life is celebration

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21.9.12

विशेष राज्य के अभियान का सच

विशेष राज्य के अभियान का सच

संजय मिश्र
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जो भौगोलिक क्षेत्र अदौ से ( सदा से ) ख़ास रहा हो वो विशेष राज्य बनने की लालसा दिखाए ये सुनने में अटपटा सा लगता है। पर यहाँ सन्दर्भ दूसरा है। विशेष राज्य की पैरोकारी करने वाले बताते हैं कि अपने बूते बिहार को जितना बढ़ना था वो चरम बिंदु छू लिया गया है। आगे की तरक्की के लिए और विकसित राज्य की कतार में आने के लिए जो सफ़र है उसमें विशेष राज्य के दर्जे का साथ चाहिए। इसके लिए नीतीश की पार्टी जे डी यू बाकायदा राज्यव्यापी अभियान चला रही है। दिलचस्प है कि ठीक इसी समय बिहार में सर्वाधिक पाठक संख्या का दावा करने वाला एक अखबार समूह विशेष राज्य के लिए जनमत जुटाने में लगा है।

आगे की  पड़ताल से पहले बिहार के तीन लोकप्रिय मुख्यमंत्रियों के बयान को याद करें। राज्य के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह ने कहा था कि बिहार के डूबने से बंगाल का भला हो तो वे ऐसा ही होने देंगे। लालू प्रसाद की वो मशहूर हुंकार तो आपको याद ही होगी कि --- बिहार मेरी लाश पर बंटेगा। और अब परिदृश्य पर नीतीश कुमार हैं जो मानते हैं कि विशेष राज्य का दर्जा तो बिहार का हक़ है और इसे छीन लिया जाएगा और ये कि इसके लिए किसी हद तक जाया जा सकता है। यहाँ तक कि जो विशेष राज्य का दर्जा देगा केंद्र में उस दल की सरकार बनाने में वो सहयोग करेंगे।

राजनीति की महीनी को नहीं तार पाने वाले कहेंगे कि अच्छा है कांग्रेसी श्रीबाबू बिहार हित साधन के प्रति उदासीन रहे---जबकि लालू और उससे भी आगे बढ़ कर नीतीश इस राज्य का भला चाहते। इसे ही भांप कर जे डी यू का अभियान चलाने वाले आम जन को समझाने कि कोशिश में लगे हैं कि कांग्रेस(केंद्र) बिहार की हकमारी कर रही है। यानि केंद्र पर दबाव बनाए रखना उचित है--और ये कि विशेष दर्जा तो बस अब मिलने ही वाला है। इनकी रणनीति के विविध आयामों के खुलासे से पहले तीनो मुख्यमंत्रियों के बयानों को समझने की कोशिश करें।

सूबे के पहले सीएम के बयान का संबंध कोसी परियोजना से था . . . वो परियोजना जो लॉर्ड वेभेल का ब्रेन चाइल्ड थी। पहले आम चुनाव का ये प्रमुख मुद्दा बनी . . .  ख़ास कर मिथिला में। समाजवादी लक्स्मन झा और कांग्रेसी जानकीनंदन सिंह इस मुद्दे पर आंदोलनरत थे। घबराई कांग्रेस (पटना) की सरकार वेभेल प्लान के बदले नित नई कमजोर वैकल्पिक योजनाएं सुझा रही थी। उस समय के दस्तावेजों को खंगालें तो साफ़ पता चलता है की पटना का सत्ता प्रतिष्ठान मिथिला के विकास का आग्रही तो बिलकुल ही नहीं था। जबकि वेभेल की योजना मिथिला(बिहार) का काया-पलट करने की क्षमता रखनेवाली।

विकसित मिथिला की कल्पना से इर्ष्या करने वाला पटना का सत्ता प्रतिष्ठान इससे होने वाली बिहार की प्रगति के अवसर को हाथ से जाने दिया। पटना के हुक्मरानों और कलकत्ता(बी सी रॉय) के बीच सांठ-गाँठ हुई और डी वी सी परियोजना को आगे किया गया। श्रीबाबू के बयान का मतलब था कि बिहार(मिथिला) बाढ़ से डूबती रहे और डी वी सी के बूते बंगाल के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र बच जाएँ। यहाँ तक कि डी वी सी के समझौते को बंगाल फ्रेंडली बनाया गया।

नेहरू को कोसी की वेभेल परियोजना से शुरू में अनुराग था। लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री ने उनसे ये बहाने बनाए कि वेभेल परियोजना की डैम (बारह-क्षेत्र) सिस्मिक जोन में पड़ता है और ये बिहार(मिथिला) के लिए जानलेबा  साबित होगा। नेहरू को ये भी कहा गया कि इस परियोजना से निकलने वाली बिजली का उपयोग करने में बिहार सक्षम नहीं है। इन्होने ये संकेत दिए कि नेहरू चाहें तो भाखड़ा-नांगल परियोजना शुरू कर लें। यानि वेभेल परियोजना लटका दी गई और इन पैसों से भाखड़ा-नांगल (पंजाब का काया-कल्प ), डी वी सी (बंगाल का भला हुआ) का रास्ता  साफ़ हुआ।

अब लालू के बयान को परखें। देस-दुनिया में बड़ा नाम था लालू का। समर्थक उनकी तुलना कृष्ण भगवान् से करने लगे थे। ऐसे में अखंड बिहार पर एक-छत्र राज की चाहत परबान पर थी। लेकिन इस अकबाल के बावजूद प्रचंड बहुमत नसीब न था। सलाहकारों ने समझाया कि अपने बयान को किनारा करें और बंटबारे के लिए तैयार हो जाएं। उन्हें ये बताया गया कि झारखण्ड बन जाएगा तो जे एम एम की जरूरत नहीं रह जाएगी। बचे बिहार में अपना ही बहुमत रहेगा। आखिरकार बंटवारे के लिए वे तैयार हो गए।

लालू युग में विशेष दर्जे का मामला जोर-शोर से उठा। अनिवासी भारतीय पटना बुलाए गए। केंद्र-राज्य संबंधों के जानकार और अर्थशास्त्री मोहन गुरुस्वामी भी बाद में पटना आए। यहाँ लोगों को वो समझा गए कि आज़ादी के बाद से सामान्य स्थिति में केंद्र को बिहार को जो राशि देनी चाहिए उससे चालीस हज़ार करोड़ कम मिले। बिहार का आर्थिक अवरोधन नामक उनकी पुस्तिका बिहार की हकमारी की कहानी कहती है। बावजूद इसके लालू अपनी ही दुनिया में रमे रहे और बिहार की उन्नति की चाहत अधूरी रही।

बिहार में जे डी यू का संगठन कमजोर है। विशेष राज्य के अभियान के दौरान अधिक माथा पच्ची  इसी बात को लेकर है। ये महसूस किया जा रहा है कि नीतीश की बेहतर छवि कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ोत्तरी में तब्दील नहीं हुई। इस बात पर भी ध्यान है कि छवि निर्माण में जितना लंबा वक्त गुजरा उस अनुपात में कार्यकर्ता बढाने पर लापरवाही रही। अब इसकी भरपाई को प्राथमिकता दी जा रही है।

नीतीश के चाणक्य संजय झा इन दिनों अभियान की कमान संभाले हुए हैं। कार्यकर्ताओं को वे समझा रहे हैं कि केंद्र की राजनीति के बड़े कैनवास में नीतीश की अहम् भूमिका है। कार्यकर्ताओं को संगठन शक्ति पुख्ता करने की नसीहत देते कहा जा रहा है कि नीतीश को पी एम बनाना है तो चार नवम्बर की रैली को ऐतिहासिक बनाएं। संजय झा ये बताने से नहीं चूक रहे कि पटना में उस दिन होने वाली अधिकार रैली में दस लाख समर्थक जुटेंगे और ये रैली मौजूदा राजनीति के रुख को दिशा देने वाला साबित होगा।

मकसद साफ़ है। विशेष राज्य के अभियान के बहाने नजर संगठन की मजबूती और दिल्ली की गद्दी पर है। अब तक लालू विरोध के नाम पर और बीजेपी के संगठन के आसरे सत्ता मिलती रही। बीजेपी से पल्ला झाड़ने के लिए संगठन चाहिए तभी दिल्ली में हैसियत बढ़ेगी। जे डी यू को ये अनुमान है कि लालू विरोध वाले वोट बैंक की सहूलियत के कारण बीजेपी भी अपने संगठन विस्तार के प्रति लापरवाह है। यानि इस छिजन (खाली पोलिटिकल स्पेस) पर नजर गड़ा ली गई है। यही कारण है कि बीजेपी से जे डी यू में आए संजय झा को इस काम में लगाया गया है। अपने पुराने संबंधों के बूते वे बीजेपी समर्थकों में थोड़ी सेंधमारी में कामयाब हुए है।

कम समय में कार्यकर्ता संख्या का अधिक विस्तार हो इसके लिए सन्देश के प्रसार की जरूरत है। लिहाजा अभियान को धारदार बनाने के लिए एक बड़े अखबार समूह का सहारा लिया गया है। ये अखबार समूह विशेष राज्य के लिए मुहिम चला रहा है। जानकार बता रहे हैं कि अखबार की ये अदा पचास दिनों तक दिखेगी। अखबार के जरिये विशेष राज्य के मुद्दे को गावों तक ले जाया जा रहा है। इससे जे डी यू के सदस्यता अभियान में भी सहूलियत मिल रही है। ये मुहिम जब थमेगी तब जे डी यू की तरफ से पार्टी अभियान को आख़री स्ट्रोक मारा जाएगा . . .  4 नवम्बर के लिए। आम धारणा बनी है कि अखबार समूह ने नीतीश को बड़ी राहत दी है। नीतीश और बिहार के हिन्दी प्रिंट मीडिया के संबंधों को देखते हुए ये जानना बेमानी है कि अखबार समूह को नीतीश से कितनी राहत मिली होगी। उन्नति की दिशा में लम्बी छलांग का मंसूबा पालने वाले लोग गुण-धुन में होंगे कि राज्य के शीर्ष नेतृत्व(नीतीश) को बड़ी बड़ी गद्दी मिलना ही बिहार वासियों का कल्याण है क्या?


  

1.9.12

भारत की हार और इंडियन राजनीति की जीत - 4

भारत की हार और इंडियन राजनीति की जीत - 4
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संजय मिश्र
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किसी राह चलते व्यक्ति से पूछिए कि सेक्यूलरिज्म क्या है तो वो एकबारगी चौंक उठेगा? दिमाग पर जोर देगा और कहेगा कि कांग्रेस सेक्यूलर है . . . लालू का पार्टी भी और हाँ वामपंथी लोग भी . . . आखिर में थोड़ा झल्लाते हुए कहेगा कि बी जे पी को छोड़ कर सभी। थोड़ा और कुरेदिए तब पूछिए कि जे डी यू क्या है? . . . इस बार झट से जबाव आएगा कि . . . हाँ वो भी क्योंकि मोदी का विरोध करता है . . .  गुजरात में दंगा हुआ था न। अब याद दिलाइये कि सिखों के कत्लेआम की वजह से कांग्रेस भी सेक्यूलर नहीं हुआ . . तो वो अकबका जाएगा।

अब किसी और राही से बात करिए। उससे सवाल करिए कि सामंतवाद क्या होता है? वो कहेगा फॉरवर्ड कास्ट के लोग सामंत होते हैं। कहने का मतलब ये कि आम लोग नहीं जान पाए हैं कि स्टेट के शासन करने का प्राकृतिक स्वभाव ही सेक्यूलर यानि गैर-धार्मिक होता है . . .  और ये कि सेक्यूलर नहीं होने का अर्थ धार्मिक होने से है न कि कम्यूनल होने से है . . . और ये भी कि आम जन(वोटर)  धार्मिक बने रह सकते। वे जान नहीं पाए हैं कि सामंतवाद अर्थव्यवस्था की एक स्टेज थी न कि
इसका जाति से कोई मतलब है। राजनीतिक क्रियाकलापों और संचार माध्यमों के जरिये इन शब्दों के संबंध
में दरअसल सच बताया ही नहीं गया।

विषय बदलते हैं . . .
टू इच एकोर्डिंग टू हिज नीड्स . . . एंड फ्रॉम इच एकोर्डिंग टू हिज कैपसिटी . . .
आप सोच रहे होंगे कि ये क्या माजरा समझाया जा रहा है? आप से कहा जाए कि ये मार्क्सवाद का एसेंस
है तो आप हैरान हुए बिना नहीं रहेंगे। ये विचार सुन वामपंथी बिद्केंगे-- मुंह चुराएंगे और इस सच
को नकारेंगे। आम वामपंथी इससे अवगत नहीं और विषद समझ रखने वाले भारतीय मार्क्सवादी
इन्हें बताते नहीं। ये उस देश का हाल है जहाँ सोशल मीडिया के आने से पहले की तीन पीढी वाम
विचारों से लैस रही है . . तब जवान होने का मतलब होता था वामपंथी होना।

सनातन धर्म के उस दर्शन पर गौर करें जिसमें कहा गया कि उनका भी भला हो जो सबल हैं और उनका भी जो समर्थ नहीं  ---------- यानि सबके उन्नति की निश्छल कामना। अब मार्क्सवाद के ऊपर कहे विचार और सनातन जीवन शैली के इस सोच का मिलान करें---साफ़ है दोनों नजरिये में समानता झलकती है। अमेरिकी दर्शन के --- सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट --- वाले सोच के ठीक उलट। तो क्या अमेरिका विरोधी इंडियन मार्क्सवादी कभी सनातन सोच के साथ अपनी कन्वर्जेन्स को एक्सप्लोर करना चाहेंगे। अभी तक इन्होने ऐसा नहीं किया है।

इन्होने किया क्या है? इंडियन राजनीति की उस बड़ी समझ का साथ दिया है जो कहता है आमजनों को भ्रम में रखो और राज करो। दरअसल ऐसी नौबत आई कैसे? कई कारण खोजे जा सकते। संभव है इंडियन राष्ट्र की कांग्रेसी अवधारणा में भी इसके संकेत मिलें। चलिए इसे ही टटोलते है। ये अवधारणा कहती है--- एक दिशा से हिन्दू आए ..... दूसरी तरफ से मुसलमान . . . तीसरी दिशा से सिख। इसी तरह क्रिस्टियन आये--- और सबने कहा चलो एक राष्ट्र बनाते। कांग्रेस की अगुवाई में चलती मुहिम में इसे -- मोजाइक -- कहा जाता। अब मोजाइक भी तो किसिम किसिम के हो सकते जिस पर कोई विमर्श न हुआ।

मकसद दिख ही जाता है। भारत के इतिहास और जीवन शैली को जितना संभव हो झुठलाते जाओ। तभी तो बड़े फक्र के साथ वे कहते कि ये देश तो 65 साल का जवान है--- यानि इसका अतीत नहीं बल्कि महज वर्तमान और भविष्य है। तो क्या इंडिया हवा में बनी है? रूट-लेसनेस का आरोप न लगे इसलिए कांग्रेस और इसके हितैषी बताएँगे कि हिन्दू धर्म में जड़ता है और ये प्रगतिशील बनने में बाधक। ख़म ठोक कर बताएँगे कि सनातन जीवन प्रवाह ( कनटिनियूटी) का उत्कर्ष नहीं है इंडिया। लेकिन बड़ी ही चालाकी और ढिठाई से संवैधानिक इंडिया की समस्याओं और ना-समझ क़दमों का ठीकरा हिन्दू व्यवस्था पर जरूर फोर देते।

हिन्दू तौर-तरीकों के प्रगतिशील नहीं होने की बात पर वामपंथी भी हरकत में आ जाते। वे हिन्दुओं को याद दिलाते कि धर्म तो -- अफीम-- होता सो इससे विरत रहें। तो क्या सिर्फ हिन्दू धर्म ही अफीम होता? क्या इस्लाम और क्रिस्टियन धर्म अफीम जैसा असर नहीं डाल सकते? इस पर वे चुप्पी साध लेते। साझा हित कि बात है न तभी तो असम में भी अवैध बांग्लादेशी राशन कार्ड और वोटर कार्ड बनबा लेते और ज्योति बासु के बंगाल में भी।

ऐसा कहने वाले मिल जाएंगे कि नेहरु की सोच सिंथेटिक थी। मान लिया पर उन्होंने जतन से भारत को खोजने की कोशिश की। राहुल गांधी भी कभी-कभार ऐसा ही करते। वे ऐसा क्यों करते जिनके सलाहकार 65 साल के इंडिया का जुमला गढ़ते? इसी उधेड़बुन में हैं राहुल। इसलिए कि नेहरु के समय लोग नागरिक हुआ करते जबकि आज वोट-बैंक बना दिए गए है। सेक्यूलर वोट--- कम्यूनल वोट--- और न जाने कितने तरह के वोट हो गए आज। रहस्य यहाँ है। भूल वश राष्ट्र हित पर चिंता जता कर देखें ---पकिस्तान के साथ ट्रैक-2 पालिसी में लगे कांग्रेसी हितैषी लाल-पीले हो जाएंगे। कह दीजिये कि क्या एक दब्बू राष्ट्र की नीव रखी जा रही--तो वे फुफकार उठेंगे।

23.8.12

भारत की हार और इंडियन राजनीति की जीत - 3

भारत की हार और इंडियन राजनीति की जीत - 3
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संजय मिश्र
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किसी देश की सेहत का अंदाजा लगाना हो तो उस देश की मीडिया के हालात पर नजर दौराएं . . . ख़ास कर उस देश में जो प्रजातांत्रिक होने का दंभ भरे। अब जरा भारत की मौजूदा परिस्थिति पर निगाह डालें। मुंबई से लेकर लखनऊ तक उत्पाती भीड़ ने पत्रकारों की जमकर धुनाई की है . . . ये आरोप लगाते हुए कि असम और म्यांमार में रहने वाले अवैध घुसपैठी बांग्लादेशी मुसलमानों के दर्द को मीडिया ने नहीं दिखाया।

दिल्ली के चुनिंदा साधन-संपन्न टी वी चैनलों के एंकर और रिपोर्टर सप्ताह भर सकते में रहे . . . उनके चेहरों के भाव अहसास कराते रहे कि सदमा मारक है . . . यकीन करना मुश्किल कि जिस कौम की तीमारदारी का आरोप इन पर लगता रहा वही भष्मासुर बन कर टूट पड़ेंगे पत्रकार बिरादरी पर। न जाने राजदीप इस दौर में क्या सोच रहे होंगे . . . वो बयान कि असम दंगों में एक हज़ार हिंदू मारे जाएंगे तो भी वहां की खबर नहीं दिखाएंगे . . . बरबस चैन चुराता होगा उनका। पता नहीं इशरत जेहां मामले में मीडिया की तरफ से माफी मांगने वाले पुण्यप्रसून इस पेशे के वर्तमान हालात पर किस उधेड़बुन में हों।

थोड़ा ठहर कर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को याद कर लें। संसद में नेताओं को लताड़ते हुए एक बार उन्होंने आगाह किया था कि छूत - अछूत ( बी जे पी के प्रति ) की राजनीति छोड़ें . . . सिख दंगों जैसे संवेदनशील मसलों को बार बार न उछालें . . . इससे देश का माहौल बिगड़ता है . . . रंजिशें उभर आती हैं। बीते दस साल से इस सलाह को ठेंगा दिखाया जा रहा है। दिन रात गुजरात दंगों की याद दिलाई जा रही है। कांग्रेस के इशारे पर चल रही इस मुहिम में दिल्ली के
पत्रकारों का एक जमात ग्राउंड जीरो पर तैनात रहने वाले फ़ौजी दस्ते जैसी भूमिका अदा कर रहा है। इस बात को जानते हुए कि इससे मुसलमानों की दुखती रग भड़क उठेगी। और हुआ भी ऐसा --- एक चिन्गारी भर चाहिए थी।

क्या ये काम भारत में कार्यरत देसी या विदेशी पत्रकारों का हो सकता है कि वे इस देश की कांग्रेसी ब्रांड सेक्यूलरिज्म का झंडा फहराते फिरें? क्या विचारधाराओं का गुलाम बनना पत्रकारिता के दायरे में आता है? विचारधाराएं तो हुक्मरानों के लिए होती और उनके लिए प्रेरणा का काम करती हैं। इत्तेफाक से विचारधारा अतिवादी रुख अख्तियार करे तो एक बड़ा वर्ग पीड़ा झेलने को मजबूर होता है। पत्रकार इस दर्द को संभालकर खबर बनाते।

गुजरात के दंगों में मुसलमान ज्यादा मरे, हिंदू कम मरे। असम में मुसलमान कम मरे और हिंदू (बोडो) ज्यादा मारे गए। एक हिंदू या एक मुसलमान अपनी भावनाओं के अनुरूप दोनों जगहों की ख़बरों को कम या ज्यादा दिखाए जाने पर मीडिया से सवाल करता है। पत्रकार कह सकता है कि ऐसे सवाल भावुकतावश किये जा रहे। लेकिन पत्रकारिता के नजरिये पर इन सवालों को कसें तो मीडिया का असली रंग दिख जाएगा। तब पता चलेगा कि दरअसल वे राजनीतिक हथियार के तौर पर काम कर रहे।

जीवन अमूल्य है और पूरा जीवन जी लेना प्राकृतिक अधिकार। इसमें जब बाधा आती है यानि जब किसी की इहलीला जबरदस्ती समाप्त की जाए तो वो न्यूज़ के दायरे में आता है . . . चाहे वो गुजरात में हो, असम में हो, मुंबई, दिल्ली या फिर और कहीं। पत्रकारिता ये इजाजत पत्रकार को नहीं देता कि इसकी रिपोर्टिंग या इसे पेश करने में भेद-भाव बरती जाए। पर भारत में हो क्या रहा है? राजदीप के बयान पत्रकारिता के दायरे में आते या फिर अंध राजनीतिक कार्यकर्ता की सोच की श्रेणी में? सामाजिक सदभाव चाहने वाले कहेंगे जो हो रहा है वो खतरनाक ट्रेंड है।

पत्रकार की एक ही विचारधारा हो सकती है और वो है मानववाद। इसमें स्थानीय पहलू को ध्यान में रहकर न्यूज़ सेन्स खोजने की भी जरूरत नहीं पड़ती। म्यान्मार में मुसलमान, कश्मीर में कश्मीरी पंडित एथनिक क्लिंजिंग के शिकार हुए। गुजरात 2002 दंगों में कुछ हद तक ऐसी नौबत आ गई थी। असम में कुछ पोकेट्स में बोडो एथनिक क्लींजिंग के शिकार हुए हैं। पत्रकार का धर्म है कि ऐसे मंसूबों से आगाह करते हुए खबर पेश करे। पत्रकारिता सवाल पूछती है कि
सिर्फ गुजरात की ही चर्चा क्यों?

 पर ये पत्रकार हवाला देंगे कि मुसलमान अल्पसंख्यक हैं इसलिए उनकी पीड़ा दिखाते।  अब उनसे सवाल पूछिए की कश्मीर में कश्मीरी पंडित भी अल्पसंख्यक ही हैं और इसी तरह बिहार के किशनगंज जिले में हिंदू अल्पसंख्यक हैं। आपको ये कह कर टरका दिया जाएगा कि कश्मीरी पंडितों पर भी कार्यक्रम हुए है। क्या दिल्ली के नामी चैनलों में इतनी हिम्मत है कि वे बता सकें कि गुजरात के मुकाबले कितने मिनट या कितने सेकेण्ड उन्होंने कश्मीरी पंडितों के दर्द को आवाज दी है?

इंडिया में न्यूज़ सेन्स का एक बड़ा आधार है संविधान। यानि चीजें संविधान के अनुरूप न चले तो वो खबर का हिस्सा बनती है। कई संवैधानिक सवाल अनसुलझे रह गए हैं। क्या इन चैनलों में आपको धारा 374 पर बहस दिखाई देता है? बड़ी ही सफाई से ऐसे संवैधानिक सवालों को बी जे पी का सवाल बता कर मुंह मोड़ लिया जाता है। सी ए जी संवैधानिक संस्था है पर जब कांग्रेसी उसकी वीभत्स आलोचना करते तो ये पत्रकार इस खबर को एक दो बार चलाने के बाद डंप कर देते हैं।

इंडिया में काम कर रहा एक पत्रकार जब ड्यूटी पर होता है तो वो सिर्फ पत्रकार होता है। उस वक्त इस देश के लिए खुद की देशभक्ति का इजहार करना उसका काम नहीं होता है। न्यूज़ लिखते समय न तो वो इंडियन होता, न ही हिन्दू या मुसलमान। ड्यूटी के बाद घर जाकर वो देशभक्ति दिखा सकता है अगर वो इंडियन है। पर याद कीजिये जब जब पाकिस्तानी स्पोंसोर्ड आतंकी घटनाएं देश में होती है ये पत्रकार देशभक्ति दिखाने में लग जाते है। मकसद होता है बी जे पी ब्रांड देशभक्ति वाले बयान को प्री-एम्प्ट करना।

चलिए अब विस्फोटक यथार्थों से अपेक्षाकृत मुलायम लेकिन तल्ख़ सच्चाई की ओर। भ्रष्टाचार के खिलाफ हाल के समय में हुए सात्विक आंदोलनों से खार खाए पत्रकारों की कुछ चर्चा करें। पत्रकारों का धर्म होता है कि वो पीड़ितों के साथ खड़ा हो। स्टेट पावर के सामने आम लोगों का वो पक्षकार बने। जिस वक्त साल 2011 के 4 जून की रात रामदेव और उनके समर्थकों की निर्दयतापूर्वक पिटाई  हुई उस वक्त हमला झेल रहे लोग पीड़ितों की श्रेणी में थे। लेकिन अगले पंद्रह दिनों तक ये टीवी पत्रकार रामदेव पर हमलावर रहे, उन पर बहादुरी दिखाते रहे। स्टेट की शक्तियों से तीखे सवाल करने से बचते रहे, इन शक्तियों के इशारे पर लाठी चार्ज के विजुअल गायब करते रहे साथ ही आन्दोलनकारियों का मजाक उड़ाते रहे। राजबाला की दर्दनाक मौत पर इनकी चुप्पी पत्रकारिता को कठघरे में खड़ा करता रहा।

इंडिया में एक शब्द आजकल फैशन में है और ये शब्द है - अकबाल। शरद यादव इसके बड़े
पैरोकार हैं। सरकार, राजनेता, अन्ना (16 अगस्त, 2011)---सबका अकबाल देखा है देश ने। पत्रकारों का भी अकबाल होता और ये पीपल्स मैंडेट के कारण होता है। आज वही पीपुल उससे चुभने वाले सवाल कर रहा है। क्या पत्रकारिता को ये अधिकार है कि वो उसी पीपुल(आन्दोलनकारियों) का मजाक उडाए जिसकी बदौलत उसे शक्ति मिलती है।

वो कहेंगे कि चिदंबरम की एडवाइजरी का खौफ था। 14 अगस्त 2012 को रामदेव ने कहा कि यूपीए हुक्मरानों ने दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकारों को बुलाकर उनके आन्दोलन को डाउन प्ले करने के निर्देश दिए। मान लिया कि पत्रकारों के एंटी इस्टाबलिशमेंट मोड के उनके प्राकृतिक व्यवहार से बचने के बावजूद सरकार इन्हें धमकाती है। बेशक सरकारी नेता चाहते हैं कि ये पत्रकार उनके चरणों में लोटें। बावजूद इस लालसा के, सरकार इनकी हर धड़कन पर अंकुश नहीं लगा सकती। अन्ना के हाल के आन्दोलन के पहले तीन दिनों तक सरकार ने इन्हें नहीं कहा होगा कि दिन-रात भीड़ की गिनती करो। ये भी नहीं कहा होगा कि जब भीड़ जुट आए तो उसे वीक एंड करार दो। आन्दोलन वीक एंड की बदौलत नहीं चला करते इतनी समझ तो पत्रकारों को दिखानी ही चाहिए थी।

जरा याद करिए . . . देश के विभिन्न प्रांतों में किसी घटना या अहम् मसले पर सीबीआई जांच की मांग के लिए महीनों तक लोग सड़कों पर जोड़-आजमाइस करते हैं तब जाकर उस मसले पर सीबीआई जांच के आदेश दिए जाते हैं। पर गौर करें-- किसी गुमनाम व्यक्ति के एक आवेदन पर झट-पट में बालकृष्ण के खिलाफ सीबीआई जांच शुरू हो जाती है। संभव है बालकृष्ण ने कोई गलती की हो पर इन्वेस्टीगेटिव जर्नलिज्म के पैरोकार ये पत्रकार क्या देश को बता सकेंगे कि विच हंट के इस खेल का वो आवेदनकर्ता कौन है?

ये मत भूलिए कि इनमें से कई पत्रकारों को पत्रकारिता की बारीकियों की खूब समझ है। दरअसल ये सयाने हैं। बाजार और विचारधारा के बीच ताल-मेल बिठाना खूब आता है इन्हें। सोच समझ कर ही न्यूज़ सेन्स की बलि लेते हैं ये। ए बी पी न्यूज़ के बहाने एक दिलचस्प दृश्य देखें। स्टूडियो में बहस के दौरान यदि चार लोग पैनल में हैं तो उनमें कांग्रेस के प्रतिनिधि सहित तीन गेस्ट कांग्रसी मानसिकता के हो जाते हैं। चौथा गेस्ट इस असंतुलित बहस का पूरे कार्क्रम के दौरान भार ढोने को मजबूर रहता है। इस बीच कपिल सिब्बल या दिग्विजय सिंह की बाईट आ जाए तो इनके एक एंकर चहक उठते हैं। पैनल में मौजूद संजय झा नाम के शख्स का चेहरा खिल उठता है। ये शख्स प्रजातंत्र की भी बात करता है साथ ही अगले चालीस सालों तक लगातार कांग्रेसी शासन की वकालत करने लगता है। न जाने क्यों, ये चैनल दो सालों से संजय झा को हर मर्ज की दवा और इंडिया का सबसे बड़ा विद्वान साबित करने पर तुला है?

अन्ना आन्दोलन के ठहराव के बाद आशंका बनी कि उनके युवा समर्थकों की ऊर्जा किसी भी दिशा में जा सकती है। बेहतरी में यकीन रखने वाले कह सकते हैं कि मुंबई की हिंसा इस उर्जा के गलत दिशा में जाने का संकेत है। लेकिन इस एंगल पर सार्थक बहस न हुई। बेनी प्रसाद के वचन और राज ठाकरे ने इन पत्रकारों को राहत दी है। टीवी स्टूडियो फिर से गुलजार हो गए हैं अपने पसंदीदा शगल की ओर। सेक्यूलरिज्म और कम्यूनलिज्म पर बहस पटरी पर लौट आई है . . . साथ में है आरक्षण का तड़का। भारत की आत्मा पत्रकारों की इस जमात से सवाल कर रही है कि किस साल और किस तारीख को इंडिया के कांग्रेस ब्रांड सेक्यूलरिज्म की रक्षा हो जाएगी? क्या उस तारीख के बाद देश के बुनियादी समस्याओं पर गंभीरता से मंथन करेंगे वे? क्या तारीख जानने की भारत की आस पूरी होगी?

16.8.12

भारत की हार और इंडियन राजनीति की जीत -- 2

भारत की हार और इंडियन राजनीति की जीत -- 2
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संजय मिश्र
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4 जून 2011 के बहशियाना हमला झेलने के बाद रामदेव ने कहा था कि मरकर शहीद होने की सलाह को एक न एक दिन पीछे छोड़ दूंगा। 14 अगस्त 2012 को जीवित रह गए रामदेव के मुस्कराने का दिन था। एक आध दलों को छोड़ अधिकाँश गैर कांग्रेसी राजनीतिक दल काला धन के मुद्दे पर उन्हें समर्थन देते नजर आए। हाथ धो कर उनकी आलोचना करने वाले पत्रकार और टीवी स्टूडियो में बैठे विश्लेषक 13 और 14 अगस्त को जे पी आन्दोलन के दौर के गैर कांग्रेसवाद को याद करने का लोभ कर रहे थे। बेशक जे पी की शख्सियत बहुत ऊँची थी और वे खालिस राजनेता थे। ऊपर से सिक्सटीज का गैर कांग्रेसवाद 74 के आन्दोलन में अपने चरम पर था।

फिर ऐसा क्या हुआ जो लोग जे पी आन्दोलन से तुलना करने को मजबूर हुए? आज कांग्रेसी रवैये पर देश भर में प्रचंड नाराजगी व्याप्त है जिसे रामदेव अपनी तरफ मोड़ने में कामयाब हुए हैं। लिहाजा अन्ना आन्दोलन के ठहराव से मायूस हुए कई लोग रामदेव के आन्दोलन में  छाँव की तलाश कर रहे थे।  रामदेव के व्यापक समर्थक आधार को विपक्षी दलों के अलावा कांग्रेस की शरण में रहने वाले दल भी अवसर के रूप में देख रहे थे। ऐसा लगता है कि कोई अकेला गैर कांग्रेसी मोर्चा तो नहीं बन  पाए पर रामदेव के मुद्दे का समर्थन करने आए लोग विभिन्न राज्यों में चुनाव के दौरान उनसे समर्थन की आस रखे। रामदेव ने संकेत दिया है कि समर्थन करनेवाले दलों ने उन दलों के अन्दर भ्रष्ट तत्वों को ठीक करने का वायदा किया है। संभव है ये दल अत्यधिक विवादित उम्मीदवारों से परहेज कर रामदेव का समर्थन ले लें। 

अन्ना और रामदेव के आन्दोलन में तात्विक फर्क दिखता है। अन्ना के प्रयास संविधानिक इंडिया के शुद्ध देसीकरण की तरफ है। जबकि रामदेव के आन्दोलन में गांधी के देशज विचार, मालवीय की सोच, संविधान को ग्राम सभा केन्द्रित करने वाले आह्लाद, रामदेव की खुद की देसज सोच, बीजेपी के गोविन्दाचार्य ब्रांड विचार और इन तरह के तमाम आग्रह एक साथ अपनी झलक दिखाते हैं। याद करें कांग्रेस विभिन्न विचारों को आत्मसात करने की क्षमता रखती थी। अब कांग्रेस को उसी की पुरानी शैली में जबाव मिल रहा है।

यकीन करिए अंदरखाने इस पार्टी में चिंता तैर रही है। इस बीच राष्ट्रवाद की भी बात होती रही। अन्ना आन्दोलन का राष्ट्रवाद देश हित की चरम चिंता में प्रस्फुटित हुआ है जबकि रामदेव राष्ट्रवाद के विभिन्न विचारों को एक साथ ढोने की कोशिश में लगे हैं। ये संविधानिक इंडिया की राष्ट चिंता को भी बुलावा देना चाहता। यहाँ भी कांग्रेस के लिए चिंता का सबब है। जे पी के आन्दोलन की परिणति को याद करें तो सत्ता परिवर्तन तो हो गया लेकिन उनके चेले सत्तासीन होते ही खुद जे पी के विचारों को भूल गए। जातीय और धार्मिक उन्माद की राजनीति, घोटालों में संलिप्तता और इन सबके बीच अल्पसंख्यकों को रिझाने के लिए कुछ भी कर गुजरने की निर्लज कोशिश अभी तक परवान है। ऐसे दल रामदेव से समर्थन ले लेने के बाद राजनीतिक शुद्धीकरण की दिशा में कितनी दूर तक साथ निभा पाएंगे ये अंदाजा रामदेव को भी नहीं होगा। भारत के लोग ठहर कर देख लेना चाहते हैं।






14.8.12

भारत की हार और इंडियन राजनीति की जीत-- 1

भारत की हार और इंडियन राजनीति की जीत -- 1
संजय मिश्र -- 07 अगस्त
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अन्ना आंदोलन नेपथ्य में जा चुका है।  राजनीतिक वर्ग का बड़ा तबका कुटिल मुस्कान बिखेड़ने में मगन है। आम जन कुछ खोजते से नजर आ रहे हैं। उनका संबल कितना टूटा कहा नहीं जा सकता। मीडिया ये चीत्कार सुनता पर डेढ़ साल से सरकारी आकाओं की खुशामद में लगे दिल्ली के अधिकाँश पत्रकार चारण भाट की तरह अपने इस अनुभव का विस्तार करते आंदोलनी नेताओं के विच हंट में रमा है। जन-चेतना के ऐतिहासिक उभार से उबर चुके नेताओं ने जता दिया है कि सिविल सोसाइटी की मौजूदगी उसे बर्दाश्त नहीं। इंडिया में यकीन रखने वाला ये राजनीतिक जमात इतना भर चाहता कि सोसाइटी से जुड़े लोग नरेगा और इसी तरह की योजनाओं को चमत्कारिक बताता फिरे और भूल से भी ग्रीन-पीस जैसा दबाव समूह बनने की हिमाकत ना करे। ये भी तय हो गया है कि सत्ता की उद्दंडता और मीडिया के बीच गठ-जोड़ अभी चलेगा।

उस दिन यानि 3 अगस्त ... जब अन्ना के मंच से आन्दोलन समाप्त करने की घोषणा हुई तो रंग-बिरंगी पोशाक में डटे लोग जंतर-मंतर के यंत्रों की तजबीज करना चाह रहे थे कि कहीं धूप और छाया का अनुपात तो नहीं गड़बड़ाया। ? निराशा और विषाद के बीच पैरों की चहलकदमी कबूल कर रहे थे कि भारत की उम्मीद एक  बार फिर पश्त हुई है। सपने संजोए आँखों को पेड़ों की झुरमुट के बीच से दूर खड़े सत्ता  केन्द्रों के विशाल खम्भे अट्टहास करते नजर आ रहे थे। मनो प्रजा पर जीत हासिल कर तंत्र खिलखिला रही हो। तंत्र की तरफ से सन्देश आने की उम्मीद ख़त्म हो गई थी।

टीवी स्टूडियो गुलजार हैं उन लोगों से जो अन्ना आन्दोलन की खामियां उजागर करने में लगे हैं। उन्हें अहसास है कि साल 2011 के 16 अगस्त के जन-सैलाब की याद भर से कांपने वाले नेता फिर से रुतबे में आए हैं। लिहाजा अन्ना आन्दोलन को कमतर बताने के लिए जे पी आन्दोलन को याद किया जा रहा है। इस आलेख में परिपाटी के विपरीत कुछ लोगों के नाम लिए जा रहे हैं ... मकसद उनके बहाने चीजों को सिर्फ स्पष्ट करना है।

मसलन उर्मिलेश नाम के पत्रकार जे पी मूवमेंट और प्रजातंत्र को अमृत वचन की तरह पेश करते। बेशक जे पी लोकतंत्र वापसी करवाने में सफल रहे और देश उनका शुक्रगुजार रहेगा। लेकिन उर्मिलेश आज की पीढी को ये नहीं बताते कि 74 के आन्दोलन में जे पी ने सेना को उकसाते हुए दिल्ली का तख्ता पलट देने के लिए कहा था। उसी आन्दोलन के दौरान देश में कुछ जगहों पर उनके समर्थकों द्वारा हिंसक वारदातों को अंजाम दिया गया। उर्मिलेश ये बताना क्यों भूलते कि जे पी आन्दोलनकारियों ने देश के कुछ हिस्सों में जगह-जगह मकानों की दीवारें इंदिरा गांधी के संबंध में गंदी गालियों से पाट दी थी। बेशक प्रशासन के लोगों ने उसे मिटाया था। चौक-चौराहों पर इंदिरा सहित वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के सांकेतिक श्राद्ध कर्म किये गए।

अन्ना आन्दोलन के लोगों ने अभी तक इस दर्जे की नीचता नहीं दिखाई है। बल्कि जन-चेतना के नैतिक पक्ष का अवतार आजादी के बाद अन्ना के ही लोगों ने विराट रूप में पहली बार दिखाया। दग्ध नेताओं की ओर से साम, दाम, दंड, और भेद की तमाम कोशिशें आजमाई गई बावजूद इसके नई पीढी में प्रेरणा जगाने में आन्दोलनकारी लगे रहे। उर्मिलेश को मलाल है कि अन्ना आन्दोलन ने दम तोड़ा। संभव है उन्हें अपने आन्दोलन की याद हो आई हो। पटना में उनके द्वारा पत्रकारों के लिए किया गया आन्दोलन इस मायने में असफल रहा कि नव भारत टाइम्स का पटना संस्करण बंद कर दिया गया। इस संस्करण के तमाम पत्रकार सड़कों पर आ गए।

कहा जा रहा है कि अन्ना के लोग भारत में यूरोप की तर्ज पर एक दबाव समूह के तौर पर बने रहेंगे। इसका अंदाजा  अनशन को समाप्त करवाने में लगे लोगों की फेहरिस्त देख कर लगाया जा सकता है।  कुलदीप नैयर जैसे लोग भी थे इसमें। वे लाल बहादुर शास्त्री की मौत पर सवाल उठा सकते पर इसी मुद्दे पर कांग्रेस से सवाल करने से बचते हैं। अन्ना टीम के लोगों की अनशन करने की रणनीतिक भूल इस फेहरिस्त में शामिल विभिन्न विचारधाराओं और सरकार से पंगा नहीं लेने वाले ऐसे नामी-गिरामी लोगों के लिए सुनहरा मौका बनकर आया। केजरीवाल जैसों को समझा-बुझा कर सत्ता की राजनीति करने वालों की राह आसान कर दी गई। अनशन पर सिर्फ अन्ना होते तो दृश्य कुछ दूसरा होता।

ये अकारण नहीं है कि जे एन यू के वामपंथी शिक्षक भी अपने मार्क्सवादी छात्रों के इस आन्दोलन में शामिल रहने की बात कबूलने लगे हैं। पिछले साल अप्रैल में भी इन्होने ये बात स्वीकारी थी। लेकिन बीच के डेढ़ साल में जब कांग्रेस की तरफ से इसे आर एस एस प्रायोजित आन्दोलन करार दिया जा रहा था तो ये वामपंथी चुप रहे ... बल्कि कांग्रेस की मुहिम को शह देते रहे। यही रवैया समाजवाद के नाम पर राजनीति करने वाले रिजनल क्षत्रपों का रहा जो विभिन्न घोटालों की जद  में रहे हैं। इन नेताओं ने राहत की सांस ली है कि बेहतर लोकपाल अब दूर की कौड़ी है।

बावजूद इसके लोकपाल के लिए यश लेने की होड़ में तमाम पार्टियां कलाबाजी दिखाएंगे। इतना तो तय है कि अन्ना के साथ युवा वर्ग की जो केमिस्ट्री बनी उन युवाओं को कांग्रेस अपने पाले में लाना चाहेगी। राहुल गांधी जो कि अन्ना के कारण युवाओं के लिए तरस गए थे अब अपना सूखा मिटाने की कोशिश करेंगे। लोकपाल पर हलचल दिखा कर कांग्रेस इस मकसद को साकार करना चाहेगी। उधर अन्ना के लोगों की हताशा को भुनाने की कोशिश बीजेपी की ओर से होगी। इन दलों को अहसास है कि ये वर्ग किसी भी तरफ सरक सकता है। अन्ना आन्दोलन के ठहराव की इस से बेहतर टाइमिंग की लालसा बीजेपी ने नहीं की होगी। लोकसभा चुनाव तक के लिए उसे फोकस में रहने का वक्त मिल जाएगा। कांग्रेस के इशारे पर चली मीडिया की उस मुहिम का अंत भी होगा जिसके तहत विपक्ष की स्पेस अन्ना द्वारा ले लेने का लगातार प्रचार किया गया।

अब टीवी मीडिया में इन्डियन राजनीति के तिलिस्म दिखलाए जाएंगे। कांग्रेस ब्रांड सेक्युलरिज्म - कम्युनलिज्म पर गरमागरम बहस होगी, कांग्रेस की तानाशाही मानसिकता को एरोगेंस कह कर छुपाया जाएगा। जातीय राजनीति करने वालों के लिए आरक्षण के मुद्दे उठाए जाएँगे। तिस पर लोकतंत्र की दुहाई दी जाएगी। प्रगतिशीलता दिखाने के लिए खाप पंचायतों से इनपुट मिल ही जाएगा। विदर्भ के किसान आत्महत्या करेंगे तो शाहरुख़ खान को दस-दस दिनों तक दिखा देंगे ... देस में भूख से मौत होगी तो मोहाली वन डे को सात दिनों तक थोप दिया जाएगा। एन के सिंह अन्ना टीम से पत्रकारों के लिए माफी मंगवा लेंगे पर मुंबई की हिंसा के शिकार पत्रकारों के लिए चुपी साध लेंगे। राजदीप के असम दंगों पर उस खतरनाक बयान की चर्चा नहीं चलाएंगे। अगले चुनाव तक भारत की चीत्कार पर इनकी तरफ से विमर्श अब भूल जाएं।

17.7.12

सितंबर तक बंद हो जाएँगे बिहार के सभी बाल वर्ग केंद्र

सितंबर तक बंद हो जाएँगे बिहार के सभी बाल वर्ग केंद्र

संजय मिश्र

बिहार शिक्षा परियोजना की ओर से संचालित राज्य के सभी बाल वर्ग केंद्र सितंबर तक बंद कर दिए जाएँगे। राज्य सरकार के कर्ता -धर्ताओं ने परियोजना को इस मुतल्लिक संकेत दे दिए हैं। बिहार शिक्षा परियोजना ( सर्व शिक्षा अभियान ) के वरीय अधिकारियों ने भी अपने तरीके से निशाने पर आए कर्मियों तक सन्देश भिजवा दिया है। यानि इन केन्द्रों से जुड़े साढ़े पांच हजार महिला कर्मियों की नौकरी पर तलवार लटक गई है। भारतीय मजदूर संघ ने सरकार के इस कदम का कड़ा प्रतिवाद करने की ठानी है।

संघ की अनुषांगिक इकाई बाल वर्ग दीदी एवं सुपर-वाईजर संघ ने 23 जुलाई को पटना के आर-ब्लाक चौराहा पर जोरदार प्रदर्शन की तैयारी पूरी कर ली है। सुपर-वाईजर संघ की राज्य संयोजिका मंजू चौधरी का कहना है कि एक तरफ शिक्षा का अधिकार कानून में पूर्व बालपन शिक्षा पर जोर दिया गया है जबकि दूसरी तरफ चल रहे इस तरह के केंद्र बंद करने की केंद्र की साजिश के आगे राज्य सरकार झुक रही है। बाल वर्ग दीदी संघ की राज्य संयोजिका इंदु कुमारी ने हैरानी जताते हुए कहा कि एक दशक से भी ज्यादा समय से काम कर रही 5320 बाल वर्ग दीदी के पेट पर लात मारा जा रहा है वहीं महिलाओं की आवाज बुलंद करने वाली राज्य सरकार चुप्पी साधे हुए है।

भारतीय मजदूर संघ के प्रदेश महामंत्री धीरेन्द्र प्रसाद सिंह ने इन ख़बरों की पुष्टि करते हुए कहा कि परियोजना के अधिकारियों ने उनसे इस संबंध में संपर्क साधा था। संघ नेता ने साफ़ किया कि बाल वर्ग दीदी को शिक्षिका का दर्जा दिलाने के लिए वे आंदोलनरत रहेंगे। दरअसल सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक पुर्व बालपन शिक्षा के जिला समन्वयकों को राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी संजीव कुमार के साथ 26 जून को पटना में हुई बैठक में ही कह दिया गया कि सितंबर तक बाल वर्ग केन्द्रों को बोरिया-बिस्तर समेटना होगा।

सूत्रों की मानें तो केंद्र सरकार आंगनबाडी केन्द्रों को ज्यादा तवज्जो देना चाहता है साथ ही बाल वर्ग केन्द्रों के लिए प्रति जिला 35 लाख के सालाना बजट की बचत करना चाहता है। आपको बता दें कि बाल वर्ग केन्द्रों के लिए केंद्र 65 फीसदी हिस्सा वहन करता है जबकि राज्य सरकार बाकि के 35 फीसदी खर्च को वहन करती है। दिलचस्प है कि इसी साल अप्रैल में बाल वर्ग दीदी के मानदेय एक हजार से बढ़ा कर तीन हजार किये गए वहीं सुपर-वाइजरों का मानदेय डेढ़ हजार से बढ़ा कर साढ़े तीन हजार किया गया। सूत्र ये भी बताते हैं कि पुर्व बालपन शिक्षा के तहत दो अन्य कार्यक्रम महादलित उत्थान केंद्र और तालीमी मरकज केंद्र चलते रहेंगे।

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13.7.12

द लास्ट मुग़ल . . .

द लास्ट मुगल्स  . . .

संजय मिश्र

'द लास्ट मुग़ल' के लेखक विलियम डलरिंपल ने जब कहा कि भारतीय इतिहासकार एक दूसरे के लिए लिखते हैं तो विवाद खड़ा हो गया। लगे हाथ उन्होंने ये आरोप भी जड़ दिया कि इनके लेखन में जन-मानस के इतिहास बोध की घोर उपेक्षा की गई  है। 1857 की लड़ाई के संदर्भ में जनता की इस समझ में अटूट आस्था रखने वाले डलरिंपल निराश हुए होते अगर वे मुगलों के वारिश की खोज में दरभंगा आते। चौंकिए नहीं ! मुगलों के अंतिम वारिश 29 साल तक दरभंगा में रहे और यहीं इस परिवार के सदस्यों का इंतकाल हुआ। इनके मजार पर लोगो का जाना तो दूर की बात, पास के  मस्जिद के नमाजी भी इस धरोहर से अनजान हैं।

साल 1881 की ही बात है जब बहादुरशाह के पोते जुबैरुद्दीन गुड-गाणी दरभंगा आए ... और फिर यहीं के होकर रह गए। असल में 1857 की क्रान्ति से आजिज़ आ चुके अँगरेज़ बहादुरशाह के परिजनों के खून प्यासे हो गए थे। ऐसे में दरभंगा के महराज लक्ष्मीश्वर सिंह ने न सिर्फ उन्हें शरण दी बल्कि उनकी सुरक्षा का पूरा जिम्मा उठाया।  ' आतिश -ए - पिन्हाँ ' के लेखक मुश्ताक अहमद की माने तो महराज का - हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स - में काफी असर था। जान की सुरक्षा से निश्चिन्त हो जुबैरुद्दीन ने जीवन के बाकि के साल किताबें लिखते हुए बिताई।

दरभंगा में रहकर उन्होंने तीन किताबें लिखी। उनकी लिखी ' चमनिस्तान - ए - सुखन ' कविता संग्रह है जबकि ' मशनबी दुर -ए - सहसबार '  महाकाव्य है। जुबैरुद्दीन की तीसरी रचना ' मौज - ए - सुलतानी ' है। इसमें देश की विभिन्न रियासतों की शासन  व्यवस्था का जिक्र है। खास बात ये है कि महाकाव्य ' मशनबी दुर -ए - सहसबार ' में राज दरभंगा और मिथिला की संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को तफसील से बताया गया है।

राज परिवार की अंतिम महारानी के द्वारा संचालित कल्याणी फाउंडेशन की ओर से ''मौज -ए -सुलतानी ' को प्रकाशित कराया गया है। कल्याणी फाउंडेशन के लाएब्रेरियन पारस के मुताबिक़ मौज ए  सुल्तानी की मूल प्रतियों में से एक राज परिवार के पास है। मुश्ताक अहमद भी इसकी तसदीक करते हैं। उनके अनुसार ये प्रति कुमार शुभेश्वर सिंह की लाएब्रेरी में उन्होंने देखी थी। वे दावा करते है कि इस प्रति में जुबैरुद्दीन का मूल हस्ताक्षर भी है।

विलियम डलरिम्पल अपनी  किताब में दारा बखत की बार - बार चर्चा करते हैं जबकि जुबैरुद्दीन पर वे मौन हैं। उधर लाला श्रीराम अपनी किताब 'खुम - खान ए - जाबेद ' में बहादुरशाह की वंशावली का जिक्र करते हैं। इस किताब में दावा किया गया है कि जुबैरुद्दीन ही बहादुरशाह के वारिश थे। असल में बहादुरशाह के सबसे बड़े बेटे दारा बख्त 1857 के विद्रोह से पहले ही मर गए थे। लेकिन सिपाही विद्रोह के बाद सब कुछ बदल गया। बहादुरशाह के पांच बेटों को अंग्रेजों ने दिल्ली के खूनी दरवाजे के निकट बेरहमी से मार दिया।

इस मारकाट से बहादुरशाह का एक और पुत्र रईस खान  बच निकला और कलकत्ता के मटिया बुर्ज़ इलाके में पनाह ली। कलकत्ता में ही 1861 में रईस की मौत हो गई। साल 1858 में जुबैरुद्दीन किसी तरह दिल्ली से भागने  में सफल रहा और वाराणसी में सालो तक छुपा रहा। वाराणसी  में ही उसकी मुलाकात दरभंगा के महराज से हुई। महाराज ने उन्हें दरभंगा आने का न्योता दे दिया। घुमते-भटकते अगले साल जुबैरुद्दीन दरभंगा पहुँच गए।

लक्ष्मीश्वर सिंह ने काजी मुहल्ला में उनके लिए घर बनवा दिया। काजी मोहल्ला ही आज का कटहल वाड़ी है।  जुबैर के लिए मस्जिद भी बना दी गई। लेकिन बदकिस्मती ने उनका साथ नहीं छोड़ा। जुबैरुद्दीन के दो बेटों की मौत हैजा से हो गई। ये साल 1902 की बात है। इसी साल ग़मगीन उनकी पत्नी भी दुनिया छोड़ गई। जुबैरुद्दीन का इंतकाल 1910 में हुआ। उनका अंतिम संस्कार दिग्घी लेक के किनारे किया गया। राज परिवार की तरफ से 1914 में उस जगह पर एक मजार बनबाया गया।

रेड सैंड स्टोन से बना ये मजार जर्जर हालत में है। दीवार में लगे खूबसूरत झरोखे कई जगह से टूट गए हैं। मजार के अन्दर कंटीले घास उग आए हैं। इसके अन्दर जाने वाली सीढ़ी खस्ताहाल है। दरवाजे पर बना आर्क भी दरकने लगा है। मजार के केयरटेकर उस्मान को इस बात का अंदाजा नहीं है कि ये मजार मुगलों के अंतिम वारिश की है। ... अगली वार विलियम डलरिंपल भारत आएं तो दरभंगा के संस्कृति प्रेम पर अट्टहास करते इस मजार को जरूर देखें।

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