैं कि इंडिया तो बस ६५ साल का देश है...लिहाजा इस देश के पुरातन इतिहास के गौरव से लगाव किय बात का। वामपंथी इस बात से उत्साहित हुए कि हिन्दू धर्म रिवील्ड नहीं है... लिहाजा उनमें आस जगी कि हिन्दुओं में अपने जीवन शैली के प्रति अनुराग खत्म कर उन्हें वाम मार्ग में दीक्षित किया जाए। कुछ हद तक वो सफल भी हुए। यही कारण है कि इन राजनीतिक वर्गों के साझा हित की झलक वामपंथियों के लिखे इतिहास की सरकारी किताबों में आपको मिल जाएंगे। असल में इंदिरा गांधी ने जब सत्ता संभाली तो कांग्रेस में अपना वर्चस्व जमाने के लिए कई कल्याणकारी फैसले किए। वामपंथियों को ये कदम सुखद लगे और उसी समय इन्होंने न सिर्फ इंदिरा का समर्थन किया बल्कि शैक्षिक संस्थानों में जो पैठ बनाई वो अभी तक बनी हुई है। साहित्य और मीडिया में भी मौजूदा समय तक इन्हीं विचारों से लैस लोगों की पकड़ है।

इनकी हठधर्मिता इस हद तक है कि अगर आपने गौ-मांस नहीं खाया तो आप प्रगतिशील कहलाने के काबिल नहीं। पाणिनी का नाम लेकर बड़े ही चाव से ये बखान करते कि – गोघ्न— शब्द का जुड़ाव उस पाहुन से है जिसे गाय का मांस खिलाया जाता था। जबकि पाणिनी ने जो सूत्र —गोघ्नं संप्रदाने.... दिया है वो मेहमानों को उपहार में गौ मिलने के संदर्भ को बताता है। वेद में ही गाय अघ्न्य यानि नहीं मारी जाने वाली कही गई।
डी एन झा ने गौ-भक्षण पर किताब लिखी। इसे हथियार के तौर पर वामपंथियों ने इस्तेमाल किया। डी एन झा लोगों को बताते रहे कि आर्य समाज आंदोलन के बाद गौ पूजनीय हुई। यानि ब्राम्हण ( हिन्दू) तब तक ( १९ वीं सदी तक ) गौ भक्षण करते रहे। वे इस तथ्य को छुपा गए कि खुद मैक्स-म्यूलर को वेद में डेढ़ दर्जन स्थलों पर गाय को नहीं मारने के संकेत मिले। सच तो ये है कि वेद के ब्रम्ह भाव में ही गाय अहिंसा की प्रतिमूर्ति बन चुकी थी। अब एनसीईआरटी के क्लास ग्यारह के प्राचीन भारत (१९७७ संस्करण) में पेज ४७ का ये अंश पढ़ें--- लोग गौ-मांस तो अवश्य खाते थे, किन्तु सुअर का मांस अधिक नहीं खाते थे---- । इस अंश से कांग्रेस ब्रांड सेक्यूलरिज्म के मंसूबों को आसानी से समझा जा सकता है।
दरअसल हिन्दू धर्म को प्रगतिबाधक मानने वाले वामपंथियों को विवेकानंद इसलिए महान नजर नहीं आए कि उन्होंने दुनिया के सामने वेदांत की धाक जमाई बल्कि इसलिए कि विवेकानंद ने गाय का मांस खाया था। यंग बंगाल आंदोलन के कर्ता-धर्ता और थोड़ी बहुत कविताएं लिखने वाले हेनरी डेरोजिए इसलिए महान हो गए क्योंकि वे ब्राम्हणों को देखते ही –गाय खाबो, गाय खाबो – कह कर चिढ़ाते थे। चितरंजन दास ने गाय का मांस नहीं खाया इसलिए महानता में चूक गए... इसी तरह राजेन्द्र बाबू पिछड़ गए... पर वामपंथियों की नजर में गाय का मांस खाने वाले मोती लाल नेहरू महान हो गए।
अब थोड़ी बात वामपंथ के असर में तर-बतर अंग्रेजी पत्रकारों और बौद्धिकों की करें। बीफ शब्द से इन्हें इतना लगाव है कि जब किसी शहर में कानून व्यवस्था की समस्या आ जाती है तो ये लिखते हैं--- सेक्यूरिटी बीफ्ड अप--- न कि-- सेक्यूरिटी स्टेप्ड अप। जबकि इंगलैंड में बीफ अप शब्द को गंवारों का शब्द माना जाता है। सच तो ये है कि वहां इस शब्द का चलन अब नहीं है। पर इंडिया में सेक्यूलरवादी इस शब्द को पवित्र वस्तु की तरह देखते हैं। इसी तरह ये लोग – काऊ बेल्ट--  शब्द का इस्तेमाल करते हैं। इन शब्दों के सचेत चयन का मकसद आसानी से समझा जा सकता है।
   

17.4.13


राजनीतिक दलों के लिए बोझ बनती जा रही है सेक्यूलरिज्म
संजय मिश्र
अनजाने ही नीतीश ने वो तान छेड़ दिया जिसके लिए बीजेपी अरसे से लालायित रही...और कांग्रेस जिसके लिए कतई तैयार न थी ... यानि सेक्यूलरिज्म पर बहस। बीजेपी की आस तब अधूरी रह गई थी जब मोदी ने सेक्यूलरिज्म माने इंडिया फर्स्ट का राग अलापा था। इस स्लोगन पर थोड़ी हलचल हुई पर मेनस्ट्रीम मीडिया ने बड़ी चालाकी से उस विमर्श से अपने को अलग कर लिया। लेकिन जैसे ही नीतीश ने टोपी और तिलक वाले राजनीतिक बिम्ब को आगे बढ़ाया, व्याकुलता बढ़ गई।
मोदी पर अप्रत्याशित हमले के कारण देश की नजर टिकी सो मीडिया ने नीतीश के अलाप को हाथो-हाथ लिया। पहली बार ऐसा लगा कि इंडिया के सफर में सेक्यूलरिज्म पर थोड़ी-बहुत चर्चा हुई। तरह तरह के विचार सामने आने लगे और अब भी गाहे-बगाहे आ ही रहे हैं। खास बात ये है कि उन तबकों से भी विचार आ रहे हैं जो दक्षिणपंथ के आग्रही नहीं हैं। पानी में मारे गए ढेले से उठी तरंग के समान ये अकुलाहट सतह पर आई। लोग तज-बीज करने पर मजबूर हुए कि ये --- मेरा सेक्यूलरिज्म... तेरा सेक्यूलरिज्म का --- का कैसा खेल चल रहा है ? मीडिया चेतती तब तक देर हो चली थी। सोशल मीडिया में ये अब भी जगह बनाए हुए है।
कांग्रेस नीतीश की बातों के मायने भांप गई। लिहाजा पार्टी ने मोदी पर हमले के अंश पर चुटकी लेकर किनारा कर लिया। वो भूली नहीं है कमल हासन के उस उद्गार को जिसमें मुस्लिम कट्टरपंथियों से खार खाए फिल्मी सितारे ने किसी सेक्यूलर देश जाकर बसने की चेतावनी दे दी थी। यानि ये कहकर उसने इंडिया के सेक्यूलर होने पर ही सवाल खड़ा कर दिया था। नीतीश भी मोदी को समझाना चाह रहे थे कि राजनीति के सामने टोपी और तिलक धारण करने जैसी मजबूरी का निरंतर निर्वाह करना होता है।
                                                                   
वोट की उम्मीद में ही नीतीश क्यों न कह रहे हों... ये सवाल तो उठता ही है कि क्या इंडिया में सेक्यूलर(शुद्ध आचरण वाला) नहीं रहा जा सकता है ? क्या इसी मजबूरी के तहत सरकारी योजनाओं के शिलान्यास के वक्त नारियल फोड़ी जाती ? क्या इसी खातिर इफ्तार पार्टियों में शरीक होकर मुस्लिम टोपी पहनकर फोटो सेशन करवाया जाता है ? क्या इंडो-पाक क्रिकेट मैच देखने के लिए नेताओं और पत्रकारों के बड़े वर्ग का ड्यूटी से समय निकालना और गौरवांन्वित होने की आतुरता का इजहार करना इसी श्रेणी में आता है ? पंजाब के एक सिख मुख्यमंत्री का गुरूद्वारे में जूते साफ करने पर मचे बवाल की याद है इन्हें ?
बीजेपी के लिए राहत की बात है कि टोपी और तिलक के जरिए नीतीश सर्व धर्म समभाव की वकालत भी कर बैठे। इरादा तो था मुसलमानों को खुश करना और मोदी के टोपी नहीं पहनने वाले प्रकरण की खबर लेना। पर ऐसा करते हुए वो संविधान की मूल भावना के विपरीत भी चले गए। संविधान का मर्म है कि राज सत्ता से जुड़े लोग निजी जिन्दगी में कुछ भी हों... लेकिन सार्वजनिक और सरकारी कामों के समय सेक्यूलर यानि गैर-धार्मिक आचरण का प्रदर्शन करेंगे। टोपी पहनने और तिलक लगाने जैसे धार्मिक व्यवहार से दूर रहेंगे।
असल में राजकाज के निर्वहन का स्वभाव ही सेक्यूलर होता है। मसलन सड़कें बनेंगी तो उस पर सब चलेंगे.... अस्पताल बनेगा तो सभी धर्मों के लोग वहां इलाज कराएंगे। इतना ही नहीं सड़क बननी है और सामने धार्मिक ढांचा है तो उसे व्यापक हित में हटा दिया जाता है। इसी तरह स्कूलों और अस्पतालों के पास लाउड-स्पीकर के इस्तेमाल की मनाही होती है भले ही वो मंदिर और मस्जिद की ही क्यों न हो ? गौर करने की बात है कि सेक्यूलरिज्म शब्द का जुड़ाव मौजूदा स्थिति से है... सांसारिकता से है, दुनियादारी से है। इसका आध्यात्मिकता से लेना-देना नहीं है। पिछला जन्म हुआ था या नहीं, अगला जन्म होगा या नहीं.... स्वर्ग है या नहीं... सेक्यूलरिज्म में इस तरह के विमर्श की गुंजाइश नहीं। यही कारण है कि इंडिया के संविधान के अनुसार जनता तो धार्मिक रहे पर शासन से जुड़े लोग सेक्यूलर आचरण वाले रहें।
पर इंडिया के राजनेता इस लाइन पर चलना नहीं चाहते। यही कारण है कि इस देश में सबसे अधिक दुष्कर्म सेक्यूलरिज्म शब्द के साथ हुआ है। मोदी के सेक्यूलरिज्म यानि इंडिया फर्स्ट में राष्ट्रवाद की धमक है। उन्होंने स्पष्ट नहीं किया है कि इस राष्ट्रवाद(राष्ट्रहित) के लिए सेक्यूलर मिजाज ही रास्ता है। कांग्रेस समेत सभी गैर-बीजेपी दलों का दुराग्रह है कि जो दल मुसलमानपरस्त नहीं वो कम्यूनल( गैर-सेक्यूलर शब्द का इस्तेमाल नहीं करते वे) हैं। यानि जो सेक्यूलर नहीं वो कम्यूनल ही हो सकता है। यानि सेक्यूलर शब्द का एंटोनिम गैर सेक्यूलर न होकर कम्यूनल कर दिया इन्होंने। भाषाविद ध्यान दें इस पर। यदि सेक्यूलर माने गैर-धार्मिक तो फिर गैर-सेक्यूलर मतलब धार्मिक आचरण वाला हुआ। पर कांग्रेस ब्रांड सेक्यूलरिज्म के अनुसार धार्मिक आचरण वाले कम्यूनल ही होंगे।
जरा दंगा वाली थ्योरी पर भी ध्यान दें। सेक्यूलर जमात कहता कि गुजरात में दंगे हुए तो वहां के सीएम मोदी कम्यूनल हुए। इस थ्योरी के नजरिए से देखें तो सिख दंगे के कारण पूर्व पीएम राजीव गांधी भी कम्यूनल हुए। देश का कौन सा राज्य ऐसा छूटा हो जहां दंगे न हुए हों ? यानि इन राज्यों की सरकारें कम्यूनल हुई। यहां आकर कांग्रेस और उनके चारण पत्रकार फस जाते हैं। नीतीश के प्रवचन ने सेक्युलरिज्म के मौजूदा स्वरूप की सीमाएं उघार दी हैं।  

13.4.13

मिथिला चित्रकला पार्ट- 6

मिथिला चित्रकला पार्ट- 6
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संजय मिश्र
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मोर माने प्रणयलीला, उर्वरता दिखाते बांस और कमल माने योनि... यानि सृजन के समवेत गान को आकार देने का अनुराग दर्शाते प्रतीक ... . मानो ईश्वर की उस अभिलाषा के निर्वाह का आभास कराते ...जो सृष्टि, पालन और संहार की लीला में निहित है ...ऐसा आस्थावान लोग कहेंगे। ब्रम्हयोनि से जुड़े प्रतीक पीपल के पत्ते पर सृजन का सोपान गढ़ने वाले गंगा झा भी कुछ ऐसा ही कह रहे होते हैं जब उनकी कूची जीवन के उहापोहों को मिथिला चित्र शैली में उकेरती रहती। मिथिला स्कूल ऑफ पेंटिंग के इस आयाम से अधिकांश लोग अनजान हैं।
दरभंगा के एक निजी स्कूल में शिक्षक गंगा झा के लिए ये महज संयोग हुआ कि वे पीपल के पत्ते पर पेंटिंग करने लगे। वे बताते हैं कि पीपल के पत्ते पर बनी पूर्व रूसी राष्ट्रपति गोर्वाचोव की पोर्ट्रेट किसी मैगजीन में देखने के बाद उन्हें ये खयाल आया। लेकिन मुश्किल सामने खड़ी थी। आखिर पत्ते को रेशे सहित कहां से लाया जाए। हरे पत्ते को पानी में कई दिनों तक रखने के बाद और फिर पानी में सोडा डाल कर उसमें भिगोए रखने के बाद उन्हें सफलता मिली।
साफ और रेशेदार पत्ते पर उन्होंने पेंटिंग की तो दूसरी समस्या आ गई। रेशों के बीच के छिद्र से रंग का दूसरी तरफ निकल जाना। गंगा झा का कहना है कि तीन तीन बार कलर करते रहने पर मनमाफिक नतीजा सामने आता है। लिहाजा करीब सौ घंटे एक चित्र बनाने में लग जाते हैं। अन्य कलाकारों की तरह वे भी बाजारू रंग का ही इस्तेमाल करते हैं। इस कलाकार ने शुरूआत नेताओं के चित्र बना कर की। बाद में इसका दायरा बढ़ाया। खजुराहो और एमएफ हुसैन के चित्र भी उन्होंने उकेरे।
मनोबल बढ़ा तो फिर मुड़ गए पत्ते पर मिथिला चित्रकला को नया आयाम देने की तरफ। काले कागज पर चिपकाए गए पीपल के पत्ते पर जब चित्र बन जाता तब करीने से उसे सफेद कागज पर माउंट करते हैं। पत्ते पर कचनी की गुजाईश नहीं रहती तो पत्ते के बाहर काले कागज पर ही उसे पेंट किया जाता है। इसके अलावा वे कागज पर भी मिथिला चित्र बनाते हैं।
दरभंगा जिले के पड़री गांव के रहने वाले गंगा प्रसाद झा ने कला की आरंभिक शिक्षा पटना आर्ट कॉलेज के पूर्व प्राचार्य राधा मोहन प्रसाद से ली। बाद में दरभंगा के ब्रम्हानंद कला महाविद्यालय और कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय से कला की शिक्षा पाई। देश के विभिन्न शहरों में इनके सोलो एक्जीबीसन लग चुके हैं। पूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम इनकी पीपल कला के मुरीद हैं और इन्हें प्रशस्ति पत्र दे चुके हैं। वे उम्मीद जताते हैं कि पीपल कला प्रसार जरूर पाएगी।

गंगा प्रसाद झा – चित्रकार
पीपल के पत्ते पर बनाए चित्र से मुझे ख्याति मिली... लेकिन कागज पर बनी मेरी मिथिला पेंटिंग की खासियत है कि इनमें एनाटोमी का खयाल रखा गया है। यानि बैकग्राउंड को देखते हुए पात्र और प्रतीकों की लंबाई और चौड़ाई सही अनुपात में रखी गई हैं। दरअसल मिथिला चित्र शेली में एनाटॉमिक सेंस का अभाव रहा है।
 


28.3.13

                मिथिला चित्रकला पार्ट- 5
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संजय मिश्र
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आपसे कहें कि जापान में आए सुनामी के कहर से मिथिला चित्रकला का कोई नाता है तो आप चौंके बिना नहीं रहेंगे। उस त्रासदी के समय इनसान कितना असहाय हो गया था। मिथिला चित्रकला में इससे जुड़े मार्मिक थीम को जगह दी गई। जीवन, प्रकृति और परम शक्ति के संबंधों को टटोलते ये नयनाभिराम चित्र मन को शांति देते हैं साथ ही जीवन के लिए लगाव भी पैदा करते। मधुबनी जाने वाले जापानी पर्यटक ऐसे चित्रों के मुरीद हैं।
किसी पेड़ के तने की छाल हटा उस पर बने मिथिला चित्र आपको नजर आए तो हैरान न हों। कभी आपको पीपल के पत्तों पर बने ऐसे ही चित्र की प्रदर्शनी भी देखनी पड़ जाए। बिहार का पर्यटन विभाग तो - रूरल टुअरिज्म – के तहत मिथिला चित्रकला की विरासत वाले गांवों को टुअरिस्ट डेस्टीनेशन में शामिल कर रहा है। जब थीम और गतिविधियां सारे कपाट खोलने पर उतारू हों तो सहज ही सवाल उठता कि मिथिला चित्रकला की मौलिक समझ से कोई समझौता तो नहीं हो रहा ? और क्या इस समझ में रूचि जगाने के लिए शिक्षण की व्यवस्था भी हुई है या नहीं ?    
पहली दफा दरभंगा आए हों तो जगह-जगह टंगे मिथिला चित्रकला सिखाने के निजी संस्थानों के साईन-बोर्ड देख आपमें आस जग जाएगी.... कि मिथिला स्कूल आफ पेंटिंग के मूल वैभव को बचाने की भूख है इस नगरी में। पर गर्व की उष्मा से भरे मिथिलावासियों का ध्यान इस ओर नहीं है कि जिस पैमाने पर थीम में फ्यूजन हो रहा वो इसके लोक स्वरूप को ओझल न कर दे। उन्हें ये अहसास कहां कि अधिकांश संस्थानों में सीखने वाले की कौन कहे.. सिखाने वाले कलाकारों को मिथिला चित्रकला के संकेतों और प्रतीकों की पूरी समझ नहीं।
करीब दो पीढ़ी पहले तक यहां के गावों की ललनाएं जब भीत की दिवारों पर मोर, बांस या केले के पेड़ को लिखती थी तो बरबस मुस्कुराती... और लजाकर सुर्ख लाल हो जाती। कभी कभी तो लोक संगीत के बोल भी फूट पड़ते। असल में उन्हें मालूम होता था कि मोर प्रणयलीला को दर्शाता जबकि बांस उर्वरता का प्रतीक है। सहज भाव से उसका मन उसमें भींग रहा होता... वो महसूस करती कि कचनी के बिना उसका लिखना सार्थक नहीं। आज की पीढ़ी चित्र को उकेरना सीखती है... उसके लिए ये परंपरा नहीं है। वो जब सीख लेगी तो कलाकार कहलाएगी।
कला मर्मज्ञ उपेन्द्र महारथी इन खतरों को समझते थे। लिहाजा उन्होंने बिहार ललित कला अकादमी के तहत संस्थागत तरीके से इसके ट्रेनिंग की व्यवस्था की। पर ये बड़ा स्वरूप नहीं ले पाया। साल १९८५ में दरभंगा के संस्कृत विश्वविद्यालय ने युनेस्को के सहयोग से मिथिला चित्र के विभिन्न शैलियों के प्रशिक्षण पर काम शुरू किया। फिलहाल ये विश्वविद्यालय एक साल का डिप्लोमा कोर्स चला रहा है। दरभंगा स्थित कला महाविद्यालय में भी मिथिला चित्रकला सिखाई जाती है। इतना ही नहीं भारती विकास मंच की ओर से मिथिला चित्रकला के कोर्स के लिए किताबों की श्रृंखला प्रकाशित की जा रही है। पर ये प्रयास नाकाफी हैं।
उधर, बिहार सरकार ने घोषणा कर रखी है कि मधुबनी में विश्व-स्तरीय मिथिला पेंटिंग संस्थान खोला जाएगा। इसका चरित्र डीम्ड यूनिवर्सिटी जैसा होगा। फरवरी  2 0 1 3 में मुख्य-मंत्री के सांस्कृतिक सलाहकार पवन वर्मा ने सौराठ गांव में इसके लिए अधिगृहित की गई जमीन का मुआयना भी किया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि ये संस्थान जल्द अस्तित्व में आए ताकि सिद्धहस्त कलाकार तैयार हो सकें। इससे उन गांवों में भी इस कला का प्रसार होगा जहां से ये लोक कौशल विलुप्त हो गया है।  

4.3.13

हिन्दू मानस और हिन्दुत्व के अंतर्विरोध

हिन्दू मानस और हिन्दुत्व के अंतर्विरोध
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संजय मिश्र
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... वो एक सांप है, एक बिछुआ है... ऐसे गंदे आदमी.... ये उद्गार हैं कांग्रेस के श्रेष्ठ बदजुबान नेताओं में शुमार मणिशंकर अय्यर के। अपने रौ में वे कई अमर्यादित बातें कह गए। उन बातों में न जाकर महज जिस अंदाज में कांग्रेसी नेता ने बाइट दी वो कांग्रेस के तीन चिर-परिचित पहचान की झांकी दिखलाती है। घमंड, अंग्रेजों की तरह सोचना कि इस देश को सिर्फ वो चला सकती और मुसलमानपरस्ती। कांग्रेस के अधिकांश नेता एलीटिस्ट हैं... राजा-महाराजा की तरह सोचते हैं। जब वे प्रजातंत्र और गरीबों की बात करते तो भान होता कि इन शब्दों पर उपकार किया जा रहा है। अब ऐसी मनोवृति को बीजेपी राष्ट्रीय परिषद के अधिवेशन में नरेन्द्र मोदी - पसीने-की याद दिला रहे थे।

कसमसाहट स्वाभाविक है... आपको स्मरण हो आया हो कि ये वही अय्यर हैं जिन्होंने विपक्षी सांसदों को जानवर तक कह दिया था। बीजेपी की बैठक में इसी कांग्रेसी मिजाज से देश को मुक्त करने का संकल्प जताया गया, विचारधारा की बातें हुई साथ ही भारत को महान बनाने का सपना दिखाया गया। इसकी खातिर आडवाणी ने - पार्टी विद अ डिफरेंस- पर बल दिया। बैठक के दौरान ही ठेलकर अभिभावक बनाए गए आडवाणी ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जीरो टालरेंस की नीति पर चलने को कहा। वहां मौजूद अन्य नेताओं की तरह उन्होंने भी विवेकानंद को करीने से कोट करते बीजेपी के हिन्दुत्व के तत्व खोजने की कोशिश की।

वेदांत मनीषी विवेकानंद का हवाला देते हुए आडवाणी ने भारत माता का जिक्र किया। विवेकानंद ने जिस अर्थ में इस शब्द का इस्तेमाल किया हो वो अलग मसला है पर वैदिक सोच में भारत माता की कल्पना नहीं है... वहां तो विश्व के सार्वजनीन हित की कामना है। बावजूद इसके बीजेपी भारत माता की जय के बगैर कोई कर्मकांड पूरा नहीं करती। तो क्या बीजेपी का हिन्दुत्व और भारत की हिन्दुइज्म ( हिन्दुवाद) अलग- अलग चीजें हैं। ये सवाल इसलिए भी उठता है कि इस पार्टी ने कभी ये स्पष्ट नहीं किया कि भारत को सबल बनाने की खातिर भारत माता की बात तात्कालिक पड़ाव है ... विशद लक्ष्य तो पृथ्वी माता ( विश्व कल्याण) ही है। आडवाणी ने ५० साल के लिए भारत माता की चिंता करने की विवेकानंद की अकुलाहट की चर्चा जरूर की पर ये नहीं कहा कि बीजेपी ऐसा कब तक करेगी।

बहुत पहले की बात है... पश्चिम के ताकतवर मुस्लिम साम्राज्य के शासक के दरबार में भारत के लोगों की उनके पिछड़े और दब्बू होने के कारण खिल्ली उड़ाई जाती थी... उन्हें हिकारत से देखा जाता और अपमान के मकसद से हिन्दू- हिन्दू कहकर हूट किया जाता... उनके लिए हिन्दू माने गुलाम... भारत के लोगों के लिए ... माना जाता है कि हिन्दू शब्द का इस्तेमाल इसके बाद ही चलन में आया। बावजूद इसके बीजेपी हिन्दू शब्द से लगाव रखती है। राष्ट्रीय परिषद की बैठक में भी पार्टी नेता आदत के अनुरूप हिन्दुस्तान की जगह हिन्दुस्थान शब्द का इस्तेमाल करते रहे... खासकर वो नेता जो आरएसएस की पृष्ठभूमि वाले हैं। दरअसल आरएसएस की चाहत इतिहास के उन लम्हों को साकार करना लगता है जो हिन्दू जीवन-शैली की खूबी रही। इतिहास के पन्नें उलटाएं तो देखेंगे कि जितने भी विदेशी हमलावर भारत आए बाद में वे यहीं की जीवन-शैली में रच-बस गए।

मोटे तौर पर मुसलमान ऐसा नहीं कर पाए। वे अपने धर्म से प्रतिबद्धता रखते और
 .... भूराप्योवोम भूतात्मा समह शांति करोअरिहा....  जैसे भाव को ग्रहण करने में रूचि नहीं दिखाते। इस श्लोक का अर्थ है---
पृथ्वी, जल, आकाश तथा अन्य भूत जिन विराट रूप धारी प्रभु के अंग हैं, जो सर्वत्र सम भाव से रहते और समता रखते हैं, जो शांति का विस्तार करने वाले हैं....
यानि मुसलमानों का पूरा - एसीमिलेशन- संभव नहीं दिखता बीजेपी को। यही कारण है कि ये पार्टी चाहती है कि मुसलमान और क्रिस्टीयन को कम से कम हिन्दू शब्द की परिधि में अंगीकार कर लिया जाए। इसलिए वे दलील देते कि जो भी हिन्दुस्थान में जन्मा वो हिन्दू कहलाया। हिन्दू धर्म के लोग हिन्दुत्व की इस अवधारणा से कितने सहमत हुए हैं कहना मुश्किल है। लेकिन ऐसे हिन्दू भी हैं जो बीजेपी की इस कोशिश को नाकाफी और नकारात्मक मान कर निराश भी होते हैं।

यहां ये सवाल अर्थपूर्ण है कि क्या बीजेपी ने अपने हिन्दुत्व के विचारों को हिन्दू समाज से साझा किया है या फिर उसे समझाया है? क्योकि आम धारणा बन गई है कि हिन्दुत्व माने हिन्दुवाद। हिन्दुत्व पर प्रहार के उद्वेग में कांग्रेस इसी तरह की धारणा को पुष्ट करती रहती है। कांग्रेस बड़बोलापन दिखा कह सकती है कि मुसलमानों को आरक्षण देकर वो - एसीमिलेशन- का ठोस आधार तैयार कर रही। वो कह सकती है कि इस तरीके से मुसलमान हिन्दू समाज की एक जाति के तौर पर प्रतिष्ठित हो जाएंगे। पर बौखलाई कांग्रेस का ध्यान इस पर नहीं है लिहाजा इसे भुना नहीं रही। वो मुसलमानों के वोट के लिए इतनी व्याकुल है कि बीजेपी को गरियाने के चक्कर में हिन्दुओं का अपमान कर बैठती है। उसे ये भी याद नहीं रहता कि आतंकवाद के साथ वो जिस केसरिया शब्द का उपयोग करती वो रंग राष्ट्रीय झंडे में भी है।

एक आध वाकये को छोड़ दें तो ऐसे आरोपों पर बीजेपी की प्रतिक्रिया रूटीन ही होती। वो इस बात पर राहत महसूस करती कि इससे हिन्दू कांग्रेस से नाराज रहेंगे और बीजेपी का वोट बैंक छिजन का शिकार नहीं होगा। आडवाणी ने राष्ट्रीय परिषद की बैठक में अकारण नहीं कहा कि कांग्रेस ने बीजेपी के लिए बहुत कुछ कर रखा है। कांग्रेस के सेक्यूलरिज्म को बीजेपी श्यूडो सेक्यूलरिज्म कहती। वो ये भी चाहती कि सेक्यूलरिज्म पर देशव्यापी विमर्श हो। पर इसके लिए वो पहल नहीं करती। बीजेपी धारा ३७० की भी बात करती है पर कश्मीरी पंडितों की एथनिक क्लिनजिंग पर इसने कभी कोई आंदोलन नहीं किया।

उसे इस बात का मलाल है कि मनमोहन सिंह ने कह दिया कि देश की संपदा पर पहला हक मुसलमानों का है। जाहिर है इस देश की हवा, पानी, खनिज, जंगल.... सभी कुछ मुसलमानों का अपना है। लिहाजा इस देश में लिखा गया वेद और गौरवमयी भाषा संस्कृत भी मुसलमानों की अपनी संपदा है। क्या इन पहलुओं पर बीजेपी और मुसलमानों के बीच कनेक्टिविटी विकसित हो पाई है? नरेन्द्र मोदी ने मौके पर कहा कि देश सत्ता परिवर्तन के लिए बेचैन है। लिहाजा बीजेपी को जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी। वो हूंकार भरते हैं कि भारत को महाशक्ति बनाने के लिए अथक श्रम के साथ जनता त्याग की अपेक्षा करेगी।

बकौल आडवाणी विवेकानंद ने कहा था कि देश के पुनर्निर्माण के लिए ५० सालों तक देवी-देवताओं को सोने दिया जाए। क्या बीजेपी भरोसा दे सकती कि देश के पुनर्निर्माण के लिए अयोध्या में राम मंदिर बन जाने के बाद अन्य विवादित धार्मिक स्थलों को छेड़ा नहीं जाएगा। समान नागरिक संहिता जैसे संविधानिक मसलों पर वो लाचार की तरह पेश आती है। इसी तरह घुसपैठ का मामला है। कांग्रेस के विचारों से नजदीकी रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा भी कहते हैं कि बांग्लादेशी घुसपैठ का मामला गंभीर है और बीजेपी को इस पर देश में आम राय बनाने की पहल करनी चाहिए।

आजादी के समय में जितनी विचारधाराएं उभरी उसने देश के नीति निर्धारण में अपनी मजबूत जगह बनाई। लेकिन दक्षिणपंथ अभी तक वो मुकाम हासिल नहीं कर पाया है। देश बीजेपी को इस नजरिये से भी देखता है कि ये पार्टी उस जगह को मजबूती से भरे। लेकिन बीजेपी दक्षिणपंथ और मध्यमार्ग के बीच फ्लिप-फ्लाप करती रहती है जहां कांग्रेस उसे धकिया देती है। क्या बीजेपी कभी सी आर दास और राजेन्द्र प्रसाद सरीखे नेताओं के विचारों को संबल बनाएगी? मौजूदा समय में कांग्रेस भव्यता के भ्रम में जी रही है। इससे पार पाने लायक आत्मविश्वास क्या बीजेपी जुटा पाएगी? क्या इसी कमी को पूरा करने के लिए - नमो..नमो- का समूह गान हो रहा है? 

23.2.13

इंडिया का संकट



इंडिया का संकट
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नोट- किसी की भावना को ठेस पहुंचे तो क्षमा चाहते हैं - संजय मिश्र
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संजय मिश्र
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आशीष नंदी प्रकरण की आंच लगभग थाम ली गई है। अनचाहे इसने इंडिया के संकट की झांकी दिखला ही दी। कोई भी पक्ष नहीं चाहता था कि ये देश के सार्वजिनक जीवन के अंतर्विरोध को और नंगा करे। राजनीतिक वर्ग और दिल्ली में अड्डा जमाए अपने को बुद्धिजीवी कहने वाली जमात इस आंच में झुलसना नहीं चाहती थी। लिहाजा मामला शांत होने के मनुहार की ही मुद्रा में दिखी। दिल्ली की हिन्दी मीडिया ने अपने चरित्र के मुताबिक उछल-कूद दिखलाने की कोशिश की पर उसे जल्द आभास हो गया कि अभिव्यक्ति से ज्यादा इसमें फिसलने के खतरे उठाने पड़ेंगे।

अधीरता में सभी पक्ष आशीष नंदी को निशाने पर लेते रहे। यहां तक कि कोर्ट ने भी उन्हें ही नसीहत दे डाली। असल में बेचैनी और फुफकार की वजह नंदी के उस जवाब से अधिक उस सवाल में छिपी थी जो जयपुर लिटररी फेस्टिवल में पत्रकार तरूण तेजपाल ने उछाल दी। ये सवाल की शक्ल में दरअसल एक थ्योरी है जिसमें आर्थिक भ्रष्टाचार के, दलितों और पिछड़ों के लिए सामाजिक जीवन में बराबरी लाने का कारगर जरिया होने का दुराग्रह है। इसे इक्वलाइजर थ्योरी कहा जा रहा है। इसी संदर्भ में नंदी जवाब दे रहे थे।

नंदी की मानें तो इन वर्गों में भ्रष्टाचार की प्रवृति बढ़ी है और जहां सत्ता में इनकी पहुंच नहीं हुई( वामपंथी शासन वाले बंगाल में ) ऐसे मामले बेहद कम रहे। इसे झलकाएं तो आशए ये कि हाल के समय में भ्रष्टाचार के ट्रिगर होने में वो चाहत काम कर रही जो ये मानती कि हर क्षेत्र में हैसियत बढ़ा लेना है चाहे जरिया गैर-कानूनी और अनैतिक ही क्यों न हो। दलितों का अपमान करने का आरोप लगा नंदी की खूब खिंचाई हुई। घबराए नंदी ने जीवन भर दलितों के उत्थान के लिए काम करने की याद दिलाई। जयपुर के उस कायर्क्रम में नंदी से बात करने वाले पैनल में टीवी पत्रकार आशुतोष भी शामिल  थे। उन्होंने मुद्दे को खूब उछाला और उत्तरोतर अपनी समझ को व्यापकता देते हुए यहां तक कह दिया  कि नंदी की अनुकंपावादी सोच को दलित समझने को तैयार नहीं .... नंदी चाहें तो दलितों के मानस को समझें।

दलितों को समझने की चेतावनी का मतलब ये कि आजादी से पहले दलित हित के लिए जो धारा ( समाज सुधार, छूआ-छूत मिटाने और अन्य उपायों के जरिए  ) दत्त-चित रही वो अनुकंपावादी हुए सो वे हाशिए पर रहें। अब दलित विमर्श के वैसे बौद्धिक प्रासंगिक रहेंगे जो इक्वलाइजर थ्योरी में यकीन रखने वाले होंगे। आलोचना झेल रहे नंदी कई बार मुस्कान बिखेरते अपने उस कथन को दुहराते रहे कि --जब तक भ्रष्टाचार की वजह से दोनों तबके ( दलित और सवर्ण ) बराबर (स्पर्धी ) हैं इस देश के गणतंत्र में उम्मीद बची है। तो क्या इस देश का गणतंत्र इतना कमजोर है कि उसे सबल होने के लिए भ्रष्टाचार की वैशाखी चाहिए? क्या संविधानिक इंडिया में बौद्धिक विमर्श के नाम पर आर्थिक भ्रष्टाचार करने की वकालत की जा रही ?

पिछड़ावाद से लेकर दलितवाद तक एक कामन ट्रेंड झलकता है। इसके मुताबिक ५००० साल तक ब्राह्मणों ने इन तबकों के साथ अन्याय किया और अब संविधानिक इंडिया में उसका हिसाब-किताब कर लेना है। भाषा का स्तर घटाएं तो कह सकते हैं कि इस सोच में इतिहास का बदला लेने की ललक प्रबल है। और इस राह में जो बाधक तत्व रह गए हैं यानि मीडिया और न्यायपालिका .... उसमें भीतर तक पैठ बना उसकी प्रकृति बदल देने की आतुरता है। यानि टोका-टाकी की गुंजाइश न रह जाए। याद करें चारा घोटाले के शुरूआती दिनों को ... कुछ बुद्धिजीवी कोर्ट को नसीहत देने से बाज न आए कि लालू प्रसाद के जनप्रिय होने का ख्याल रखा जाए। ऐसा ही उदाहरण मायावती के पैरोकार पेश कर रहे हैं।

दलितों को समझने की सीख देने वाले नवदलितवादियों की आकांक्षा सीमाएं तोड़ने वाला है। ये जमात इस बात का पैरोकार हैं कि जनसंख्या के अनुपात में हक छीन लिया जाए। याद करें ऐसे बोद्धिकों को जो अन्ना आंदोलन में शरीक होने की बजाय टीवी स्टूडियो में बैठ कर प्रस्तावित लोकपाल की नोकरियों में हिस्से का बंटवारा करने में मशगूल रहे। जिन्ना की प्रोपोर्शनल रिप्रजेंटेशन की जिद की तरह नवदलितवादी कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका, सरकारी नोकरियां, मीडिया ... और इन सबसे आगे बढ़कर निजी क्षेत्र में हिस्सेदारी की वकालत कर रहे हैं। निजी क्षेत्र में हक छीनने के सबसे बड़े चैंपियन हैं राम विलास पासवान।

कांसीराम कहा करते थे कि दलित - लेने वाली जाति - के बदले - देने वाली जाति - की आकांक्षा पाले। वो आरक्षण को भीख सरीखा देखते थे। उनके इस तरह के नजरिए के कारण नवदलितवादी कांसीराम की विरासत को मूर्त्तियों में सिमटाकर बिसरा देने पर आमादा है। इन बौद्धिकों की अभिलाषा की कोई सीमा नहीं। निजी क्षेत्र के बाद किसका नंबर आएगा ? क्या इस देश की जमीन, नदियां, पहाड़, जंगल ... भी जातीए अनुपात में बांट ली जाएगी ? कल्पना करें वो दृष्य जब आपसे अपने जातीए हिस्सेदारी के अनुपात में आक्सीजन सांस में लेने को कहा जाए।

क्षमा करें... इस अतिरंजित परिदृष्य का मकसद उस प्रवृति की ओर इशारा करना है जो इस देश के तमाम अवयवों को महज हिस्से के रूप में देखने का आग्रही है। क्या संविधानिक इंडिया लूट के माल जैसा है ? तब क्या ये भूखंड देश कहलाने की हकदार है ? कांग्रेज जो कि सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है ... इस प्रवृति के खतरे को समझती है। सवाल है कि जब ये समझ है तो इन मंसूबों का साथ क्यों देती ?

नंदी के विचार पर कांग्रेस और बीजेपी की प्रतिक्रिया नपी-तुली और सतर्क रही। बीजेपी सामाजिक न्याय के साथ सबके हित की कामना की बात करती है। लेकिन इससे आत्मीयता रखने वाले संगठन मुसलमान राजाओं के शासन में हिन्दुओं पर हुए अत्याचार की याद दिलाते। वे भी इतिहास का बदला चाहते... पर ये किस रूप में हो इस पर कोई निश्चित राय उनमें आकार नहीं ले पाई है। ये दुविधा संशय पैदा करती रहती है कि कब क्या हो जाए?

उधर कांग्रेस सभी विचारधाराओं को आत्मसात करने के पुराने रिकार्ड के दम पर दंभ भरती रहती है। लेकिन अपने सिकुड़ते जनाधार से बेचैन है। मुसलमानों को रिझाना उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। फिलहाल उसे आभास हो रहा कि मुसलमान उसके हाथ आकर भी फिसल जा रहे और जातीये पार्टियों की शोभा बढ़ा जाते। इसलिए पूरा जोर अपनी शैली की सेक्यूलरिज्म पर दे रही है। देश में सबसे अधिक सुना जाने वाला शब्द भी यही है। इसके सहारे मुसलमानों को संदेश दिया जा रहा है कि ५००० साल वाले बदले को वो बर्दाश्त कर रही है जबिक मुसलमानों से बदले वाली चाहत को वो सफल नहीं होने देगी। इसी खतरनाक इरादे को वो राजनीतिक और सामाजिक जीवन पर थोप रही है। ये अकारण नहीं कि इतिहास के सरकारी किताबों में भी इसी सोच के अनुरूप पाठ्यक्रम तय होते रहे।

बीजेपी की तरह कांग्रेस भी एक पार्टी के शासन की पक्षधर है। गठबंधन उसकी रूचि में फिट नहीं बैठता। पर उसकी समझ है कि बीजेपी तभी पूरी तरह कमजोर होगी जब जातीए पार्टियां बनी रहे। इसलिए एक किस्म के बदले पर चुप्पी तो दूसरे किस्म के बदले के खिलाफ मुखरता ओढ़ लेती है कांग्रेस। जातीए पार्टियां मजबूत हो गई तो ? कांग्रेस को भरोसा है कि मुसलमानों को आरक्षण देकर पिछड़ावाद पर और सीबीआई के सहारे दलितवाद पर नकेल कस ली जाएगी। बावजूद इस गिरोहबंदी के बीजेपी का सफाया नहीं होना और कांग्रेस का बहुमत नहीं ला पाना दरअसल दोनों ही किस्म के बदले की राजनीति के निषेध की जन गुहार है। चुनावी राजनीति में ठहराव का कारण भी यही है।
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13.1.13

नशा

नशा
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भटक गया बचपन गलियों में
मैं भी ढूंढू ....तू भी ढूंढ
काँटा गड़ा कहाँ कलियों में,
मैं भी ढूंढू ....तू भी ढूंढ
आशाएं जो थे भविष्य के
भावी नायक अखल विश्व के
कुलिस कठोर करों ने किस के
जला नीड़ के डाले तिनके
सोन चिरैया बिलख रही किस मरघट के तरुवर की ठूंठ
मैं भी ढूंढू ....तू भी ढूंढ
चन्द्र खिलौने लेने के दिन
गुजरे ठिकरे कचड़े बिन बिन
मन में दबी आग लेने को
इक दिन सारे बदले गिन गिन
किस एकाकी क्षण में उसने पी ली करुआहट की घूँट
मैं भी ढूंढू ....तू भी ढूंढ
झंझावातों के अंदेशे
सहज सजगता के संदेशे
हो चिंतन कि इसके पहले
अलग विलग हो रेशे रेशे
समय शेष है सद प्रयास से लें बिखरी कलियों को गूंथ
मैं भी ढूंढू ....तू भी ढूंढ
किलकारी बनकर चिनगारी
जला रही है क्यारी क्यारी
किसलय कोंपल झुलस रहे हैं
अब पूरी बगिया की बारी
व्यथा जनक इन परिदृश्यों से किसने ली है आँखें मूँद
मैं भी ढूंढू ....तू भी ढूंढ।
.......
यहाँ - मैं -  से मतलब है प्रशासन और - तू - से मतलब है बच्चों के अभिभावक .... ये पंक्तियाँ बिहार के आई पी एस ऑफिसर अनिल कुमार के लिखे हैं। ये कविता स्कूली बच्चों में नशे की लत के खिलाफ अभियान को धारदार बनाने के मकसद से लिखी गई। कुछ ही दिनों में अनिल कुमार की छप कर आने वाली कविता संग्रह में शामिल होगी ये कविता। सामाजिक समस्याओं पर अंकुश के लिए एक अधिकारी की ऐसी विकलता उत्साह बढाती है।
---संजय मिश्र


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