life is celebration

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30.1.10

वेलेंटाइन डे और प्रेम


सैसव जीवन दर्शन भेल .....दुहु दल- बलहि दंद परि गेल
कबहु बांधाय कच कबहु बिथार ....कबहु झाँपे अंग कबहु उधार
थीर नयान अथिर किछु भेल .... उरज उदय - थल लालिमा देल
चपल चरन , चित चंचल भान .... जागल मनसिज मुदित नयान
विद्यापति कह करू अवधान .... बाला अंग लागल पञ्च बान
......ये एक तरुणी की व्यथा है .... वो हैरान है अपने शारीरिक परिवर्तन से .... समझ नहीं आता क्या करे .... पहले पैर चंचल थे ... अब मन में भी हलचल है ... नए अहसास ने दे दी है दस्तक ... मालूम नहीं कैसी प्यास सी जग गई है ...शोख बचपन पर अल्हड़ता कितनी हाबी हो गई है ...
ऐसे ही अनजान लेकिन खीझ भरे उहापोहों के बीच कब कौन प्यार की दहलीज पर कदम रख दे ..... पता भी नहीं चलता। ये भान अचानक से होता है।
कौन जाने प्रेम किसे कहते.. परिभाषित करने से चूकने लगते हैं लोग ... कुछ बाते कह पाते हैं बस .... नर -नारी के बीच प्रेम इस खिंचाव के बाद पलने लगता है। अपनेपन की अनुभूति आकार लेने लगती है ... मोह जगने लगता है। प्रकृति भी ऐसे में मुस्कुराने लगती ... पक्षी कलरव कर आपका स्वागत करते। मन चाहता ये मोह परिणति की ओर बढे ।
ऐसे समय में परिणति का पूरा आभास भी कहाँ हो पाता.....तड़प सुख का अहसास कराने लगता ... मिलन पर नजरें टिक जाती... दृढ़ता को संबल मिलता .... पग-पग कदम बढ़ते .... एकाकार होने की चाहत उभर आती । राह हमेशा आसान कहाँ रह जाता... बाधाएं सर उठा लेती हैं। फिर दौर शुरू होता है विरह की ताप का। दुनिया में कितने साहित्य रच डाले गए ....
परिणति जो आकार ले .... साथ देने की उत्कंठा कभी मंद नहीं पड़ती । इसका शिखर समर्पण के रूप में प्रकट होने लगता है। इसके बाद की निष्ठा - लौकिक प्रेम के परलौकिक बन जाने की ओर प्रवृत होता है। आध्यात्म इसे सत चित- आनंद की अवस्था मानने लगता... यहाँ आकर प्रेम देव लोक की अनुभूति में बदल जाता है।

विज्ञान के नजरिए से देखें तो प्रेम नशा लेने के समान है । प्रेम करने वाले दुनिया से विरत भाव रखने लगते । आँखें जब मिलती है तो कहते हैं ब्रेन से - डोपामाइन - नामक रसायन निकलता है । नतीजतन धड़कन सामान्य से तीन गुना ज्यादा हो जाता है । खून का प्रवाह इस समय गाल और ख़ास इन्द्रियों में अधिक होता है ...अचानक पेट में खालीपन का अहसास होने लगता है। इस दौरान हाथ और पांव में खून का प्रवाह कम रहता है यही कारण है की प्रेमी के हाथ ठंढे और स्थूल से हो जाते और शरीर कांपने लगता है... नर्वसनेस चरम पर पहुँच जाता है।

चिकित्सक मानते हैं कि प्रेम का समागम रूप अछा व्यायाम है...भारतीय सौंदर्य शास्त्र में भी समागम को योग आसन के रूप में देखा गया है। प्रेम- रत रहने वाले अनेक रोगों पर अंकुश रखने में समर्थ हो पाते हैं...आकुलता यानी एन्ग्जाईटी भी दब जाती है। शोध बताते हैं कि इससे इम्यून सिस्टम मजबूत बना रहता है॥ यानी प्रेम करिए ....साथ ही इन्फेक्सन की चिंता से दूर रहिये...
सवाल उठता है कि प्रेम महज रासायनिक प्रक्रिया है तो ये सबसे क्यों नहीं हो जाता। शोध बताते हैं कि प्रेम के दौरान ख़ास तरह कि रसायन निकलती है जिसे नाक तो नहीं लेकिन ब्रेन पहचान लेता है। यही कारण है की लोग संबंधियों से आसक्त नहीं होते।
इतनी पवित्र बातें और ब्रेन कि चर्चा ... पर आप हैरान रह जाएंगे ये जान कर कि गहरे प्रेम में रत रहने के समय भी ब्रेन का बहुत ही छोटा हिस्सा सक्रिय रहता है । जबकि दोस्ती की भावना और दोस्तों से मिलने के समय ब्रेन का बड़ा हिस्सा सक्रिय रहता है। तभी तो शायद दो दिलों के बीच के सभी भावों में निजता रहती है। जैसे नशा लेने पर सभी - फील गुड - की दशा में होते... प्रेमी की मनोदशा भी ऐसी ही होती है... ख्यालों में तो वे अक्सर पाए जाते।

प्यार करने वाले कहेंगे कि प्रेम - जीन, रसायन, और हारमोन से ऊपर की चीज है... दुनिया जले या बिहुँसी उठे ....पर प्रेम रत इंसान मुदित, तृप्त, और खुश रहता है। विलक्षण प्रतिभा वाले इंसान ... कहते हैं कि प्रेम में भी अछे रहे होते हैं। पर हे किशोरों ...आप समझ रखने लायक उम्र में प्रवेश तो कर जाएं। वेलेंटाइन डे की आपको शुभकामनाएं .... बसंत सदा मोहक साबित हो....

4 टिप्‍पणियां:

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

विद्यापति के पद के बहाने प्रेम छलक पड़ा यहाँ । सुन्दर प्रविष्टि । आभार ।

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

प्रेम जैसे विषय पर बहुत सुंदर लिखा आपने..बढ़िया आलेख...बधाई

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी रचना। बधाई।

SACHIN KUMAR ने कहा…

SACHIN KUMAR
KAHA AAP BHI....ITNI JALDI LIKH KAR AAP SHIV SAINIKO KO BHARKANA CHAHTE HAI...BAGHWAN SE NAHI TO IN KAGJI SERO SE TO DARIYE....KYA MAHABHARAT KHARA KAR RAKHA HAI IN LOGO NE.....

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