life is celebration

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16.10.14

मुसलिम अटीट्यूड – परसेप्शन एंड रिएलिटी---- भाग-३

मुसलिम अटीट्यूड – परसेप्शन एंड रिएलिटी---- भाग-३
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संजय मिश्र
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इंडिया के करीब सौ मुसलमान युवकों के फरार होने की खबर सार्वजनिक हुई तो देश के समझदार तबकों में सनसनी फैल गई... दबे स्वर में उन्होंने चिंता जताई... खबर खुफिया स्रोतों की तरफ से आई थी... आशंका है कि ये युवक इराक और सीरिया में आईएसआईएस के चंगुल में हैं... जिहाद करने निकले हैं... और इसलाम के नाम पर आहूति देने गए हैं। इधर इन युवकों के परिजनों का हाल बेहाल है... वे मदद की गुहार लगा रहे हैं।

ये मुसलमानों के पश्चिम की तरफ ताकने का पीड़ा देने वाला पहलू है... मक्का-मदीना पश्चिम में है सो स्वाभाविक चार्म है उस दिशा का... ये चार्म पश्चिम के विकसित देशों के लिए रूझान से अलग है... ये धार्मिक है... इसका प्रकटीकरण बीसवीं सदी के शुरूआत से ही इंडिया के राजनीतिक-सामाजिक विमर्श में असहजता घोलने का पोटेंशियल रखता आया है।

ओटोमन अम्पायर (तुर्क) में ब्रिटिश मनमानी के मुद्दे पर इंडिया में १९१९-२२ में जो खिलाफत आंदोलन चला उसमें तुर्की के सुल्तान के धार्मिक अधिकारों के सवाल भी शामिल थे.... इंडिया के मुसलमानों के इस हलचल को लेकर गांधी विशेष आग्रही हुए ... उन्होंने इसे अवसर के रूप में देखा और खुल कर समर्थन दिया... इस देश के आज के लोग जो दिन-रात सेक्यूलरिज्म की बात सुनते हैं... उन्हें ये अटपटा जरूर लग सकता है।

पाकिस्तान भी पश्चिम में है... और इसकी बुनियाद भी इसलाम के आसरे पड़ी ... जिन्ना और इकबाल ने जिस पाकिस्तान का तान छेड़ा वो इस सबकंटिनेंट को पार्टिशन की तरफ धकेलने में सफल हुआ... जिस मुसलमान आबादी ने इंडिया में ही बसर करने का मन बनाया.. उसके लिए न तो पश्चिम के धार्मिक प्रतीकों का मोह कम हुआ और न ही नए बने पाकिस्तान के लिए आसक्ति... साल १९७१ के युद्ध और पाकिस्तान के टूटने का गहरा असर पड़ा उनपर।

वे इस बात पर एकमत हुए कि पाकिस्तान में बसने के किसी सपने से ज्यादा मुफीद इंडिया में रहना ही है... इससे भी बड़ा सबक था बांग्लादेश का आकार लेना... इसने जता दिया था कि भाषा(यहां बांग्ला पढ़े) की ललक धर्म के आकर्षण से पार पा सकता है... टू-नेशन थ्योरी ध्वस्त हो चुकी थी... बांग्लादेश में फंसे बिहारी मुसलमानों को लेने से पाकिस्तान के इनकार ने रही सही कसर पूरी कर दी... पाकिस्तान रूपी पश्चिम का मोह मोटा-मोटी अब वहां रहने वाले उनके संबंधियों और सांस्कृतिक आह्लादों तक सिमट कर रह गई।

इधर एक नया तबका उभरा है इस देश में जो मुसलमानों के पश्चिम प्रेम को भड़काने के नाम पर सशक्त हुआ है... इसका आधार मुसलमान के मानस का दोहन करना है... वे कांग्रेस ब्रांड सेक्यूलरिज्म के फोकल प्वाइंट यानि मुसलमानपरस्ती की खातिर ऐसा करते हैं... इसके दर्शन हाल में इस देश को खूब हुए हैं... मसलन इराक में आईएसआईएस की बर्बरता, बोको हरम से जुड़ी अमानुषिक हरकतों पर तो चुप्पी साध जाता है ये तबका पर गजा पट्टी के हमास के लिए इंडिया की सड़कों को उद्वेलित करने से नहीं चूकता... पश्चिम भाव के दोहन और जायज नजरियों के बीच से गुजरते हुए इंडिया के मुसलमानों का बड़ा तबका अपने नए पीएम की उत्साह बढ़ाने वाली उस स्वीकारोक्ति को परखने में लगा है जिसमें कहा गया है कि इंडिया के मुसलमान देशभक्त हैं और अलकायदा जैसे संगठनों के मंसूबों को सफल नहीं होने देंगे।  


7.10.14

मुसलिम अटीट्यूड – परसेप्शन एंड रिएलिटी---- भाग-२

मुसलिम अटीट्यूड – परसेप्शन एंड रिएलिटी---- भाग-२ 
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संजय मिश्र
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इंडिया में भूख से मरने की खबर अक्सर आती रहती है.. पत्रकार इसे जतन से आपके पास पहुंचाते हैं... इस कोशिश में वे अफसरों की नाराजगी मोल लेते हैं... उनसे पूछिए या फिर अखबारों के पन्ने पलटिए... आप पाएंगे कि मरने वालों में मुसलमान नहीं के बराबर होते... कह सकते कि मुसलमान कर्मठ होते साथ ही हूनर वाले पेशे अपनाने के कारण भुखमरी टाल जाते... दिलचस्प है कि इसी देश के हुक्मरान कहते फिरते हैं कि मुसलमानों की माली हालत दलितों से भी खराब है।

वे सच्चर कमिटी की रिपोर्ट का हवाला देते हैं ... तो क्या ये रिपोर्ट डाक्टर्ड है? राजनीति करने में सहूलियत का इसमें ध्यान रखा गया है? रोचक है कि इस रिपोर्ट की महिमा का बखान कांग्रेस ब्रांड सेक्यूलरिस्ट सिद्दत से करते... सार्वजनिक मंचों पर इसको लेकर आंसू बहाए जाते... केन्द्र की सत्ताधारी दल बीजेपी को भी ये रिपोर्ट खूब सुहाती है... कांग्रेस की दशकों की उपलब्धि को भोथरा साबित करने में उन्हें ये हथियार नजर आता।  

इस डिस्कोर्स में शामिल होने वाले मुसलमान करीने से हुक्मरानों से हिसाब मांगते हैं... इस अल्पसंख्यक समाज की हैसियत बढ़ाने वाले कदम उठाने की चुनौती देते...मुसलमानों की बदहाली के कई कारण होंगे... पर आप ध्यान देंगे तो विशेष राजकीय सहयोग पाने की उनकी अर्जुन दृष्टि आपको नजर आ जाएगी.. मौजूदा समय में संघ परिवार के नेताओं के गैर-जरूरी बोल के बीच भी मुसलमानों की नजर बीजेपी के उस विजन डाक्यूमेंट पर टिकी है जो मुसलमानों के हितों के लिए तैयार हुए हैं।

संभव है पूर्व आम आदमी पार्टी नेत्री शाजिया इल्मी का बयान याद आया होगा आपको... साल २०१४ के लोकसभा चुनाव के समय दिए गए उस बयान को विवादित करार दिया गया... शाजिया ने गुहार लगाई थी कि मुसलमान बहुत सेक्यूलर हो लिए... अब उन्हें अपने हितों की ओर देखना चाहिए... इसमें अनकही बात ये थी कि मुसलमान आम आदमी पार्टी पर भरोसा दिखाएं तो उनके हितों का विशेष खयाल रखा जाएगा।

इंडिया के राजनीतिक सफर में डुबकी लगाएं तो इस तरह के फिकर की बानगी आपको बिहार में जगन्नाथ मिश्र के राजकाज के दौरान दिखेगी...सहरसा के रहने वाले पंडित सीएम मुहम्मद जगन्नाथ तक कहलाए... मुसलमानों के आर्थिक और सांस्कृतिक उम्मीदों पर वे खासे मेहरबान हुए। पर साल २००० का विधानसभा चुनाव... झंझारपुर क्षेत्र से जगन्नाथ मिश्र के बेटे नीतीश मिश्र उम्मीदवार थे... पिता ने मुसलमानों से बेटे को जिताने की गुहार लगाई पर नाकामी हाथ लगी.. नीतीश मिश्र हार गए.. ये लालू का दौर था।

मुसलमानों को लालू से खूब स्नेह मिल रहा था... पटना से लेकर ब्लाक तक में मुसलमानों की अपेक्षाओं का खयाल रखा जा रहा था... यूपी में मुलायम को मुल्ला मुलायम ऐसे ही नहीं कहा गया... उन पर मुसलमानों की सदिच्छा और मुसलमानों पर सपा का प्रेम जगजाहिर है... मायावती तक की विशेष कृपा बनी रही है मुसलमानों पर।

यानि नेहरू के समय से आर्थिक और इमोशनल सहयोग का जो सिलसिला चला वो किसी न किसी रूप में जारी है... यानि जहां सहूलियत उधर झुकाव... गैर-बीजेपी खेमों की बेचैनी मुसलमानों की उसी तरल सोच की उपज तो नहीं? क्या ये विकलता स्मार्ट वोटर कौम को अपने पाले में बनाए रखने की है? आखिर संकट किस बात का है? ये मुसलमान का संकट है... या कांग्रेस ब्रांड सेक्यूलरिज्म का... सनातनियों का या फिर ६५ साला इंडिया का संकट है?


जारी है........... 

6.10.14

मुसलिम अटीट्यूड – परसेप्शन एंड रिएलिटी---- भाग-१

मुसलिम अटीट्यूड – परसेप्शन एंड रिएलिटी---- भाग-१
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संजय मिश्र
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इंडिया का राजनीतिक और सामाजिक विमर्श यही मान कर चल रहा है कि आबादी के बड़े हिस्से ने जीने का सलीका तो बदला है लेकिन मुसलमान औरंगजेब और ब्राम्हण मनु के दौर में बने हुए हैं... हकीकत इससे अलग है ... जाहिर है समरसता की चाहत के बावजूद सार्वजनिक डिस्कोर्स हांफ रहा है...पहरुए न तो ब्राम्हण के मानस में आए बदलाव को स्वीकार कर रहे और न ही मुसलमानों के मिजाज की दस्तक सुनना चाहते।

ब्राम्हण की कथा फिर कभी... फिलहाल मुसलमानों के रूख में परिवर्तन को पहचानने की कोशिश करें... ... इस देश की आम समझ है कि दो बड़े कौम की सहभागिता का पहला आधुनिक पड़ाव साल १८५७ ने देखा... अंग्रेजों से छुटकारा पाने की अकुलाहट के छिट-पुट दर्शन इससे पहले भी हुए...लेकिन १८५७ में ये व्यापक आयाम के साथ उभरा... फिर भी बहादुरशाह जफर की कामना हिन्दू प्रजा के सहयोग... हिन्दू जमींदारों के सहयोग से मुगल सल्तनत की वापसी पर टिकी रही ... बेशक अंग्रेजों को परास्त करना पहली जरूरत थी।

आपसी सहयोग की मिसाल कायम हुई पर ये प्रयास विफल रहे... असफलता ने मुसलमानों को तोड़ दिया... शासक वर्ग होने के दिन लद चुके थे... जख्म थोड़े भरे तो अंग्रेजों से दोस्ताना रिश्ते पर उन्होंने गौर फरमाया...सर सैयद अहमद के समय में इस दोस्ताना रिश्ते के साथ आधुनिक शिक्षा का सूरज उगा... इस समझ को काफी बाद झटका लगा जब बंग-भंग आंदोलन के समय वे राष्ट्रीय चेतना और अंग्रेजों की सहृदयता के बीच जूझते रहे।

किस्मत बदलने की तमन्ना हावी हुई... खिलाफत आंदोलन में गांधी के सहयोग के बावजूद पश्चिम की तरफ ताकने और प्रोपोर्सनल रिप्रजेंटेशन की दिशा की तरफ वे बढ़ चले .... आजादी के आंदोलन की तीव्रता ने उन्हें अहसास करा दिया कि लोकतंत्र आएगा और उन्हें प्रजा वाला मिजाज विकसित करना पड़ेगा... मन की हलचल के बीच अलग देश के तत्व हावी हो गए... देश का बटवारा हो गया... मुसलमानों के लिए अलग देश बन गया।

जो भारत में रह गए उनके सामने धर्मसंकट था... आजादी की बेला क्रूरता की हदें पार करने का गवाह बनी थी... भीषण दंगों से हिन्दुओं के मन पर पड़ने वाले असर से भी वे वाकिफ थे...हिन्दू राष्ट्र की तमन्ना के स्वर भी उन्हें सुनाई दे रहे थे...फिर भी नेहरू ने उन्हें भरोसा दिया...अब वे जनता बन चुके थे... चुनावी राजनीति में बहुसंख्यकों के वर्चस्व की धारणा के बोझ को वे उतारने लगे...फ्री इंडिया में उनके मनोभावों को एक आसान से उदाहरण से बखूबी समझा जा सकता है।

फिल्म की दुनिया में दिलीप कुमार को हिन्दू नाम के सहारे खूब सफलता मिली... अपने नाम से सफल होने में उस समय के मुसलमान कलाकारों को हिचक थी... ये दौर बीता...  तब फिरोज खान और संजय खान का समय आया... ये मुसलमानों के आत्मविश्वास का संकेत कर रहा था... अपनी पहचान से ही उन्होंने सफलता के झंडे गाड़े...आज शाहरूख, आमीर और सलमान आत्मविश्वास के साथ आक्रामकता की नुमाइश कर रहे हैं।

शासक से जनता बनने के मुसलमानों के इस सफर में न तो औरंगजेब की महिमा है और न ही दबे-कुचले होने का दंश ...मुफलिसी से उबरते रहने की आकांक्षा इन भावों पर भारी है।

जारी है............ 

5.10.14

क्लीन इंडिया ड्राइव में राजनीति भी है मिस्टर प्राइम मिनिस्टर

क्लीन इंडिया ड्राइव में राजनीति भी है मिस्टर प्राइम मिनिस्टर
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संजय मिश्र
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हाल के समय में कई कांग्रेसी नेता अलग अलग मौकों पर इंडियन पीएम की प्रशंसा करते देखे गए हैं... १५ अगस्त के मौके पर अपने संबोधन में जब पिछली केन्द्र सरकारों के अच्छे काम को मोदी ने स्वीकार करने वाली बात कही तो माना गया कि ये कोई रणनीतिक मूव हो सकती है... लेकिन २ अक्टूबर को स्वच्छ भारत अभियान के शुरूआत के मौके पर उन्होंने विस्तार से उसे दुहराया... कांग्रेस का नाम तक लिया... कहा कि ये नेक अभियान है लिहाजा इसमें राजनीति न हो... मोदी समर्थकों के अलावा आम जनों को भी अनुमान था कि कांग्रेसी नेता मोदी के इस रूख का स्वागत करेंगे और उल्टी नहीं करेंगे... शाम होते होते कांग्रेसियों की खीझ छुपाए नहीं छुप रही थी...हे इंडिया के लोग... ये अभियान जरूर सुहाने वाला है... थाने में जाकर नरेन्द्र मोदी का मन लगाकर सफाई करना कैच विजुअल आफ द डे बना... पर कांग्रेस को आज के दिन भला-बुरा न कहें... मोदी ने उनके साथ राजनीति की है... लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने कांग्रेस से सरदार पटेल को छीन लिया... और अब उनसे गांधी की विरासत को छीन लेने की जुगत में लग गए हैं... मोदी के काम करने का तरीका ही ऐसा है कि वो दिखने लायक नतीजे दे ही देते हैं... इस अभियान को भी वो संतोष लायक मुकाम तक पहुंचा ही देंगे...फिर क्या बचेगा कांग्रेस के लिए? दलितों के बीच मोदी का संदेश जाएगा सो अलग... ये अकारण नहीं कि कांग्रेस की प्रतिक्रिया बार-बार गांधी के मुस्लिम प्रेम वाले विचारों की ओर घूम रही थी...

गुहा...भागवत और डीडी

गुहा...भागवत और डीडी
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संजय मिश्र 
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उम्मीद नहीं थी कि इतिहासकार राम चन्द्र गुहा आरएसएस की खिलाफत के लिए इतना कमजोर दांव खेलेंगे.... उन्हें दूरदर्शन पर मोहन भागवत के भाषण दिखाने पर आपत्ति है... वो कहते कि आरएसएस कम्यूनल है... लगे हाथ मोहन भागवत की तुलना इमामों और पादरियों से कर बैठे.... तो क्या वे कहना चाहते कि इस देश के इमाम और पादरी कम्यूनल होते हैं...?


साल १९८७... डीडी पर रामानंद सागर की रामायण सीरियल प्रसारित हुई थी... प्रबुद्ध लोगों को हैरानी तो हुई पर उसे देखने की होड़ सी मच गई... उधर वामपंथियों ने देश भर में इस प्रसारण की खिलाफत की थी...तल्ख विरोध चाणक्य सीरियल के प्रसारण पर भी किया इन्होंने .. साल भर पहले ही शाहबानो प्रकरण हुआ था.. सहम कर विरोध जता पाए थे वे ... रामायण सीरियल ने मौका दिया और पिल पड़े डीडी पर...उस दौर में टीवी चैनलों के नाम पर डीडी ही सब कुछ था...लिहाजा विरोध के लिए वजहें थी... 
अब जबकि निजी चैनलों की बाढ़ है और गला-काट प्रतिस्पर्धा है... डीडी के लिए प्रतिस्पर्धा में बने रहना मुश्किल हुआ जा रहा है... ऐसे में डीडी का इस पैमाने पर विरोध उसे बांध कर नहीं रख देगा? ... दूरदर्शन के लिए दोहरी आफत है... सरकारें नहीं चाहती कि ये संस्था प्रोफेशनल तरीके से काम करे... और अब विरोधी दलों के अलावा इतिहासकार, मीडिया पंडित और बुद्धिजीवी यही मंशा दिखा रहे...
चलिए इन विरोधियों की बात मान ली जाए... और फिर याद किया जाए मोहन भागवत का हिन्दू थ्योरी वाला भाषण ... निजी चैनलों ने इसकी आलोचना को प्रमुखता से दिखाया.... क्या डीडी के दर्शकों को इस तरह के डिस्कोर्स को देखने का हक नहीं देना चाहते ये विरोधी... क्या डीडी के दर्शकों को इसके लिए निजी चैनलों की ओर रूख करने के लिए मजबूर करना चाहते वे.... फर्ज करिए भागवत का वो भाषण डीडी का एक्सेक्लूसिव होता तो क्या विरोध करने वाले मोहन भागवत के उस भाषण पर कोई बवाल नहीं करते... क्या तब वो खबर नहीं होती? ... क्या मान लिया जाए कि विरोध करने वाले आगे से डीडी की स्वायतता की चर्चा नहीं करेंगे...और न ही प्रोफेशनल होने के लिए कहेंगे ? रामचन्द्र गुहा को याद रखना चाहिए कि उन जैसों की वजह से ही मोहन भागवत पहले भी खबर थे और आगे भी बने रहेंगे...

12.8.14

मोहन भागवत का बयान एसिमिलेशन की चाहत तो नहीं?


मोहन भागवत का बयान एसिमिलेशन की चाहत तो नहीं?
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संजय मिश्र
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उन लोगों को भी भारत, भारतीय और भारतीयता शब्द की याद सताने लगी है जो इंडिया और इंडियन शब्द से बांए-दांए होना कबूल नहीं करते ... मोहन भागवत ने हिन्दू शब्द की आरएसएस वाली व्याख्या को महज दुहरा दिया है...ये अहम नहीं कि इन बातों को वे पहले कहते थे तो काना-फूसी भी नहीं होती थी... अभी इस शब्द पर विमर्श चल पड़ा है... संविधान याद आने लगा है इंडिया शब्द के पैरोकारों को... ऐसा लगता है अब वे भारतीय शब्द को रियायत देने के मूड में हैं... ये रियायत टैक्टिकल मूव हो सकता है पर आप इस बदलाव को अच्छा मान लें तो ऐतराज नहीं....

जो ६५ साल के युवा इंडिया में यकीन करते .. और मानते कि इसका पांच हजार साल के भारत से डिस्कनेक्ट है... उनमें ये बदलाव दिख रहा है... पेंच हिन्दू शब्द के सोर्स में छिपा है... हिन्दू शब्द मुसलिम संस्कृति के मूल पश्चिमी गढ़ से आया है... और वहां इसे कलेक्टिव नाउन के रूप में ही लिया जाता रहा है...भारतीय शब्द को रियायत देने वाले हिन्दुस्तान या हिन्दू के पक्ष में नहीं जाना चाहते...पर यहां भी दिक्कत है उन्हें... असल में हिन्दुस्तान और हिन्दू शब्द के इस्तेमाल का रिवाज मुसलमानों में ही अधिक है... क्या इंडिया के पैरोकारों के चाहने से इंडिया के मुसलमान हिन्दुस्तान और हिन्दू शब्द का इस्तेमाल छोड़ देंगे?

ये हैरानी की बात है कि मोहन भागवत के इस प्रसंग के मकसद पर विमर्श बड़ा ही ढ़ीला-ढाला है... वे जोर लगा कर इसी नतीजे पर पहुंचते हैं कि ये सेफ्रोनाइजेशन का आग्रह है... दरअसल आरएसएस की नजर उस ऐतिहासिक बहाव को रास्ता देना लगता है जिसके कारण विदेश से आने वाले हर आक्रांता इस देश की संस्कृति में रच-बस जाया करते थे... मुसलमान का एसिमिलेशन अधूरा और छिटपुट ही रह गया...आरएसएस इसी अधूरेपन को पूर्णता देना चाहता है... वो भी महज एक शब्द- हिन्दू-  के जरिए... वो मुसलमानों की धार्मिक पहचान को नहीं छेड़ने की बात भी करता है ...

ये विकलता है... कि मुसलमान बस हिन्दू शब्द से विशेषित हो जाएं ...यानि कि जो हिन्दू शब्द जीवन शैली है ... उसे अपना कह दें... अपनी विशिष्ट धार्मिक पहचान बनाए रखते हुए... आरएसएस वाले कह सकते हैं कि ये आसान.. पर व्यापक रास्ता है इस देश को आगे ले जाने का .. वो मानता रहा है कि मुगलों और राजपूतों के बीच शादी-ब्याह के रिश्ते एकांगी रहे जिस कारण एसिमिलेशन का काम पूरा नहीं हो पाया...

राजपूत की बेटी और मुगल के बेटे का रिश्ता होता रहा... मुगल की बेटी और राजपूतों के बेटे के बीच रिश्ते नहीं हुए... ये टू-वे ट्रैफिक की तरह होते तो दारा शिकोह वाले दूसरे मौके की जरूरत नहीं पड़ती... दारा शिकोह सत्ता संघर्ष में खुद कमजोर पड़ गए लिहाजा एसिमिलेशन का दूसरा मौका भी हाथ से निकल गया ... कई मुसलमान समय समय पर इस बात को स्वीकार करते रहे हैं कि जब इस देश की हवा, मिट्टी, जंगल और पानी पर उनका हक है तो फिर ताज के साथ वेद, पुराण, खजुराहो भी उनकी विरासत क्यों नहीं हो सकती है?...

एसिमिलेशन का अनजाने में एक रास्ता कांग्रेस का भी है... आरक्षण के जरिए मुसलमान आखिरकार समय के साथ जाति के खांचे में फिट हो जाएंगे... इसका असर गहरा होगा...पर कांग्रेस इसे सचेत कदम के रूप में नहीं ले पाएगी... इसके लिए उसे अपने नजरिए में व्यापक बदलाव जो करना पड़ेगा... फिलहाल मुसलमानों के आरक्षण के सहारे कांग्रेस की रूचि सत्ता पाने की आकुलता तक सिमटी हुई है...
     

पिछड़ों के हाथ में रहेगी कुंजी..

पिछड़ों के हाथ में रहेगी कुंजी...
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संजय मिश्र
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खबर ये नहीं है कि नीतीश की पुकार को सुनकर लालू प्रसाद गले मिल गए... खबर ये है कि ११ अगस्त को जहां वे मिले वहां लोगों का जुटान नहीं हुआ... खबरनवीसों के लिए हाजीपुर उपचुनाव के सभामंच की वो तस्वीरें भले ऐतिहासिक फोटो की तरह सहेज कर रखने वाली चीज बन गई हों... पर बिहार की राजनीति में इस गठबंधन की राह उस सभामंच के नीचे की तस्वीरें तय करेंगी... ये तस्वीरें आने वाली अड़चनों के संकेत कर रही थीं... लालू की अभी भी इतनी हैसियत है कि वो बिहार के किसी कोने में सभा करने जाएं तो बीस-पच्चीस हजार लोग पहुंच ही जाते... नीतीश भी दस-पंद्रह हजार लोग कहीं भी जुटा लेते हैं... कायदे से हाजीपुर के उस भरत-मिलान की सभा में चालीस से पचास हजार लोग होने चाहिए थे... पर महज तीन-चार हजार की मौजूदगी चीख-चीख कर कह रही कि नेताओं के गले तो मिल गए पर उनके समर्थकों के दिल नहीं... मान लें कि लालू प्रसाद के समर्थक यहां से जेडीयू के कोटे के उम्मीदवार राजेन्द्र राय के कारण रणनीति के तौर पर कन्नी काट गए हों... तो भी मौजूद लोगों की तादाद पन्द्रह हजार होनी चाहिए थी... मतलब ये कि जेडीयू समर्थकों में इस महागठबंधन के लिए प्यार नहीं उमड़ा है... नीतीश की इस दयनीय शो का तेज दिमाग वाले लालू बेजा इस्तेमाल भी कर सकते... खबर ये भी है कि गठबंधन की राह आगे ठीक-ठाक चल पड़ी तो दो वोटर तबकों का धर्मसंकट समाप्त हुो जाएगा... जो मुसलमान २०१४ लोकसभा चुनाव के समय व्याकुल थे और अर्धचेतन मन से किसनगंज और कोसी इलाके में पोलराइज हो गए ... अब उन्हें विकल्पों के चक्कर में नहीं पड़ना पड़ेगा और वे थोक भाव से इस गठबंधन को राहत दे देंगे... इसी तरह उन सवर्णों वोटरों का धर्मसंकट भी दूर हो गया जो नीतीश की छवि के कारण लोकसभा चुनाव में तो नही पर २०१५ के विधानसभा चुनाव में नीतीश के लिए दिल में जगह रखे रहना चाहते थे... असल चुनावी जंग अब पिछड़ों के बीच छिड़ेगी... जो इनका ज्यादा हिस्सा अपने साथ ले जाएगा वो निर्णायक स्थिति में होगा...

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