life is celebration

life is celebration

18.11.12

आस्था के आसरे बाज़ार को चुनौती देने की कोशिश

आस्था के आसरे बाज़ार को चुनौती देने की कोशिश
------------------------
संजय मिश्र
---------------
जै ज़माना मे दुनिया बनले ... कहै छै जे परकृति माए अपन देह के बांटि लेलखिन ... छठम अंश जे भेलै से छठी माए भेलखिन .....बूढ़ पुरनिया इहो कहै छै जे ओ ब्रह्मा के मानस पुत्री छलखिन ... जे से ... हिनकर पूजा केला स बच्चा सबहक रक्षा होई छै .... कतेक खिस्सा कहब। इस किस्सागोई के बीच कोनिया का एक हिस्सा आकार ले चुका था। लम्बी सांस छोड़ने के बाद वृद्ध कारीगर के हाथ फिर से बांस करची पर फिसलने लगे। बीच-बीच में सड़क की ओर नजर जाती। टक -टकी इस तरफ कि पिछले साल की तुलना में इस साल कितना ऑर्डर आ रहा है। दरभंगा के भटियारी सराय के बांस के कामगार बताते हैं कि खरीदारी सामान्य चल रही है। ये जानते हुए कि सेमी-फाइबर सूप (डगरा ) और पीतल के कोनिया से इन्हें चुनौती मिल रही है ... ये बांस को कलात्मक अभिव्यक्ति देने में मग्न हैं।

शहर के बीच में स्थित इस गाँव में करीब पच्चीस लोग इस पुश्तैनी काम को अंजाम देने में लगे हैं। लक्ष्मण मल्लिक बताते हैं कि कोनिया, सूप, चंगेरा, बड़ा चंगेरा( जिसे दौड़ा भी कहते हैं ) की सामान्य बिक्री हो रही है। कोनिया 25 से 35 रूपये में जबकि दौड़ा 100 रूपये में। बांस की करची से बना पथिया 100 रूपये में बिक जाता है लेकिन इसकी डिमांड में तेजी नहीं है। कच्चा माल के रूप में बांस, रंग, और अन्य सजावटी सामान की इन्हें खरीद करनी पड़ती है। एक हरौथ बांस 250 रूपये में आता है।

बारह साल के नाती प्रहलाद को कारीगरी की बारीकी समझाते हुए लक्ष्मण कह उठते हैं कि 300 रूपये में लोग पीतल का कोनिया खरीदते हैं। ज्यादा खर्च करने वाले इसे खरीदने लगे हैं और साल-दर-साल इसका इस्तेमाल करते हैं। उधर चमक-दमक में यकीन रखने वाले प्लास्टिक ( सेमी-फाइबर ) सामान लेने लगे हैं। प्लास्टिक का सूप 125 रूपये में मिलता है। लेकिन आस्थावान लोग पारंपरिक विचारों को अहमियत देते हैं। मुस्कुराते हुए लक्ष्मण कहते हैं कि -- हमर सबहक हाथ सं बनल बांसक समान शुद्ध मानल ज़ाई छै ... बांसक समान बंश बढबैत छै। शायद इस सोच में ही इन कारीगरों की उम्मीद बची है। प्रहलाद के मुताबिक़ पढ़-लिख कर नौकरी करेंगे लेकिन पुश्तैनी धंधा सीखने में क्या हर्जा है?

10.11.12

चिंता न करें जेठमलानी इसी देश में मिथिला भी है।

चिंता न करें जेठमलानी इसी देश में मिथिला भी है।
----------------------------
संजय मिश्र
-------------------
जेठमलानी के राम संबंधी बयान को सप्ताह होने को आए पर कांग्रेस की खुशामद में रमे दिल्ली के पत्रकार खासकर टीवी पत्रकार पूरे रौ में हैं। कांग्रेसी आका खुश होंगे सो बीजेपी को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। इनमें वो चैनल भी लगे हैं जिनके ब्रांड बन चुके पत्रकार को उसी जेठमलानी ने बेइज्जत कर अपने घर से भगा दिया था। आज जेठमलानी उनके लिए हॉट केक हैं जो राम, हिन्दू जीवन शैली से कांग्रेस ब्रांड सेक्यूलरिज्म की खातिर अछूत सरीखा व्यवहार करती रही है। पत्रकारिता का तनिक भी ख़याल होता तो ये चैनल मिथिला में स्थित अपने किसी रिपोर्टर से लाइव करवा रहे होते। जेठमलानी अपने विचार पर मुग्ध हैं। न जाने उन्हें राम के संबंध में मिथिला की सोच का कितना अहसास है।

मिथिला में राम का ससुराल है। ये इलाका धर्म और आध्यात्म का बड़ा केंद्र रहने का आदर हासिल रखता है। कुछ दिलचस्प पहलू यहाँ रखे जा रहे हैं। राम के भगवान्, मर्यादा वाले चरित्र और जमाई --इन तीनों रूपों का अनूठा संगम मिथिला में दीखता है। आस्थावान लोग भगवान् या नारायण का रूप उनमें देख धन्य होते। वहीं जनमानस लोक हितवादी मर्यादा के लिए उन्हें उसी श्रधा से याद करते हैं। जमाई के रूप में भी वे स्तुत्य ही हैं। पर सीता माता को मिले कष्ट से द्रवित स्वर जब लोगों के मुख से निकलते तो लगता आसमान फटने वाली कहावत चरितार्थ हो जाती। तभी तो यहाँ विवाह पंचमी के दिन लोग अपनी बेटियों के ब्याह से कतराते हैं। इसी दिन सीता का विवाह हुआ था।

मिथिला की  धरती पर कई साहित्यकारों ने राम कथा लिखी पर उनमें सीता की महानता को ज्यादा उकेरा गया। ये भी गौर करने वाली बात है कि कष्ट हरने के लिए विद्यापति नें कृष्ण और भोलेनाथ को अपनी पदावली में अधिक जगह दी। मिथिला में संभवतः राम के कारण ही जमाई को भगवान् की तरह आदर देने की परंपरा है। पर ये भी सच है कि भगवान् के रूप में राम के मंदिर मुश्किल से मिल जाएं। सीता के प्रति ममता के साथ ही राम के तीनों रूपों के साथ मिथिला सामंजस्य बिठाने की कोशिश करती रही है। जेठमलानी जी सीता के दुखों को महसूस करने के लिए मिथिला की तरफ से आपको धन्यवाद।

5.11.12

रियल रिजनल क्षत्रप बन गए नीतीश

रियल रिजनल क्षत्रप बन गए नीतीश
-------------------------------------------
संजय मिश्र
---------------
04-11-12
-----------
एक दिन ने इतनी राजनीतिक हलचल कभी-कभार ही देखी होगी। जहां दिल्ली में राजनीति इठला रही थी वहीं पटने में ये छुई -मुई सी हो रही थी। सुपर-डुपर  सन्डे यानि 04-11-12 को दिल्ली से ज्यादा राजनीतिक रंग पटने ने देखे जहां देश के अगले पी एम की रेस के तीन दावेदार
जमे थे। अड़चनों से पार पाते नीतीश कुमार गांधी मैदान में अधिकार रैली में जब अपने समर्थकों को निहार
रहे थे तो उनके मुख-मंडल पर संतोष के भाव झलक रहे थे। राहत मिली थी दो महीने की उथल-पुथल भरी
जद्दोजहद से। सकून ये कि दिल्ली की गद्दी की महत्वाकांक्षा के लिए जिस हैलीपैड की जरूरत है वो चाहत
साकार हुई। परसेप्सन वाले रिजनल क्षत्रप होने के दिन अब लद गए हैं। नीतीश कुमार का रियल रिजनल
क्षत्रप के रूप में अवतरण हो गया है।

दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस ने भी इसी दिन अपनी ताकत दिखाई। 16 अगस्त 2011 को इसी रामलीला मैदान में अन्ना के चाहने वाले जन सैलाब ने जो चुनौती राजनीतिक जमात के लिए पेश
की थी उससे उबड़ना कांग्रेस के लिए जरूरी था। ये पार्टी अपनी लाज बचाने में कामयाब रही। उत्साह में
अगले आमचुनाव का शंखनाद हो चला। नीतीश के लिए यहाँ भी राहत के क्षण आए। रामलीला के मुकाबले
गांधी मैदान में जुटान अधिक रही। यानि मोल-भाव के लिहाज से मुफीद अवसर के संकेत। नीतीश ने
हुंकार भरते हुए मार्च में दिल्ली कूच करने का ऐलान कर दिया। साथ ही जब उन्होंने पिछड़े राज्यों को विशेष
राज्य के दर्जे की मांग के लिए गोलबंद करने की घोषणा की तो राजनीतिक निहितार्थ स्पष्ट झाँकने लगे।
जाहिर है इस राजनीतिक ध्रुवीकरण की जद में ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और शिबू सोरेन जैसों को
साधा जा सकता है।

शतरंज की बिसात बिछ चुकी है। नीतीश की रणनीति है कि मौजूदा राजनीतिक गठबंधनो के अलावा
संभावित तीसरे मोर्चे में स्वीकार्यता का विकल्प कायम हो। लेकिन इसके लिए मॉस लीडर होने का तमगा
जरूरी था। अधिकार रैली की सफलता ने ये तमगा दे दिया है। बिहार को समझने वाले जानते हैं कि नीतीश
की राजनीतिक यात्रा सवर्णों के दृढ़ लालू विरोध और बीजेपी के मजबूत संगठन के आसरे टिका रहा है।
जे डी यू संगठन के मामले में बेहद कमजोर था। लेकिन विशेष राज्य की मुहिम के बहाने पूरा जोर संगठन
को मजबूत करने पर लगा रहा। कड़ी मेहनत रंग लाई। गांधी मैदान में जब नीतीश समर्थको को संबोधित
कर रहे थे तो यही कठिन परीक्षा पास कर लेने का सकून था।

राजनीतिक बिम्ब के लिहाज से देखें तो पिछड़े राज्यों के विकास का मुद्दा अब सतह पर आ चुका है। हर
हिन्दुस्तानी को तरक्की करने का हक़ जैसे नारे आने वाले समय में गूंजेंगे। सोच-समझ कर ही उसी तारीख
और उसी गांधी मैदान में अधिकार रैली रखी गई जहाँ से जे पी ने इंदिरा को चुनौती दी थी। दिलचस्प है कि
इसी दिन पी एम पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी दिवंगत कैलाश पति मिश्र को श्रधांजलि देने पटना पहुंचे।
बीजेपी कार्यकर्ताओं ने ग़मगीन माहौल में भी -देश का पी एम कैसा हो नरेन्द्र मोदी जैसा हो - जैसे नारे
लगा कर राजनीतिक कशमकश को गरमा दिया। कुछ ही देर बाद आडवाणी ने पटने में ही नीतीश की
तारीफ़ कर चौंका दिया। जाहिर है आडवाणी के पी एम पद की होड़ में होने का जे डी यू समर्थन करता है
... मोदी को किनारे करने के लिए। नीतीश ने भी दिवंगत बीजेपी नेता को मंच से ही श्रधांजलि देकर ये
जता दिया कि सारे ऑप्सन खुले हैं। लालू का छटपटाना स्वाभाविक है। नीतीश से भी अधिक भीड़ जुटा कर कभी इतिहास रचने वाले लालू अब कांग्रेस खेमे में कमजोर पड़ते जाएंगे। उधर, विशेष राज्य के अभियान से आस लगाने वाली जनता को अब तक अहसास हो चुका होगा कि
ये मुद्दा पृष्ठभूमि में जा चुकी है और इसकी डगर कठिन है।  

3.10.12

नीतीश के विरोध के मायने

नीतीश के विरोध के मायने
-----------------------
संजय मिश्र
------------------
नीतीश का प्रभामंडल बिखरने लगा है . . . ऐसी सोच राजनीतिक विश्लेषकों को मथ रहे हैं। वे एकमत नहीं हुए हैं पर आम राय बनी है कि जो बवंडर आया था वो फिलहाल शांत हो चला है। नीतीश चाहते होंगे कि ये थमा रहे . . . आखिरकार सत्ता के परम सुख के बीच पहली दफा धरातल से लावा फूटा है। ये न तो उपेन्द्र कुशवाहा, ललन सिंह सरीखे नजदीकियों की चेतावनी है और न ही पटना के आर-ब्लाक के प्रदर्शनों की हुंकार। अभी की चुनौती ग्रोथ रेट के छलावे को उघार करते हुए सवालों की झड़ी लगाते हैं।

26 सितम्बर और तीन अक्टूबर के बीच के अंतराल में नीतीश ने दिखाया है कि वे अपने ही एजेंडे पर चलेंगे। 26 को दरभंगा से विरोध की जो चिंगारी निकली खगडिया जाते जाते धधक गई। इस दौरान जहाँ जहाँ विरोध और उपद्रव हुए वहां के शिक्षकों पर कठोर कार्रवाई हुई है। लोक लाज से बेपरवाह प्रशासन की नीतीश भक्ति देखिये कि सुपौल के कई स्कूली छात्रों से विरोध नहीं जताने का बोंड तक भरवा लिया। उधर बन्दूक लहराने वाले रणबीर यादव पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। दिल्ली के वे राजनीतिक विश्लेषक नीतीश के इन मनोभावों से भौचक हैं जो उन्हें पीएम पद का दावेदार बता रहे थे।

बिहार के सी एम जताना चाह रहे हैं कि राज्य के स्वयंभू गार्जियन अकेले वही हैं और उनकी अथोरिटी को कोई चुनौती कैसे दे सकता? और ये भी बताना चाहते कि बिहार की चिंता करने के कारण बात नहीं मानने वाली जनता को कनैठी देने का उन्हें प्राकृतिक हक़ है। आम सभाओं
में किसी के विरोध करने पर देश के पहले पी एम नेहरू की नाराजगी के किस्से मशहूर हैं। वे गुसैल थे और उनके नाराज होने पर विरोध करने वाले सम्मान देते हुए शांत हो जाते थे। लेकिन दरभंगा की अधिकार रैली के दौरान नीतीश नाराज हुए और मर्यादा भूल बैठे। सम्मान देने और  शांत होने के  बदले शिक्षकों ने चप्पल दिखा कर सीमा लांघी। नीतीश कुमार के लिए ये आत्म मंथन का वक्त आया है।

बिहार की हित कामना करने वाले लोग लालू के राज में विजन के अभाव की बात करते थे . . .
ख़ास कर राज्य के विकास के सन्दर्भ में। पर इनके जेहन में ये सवाल तब नहीं कौंधा होगा कि कल को कुर्सी में बैठा विजन वाला व्यक्ति भी अपनी महत्वाकांछा से वशीभूत हो राह से भटक सकता है। उस समय फौरी तौर पर कथित जंगल राज से मुक्ति की अकुलाहट इतनी तीव्र थी कि  नीतीश का आना उन्हें राहत दे गया।

ऐसी सोच वालों में वो तबका भी शामिल था जो प्रजातांत्रिक मूल्यों और संस्थानों के जरिये बदलाव का पक्षधर था। पर उन्हें भी तब अंदेशा था कि अपराध के खिलाफ प्रचंड जनमत के कारण अपराधियों से गैरकानूनी तरीके से निपटने की कोशिश होगी। लेकिन नीतीश ने फास्ट ट्रैक  कोर्ट को सक्रिय कर संस्थागत रास्ता अख्तियार किया। इस पहल ने उन तमाम अंदेशों को निराधार साबित किया। भय का माहौल दूर हुआ पर ये दीर्घजीवी कहाँ रहा? अपराधियों का मनोबल आज लालू युग  के दिनों की झलकी दिखाने पर आमादा है। एक तरफ महिलाओं के सशक्तिकरण के प्रयास हो रहे वहीं उनपर अत्याचार का ग्राफ बढ़ रहा है। चूक कहाँ पर हो रही है? इस परिदृश्य पर चिंता जताने की जहमत नहीं उठाना नीतीश पर सवाल खड़े करता है।

नीतीश अपने आप को चाणक्य और चन्द्रगुप्त की दोहरी भूमिका में देखने के आदी हो चले हैं।
ऊपर से विपक्षी विधायकों की कम संख्या उन्हें अभय दान दे गई। कमजोर विपक्ष को और कमजोर करने के लिए जुनून इतना बढ़ा कि इन दलों से थोक के भाव जिन नेताओं का आयात किया गया उनकी पृष्ठभूमि तक नहीं देखी। जे डी यू में आतंरिक प्रजातंत्र को पुष्ट करने की जगह विधायक निधि समाप्त कर दी गई। विधायकों को अफसरों के रहमोकरम के हवाले कर दिया गया। शरद यादव को नीतीश के दबाव में कई बार अपने ही बयान को चबा कर निगलना पड़ा। उपेन्द्र कुशवाहा से लेकर ललन सिंह तक की बगावत की वजह नीतीश का निरंकुश व्यवहार रही। वे हाशिये पर चले जाने को मजबूर किये गए।

ऊपर से प्रिंट मीडिया अपने कब्जे में। यानि चेक एंड बैलेंस के तमाम रास्ते बंद। एक मात्र रास्ता जनता के फैसले का रख छोड़ा है नीतीश ने। अफसरों के साथ मिलकर आंकड़ों की कलाबाजी और छवि निर्माण की सनक अभी भी मौजूद है। वे, उनके अफसर और चारण पत्रकार बताते फिर रहे कि
चीन के ग्रोथ रेट से भी आगे निकल गया बिहार। हर तरफ जय जय कार है। इतना भी ध्यान नही कि
समस्याओं की अनदेखी घातक हो सकती है . . . ऐसे में जबकि समाधान की राह देख रही जनता की आँखें
पथरा रही हैं। समझदार लोग कहते हैं कि कुछ नहीं कमाने वाला एक साल में सौ रुपये कमाए तो उसका ग्रोथ रेट सौ फीसदी कहलाएगा जबकि हजार रूपए कमाने वाला एक साल में सौ रूपए कमाए तो उसका ग्रोथ रेट महज दस फीसदी होगा। बावजूद इसके दस फीसदी ग्रोथ रेट वाला व्यक्ति ही ज्यादा साधन संपन्न रहेगा। यही संबंध बिहार और देश के विकसित राज्यों के बीच है। यानि बिहार के
लोगों की माली हालत विकसित प्रदेशों के लोगों से बहुत खराब है।

राज्य सरकार इस सच को छुपाती रहती है और ग्रोथ रेट की डुगडुगी बजाने में रमी हुई है। आंकड़ों की फरेब
नहीं समझने वाली जनता ये जानना चाहती है कि जब राज्य चीन से आगे निकल गया तो विशेष राज्य की
भीख क्यों माँगी जा रही है? नीतीश की दुविधा यही है। ग्रोथ रेट से दिल्ली में डंका तो बज जाता पर राज्य की
जनता की बढी उम्मीदों का क्या करे? दरअसल बिहार की जरूरतों के हिसाब से विशेष राज्य के अभियान
का मुफीद समय तब था जब नीतीश दुबारा सत्ता में आए थे। उस समय जनता भी ये सोच कर साथ देती कि
इससे उनके कल्याण का रास्ता खुलेगा। लेकिन दिल्ली की सत्ता के मंसूबों के लिहाज से नीतीश इस मुद्दे को
अभी उठा रहे।

साल 2014 का अवसर इस अभियान पर इतना हावी है कि किसी मांग को लेकर किसी तबके का विरोध
नीतीश को विचलित कर रहा है। तभी वे उसी अंदाज में विरोधियों से बदला लेने पर उतारू हैं जिस अंदाज में
कांग्रेस विरोध करने वालों से निपटती है। जाहिर है निरंकुश राजनीतिक शैली के मामले में नीतीश और
कांग्रेस एक वेबलेंथ पर हैं। 03 अक्टूबर को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बिहार दौरे पर नीतीश विशेष राज्य की
मांग करते हैं। प्रणब भी बिहार के कृषि रोड मैप की तारीफ़ करते हैं साथ ही नीड एंड ग्रीड के फर्क को भी
समझाते हैं। लालू वैसे ही साकांक्ष नहीं हुए हैं। बी जे पी के प्रदेश अध्यक्ष के चालीसो लोक सभा सीट से पार्टी
उम्मीदवार उतारने के संकेत ने लालू को अतिरिक्त उर्जा से भर दिया है। 03 अक्टूबर से ही बिहार में
परिवर्तन यात्रा पर निकल गए हैं लालू।





21.9.12

विशेष राज्य के अभियान का सच

विशेष राज्य के अभियान का सच

संजय मिश्र
----------

जो भौगोलिक क्षेत्र अदौ से ( सदा से ) ख़ास रहा हो वो विशेष राज्य बनने की लालसा दिखाए ये सुनने में अटपटा सा लगता है। पर यहाँ सन्दर्भ दूसरा है। विशेष राज्य की पैरोकारी करने वाले बताते हैं कि अपने बूते बिहार को जितना बढ़ना था वो चरम बिंदु छू लिया गया है। आगे की तरक्की के लिए और विकसित राज्य की कतार में आने के लिए जो सफ़र है उसमें विशेष राज्य के दर्जे का साथ चाहिए। इसके लिए नीतीश की पार्टी जे डी यू बाकायदा राज्यव्यापी अभियान चला रही है। दिलचस्प है कि ठीक इसी समय बिहार में सर्वाधिक पाठक संख्या का दावा करने वाला एक अखबार समूह विशेष राज्य के लिए जनमत जुटाने में लगा है।

आगे की  पड़ताल से पहले बिहार के तीन लोकप्रिय मुख्यमंत्रियों के बयान को याद करें। राज्य के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह ने कहा था कि बिहार के डूबने से बंगाल का भला हो तो वे ऐसा ही होने देंगे। लालू प्रसाद की वो मशहूर हुंकार तो आपको याद ही होगी कि --- बिहार मेरी लाश पर बंटेगा। और अब परिदृश्य पर नीतीश कुमार हैं जो मानते हैं कि विशेष राज्य का दर्जा तो बिहार का हक़ है और इसे छीन लिया जाएगा और ये कि इसके लिए किसी हद तक जाया जा सकता है। यहाँ तक कि जो विशेष राज्य का दर्जा देगा केंद्र में उस दल की सरकार बनाने में वो सहयोग करेंगे।

राजनीति की महीनी को नहीं तार पाने वाले कहेंगे कि अच्छा है कांग्रेसी श्रीबाबू बिहार हित साधन के प्रति उदासीन रहे---जबकि लालू और उससे भी आगे बढ़ कर नीतीश इस राज्य का भला चाहते। इसे ही भांप कर जे डी यू का अभियान चलाने वाले आम जन को समझाने कि कोशिश में लगे हैं कि कांग्रेस(केंद्र) बिहार की हकमारी कर रही है। यानि केंद्र पर दबाव बनाए रखना उचित है--और ये कि विशेष दर्जा तो बस अब मिलने ही वाला है। इनकी रणनीति के विविध आयामों के खुलासे से पहले तीनो मुख्यमंत्रियों के बयानों को समझने की कोशिश करें।

सूबे के पहले सीएम के बयान का संबंध कोसी परियोजना से था . . . वो परियोजना जो लॉर्ड वेभेल का ब्रेन चाइल्ड थी। पहले आम चुनाव का ये प्रमुख मुद्दा बनी . . .  ख़ास कर मिथिला में। समाजवादी लक्स्मन झा और कांग्रेसी जानकीनंदन सिंह इस मुद्दे पर आंदोलनरत थे। घबराई कांग्रेस (पटना) की सरकार वेभेल प्लान के बदले नित नई कमजोर वैकल्पिक योजनाएं सुझा रही थी। उस समय के दस्तावेजों को खंगालें तो साफ़ पता चलता है की पटना का सत्ता प्रतिष्ठान मिथिला के विकास का आग्रही तो बिलकुल ही नहीं था। जबकि वेभेल की योजना मिथिला(बिहार) का काया-पलट करने की क्षमता रखनेवाली।

विकसित मिथिला की कल्पना से इर्ष्या करने वाला पटना का सत्ता प्रतिष्ठान इससे होने वाली बिहार की प्रगति के अवसर को हाथ से जाने दिया। पटना के हुक्मरानों और कलकत्ता(बी सी रॉय) के बीच सांठ-गाँठ हुई और डी वी सी परियोजना को आगे किया गया। श्रीबाबू के बयान का मतलब था कि बिहार(मिथिला) बाढ़ से डूबती रहे और डी वी सी के बूते बंगाल के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र बच जाएँ। यहाँ तक कि डी वी सी के समझौते को बंगाल फ्रेंडली बनाया गया।

नेहरू को कोसी की वेभेल परियोजना से शुरू में अनुराग था। लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री ने उनसे ये बहाने बनाए कि वेभेल परियोजना की डैम (बारह-क्षेत्र) सिस्मिक जोन में पड़ता है और ये बिहार(मिथिला) के लिए जानलेबा  साबित होगा। नेहरू को ये भी कहा गया कि इस परियोजना से निकलने वाली बिजली का उपयोग करने में बिहार सक्षम नहीं है। इन्होने ये संकेत दिए कि नेहरू चाहें तो भाखड़ा-नांगल परियोजना शुरू कर लें। यानि वेभेल परियोजना लटका दी गई और इन पैसों से भाखड़ा-नांगल (पंजाब का काया-कल्प ), डी वी सी (बंगाल का भला हुआ) का रास्ता  साफ़ हुआ।

अब लालू के बयान को परखें। देस-दुनिया में बड़ा नाम था लालू का। समर्थक उनकी तुलना कृष्ण भगवान् से करने लगे थे। ऐसे में अखंड बिहार पर एक-छत्र राज की चाहत परबान पर थी। लेकिन इस अकबाल के बावजूद प्रचंड बहुमत नसीब न था। सलाहकारों ने समझाया कि अपने बयान को किनारा करें और बंटबारे के लिए तैयार हो जाएं। उन्हें ये बताया गया कि झारखण्ड बन जाएगा तो जे एम एम की जरूरत नहीं रह जाएगी। बचे बिहार में अपना ही बहुमत रहेगा। आखिरकार बंटवारे के लिए वे तैयार हो गए।

लालू युग में विशेष दर्जे का मामला जोर-शोर से उठा। अनिवासी भारतीय पटना बुलाए गए। केंद्र-राज्य संबंधों के जानकार और अर्थशास्त्री मोहन गुरुस्वामी भी बाद में पटना आए। यहाँ लोगों को वो समझा गए कि आज़ादी के बाद से सामान्य स्थिति में केंद्र को बिहार को जो राशि देनी चाहिए उससे चालीस हज़ार करोड़ कम मिले। बिहार का आर्थिक अवरोधन नामक उनकी पुस्तिका बिहार की हकमारी की कहानी कहती है। बावजूद इसके लालू अपनी ही दुनिया में रमे रहे और बिहार की उन्नति की चाहत अधूरी रही।

बिहार में जे डी यू का संगठन कमजोर है। विशेष राज्य के अभियान के दौरान अधिक माथा पच्ची  इसी बात को लेकर है। ये महसूस किया जा रहा है कि नीतीश की बेहतर छवि कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ोत्तरी में तब्दील नहीं हुई। इस बात पर भी ध्यान है कि छवि निर्माण में जितना लंबा वक्त गुजरा उस अनुपात में कार्यकर्ता बढाने पर लापरवाही रही। अब इसकी भरपाई को प्राथमिकता दी जा रही है।

नीतीश के चाणक्य संजय झा इन दिनों अभियान की कमान संभाले हुए हैं। कार्यकर्ताओं को वे समझा रहे हैं कि केंद्र की राजनीति के बड़े कैनवास में नीतीश की अहम् भूमिका है। कार्यकर्ताओं को संगठन शक्ति पुख्ता करने की नसीहत देते कहा जा रहा है कि नीतीश को पी एम बनाना है तो चार नवम्बर की रैली को ऐतिहासिक बनाएं। संजय झा ये बताने से नहीं चूक रहे कि पटना में उस दिन होने वाली अधिकार रैली में दस लाख समर्थक जुटेंगे और ये रैली मौजूदा राजनीति के रुख को दिशा देने वाला साबित होगा।

मकसद साफ़ है। विशेष राज्य के अभियान के बहाने नजर संगठन की मजबूती और दिल्ली की गद्दी पर है। अब तक लालू विरोध के नाम पर और बीजेपी के संगठन के आसरे सत्ता मिलती रही। बीजेपी से पल्ला झाड़ने के लिए संगठन चाहिए तभी दिल्ली में हैसियत बढ़ेगी। जे डी यू को ये अनुमान है कि लालू विरोध वाले वोट बैंक की सहूलियत के कारण बीजेपी भी अपने संगठन विस्तार के प्रति लापरवाह है। यानि इस छिजन (खाली पोलिटिकल स्पेस) पर नजर गड़ा ली गई है। यही कारण है कि बीजेपी से जे डी यू में आए संजय झा को इस काम में लगाया गया है। अपने पुराने संबंधों के बूते वे बीजेपी समर्थकों में थोड़ी सेंधमारी में कामयाब हुए है।

कम समय में कार्यकर्ता संख्या का अधिक विस्तार हो इसके लिए सन्देश के प्रसार की जरूरत है। लिहाजा अभियान को धारदार बनाने के लिए एक बड़े अखबार समूह का सहारा लिया गया है। ये अखबार समूह विशेष राज्य के लिए मुहिम चला रहा है। जानकार बता रहे हैं कि अखबार की ये अदा पचास दिनों तक दिखेगी। अखबार के जरिये विशेष राज्य के मुद्दे को गावों तक ले जाया जा रहा है। इससे जे डी यू के सदस्यता अभियान में भी सहूलियत मिल रही है। ये मुहिम जब थमेगी तब जे डी यू की तरफ से पार्टी अभियान को आख़री स्ट्रोक मारा जाएगा . . .  4 नवम्बर के लिए। आम धारणा बनी है कि अखबार समूह ने नीतीश को बड़ी राहत दी है। नीतीश और बिहार के हिन्दी प्रिंट मीडिया के संबंधों को देखते हुए ये जानना बेमानी है कि अखबार समूह को नीतीश से कितनी राहत मिली होगी। उन्नति की दिशा में लम्बी छलांग का मंसूबा पालने वाले लोग गुण-धुन में होंगे कि राज्य के शीर्ष नेतृत्व(नीतीश) को बड़ी बड़ी गद्दी मिलना ही बिहार वासियों का कल्याण है क्या?


  

1.9.12

भारत की हार और इंडियन राजनीति की जीत - 4

भारत की हार और इंडियन राजनीति की जीत - 4
-------------------------------------------------------
संजय मिश्र
----------------
किसी राह चलते व्यक्ति से पूछिए कि सेक्यूलरिज्म क्या है तो वो एकबारगी चौंक उठेगा? दिमाग पर जोर देगा और कहेगा कि कांग्रेस सेक्यूलर है . . . लालू का पार्टी भी और हाँ वामपंथी लोग भी . . . आखिर में थोड़ा झल्लाते हुए कहेगा कि बी जे पी को छोड़ कर सभी। थोड़ा और कुरेदिए तब पूछिए कि जे डी यू क्या है? . . . इस बार झट से जबाव आएगा कि . . . हाँ वो भी क्योंकि मोदी का विरोध करता है . . .  गुजरात में दंगा हुआ था न। अब याद दिलाइये कि सिखों के कत्लेआम की वजह से कांग्रेस भी सेक्यूलर नहीं हुआ . . तो वो अकबका जाएगा।

अब किसी और राही से बात करिए। उससे सवाल करिए कि सामंतवाद क्या होता है? वो कहेगा फॉरवर्ड कास्ट के लोग सामंत होते हैं। कहने का मतलब ये कि आम लोग नहीं जान पाए हैं कि स्टेट के शासन करने का प्राकृतिक स्वभाव ही सेक्यूलर यानि गैर-धार्मिक होता है . . .  और ये कि सेक्यूलर नहीं होने का अर्थ धार्मिक होने से है न कि कम्यूनल होने से है . . . और ये भी कि आम जन(वोटर)  धार्मिक बने रह सकते। वे जान नहीं पाए हैं कि सामंतवाद अर्थव्यवस्था की एक स्टेज थी न कि
इसका जाति से कोई मतलब है। राजनीतिक क्रियाकलापों और संचार माध्यमों के जरिये इन शब्दों के संबंध
में दरअसल सच बताया ही नहीं गया।

विषय बदलते हैं . . .
टू इच एकोर्डिंग टू हिज नीड्स . . . एंड फ्रॉम इच एकोर्डिंग टू हिज कैपसिटी . . .
आप सोच रहे होंगे कि ये क्या माजरा समझाया जा रहा है? आप से कहा जाए कि ये मार्क्सवाद का एसेंस
है तो आप हैरान हुए बिना नहीं रहेंगे। ये विचार सुन वामपंथी बिद्केंगे-- मुंह चुराएंगे और इस सच
को नकारेंगे। आम वामपंथी इससे अवगत नहीं और विषद समझ रखने वाले भारतीय मार्क्सवादी
इन्हें बताते नहीं। ये उस देश का हाल है जहाँ सोशल मीडिया के आने से पहले की तीन पीढी वाम
विचारों से लैस रही है . . तब जवान होने का मतलब होता था वामपंथी होना।

सनातन धर्म के उस दर्शन पर गौर करें जिसमें कहा गया कि उनका भी भला हो जो सबल हैं और उनका भी जो समर्थ नहीं  ---------- यानि सबके उन्नति की निश्छल कामना। अब मार्क्सवाद के ऊपर कहे विचार और सनातन जीवन शैली के इस सोच का मिलान करें---साफ़ है दोनों नजरिये में समानता झलकती है। अमेरिकी दर्शन के --- सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट --- वाले सोच के ठीक उलट। तो क्या अमेरिका विरोधी इंडियन मार्क्सवादी कभी सनातन सोच के साथ अपनी कन्वर्जेन्स को एक्सप्लोर करना चाहेंगे। अभी तक इन्होने ऐसा नहीं किया है।

इन्होने किया क्या है? इंडियन राजनीति की उस बड़ी समझ का साथ दिया है जो कहता है आमजनों को भ्रम में रखो और राज करो। दरअसल ऐसी नौबत आई कैसे? कई कारण खोजे जा सकते। संभव है इंडियन राष्ट्र की कांग्रेसी अवधारणा में भी इसके संकेत मिलें। चलिए इसे ही टटोलते है। ये अवधारणा कहती है--- एक दिशा से हिन्दू आए ..... दूसरी तरफ से मुसलमान . . . तीसरी दिशा से सिख। इसी तरह क्रिस्टियन आये--- और सबने कहा चलो एक राष्ट्र बनाते। कांग्रेस की अगुवाई में चलती मुहिम में इसे -- मोजाइक -- कहा जाता। अब मोजाइक भी तो किसिम किसिम के हो सकते जिस पर कोई विमर्श न हुआ।

मकसद दिख ही जाता है। भारत के इतिहास और जीवन शैली को जितना संभव हो झुठलाते जाओ। तभी तो बड़े फक्र के साथ वे कहते कि ये देश तो 65 साल का जवान है--- यानि इसका अतीत नहीं बल्कि महज वर्तमान और भविष्य है। तो क्या इंडिया हवा में बनी है? रूट-लेसनेस का आरोप न लगे इसलिए कांग्रेस और इसके हितैषी बताएँगे कि हिन्दू धर्म में जड़ता है और ये प्रगतिशील बनने में बाधक। ख़म ठोक कर बताएँगे कि सनातन जीवन प्रवाह ( कनटिनियूटी) का उत्कर्ष नहीं है इंडिया। लेकिन बड़ी ही चालाकी और ढिठाई से संवैधानिक इंडिया की समस्याओं और ना-समझ क़दमों का ठीकरा हिन्दू व्यवस्था पर जरूर फोर देते।

हिन्दू तौर-तरीकों के प्रगतिशील नहीं होने की बात पर वामपंथी भी हरकत में आ जाते। वे हिन्दुओं को याद दिलाते कि धर्म तो -- अफीम-- होता सो इससे विरत रहें। तो क्या सिर्फ हिन्दू धर्म ही अफीम होता? क्या इस्लाम और क्रिस्टियन धर्म अफीम जैसा असर नहीं डाल सकते? इस पर वे चुप्पी साध लेते। साझा हित कि बात है न तभी तो असम में भी अवैध बांग्लादेशी राशन कार्ड और वोटर कार्ड बनबा लेते और ज्योति बासु के बंगाल में भी।

ऐसा कहने वाले मिल जाएंगे कि नेहरु की सोच सिंथेटिक थी। मान लिया पर उन्होंने जतन से भारत को खोजने की कोशिश की। राहुल गांधी भी कभी-कभार ऐसा ही करते। वे ऐसा क्यों करते जिनके सलाहकार 65 साल के इंडिया का जुमला गढ़ते? इसी उधेड़बुन में हैं राहुल। इसलिए कि नेहरु के समय लोग नागरिक हुआ करते जबकि आज वोट-बैंक बना दिए गए है। सेक्यूलर वोट--- कम्यूनल वोट--- और न जाने कितने तरह के वोट हो गए आज। रहस्य यहाँ है। भूल वश राष्ट्र हित पर चिंता जता कर देखें ---पकिस्तान के साथ ट्रैक-2 पालिसी में लगे कांग्रेसी हितैषी लाल-पीले हो जाएंगे। कह दीजिये कि क्या एक दब्बू राष्ट्र की नीव रखी जा रही--तो वे फुफकार उठेंगे।

23.8.12

भारत की हार और इंडियन राजनीति की जीत - 3

भारत की हार और इंडियन राजनीति की जीत - 3
------------------------------------------------
संजय मिश्र
--------------
किसी देश की सेहत का अंदाजा लगाना हो तो उस देश की मीडिया के हालात पर नजर दौराएं . . . ख़ास कर उस देश में जो प्रजातांत्रिक होने का दंभ भरे। अब जरा भारत की मौजूदा परिस्थिति पर निगाह डालें। मुंबई से लेकर लखनऊ तक उत्पाती भीड़ ने पत्रकारों की जमकर धुनाई की है . . . ये आरोप लगाते हुए कि असम और म्यांमार में रहने वाले अवैध घुसपैठी बांग्लादेशी मुसलमानों के दर्द को मीडिया ने नहीं दिखाया।

दिल्ली के चुनिंदा साधन-संपन्न टी वी चैनलों के एंकर और रिपोर्टर सप्ताह भर सकते में रहे . . . उनके चेहरों के भाव अहसास कराते रहे कि सदमा मारक है . . . यकीन करना मुश्किल कि जिस कौम की तीमारदारी का आरोप इन पर लगता रहा वही भष्मासुर बन कर टूट पड़ेंगे पत्रकार बिरादरी पर। न जाने राजदीप इस दौर में क्या सोच रहे होंगे . . . वो बयान कि असम दंगों में एक हज़ार हिंदू मारे जाएंगे तो भी वहां की खबर नहीं दिखाएंगे . . . बरबस चैन चुराता होगा उनका। पता नहीं इशरत जेहां मामले में मीडिया की तरफ से माफी मांगने वाले पुण्यप्रसून इस पेशे के वर्तमान हालात पर किस उधेड़बुन में हों।

थोड़ा ठहर कर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को याद कर लें। संसद में नेताओं को लताड़ते हुए एक बार उन्होंने आगाह किया था कि छूत - अछूत ( बी जे पी के प्रति ) की राजनीति छोड़ें . . . सिख दंगों जैसे संवेदनशील मसलों को बार बार न उछालें . . . इससे देश का माहौल बिगड़ता है . . . रंजिशें उभर आती हैं। बीते दस साल से इस सलाह को ठेंगा दिखाया जा रहा है। दिन रात गुजरात दंगों की याद दिलाई जा रही है। कांग्रेस के इशारे पर चल रही इस मुहिम में दिल्ली के
पत्रकारों का एक जमात ग्राउंड जीरो पर तैनात रहने वाले फ़ौजी दस्ते जैसी भूमिका अदा कर रहा है। इस बात को जानते हुए कि इससे मुसलमानों की दुखती रग भड़क उठेगी। और हुआ भी ऐसा --- एक चिन्गारी भर चाहिए थी।

क्या ये काम भारत में कार्यरत देसी या विदेशी पत्रकारों का हो सकता है कि वे इस देश की कांग्रेसी ब्रांड सेक्यूलरिज्म का झंडा फहराते फिरें? क्या विचारधाराओं का गुलाम बनना पत्रकारिता के दायरे में आता है? विचारधाराएं तो हुक्मरानों के लिए होती और उनके लिए प्रेरणा का काम करती हैं। इत्तेफाक से विचारधारा अतिवादी रुख अख्तियार करे तो एक बड़ा वर्ग पीड़ा झेलने को मजबूर होता है। पत्रकार इस दर्द को संभालकर खबर बनाते।

गुजरात के दंगों में मुसलमान ज्यादा मरे, हिंदू कम मरे। असम में मुसलमान कम मरे और हिंदू (बोडो) ज्यादा मारे गए। एक हिंदू या एक मुसलमान अपनी भावनाओं के अनुरूप दोनों जगहों की ख़बरों को कम या ज्यादा दिखाए जाने पर मीडिया से सवाल करता है। पत्रकार कह सकता है कि ऐसे सवाल भावुकतावश किये जा रहे। लेकिन पत्रकारिता के नजरिये पर इन सवालों को कसें तो मीडिया का असली रंग दिख जाएगा। तब पता चलेगा कि दरअसल वे राजनीतिक हथियार के तौर पर काम कर रहे।

जीवन अमूल्य है और पूरा जीवन जी लेना प्राकृतिक अधिकार। इसमें जब बाधा आती है यानि जब किसी की इहलीला जबरदस्ती समाप्त की जाए तो वो न्यूज़ के दायरे में आता है . . . चाहे वो गुजरात में हो, असम में हो, मुंबई, दिल्ली या फिर और कहीं। पत्रकारिता ये इजाजत पत्रकार को नहीं देता कि इसकी रिपोर्टिंग या इसे पेश करने में भेद-भाव बरती जाए। पर भारत में हो क्या रहा है? राजदीप के बयान पत्रकारिता के दायरे में आते या फिर अंध राजनीतिक कार्यकर्ता की सोच की श्रेणी में? सामाजिक सदभाव चाहने वाले कहेंगे जो हो रहा है वो खतरनाक ट्रेंड है।

पत्रकार की एक ही विचारधारा हो सकती है और वो है मानववाद। इसमें स्थानीय पहलू को ध्यान में रहकर न्यूज़ सेन्स खोजने की भी जरूरत नहीं पड़ती। म्यान्मार में मुसलमान, कश्मीर में कश्मीरी पंडित एथनिक क्लिंजिंग के शिकार हुए। गुजरात 2002 दंगों में कुछ हद तक ऐसी नौबत आ गई थी। असम में कुछ पोकेट्स में बोडो एथनिक क्लींजिंग के शिकार हुए हैं। पत्रकार का धर्म है कि ऐसे मंसूबों से आगाह करते हुए खबर पेश करे। पत्रकारिता सवाल पूछती है कि
सिर्फ गुजरात की ही चर्चा क्यों?

 पर ये पत्रकार हवाला देंगे कि मुसलमान अल्पसंख्यक हैं इसलिए उनकी पीड़ा दिखाते।  अब उनसे सवाल पूछिए की कश्मीर में कश्मीरी पंडित भी अल्पसंख्यक ही हैं और इसी तरह बिहार के किशनगंज जिले में हिंदू अल्पसंख्यक हैं। आपको ये कह कर टरका दिया जाएगा कि कश्मीरी पंडितों पर भी कार्यक्रम हुए है। क्या दिल्ली के नामी चैनलों में इतनी हिम्मत है कि वे बता सकें कि गुजरात के मुकाबले कितने मिनट या कितने सेकेण्ड उन्होंने कश्मीरी पंडितों के दर्द को आवाज दी है?

इंडिया में न्यूज़ सेन्स का एक बड़ा आधार है संविधान। यानि चीजें संविधान के अनुरूप न चले तो वो खबर का हिस्सा बनती है। कई संवैधानिक सवाल अनसुलझे रह गए हैं। क्या इन चैनलों में आपको धारा 374 पर बहस दिखाई देता है? बड़ी ही सफाई से ऐसे संवैधानिक सवालों को बी जे पी का सवाल बता कर मुंह मोड़ लिया जाता है। सी ए जी संवैधानिक संस्था है पर जब कांग्रेसी उसकी वीभत्स आलोचना करते तो ये पत्रकार इस खबर को एक दो बार चलाने के बाद डंप कर देते हैं।

इंडिया में काम कर रहा एक पत्रकार जब ड्यूटी पर होता है तो वो सिर्फ पत्रकार होता है। उस वक्त इस देश के लिए खुद की देशभक्ति का इजहार करना उसका काम नहीं होता है। न्यूज़ लिखते समय न तो वो इंडियन होता, न ही हिन्दू या मुसलमान। ड्यूटी के बाद घर जाकर वो देशभक्ति दिखा सकता है अगर वो इंडियन है। पर याद कीजिये जब जब पाकिस्तानी स्पोंसोर्ड आतंकी घटनाएं देश में होती है ये पत्रकार देशभक्ति दिखाने में लग जाते है। मकसद होता है बी जे पी ब्रांड देशभक्ति वाले बयान को प्री-एम्प्ट करना।

चलिए अब विस्फोटक यथार्थों से अपेक्षाकृत मुलायम लेकिन तल्ख़ सच्चाई की ओर। भ्रष्टाचार के खिलाफ हाल के समय में हुए सात्विक आंदोलनों से खार खाए पत्रकारों की कुछ चर्चा करें। पत्रकारों का धर्म होता है कि वो पीड़ितों के साथ खड़ा हो। स्टेट पावर के सामने आम लोगों का वो पक्षकार बने। जिस वक्त साल 2011 के 4 जून की रात रामदेव और उनके समर्थकों की निर्दयतापूर्वक पिटाई  हुई उस वक्त हमला झेल रहे लोग पीड़ितों की श्रेणी में थे। लेकिन अगले पंद्रह दिनों तक ये टीवी पत्रकार रामदेव पर हमलावर रहे, उन पर बहादुरी दिखाते रहे। स्टेट की शक्तियों से तीखे सवाल करने से बचते रहे, इन शक्तियों के इशारे पर लाठी चार्ज के विजुअल गायब करते रहे साथ ही आन्दोलनकारियों का मजाक उड़ाते रहे। राजबाला की दर्दनाक मौत पर इनकी चुप्पी पत्रकारिता को कठघरे में खड़ा करता रहा।

इंडिया में एक शब्द आजकल फैशन में है और ये शब्द है - अकबाल। शरद यादव इसके बड़े
पैरोकार हैं। सरकार, राजनेता, अन्ना (16 अगस्त, 2011)---सबका अकबाल देखा है देश ने। पत्रकारों का भी अकबाल होता और ये पीपल्स मैंडेट के कारण होता है। आज वही पीपुल उससे चुभने वाले सवाल कर रहा है। क्या पत्रकारिता को ये अधिकार है कि वो उसी पीपुल(आन्दोलनकारियों) का मजाक उडाए जिसकी बदौलत उसे शक्ति मिलती है।

वो कहेंगे कि चिदंबरम की एडवाइजरी का खौफ था। 14 अगस्त 2012 को रामदेव ने कहा कि यूपीए हुक्मरानों ने दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकारों को बुलाकर उनके आन्दोलन को डाउन प्ले करने के निर्देश दिए। मान लिया कि पत्रकारों के एंटी इस्टाबलिशमेंट मोड के उनके प्राकृतिक व्यवहार से बचने के बावजूद सरकार इन्हें धमकाती है। बेशक सरकारी नेता चाहते हैं कि ये पत्रकार उनके चरणों में लोटें। बावजूद इस लालसा के, सरकार इनकी हर धड़कन पर अंकुश नहीं लगा सकती। अन्ना के हाल के आन्दोलन के पहले तीन दिनों तक सरकार ने इन्हें नहीं कहा होगा कि दिन-रात भीड़ की गिनती करो। ये भी नहीं कहा होगा कि जब भीड़ जुट आए तो उसे वीक एंड करार दो। आन्दोलन वीक एंड की बदौलत नहीं चला करते इतनी समझ तो पत्रकारों को दिखानी ही चाहिए थी।

जरा याद करिए . . . देश के विभिन्न प्रांतों में किसी घटना या अहम् मसले पर सीबीआई जांच की मांग के लिए महीनों तक लोग सड़कों पर जोड़-आजमाइस करते हैं तब जाकर उस मसले पर सीबीआई जांच के आदेश दिए जाते हैं। पर गौर करें-- किसी गुमनाम व्यक्ति के एक आवेदन पर झट-पट में बालकृष्ण के खिलाफ सीबीआई जांच शुरू हो जाती है। संभव है बालकृष्ण ने कोई गलती की हो पर इन्वेस्टीगेटिव जर्नलिज्म के पैरोकार ये पत्रकार क्या देश को बता सकेंगे कि विच हंट के इस खेल का वो आवेदनकर्ता कौन है?

ये मत भूलिए कि इनमें से कई पत्रकारों को पत्रकारिता की बारीकियों की खूब समझ है। दरअसल ये सयाने हैं। बाजार और विचारधारा के बीच ताल-मेल बिठाना खूब आता है इन्हें। सोच समझ कर ही न्यूज़ सेन्स की बलि लेते हैं ये। ए बी पी न्यूज़ के बहाने एक दिलचस्प दृश्य देखें। स्टूडियो में बहस के दौरान यदि चार लोग पैनल में हैं तो उनमें कांग्रेस के प्रतिनिधि सहित तीन गेस्ट कांग्रसी मानसिकता के हो जाते हैं। चौथा गेस्ट इस असंतुलित बहस का पूरे कार्क्रम के दौरान भार ढोने को मजबूर रहता है। इस बीच कपिल सिब्बल या दिग्विजय सिंह की बाईट आ जाए तो इनके एक एंकर चहक उठते हैं। पैनल में मौजूद संजय झा नाम के शख्स का चेहरा खिल उठता है। ये शख्स प्रजातंत्र की भी बात करता है साथ ही अगले चालीस सालों तक लगातार कांग्रेसी शासन की वकालत करने लगता है। न जाने क्यों, ये चैनल दो सालों से संजय झा को हर मर्ज की दवा और इंडिया का सबसे बड़ा विद्वान साबित करने पर तुला है?

अन्ना आन्दोलन के ठहराव के बाद आशंका बनी कि उनके युवा समर्थकों की ऊर्जा किसी भी दिशा में जा सकती है। बेहतरी में यकीन रखने वाले कह सकते हैं कि मुंबई की हिंसा इस उर्जा के गलत दिशा में जाने का संकेत है। लेकिन इस एंगल पर सार्थक बहस न हुई। बेनी प्रसाद के वचन और राज ठाकरे ने इन पत्रकारों को राहत दी है। टीवी स्टूडियो फिर से गुलजार हो गए हैं अपने पसंदीदा शगल की ओर। सेक्यूलरिज्म और कम्यूनलिज्म पर बहस पटरी पर लौट आई है . . . साथ में है आरक्षण का तड़का। भारत की आत्मा पत्रकारों की इस जमात से सवाल कर रही है कि किस साल और किस तारीख को इंडिया के कांग्रेस ब्रांड सेक्यूलरिज्म की रक्षा हो जाएगी? क्या उस तारीख के बाद देश के बुनियादी समस्याओं पर गंभीरता से मंथन करेंगे वे? क्या तारीख जानने की भारत की आस पूरी होगी?

Website Protected By Copy Space Do Not copy

Protected by Copyscape Online Copyright Infringement Tool