life is celebration

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24.12.12

आम आदमी पार्टी से क्यों मची है हलचल?
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संजय मिश्र
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पिछला साल अन्ना का रहा तो साल 2012 पर अरविन्द केजरीवाल छाए रहे। लोकपाल बिल पास नहीं होने और केजरीवाल के चुनावी राजनीति में कूद पड़ने के बाद माना जाने लगा की पारंपरिक राजनीति पर आन्दोलनों का संकट टल गया है। पर घाघ राजनेताओं का अमर्यादित सार्वजनिक व्यवहार चीख-चीख कर कह रहा कि संकट टला नहीं है उलटे इसका असर पड़ा है। मणि शंकर अय्यर का सांसदों को जानवर कहना पोलिटिकल क्लास के मन की हलचल बयां करता है। पेश है बीत रहे साल में केजरीवाल की यात्रा पर एक नजर --

साधारण कद-काठी, हाफ शर्ट और पैंट पहना एक व्यक्ति जब दिल्ली के गैर-संभ्रांत इलाके की गलियों में हाथ में पिलास लिए बिजली कनेक्शन जोड़ने आ धमकता है तो लोग-बाग़ खिंचे चले आते हैं ... कानून टूटने के डर से निर्विकार। दिलासा देने की जरूरत कहाँ रह जाती है सहट कर आ जाती इस औसत भीड़ को ... न कोई उत्पात और न ही हिंसा ... बस लोगों के मानस पटल पर फ़ैल जाती राहत की प्रखरता। ये राजनीति का नया स्वाद है ... सुखद आश्चर्य बिखेरती ... सुच्चा देसी ग्रामर। इस दस्तक से इंडिया की एलीट हो चली राजनीति असहज है।

अब तक आप समझ गए होंगे कि बात केजरीवाल की ही हो रही है। घनी मूंछों के नीचे से झांकती निश्छल मुस्कान और पैर में साधारण सा चप्पल। मोटी - मोटी फ़ाइल कांख में दबाए यही व्यक्ति जब प्रेस कांफ्रेंस करने पहुँचता है तो उसी एलीट राजनीतिक वर्ग को इसकी धमक सुनाई देती है ... न जाने इस बार किसकी बारी हो। रिपोर्टरों को उनके संपादक नसीहतें दे कर भेजते, निरंतर उनसे संपर्क में रहते कि कब कौन से सवाल करने हैं? होम-वर्क कर आए रिपोर्टर के जेहन में ये बात घुमड़ती रहती कि वो ऐतिहासिक पलों को कवर करने आए हैं। लिहाजा दिल और दिमाग ... दोनों से सवालों की बौछार निकलती ... और अगले कई घंटों तक टीवी स्टूडियो इन बातों पर रणनीति बदल- बदल कर विमर्श करने को मजबूर होते।

केजरीवाल और उसकी टोली से न चाहते हुए देश के नियंता व्याकुल हो चले हैं। बौखलाहट इतनी कि उन नेताओं, संयमी भाषा बोलने के आदी बुजुर्ग पत्रकारों और विशफुल दुनिया में रहने वाले बुद्धिजीवियों की जुबान  फिसलने लगी हैं। कभी कोई माखौल उडाता तो कभी नसीहतें देता। दिलचस्प है कि 65 साल के कथित इंडिया में किसी राजनीतिक शख्स को इतनी नसीहतें नहीं दी गई जितनी केजरीवाल की झोली में गई हैं। सवाल उठता है कि ये देश सुहाना क्यों नहीं बन पाया जहां सलाह देने वालों की इतनी बड़ी तादाद है? क्या वे अन्दर से हिल गए हैं?

पारंपरिक राजनीति वाले तो पहले ही खौफजदा हुए ... 16 अगस्त 2011 को ही। आन्दोलन का संकट इतना भारी पड़ा कि लग गए चक्रव्यूह में। सत्ता की माया से जुड़े बाकि के मशविरा देने वाले लोग दरअसल उसी व्यूह के बाहरी फ्रंट हैं जो केजरीवाल को आफत मानते उसकी यात्रा को थाम लेना चाहते। व्यूह रचने वाली कोर जमात को भरोसा है अपने निर्लज्ज राजनीतिक कौशल पर। वे चाहते कि जैसे-तैसे केजरीवाल पारंपरिक राजनीति की चाल में उलझें ... जो नए राजनीतिक बिंब केजरीवाल ने गढ़े हैं वो ध्वस्त हों। फिर तो राह आसान हो जाए।

ये बिंब क्या हैं जो आसानी से लोगों के दिमाग में घुस जाते? एक उदाहरण काफी होगा -- जनता मालिक है, नेता उसके नौकर (सेवक) -- इस नारे की मारक क्षमता से तिलमिला जाते राजनेता। याद करें कैसे वे कहते कि - सड़क के लोगों को बड़े लोगों ( मंत्रियों ) के साथ लोकपाल के लिए वार्ता की मेज पर बिठाया। खैर जमीनी सच ये है कि आम आदमी का नारा देने वाले पुराने राजनीतिक ध्रुव  को आम आदमी के नए पैरोकार से चुनौती मिल रही है। आम आदमी पार्टी ये समझाने में कामयाब हो रही कि देश में चल रही कल्याणकारी योजनाएं जनता पर उपकार नहीं बल्कि ये तो सरकारों की मौलिक जिम्मेदारी है।

देश में ये संदेश खुलकर जा रहा कि केजरीवाल ने राजनीति को हिम्मत दी है। इसने मौजूदा राजनीति की उस आपसी समझ को तोड़ा है जो ये मान कर चलता कि राष्ट्रपति, सोनिया और उसके परिजन, बाजपेयी और उसके परिजन, अंबानी और टाटा जैसों को सार्वजनिक तौर पर चुनौती नहीं दी जाए। मीडिया भी हैरान हुआ कि जिसे छूने से वो डरता रहा उस पर लगे केजरीवाल के आरोपों की कवरेज का उसे मौका मिलने लगा।

हम राजा, हम महराजा की मानसिकता की कलई खोलने तक बात सीमित नहीं है। ग्राम स्वराज को सुदृढ़ आकार देने पर फोकस है इन नए खिलाड़ियों का। गाँव भारत की संरचना का मूल आधार है। गाँव में सभी जाति और वर्ग के लोगों के बीच सामूहिकता के भाव को पारंपरिक राजनीति ने क्षत-विक्षत कर दिया। स्थानीय योजनाएं ग्राम-सभा से बनें और इसी के संरक्षण में कार्यान्वित हों साथ ही अहम् मसलों पर पंचायत स्तर पर रेफरें-डॉम की व्यवस्था की केजरीवाल की मांग से सहम गया है घाघ नेताओं का वर्ग। उसे भय है कि इस रास्ते चीजें चली तो विभिन्न वर्गों के बीच साझेदारी का अहसास बढेगा जो बांटने और राज करने की प्रवृति पर अंकुश लगाएगा। दिल्ली और राज्य की राजधानियों के हुक्मरान सकते में हैं कि इस तरह के विकेन्द्रीकृत सत्ता केंद्र से क्षेत्रीय विषमता का दंश भी कुछ हद तक कम होगा। और तब न नरेगा और न ही विशेष पैकेज जैसे मुद्दे जादुई छडी रह जाएंगे।

किसी राजनीतिक प्रयास को लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए अनुकूल माहौल ( जनमत) के अलावा कम से कम चार प्रमुख तत्वों की दरकार होती है। ये हैं--दर्शन (यानि वैचारिक आधार ), संगठन ( यानि उस वैचारिक आधार का वाहक ), कार्यक्रम (जिसमें कि दर्शन झांकते रहते ) और जनसहभागिता (यानि जिनके लिए आंदोलन किया जा रहा उनकी भागीदारी)। इसके इतर नेतृत्व क्षमता की परख तो होती ही रहती है हर पल ... सरकारी दाव-पेंच से पार पाने में।

केजरीवाल ने ये कहा है कि आम आदमी पार्टी में अध्यक्ष जैसा कोई पद नहीं होगा। अभी तक जो बातें सामने आई हैं उससे लगता है कि वाम दलों की केंद्रीय कमिटी जैसा ही समझदार लोगों का ग्रुप होगा जो किसी मसले पर पंचायत स्तर से छन कर आए रुझानो पर आख़िरी राय रखेगा। बीजेपी और वाम दलों को छोड़ कर देश के तमाम राजनीतिक दल व्यक्तिवादी (प्रजातांत्रिक तानाशाही ) नेतृत्व के आसरे चल रहे हैं। पब्लिक का माय-बाप होने वाली संस्कृति के वे पोषक हैं।

केजरीवाल ने जो पासा फेका है वो अलग नजरिया पेश करता है। उनकी नेतृत्व शैली में लोगों को प्रभावित करने और लोगों की समझ और परिवेश से खुद प्रभावित होने की ललक है। इसकी गूँज फ़ैल रही तभी तो घबराए पारंपरिक नेताओं का ख़ास तबका केजरीवाल पर ही तानाशाह होने का आरोप मढ़ रहे। इस तरह के आरोप जान-बूझ कर लगाए जा रहे ताकि केजरीवाल के चाहनेवाले भ्रम की स्थिति में रहें। इन हमलों से बेफिक्र आम आदमी पार्टी उन क्रियाकलापों में लगा है जहाँ लोगों को स्वेछा से सामूहिक लक्ष्य की दिशा में प्रयास के लिए मनाया जाए।

अरविन्द करिश्माई लीडरों से अलग दिखना चाहते। पर उनकी सादगी ( ममता बनर्जी की तरह) लोगों को उस हद तक मोहती है जो करिश्मा का डर पैदा करती। लाल बत्ती जैसे श्रेष्ठता ज़माने वाले सरकारी लाभ से तौबा साथ ही ये कहना कि धंधे या लाभ के लिए उनकी पार्टी से न जुड़ें लोग ... शहरी मध्य वर्ग और ग्रामीण आबादी को एक जैसा आकर्षित करते हैं। समस्याओं को उठाना और हल सुझाना पॉलिटिकल क्लास और उनके चहेतों की वेदना बढाता है।

ये अकारण नहीं है कि आम आदमी पार्टी से विचारधारा और आरक्षण जैसे मसलों पर स्टैंड साफ़ करने वाले सवालों की झरी लगाई जाती है। मकसद ये कि या तो केजरीवाल मौजूदा खांचे वाली राजनीति की कुटिल चाल में फांस लिए जाएं या फिर स्टैंड साफ़ नहीं करने पर एक्सपोज किये जाएं। इस देश में माइनिंग नीति की खामियों पर माओवादियों के बाद सबसे ज्यादा मुखरता केजरीवाल के लोगों ने दिखाई है। इसके अलावा अलग-अलग मुद्दों पर जो स्टैंड लिया गया है उससे साफ़ है कि राजनीति के ये नए खिलाड़ी जातिवादी और धर्म की राजनीति के पचरे से दूर जनवादी राष्ट्रवाद की ओर चल पड़े हैं।

केजरीवाल की राजनीति को तरह-तरह से देखा जा रहा है। कहा जा रहा कि वो मीडिया का काम आसान कर रहे ... ये कि वो वोटरों की सोच समृद्ध कर रहे, ये भी कि वो मेधा पाटकर और अरुंधती की जन हस्तक्षेप वाली रीति-नीति को व्यापकता दे रहे ... वो प्रोजेक्ट वर्क की तर्ज पर चलते .. वगैरह-वगैरह। पर गौर करें तो हिट एंड रन से आगे का सफ़र तय हो चुका है। जन हितैषी राजनीति का अजेंडा अब सामने है।

देश के तमाम दल गठबंधन की मजबूरी के नाम पर मुद्दा आधारित राजनीति ही तो कर रहे। ऐसे में मुद्दों पर आधारित केजरीवाल की राजनीति कुछ सालों तक प्रासंगिक रह ही सकती है। पारंपरिक राजनीति और देश के मानस के बीच एक तल्खी है। देश का बड़ा वर्ग विचारधारा की जगह विचारों के युग में जी रहा है। पारंपरिक राजनीति उपरी तौर पर तो विचारधारा के आग्रही दिखने में लगे रहते हैं पर हर दिन गवाह बनता है इनके मोल-भाव और लेन -देन की राजनीति का। ऐसा जब तक चलेगा आम आदमी पार्टी इनकी चिंता बढाती रहेगी।

ये कितना सफल होगा फिलहाल आंकना कठिन है। सात्विक आंदोलनों की कोख से जन्मी है ये। लिहाजा दाव-पेंच और चुनावी अखाड़े में कितनी ही बार फिसलने का खतरा बना रहेगा। दिल्ली विधान सभा चुनाव इसके लिए परीक्षा की घड़ी होगी। आम आदमी मेंगो पीपुल वाले डकार से आहत तो है पर वो सकते में है ... क्योकि असल परीक्षा की घड़ी उसकी आई है ... वो भद्र छवि वाली मीरा कुमार को भी चुन लेता है ... साथ ही शहाबुद्दीन और पप्पू यादव जैसों को भी जिता देता है। यानि फर्क करने का समय आ गया है ....केजरीवाल आम आदमी के मन में मची ऐसी हलचल से थोड़ा मुस्करा सकते हैं।

3.12.12

दम तोड़ने की कगार पर खड़ा है खादी उद्योग

बिहार में खादी की दुर्दशा पीड़ादायक है। केंद्र सरकार के खादी कमीशन और बिहार सरकार के खादी बोर्ड से जुड़े कई संस्थाएं हैं जो उपेक्षा के कारण नाम के लिए चल रहे हैं। बिहार राज्य खादी ग्रामोद्योग संघ की इकाइयाँ खादी कमीशन से संबद्ध हैं। पर कमीशन की तरफ से रिबेट मिलना बंद हो गया है। ले देकर बिहार सरकार की ओर से दस फीसदी का रिबेट मिलता है। लेकिन रिबेट का पैसा भी कई सालों का बकाया है। आय के साधन नहीं ... समस्याओं के मकडजाल से निजात दुरूह है। संघ की दरभंगा इकाई के बहाने खादी की दुर्दशा की पड़ताल करती ये रिपोर्ट .....

दम तोड़ने की कगार पर खड़ा है खादी उद्योग
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संजय मिश्र
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.... सूत का हर धागा जो मैं कातता हूँ उसमें मुझे ईश्वर दिखाई देते हैं .... खादी व्यावसायिक युद्ध की जगह व्यावसायिक शांति का प्रतीक है .... ये भारत की आर्थिक आज़ादी का बाहक है ....
महात्मा गांधी ने जब ये बातें कही होगी तो उन्हें रत्ती भर अंदाजा नहीं रहा होगा कि उनके सपनों के भारत में
खादी बदहाली की दास्तान लिखने को मजबूर होगी। गांधी की इन उत्कट आस्था से बेखबर और  अनमन-यस्क दरभंगा जिला खादी ग्रामोद्योग संघ परिसर में आज सन्नाटा पसरा है। न तो चरखे की घर्र- घर्र और न ही उत्पादन से जुडी कोई चहलकदमी।  माहौल में सताती भविष्य की दुश्चिंता और थम कर निकलते निःश्वास के बीच एक इंतजार कि कहीं से सहायता के कोई हाथ उठ जाएं।

खादी भंडार नाम से मशहूर बिहार राज्य खादी ग्रामोद्योग संघ की दरभंगा इकाई ने इतनी विकलता कभी न देखी। हाल में यहाँ के कर्मी धरने पर बैठे। इनकी वेदना ख़बरें बनी तो आस जगी पर जिन्दगी फिर उसी पटरी पर। बाईस कठ्ठे के परिसर में फैले इस परिसर में कभी ढाई सौ कर्मी अपना कौशल दिखाते थे। नील टीनोपाल में धुले झक झक करते खादी के कपडे पहने लोगों की अलग ही दुनिया बसती थी। विपत्ति की मारी महिलाओं का आँखों में उम्मीद लिए यहाँ चरखा कातने के अवसर की तलाश में आना, ट्रकों से अनलोड होता कच्चा माल, फिनिश्ड उत्पादों को खादी के शो रूम ले जाने की गहमा-गहमी और उत्कंठा बढ़ाते स्वाधीनता सेनानियों की आवा-जाही। सादगी के बीच भव्यता के भाव का ये अहसास एम एल अकेडमी चौक ने सालों तक महसूस किया। चौक पर उठने-बैठने वाले लोग आज खादी भण्डार की दुर्दशा का गवाह हैं।

कांति -विहीन हो चुके इस परिसर में विवशता की टीस झेलते 7-8 परिवार ही रह गए हैं। मेस बंद, चरखे गोदाम में, उत्पादन लगभग ठप। एक मात्र आसरा बिक्री केन्द्रों का। बिक्री प्रभारी शिवेश्वर झा कहते हैं कि शहर में स्थित चार में से दो बिक्री केन्द्रों को दूकान का किराया नहीं चुका पाने के कारण बंद कर देना पड़ा। केंद्र सरकार के खादी ग्रामोद्योग कमीशन से संबद्ध इस संघ की जिले में 32 इकाई थी। अब ये संख्या 24 पर सिमट आई है। संघ के संयुक्त मंत्री नन्द किशोर लाल दास के मुताबिक इनमें से दस केंद्र ऐसे हैं जहाँ एक भी स्टाफ नहीं है। पूरे जिले की संघ की गतिविधि 28 स्टाफ के आसरे जैसे-तैसे चल रही है। स्टाफ विहीन होने के कारण कई केंद्र लैंड माफिया के चंगुल में आ गए हैं।

ये नौबत क्यों है? आंकड़ों के सहारे समझने की कोशिश करें। खादी कमीशन के अंतर्गत ऊनी और सिल्क के देशव्यापी उत्पादन की ग्रोथ रेट छह फीसदी के आस-पास रही। ये आंकड़े साल 2009 से 2012 के बीच के हैं। जबकि इसी अवधि में कमीशन को केंद्र सरकार की सहायता राशि में पचास फीसदी से भी ज्यादा का इजाफा हुआ। यानि इन पैसों का सही दिशा में उपयोग नहीं हो रहा। दरभंगा का खादी संघ कमीशन से पैसों की सहायता के लिए तरस रहा है। अब यहाँ के आंकड़े देखें। साल 2000 के मुकाबले साल 2011 के बीच उत्पादन, बिक्री और रोजगार सृजन साल दर साल घटता ही रहा।

टेबल -
                                             दरभंगा खादी संघ
                                             साल - 2000                                साल - 2011
उत्पादन                                65.66 लाख रूपये                         9.03 लाख रूपये
बिक्री                                     78.34 लाख रूपये                         20.40 लाख रूपये
रोजगार सृजन (स्टाफ)          112                                              28

                                              खादी कमीशन (मुंबई)
                                              साल - 2000                                साल - 2005
उत्पादन                                 431.5 करोड़ रूपये                        461.5 करोड़ रूपये
बिक्री                                      570.5 करोड़ रूपये                        617.8 करोड़ रूपये
रोजगार सृजन                        9.5 करोड़                                     8.6 करोड़


ऊपर से केंद्र सरकार ने रिबेट देना बंद कर दिया है। फाइलों को खंगालते खादी भण्डार के अका-उन-टेंट राज कुमार बताते हैं कि अभी 35 लाख की देनदारी है। इसके अलावा वेतन और ई पी एफ के लिए पैसे जुटाने पड़ते हैं। उत्पादन के लिए कच्चा माल चाहिए और उसके लिए चाहिए पैसे। कमीशन का मोहम्मदपुर और सकरी में रुई का गोदाम था जहाँ से रियायत में कच्चा माल मिल जाता था। साल 1998 में ये गोदाम बंद कर दिए गए। फिलहाल कमीशन के ही हाजीपुर स्थित टेप पूनी प्लांट से नकद में पूनी की खरीद हो रही है।  टेप पूनी के जरिये संघ के दोघरा, सिंह-वाड़ा  और मोहम्मदपुर यूनिट में कपडे का उत्पादन  होता है। इसके अलावा बिरौल केंद्र में सूत कटाई होता है। बाकि जगहें उत्पादन पूरी तरह ठप है। 

पहले उत्पादन अधिक था तो देश भर में यहाँ का माल जाता था। उस कमाई का एक हिस्सा  बाहर से ऊनी कंबल मंगवाने के काम आता था जो यहाँ के बिक्री केन्द्रों पर बेचे जाते। अभी कंबल की खरीदारी नहीं के बराबर है। तेलघनी, बढईगिरी और अन्य उद्योग भी बंद हो गए हैं। समस्याएँ और भी हैं। खादी कमीशन ने 1972 में रोजगार सृजन के लिए संघ की जिले भर की अचल संपत्ति के एवज में 2 करोड़ का लोन दिया था। अब इस कर्ज की राशि लौटाने का दबाव बनाया जा रहा है। अपग्रेडेड चरखे की कमी और स्किल्ड लेबर का अभाव तो झेलना ही पड़ रहा है। खादी भण्डार के कर्मी सुनील राय बताते हैं कि यहाँ के काम की समझ के बावजूद स्टाफ के बच्चे इस पेशे में नहीं आना चाहते।

निरंजन कुमार मिश्र - मंत्री , बिहार राज्य खादी ग्रामोद्योग संघ , दरभंगा
- पैसे की कमी आड़े आ रही है। केंद्र ने साल 2010-11 से रिबेट देना बंद कर दिया है। जबकि बिहार सरकार ने रिबेट 20 फीसदी से घटा कर 10 फीसदी कर दिया है। केंद्र की करीब 22 लाख और बिहार की करीब 18 लाख रूपये रिबेट की राशि का भुगतान हमें नहीं हुआ है। बावजूद इसके उत्पादन की रुग्णावस्था से पार पाने की हम कोशिश कर रहे हैं।



18.11.12

आस्था के आसरे बाज़ार को चुनौती देने की कोशिश

आस्था के आसरे बाज़ार को चुनौती देने की कोशिश
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संजय मिश्र
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जै ज़माना मे दुनिया बनले ... कहै छै जे परकृति माए अपन देह के बांटि लेलखिन ... छठम अंश जे भेलै से छठी माए भेलखिन .....बूढ़ पुरनिया इहो कहै छै जे ओ ब्रह्मा के मानस पुत्री छलखिन ... जे से ... हिनकर पूजा केला स बच्चा सबहक रक्षा होई छै .... कतेक खिस्सा कहब। इस किस्सागोई के बीच कोनिया का एक हिस्सा आकार ले चुका था। लम्बी सांस छोड़ने के बाद वृद्ध कारीगर के हाथ फिर से बांस करची पर फिसलने लगे। बीच-बीच में सड़क की ओर नजर जाती। टक -टकी इस तरफ कि पिछले साल की तुलना में इस साल कितना ऑर्डर आ रहा है। दरभंगा के भटियारी सराय के बांस के कामगार बताते हैं कि खरीदारी सामान्य चल रही है। ये जानते हुए कि सेमी-फाइबर सूप (डगरा ) और पीतल के कोनिया से इन्हें चुनौती मिल रही है ... ये बांस को कलात्मक अभिव्यक्ति देने में मग्न हैं।

शहर के बीच में स्थित इस गाँव में करीब पच्चीस लोग इस पुश्तैनी काम को अंजाम देने में लगे हैं। लक्ष्मण मल्लिक बताते हैं कि कोनिया, सूप, चंगेरा, बड़ा चंगेरा( जिसे दौड़ा भी कहते हैं ) की सामान्य बिक्री हो रही है। कोनिया 25 से 35 रूपये में जबकि दौड़ा 100 रूपये में। बांस की करची से बना पथिया 100 रूपये में बिक जाता है लेकिन इसकी डिमांड में तेजी नहीं है। कच्चा माल के रूप में बांस, रंग, और अन्य सजावटी सामान की इन्हें खरीद करनी पड़ती है। एक हरौथ बांस 250 रूपये में आता है।

बारह साल के नाती प्रहलाद को कारीगरी की बारीकी समझाते हुए लक्ष्मण कह उठते हैं कि 300 रूपये में लोग पीतल का कोनिया खरीदते हैं। ज्यादा खर्च करने वाले इसे खरीदने लगे हैं और साल-दर-साल इसका इस्तेमाल करते हैं। उधर चमक-दमक में यकीन रखने वाले प्लास्टिक ( सेमी-फाइबर ) सामान लेने लगे हैं। प्लास्टिक का सूप 125 रूपये में मिलता है। लेकिन आस्थावान लोग पारंपरिक विचारों को अहमियत देते हैं। मुस्कुराते हुए लक्ष्मण कहते हैं कि -- हमर सबहक हाथ सं बनल बांसक समान शुद्ध मानल ज़ाई छै ... बांसक समान बंश बढबैत छै। शायद इस सोच में ही इन कारीगरों की उम्मीद बची है। प्रहलाद के मुताबिक़ पढ़-लिख कर नौकरी करेंगे लेकिन पुश्तैनी धंधा सीखने में क्या हर्जा है?

10.11.12

चिंता न करें जेठमलानी इसी देश में मिथिला भी है।

चिंता न करें जेठमलानी इसी देश में मिथिला भी है।
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संजय मिश्र
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जेठमलानी के राम संबंधी बयान को सप्ताह होने को आए पर कांग्रेस की खुशामद में रमे दिल्ली के पत्रकार खासकर टीवी पत्रकार पूरे रौ में हैं। कांग्रेसी आका खुश होंगे सो बीजेपी को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। इनमें वो चैनल भी लगे हैं जिनके ब्रांड बन चुके पत्रकार को उसी जेठमलानी ने बेइज्जत कर अपने घर से भगा दिया था। आज जेठमलानी उनके लिए हॉट केक हैं जो राम, हिन्दू जीवन शैली से कांग्रेस ब्रांड सेक्यूलरिज्म की खातिर अछूत सरीखा व्यवहार करती रही है। पत्रकारिता का तनिक भी ख़याल होता तो ये चैनल मिथिला में स्थित अपने किसी रिपोर्टर से लाइव करवा रहे होते। जेठमलानी अपने विचार पर मुग्ध हैं। न जाने उन्हें राम के संबंध में मिथिला की सोच का कितना अहसास है।

मिथिला में राम का ससुराल है। ये इलाका धर्म और आध्यात्म का बड़ा केंद्र रहने का आदर हासिल रखता है। कुछ दिलचस्प पहलू यहाँ रखे जा रहे हैं। राम के भगवान्, मर्यादा वाले चरित्र और जमाई --इन तीनों रूपों का अनूठा संगम मिथिला में दीखता है। आस्थावान लोग भगवान् या नारायण का रूप उनमें देख धन्य होते। वहीं जनमानस लोक हितवादी मर्यादा के लिए उन्हें उसी श्रधा से याद करते हैं। जमाई के रूप में भी वे स्तुत्य ही हैं। पर सीता माता को मिले कष्ट से द्रवित स्वर जब लोगों के मुख से निकलते तो लगता आसमान फटने वाली कहावत चरितार्थ हो जाती। तभी तो यहाँ विवाह पंचमी के दिन लोग अपनी बेटियों के ब्याह से कतराते हैं। इसी दिन सीता का विवाह हुआ था।

मिथिला की  धरती पर कई साहित्यकारों ने राम कथा लिखी पर उनमें सीता की महानता को ज्यादा उकेरा गया। ये भी गौर करने वाली बात है कि कष्ट हरने के लिए विद्यापति नें कृष्ण और भोलेनाथ को अपनी पदावली में अधिक जगह दी। मिथिला में संभवतः राम के कारण ही जमाई को भगवान् की तरह आदर देने की परंपरा है। पर ये भी सच है कि भगवान् के रूप में राम के मंदिर मुश्किल से मिल जाएं। सीता के प्रति ममता के साथ ही राम के तीनों रूपों के साथ मिथिला सामंजस्य बिठाने की कोशिश करती रही है। जेठमलानी जी सीता के दुखों को महसूस करने के लिए मिथिला की तरफ से आपको धन्यवाद।

5.11.12

रियल रिजनल क्षत्रप बन गए नीतीश

रियल रिजनल क्षत्रप बन गए नीतीश
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संजय मिश्र
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04-11-12
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एक दिन ने इतनी राजनीतिक हलचल कभी-कभार ही देखी होगी। जहां दिल्ली में राजनीति इठला रही थी वहीं पटने में ये छुई -मुई सी हो रही थी। सुपर-डुपर  सन्डे यानि 04-11-12 को दिल्ली से ज्यादा राजनीतिक रंग पटने ने देखे जहां देश के अगले पी एम की रेस के तीन दावेदार
जमे थे। अड़चनों से पार पाते नीतीश कुमार गांधी मैदान में अधिकार रैली में जब अपने समर्थकों को निहार
रहे थे तो उनके मुख-मंडल पर संतोष के भाव झलक रहे थे। राहत मिली थी दो महीने की उथल-पुथल भरी
जद्दोजहद से। सकून ये कि दिल्ली की गद्दी की महत्वाकांक्षा के लिए जिस हैलीपैड की जरूरत है वो चाहत
साकार हुई। परसेप्सन वाले रिजनल क्षत्रप होने के दिन अब लद गए हैं। नीतीश कुमार का रियल रिजनल
क्षत्रप के रूप में अवतरण हो गया है।

दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस ने भी इसी दिन अपनी ताकत दिखाई। 16 अगस्त 2011 को इसी रामलीला मैदान में अन्ना के चाहने वाले जन सैलाब ने जो चुनौती राजनीतिक जमात के लिए पेश
की थी उससे उबड़ना कांग्रेस के लिए जरूरी था। ये पार्टी अपनी लाज बचाने में कामयाब रही। उत्साह में
अगले आमचुनाव का शंखनाद हो चला। नीतीश के लिए यहाँ भी राहत के क्षण आए। रामलीला के मुकाबले
गांधी मैदान में जुटान अधिक रही। यानि मोल-भाव के लिहाज से मुफीद अवसर के संकेत। नीतीश ने
हुंकार भरते हुए मार्च में दिल्ली कूच करने का ऐलान कर दिया। साथ ही जब उन्होंने पिछड़े राज्यों को विशेष
राज्य के दर्जे की मांग के लिए गोलबंद करने की घोषणा की तो राजनीतिक निहितार्थ स्पष्ट झाँकने लगे।
जाहिर है इस राजनीतिक ध्रुवीकरण की जद में ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और शिबू सोरेन जैसों को
साधा जा सकता है।

शतरंज की बिसात बिछ चुकी है। नीतीश की रणनीति है कि मौजूदा राजनीतिक गठबंधनो के अलावा
संभावित तीसरे मोर्चे में स्वीकार्यता का विकल्प कायम हो। लेकिन इसके लिए मॉस लीडर होने का तमगा
जरूरी था। अधिकार रैली की सफलता ने ये तमगा दे दिया है। बिहार को समझने वाले जानते हैं कि नीतीश
की राजनीतिक यात्रा सवर्णों के दृढ़ लालू विरोध और बीजेपी के मजबूत संगठन के आसरे टिका रहा है।
जे डी यू संगठन के मामले में बेहद कमजोर था। लेकिन विशेष राज्य की मुहिम के बहाने पूरा जोर संगठन
को मजबूत करने पर लगा रहा। कड़ी मेहनत रंग लाई। गांधी मैदान में जब नीतीश समर्थको को संबोधित
कर रहे थे तो यही कठिन परीक्षा पास कर लेने का सकून था।

राजनीतिक बिम्ब के लिहाज से देखें तो पिछड़े राज्यों के विकास का मुद्दा अब सतह पर आ चुका है। हर
हिन्दुस्तानी को तरक्की करने का हक़ जैसे नारे आने वाले समय में गूंजेंगे। सोच-समझ कर ही उसी तारीख
और उसी गांधी मैदान में अधिकार रैली रखी गई जहाँ से जे पी ने इंदिरा को चुनौती दी थी। दिलचस्प है कि
इसी दिन पी एम पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी दिवंगत कैलाश पति मिश्र को श्रधांजलि देने पटना पहुंचे।
बीजेपी कार्यकर्ताओं ने ग़मगीन माहौल में भी -देश का पी एम कैसा हो नरेन्द्र मोदी जैसा हो - जैसे नारे
लगा कर राजनीतिक कशमकश को गरमा दिया। कुछ ही देर बाद आडवाणी ने पटने में ही नीतीश की
तारीफ़ कर चौंका दिया। जाहिर है आडवाणी के पी एम पद की होड़ में होने का जे डी यू समर्थन करता है
... मोदी को किनारे करने के लिए। नीतीश ने भी दिवंगत बीजेपी नेता को मंच से ही श्रधांजलि देकर ये
जता दिया कि सारे ऑप्सन खुले हैं। लालू का छटपटाना स्वाभाविक है। नीतीश से भी अधिक भीड़ जुटा कर कभी इतिहास रचने वाले लालू अब कांग्रेस खेमे में कमजोर पड़ते जाएंगे। उधर, विशेष राज्य के अभियान से आस लगाने वाली जनता को अब तक अहसास हो चुका होगा कि
ये मुद्दा पृष्ठभूमि में जा चुकी है और इसकी डगर कठिन है।  

3.10.12

नीतीश के विरोध के मायने

नीतीश के विरोध के मायने
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संजय मिश्र
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नीतीश का प्रभामंडल बिखरने लगा है . . . ऐसी सोच राजनीतिक विश्लेषकों को मथ रहे हैं। वे एकमत नहीं हुए हैं पर आम राय बनी है कि जो बवंडर आया था वो फिलहाल शांत हो चला है। नीतीश चाहते होंगे कि ये थमा रहे . . . आखिरकार सत्ता के परम सुख के बीच पहली दफा धरातल से लावा फूटा है। ये न तो उपेन्द्र कुशवाहा, ललन सिंह सरीखे नजदीकियों की चेतावनी है और न ही पटना के आर-ब्लाक के प्रदर्शनों की हुंकार। अभी की चुनौती ग्रोथ रेट के छलावे को उघार करते हुए सवालों की झड़ी लगाते हैं।

26 सितम्बर और तीन अक्टूबर के बीच के अंतराल में नीतीश ने दिखाया है कि वे अपने ही एजेंडे पर चलेंगे। 26 को दरभंगा से विरोध की जो चिंगारी निकली खगडिया जाते जाते धधक गई। इस दौरान जहाँ जहाँ विरोध और उपद्रव हुए वहां के शिक्षकों पर कठोर कार्रवाई हुई है। लोक लाज से बेपरवाह प्रशासन की नीतीश भक्ति देखिये कि सुपौल के कई स्कूली छात्रों से विरोध नहीं जताने का बोंड तक भरवा लिया। उधर बन्दूक लहराने वाले रणबीर यादव पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। दिल्ली के वे राजनीतिक विश्लेषक नीतीश के इन मनोभावों से भौचक हैं जो उन्हें पीएम पद का दावेदार बता रहे थे।

बिहार के सी एम जताना चाह रहे हैं कि राज्य के स्वयंभू गार्जियन अकेले वही हैं और उनकी अथोरिटी को कोई चुनौती कैसे दे सकता? और ये भी बताना चाहते कि बिहार की चिंता करने के कारण बात नहीं मानने वाली जनता को कनैठी देने का उन्हें प्राकृतिक हक़ है। आम सभाओं
में किसी के विरोध करने पर देश के पहले पी एम नेहरू की नाराजगी के किस्से मशहूर हैं। वे गुसैल थे और उनके नाराज होने पर विरोध करने वाले सम्मान देते हुए शांत हो जाते थे। लेकिन दरभंगा की अधिकार रैली के दौरान नीतीश नाराज हुए और मर्यादा भूल बैठे। सम्मान देने और  शांत होने के  बदले शिक्षकों ने चप्पल दिखा कर सीमा लांघी। नीतीश कुमार के लिए ये आत्म मंथन का वक्त आया है।

बिहार की हित कामना करने वाले लोग लालू के राज में विजन के अभाव की बात करते थे . . .
ख़ास कर राज्य के विकास के सन्दर्भ में। पर इनके जेहन में ये सवाल तब नहीं कौंधा होगा कि कल को कुर्सी में बैठा विजन वाला व्यक्ति भी अपनी महत्वाकांछा से वशीभूत हो राह से भटक सकता है। उस समय फौरी तौर पर कथित जंगल राज से मुक्ति की अकुलाहट इतनी तीव्र थी कि  नीतीश का आना उन्हें राहत दे गया।

ऐसी सोच वालों में वो तबका भी शामिल था जो प्रजातांत्रिक मूल्यों और संस्थानों के जरिये बदलाव का पक्षधर था। पर उन्हें भी तब अंदेशा था कि अपराध के खिलाफ प्रचंड जनमत के कारण अपराधियों से गैरकानूनी तरीके से निपटने की कोशिश होगी। लेकिन नीतीश ने फास्ट ट्रैक  कोर्ट को सक्रिय कर संस्थागत रास्ता अख्तियार किया। इस पहल ने उन तमाम अंदेशों को निराधार साबित किया। भय का माहौल दूर हुआ पर ये दीर्घजीवी कहाँ रहा? अपराधियों का मनोबल आज लालू युग  के दिनों की झलकी दिखाने पर आमादा है। एक तरफ महिलाओं के सशक्तिकरण के प्रयास हो रहे वहीं उनपर अत्याचार का ग्राफ बढ़ रहा है। चूक कहाँ पर हो रही है? इस परिदृश्य पर चिंता जताने की जहमत नहीं उठाना नीतीश पर सवाल खड़े करता है।

नीतीश अपने आप को चाणक्य और चन्द्रगुप्त की दोहरी भूमिका में देखने के आदी हो चले हैं।
ऊपर से विपक्षी विधायकों की कम संख्या उन्हें अभय दान दे गई। कमजोर विपक्ष को और कमजोर करने के लिए जुनून इतना बढ़ा कि इन दलों से थोक के भाव जिन नेताओं का आयात किया गया उनकी पृष्ठभूमि तक नहीं देखी। जे डी यू में आतंरिक प्रजातंत्र को पुष्ट करने की जगह विधायक निधि समाप्त कर दी गई। विधायकों को अफसरों के रहमोकरम के हवाले कर दिया गया। शरद यादव को नीतीश के दबाव में कई बार अपने ही बयान को चबा कर निगलना पड़ा। उपेन्द्र कुशवाहा से लेकर ललन सिंह तक की बगावत की वजह नीतीश का निरंकुश व्यवहार रही। वे हाशिये पर चले जाने को मजबूर किये गए।

ऊपर से प्रिंट मीडिया अपने कब्जे में। यानि चेक एंड बैलेंस के तमाम रास्ते बंद। एक मात्र रास्ता जनता के फैसले का रख छोड़ा है नीतीश ने। अफसरों के साथ मिलकर आंकड़ों की कलाबाजी और छवि निर्माण की सनक अभी भी मौजूद है। वे, उनके अफसर और चारण पत्रकार बताते फिर रहे कि
चीन के ग्रोथ रेट से भी आगे निकल गया बिहार। हर तरफ जय जय कार है। इतना भी ध्यान नही कि
समस्याओं की अनदेखी घातक हो सकती है . . . ऐसे में जबकि समाधान की राह देख रही जनता की आँखें
पथरा रही हैं। समझदार लोग कहते हैं कि कुछ नहीं कमाने वाला एक साल में सौ रुपये कमाए तो उसका ग्रोथ रेट सौ फीसदी कहलाएगा जबकि हजार रूपए कमाने वाला एक साल में सौ रूपए कमाए तो उसका ग्रोथ रेट महज दस फीसदी होगा। बावजूद इसके दस फीसदी ग्रोथ रेट वाला व्यक्ति ही ज्यादा साधन संपन्न रहेगा। यही संबंध बिहार और देश के विकसित राज्यों के बीच है। यानि बिहार के
लोगों की माली हालत विकसित प्रदेशों के लोगों से बहुत खराब है।

राज्य सरकार इस सच को छुपाती रहती है और ग्रोथ रेट की डुगडुगी बजाने में रमी हुई है। आंकड़ों की फरेब
नहीं समझने वाली जनता ये जानना चाहती है कि जब राज्य चीन से आगे निकल गया तो विशेष राज्य की
भीख क्यों माँगी जा रही है? नीतीश की दुविधा यही है। ग्रोथ रेट से दिल्ली में डंका तो बज जाता पर राज्य की
जनता की बढी उम्मीदों का क्या करे? दरअसल बिहार की जरूरतों के हिसाब से विशेष राज्य के अभियान
का मुफीद समय तब था जब नीतीश दुबारा सत्ता में आए थे। उस समय जनता भी ये सोच कर साथ देती कि
इससे उनके कल्याण का रास्ता खुलेगा। लेकिन दिल्ली की सत्ता के मंसूबों के लिहाज से नीतीश इस मुद्दे को
अभी उठा रहे।

साल 2014 का अवसर इस अभियान पर इतना हावी है कि किसी मांग को लेकर किसी तबके का विरोध
नीतीश को विचलित कर रहा है। तभी वे उसी अंदाज में विरोधियों से बदला लेने पर उतारू हैं जिस अंदाज में
कांग्रेस विरोध करने वालों से निपटती है। जाहिर है निरंकुश राजनीतिक शैली के मामले में नीतीश और
कांग्रेस एक वेबलेंथ पर हैं। 03 अक्टूबर को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बिहार दौरे पर नीतीश विशेष राज्य की
मांग करते हैं। प्रणब भी बिहार के कृषि रोड मैप की तारीफ़ करते हैं साथ ही नीड एंड ग्रीड के फर्क को भी
समझाते हैं। लालू वैसे ही साकांक्ष नहीं हुए हैं। बी जे पी के प्रदेश अध्यक्ष के चालीसो लोक सभा सीट से पार्टी
उम्मीदवार उतारने के संकेत ने लालू को अतिरिक्त उर्जा से भर दिया है। 03 अक्टूबर से ही बिहार में
परिवर्तन यात्रा पर निकल गए हैं लालू।





21.9.12

विशेष राज्य के अभियान का सच

विशेष राज्य के अभियान का सच

संजय मिश्र
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जो भौगोलिक क्षेत्र अदौ से ( सदा से ) ख़ास रहा हो वो विशेष राज्य बनने की लालसा दिखाए ये सुनने में अटपटा सा लगता है। पर यहाँ सन्दर्भ दूसरा है। विशेष राज्य की पैरोकारी करने वाले बताते हैं कि अपने बूते बिहार को जितना बढ़ना था वो चरम बिंदु छू लिया गया है। आगे की तरक्की के लिए और विकसित राज्य की कतार में आने के लिए जो सफ़र है उसमें विशेष राज्य के दर्जे का साथ चाहिए। इसके लिए नीतीश की पार्टी जे डी यू बाकायदा राज्यव्यापी अभियान चला रही है। दिलचस्प है कि ठीक इसी समय बिहार में सर्वाधिक पाठक संख्या का दावा करने वाला एक अखबार समूह विशेष राज्य के लिए जनमत जुटाने में लगा है।

आगे की  पड़ताल से पहले बिहार के तीन लोकप्रिय मुख्यमंत्रियों के बयान को याद करें। राज्य के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह ने कहा था कि बिहार के डूबने से बंगाल का भला हो तो वे ऐसा ही होने देंगे। लालू प्रसाद की वो मशहूर हुंकार तो आपको याद ही होगी कि --- बिहार मेरी लाश पर बंटेगा। और अब परिदृश्य पर नीतीश कुमार हैं जो मानते हैं कि विशेष राज्य का दर्जा तो बिहार का हक़ है और इसे छीन लिया जाएगा और ये कि इसके लिए किसी हद तक जाया जा सकता है। यहाँ तक कि जो विशेष राज्य का दर्जा देगा केंद्र में उस दल की सरकार बनाने में वो सहयोग करेंगे।

राजनीति की महीनी को नहीं तार पाने वाले कहेंगे कि अच्छा है कांग्रेसी श्रीबाबू बिहार हित साधन के प्रति उदासीन रहे---जबकि लालू और उससे भी आगे बढ़ कर नीतीश इस राज्य का भला चाहते। इसे ही भांप कर जे डी यू का अभियान चलाने वाले आम जन को समझाने कि कोशिश में लगे हैं कि कांग्रेस(केंद्र) बिहार की हकमारी कर रही है। यानि केंद्र पर दबाव बनाए रखना उचित है--और ये कि विशेष दर्जा तो बस अब मिलने ही वाला है। इनकी रणनीति के विविध आयामों के खुलासे से पहले तीनो मुख्यमंत्रियों के बयानों को समझने की कोशिश करें।

सूबे के पहले सीएम के बयान का संबंध कोसी परियोजना से था . . . वो परियोजना जो लॉर्ड वेभेल का ब्रेन चाइल्ड थी। पहले आम चुनाव का ये प्रमुख मुद्दा बनी . . .  ख़ास कर मिथिला में। समाजवादी लक्स्मन झा और कांग्रेसी जानकीनंदन सिंह इस मुद्दे पर आंदोलनरत थे। घबराई कांग्रेस (पटना) की सरकार वेभेल प्लान के बदले नित नई कमजोर वैकल्पिक योजनाएं सुझा रही थी। उस समय के दस्तावेजों को खंगालें तो साफ़ पता चलता है की पटना का सत्ता प्रतिष्ठान मिथिला के विकास का आग्रही तो बिलकुल ही नहीं था। जबकि वेभेल की योजना मिथिला(बिहार) का काया-पलट करने की क्षमता रखनेवाली।

विकसित मिथिला की कल्पना से इर्ष्या करने वाला पटना का सत्ता प्रतिष्ठान इससे होने वाली बिहार की प्रगति के अवसर को हाथ से जाने दिया। पटना के हुक्मरानों और कलकत्ता(बी सी रॉय) के बीच सांठ-गाँठ हुई और डी वी सी परियोजना को आगे किया गया। श्रीबाबू के बयान का मतलब था कि बिहार(मिथिला) बाढ़ से डूबती रहे और डी वी सी के बूते बंगाल के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र बच जाएँ। यहाँ तक कि डी वी सी के समझौते को बंगाल फ्रेंडली बनाया गया।

नेहरू को कोसी की वेभेल परियोजना से शुरू में अनुराग था। लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री ने उनसे ये बहाने बनाए कि वेभेल परियोजना की डैम (बारह-क्षेत्र) सिस्मिक जोन में पड़ता है और ये बिहार(मिथिला) के लिए जानलेबा  साबित होगा। नेहरू को ये भी कहा गया कि इस परियोजना से निकलने वाली बिजली का उपयोग करने में बिहार सक्षम नहीं है। इन्होने ये संकेत दिए कि नेहरू चाहें तो भाखड़ा-नांगल परियोजना शुरू कर लें। यानि वेभेल परियोजना लटका दी गई और इन पैसों से भाखड़ा-नांगल (पंजाब का काया-कल्प ), डी वी सी (बंगाल का भला हुआ) का रास्ता  साफ़ हुआ।

अब लालू के बयान को परखें। देस-दुनिया में बड़ा नाम था लालू का। समर्थक उनकी तुलना कृष्ण भगवान् से करने लगे थे। ऐसे में अखंड बिहार पर एक-छत्र राज की चाहत परबान पर थी। लेकिन इस अकबाल के बावजूद प्रचंड बहुमत नसीब न था। सलाहकारों ने समझाया कि अपने बयान को किनारा करें और बंटबारे के लिए तैयार हो जाएं। उन्हें ये बताया गया कि झारखण्ड बन जाएगा तो जे एम एम की जरूरत नहीं रह जाएगी। बचे बिहार में अपना ही बहुमत रहेगा। आखिरकार बंटवारे के लिए वे तैयार हो गए।

लालू युग में विशेष दर्जे का मामला जोर-शोर से उठा। अनिवासी भारतीय पटना बुलाए गए। केंद्र-राज्य संबंधों के जानकार और अर्थशास्त्री मोहन गुरुस्वामी भी बाद में पटना आए। यहाँ लोगों को वो समझा गए कि आज़ादी के बाद से सामान्य स्थिति में केंद्र को बिहार को जो राशि देनी चाहिए उससे चालीस हज़ार करोड़ कम मिले। बिहार का आर्थिक अवरोधन नामक उनकी पुस्तिका बिहार की हकमारी की कहानी कहती है। बावजूद इसके लालू अपनी ही दुनिया में रमे रहे और बिहार की उन्नति की चाहत अधूरी रही।

बिहार में जे डी यू का संगठन कमजोर है। विशेष राज्य के अभियान के दौरान अधिक माथा पच्ची  इसी बात को लेकर है। ये महसूस किया जा रहा है कि नीतीश की बेहतर छवि कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ोत्तरी में तब्दील नहीं हुई। इस बात पर भी ध्यान है कि छवि निर्माण में जितना लंबा वक्त गुजरा उस अनुपात में कार्यकर्ता बढाने पर लापरवाही रही। अब इसकी भरपाई को प्राथमिकता दी जा रही है।

नीतीश के चाणक्य संजय झा इन दिनों अभियान की कमान संभाले हुए हैं। कार्यकर्ताओं को वे समझा रहे हैं कि केंद्र की राजनीति के बड़े कैनवास में नीतीश की अहम् भूमिका है। कार्यकर्ताओं को संगठन शक्ति पुख्ता करने की नसीहत देते कहा जा रहा है कि नीतीश को पी एम बनाना है तो चार नवम्बर की रैली को ऐतिहासिक बनाएं। संजय झा ये बताने से नहीं चूक रहे कि पटना में उस दिन होने वाली अधिकार रैली में दस लाख समर्थक जुटेंगे और ये रैली मौजूदा राजनीति के रुख को दिशा देने वाला साबित होगा।

मकसद साफ़ है। विशेष राज्य के अभियान के बहाने नजर संगठन की मजबूती और दिल्ली की गद्दी पर है। अब तक लालू विरोध के नाम पर और बीजेपी के संगठन के आसरे सत्ता मिलती रही। बीजेपी से पल्ला झाड़ने के लिए संगठन चाहिए तभी दिल्ली में हैसियत बढ़ेगी। जे डी यू को ये अनुमान है कि लालू विरोध वाले वोट बैंक की सहूलियत के कारण बीजेपी भी अपने संगठन विस्तार के प्रति लापरवाह है। यानि इस छिजन (खाली पोलिटिकल स्पेस) पर नजर गड़ा ली गई है। यही कारण है कि बीजेपी से जे डी यू में आए संजय झा को इस काम में लगाया गया है। अपने पुराने संबंधों के बूते वे बीजेपी समर्थकों में थोड़ी सेंधमारी में कामयाब हुए है।

कम समय में कार्यकर्ता संख्या का अधिक विस्तार हो इसके लिए सन्देश के प्रसार की जरूरत है। लिहाजा अभियान को धारदार बनाने के लिए एक बड़े अखबार समूह का सहारा लिया गया है। ये अखबार समूह विशेष राज्य के लिए मुहिम चला रहा है। जानकार बता रहे हैं कि अखबार की ये अदा पचास दिनों तक दिखेगी। अखबार के जरिये विशेष राज्य के मुद्दे को गावों तक ले जाया जा रहा है। इससे जे डी यू के सदस्यता अभियान में भी सहूलियत मिल रही है। ये मुहिम जब थमेगी तब जे डी यू की तरफ से पार्टी अभियान को आख़री स्ट्रोक मारा जाएगा . . .  4 नवम्बर के लिए। आम धारणा बनी है कि अखबार समूह ने नीतीश को बड़ी राहत दी है। नीतीश और बिहार के हिन्दी प्रिंट मीडिया के संबंधों को देखते हुए ये जानना बेमानी है कि अखबार समूह को नीतीश से कितनी राहत मिली होगी। उन्नति की दिशा में लम्बी छलांग का मंसूबा पालने वाले लोग गुण-धुन में होंगे कि राज्य के शीर्ष नेतृत्व(नीतीश) को बड़ी बड़ी गद्दी मिलना ही बिहार वासियों का कल्याण है क्या?


  

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