life is celebration

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15.4.10

पलायन का सच --- भाग ४

-------------संजय मिश्र -------------
ये उस समय की बात है जब " कालाहांडी " की मानवीय विपदा ने दुनिया भर में चिंतनशील मानस को झकझोर दिया। इस त्रासदी को "कवर " करने गए पत्रकार याद कर सकते हैं उन लम्हों को जब संवेदनशील लोगों का वहाँ जाना मक्का जाने के समान था। कुर्सी पर बैठे लोग भी तब हरकत में आये थे। वहाँ एक स्त्री इसलिए बेच दी गई थी ताकि उन पैसों से अपनों का पेट भरा जाता। उड़ीसा में भूख मिटा नहीं पाने की बेबसी आज भी है। हार कर लोगों ने पलायन का रूख किया है। पलायन करनेवालों में आदिवासियों की संख्या अधिक है। कई आदिवासी महिलाएं ब्याह के नाम पर हरियाणा में बेच दी जाती हैं। उड़ीसा की ही सीमा से लगे छतीसगढ़ की एक आदिवासी महिला को पिछले साल इसी तरीके से बेचा गया। मामले ने इतना तूल पकड़ा कि छतीसगढ़ सरकार को हस्तक्षेप करना पडा।
बिहार के कई पत्रकार भी उस दौर में कालाहांडी हो आए थे। वे हैरान हैं कि बिहार से होने वाले पलायन पर राज्य के हुक्म रानो का दिल क्यों नहीं पसीजता ? कुछ महीने पहले लुधियाना में हुई पुलिस फायरिंग में कई बिहारी मजदूर मारे गए। कहीं कोई हलचल नहीं ....... सब कुछ रूटीन सा। मरनेवालों के परिजन यहाँ बिलखते रहे...नेताओं के बयान आते रहे। इन मजदूरों को पता है कि उनकी पीड़ा से राज-काज वाले बिदकते हैं। यही कारण है कि इनकी प्राथमिकता अपनी काया को ज़िंदा रखने की है ... चाहे कहीं भी जाकर कमाना पड़े। पेट की आग के सामने सामाजिक दुराग्रह- पूर्वाग्रह टूटते गए हैं।
पलायन पहिले भी होता था। मोरंग, धरान, और ढाका जैसी जगहों पर इनके जाने का वर्णन आपको मिल जाएगा। शुरूआती खेप में उन लोगों ने बाहर का रास्ता पकड़ा जो स्वावलंबी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में छोटे और मझोले किसानों के मजदूर थे। इन्हें हम इतिहास में बंधुआ मजदूर कहते हैं। ये खेती-बाडी में किसान के सहयोग में दत्त-चित रहते। इनकी स्त्रियाँ किसान के घरों की महिलाओं की सहायता करती। बदले में किसान अपनी जमीन पर ही इन्हें घर बना देते और इनके गुजर-बसर की चिंता करते। इन मजदूरों को दूसरे किसान के खेत में काम करने की इजाजत नहीं होती। मुक्ति की कामना , सांस लेने लायक आर्थिक साधन जुटाने, अकाल, रौदी, और बाढ़ जैसी मुसीबतों के चलते वे गाँव त्यागने को मजबूर होते। बिहार के साहित्यिक स्रोतों में " कल्लर खाना " और " खैरात " जैसे शब्द इन कारणों पर बहुत कुछ बता जाते हैं।
बाद के समय में भूमिहीन खेतिहर मजदूर भी इनके साथ हो लिए। इनके साथ समस्या हुई कि किसानी से होने वाली आमदनी साल भर का सरंजाम जुटाने में नाकाफी होती। कष्ट के समय में बंधुआ मजदूरों को अपने किसान से जो आस रहती वो भूमिहीन मजदूरों को नसीब नहीं । आजादी के बाद योजनाबद्ध विकास की हवा बही। इसमें गाँव को आर्थिक इकाई के रूप में देखने पर कोई विचार नहीं हुआ। नतीजतन स्वावलंबी ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमराने लगी। जातिगत पेशों से जुड़े लोगों पर इसका मारक असर हुआ। हर परिवार के कुछ सदस्य परदेस जाने लगे। प्राकृतिक मार से भी जिन्दगी तबाह हुई.... गृहस्थी चलानी मुश्किल। इस दौर में ब्राह्मण भी बाहर जाने लगे। पुरनियां ( पुर्णियां ) , कलकत्ता, और असम के चाय बागानों में इनकी उपस्थिति दर्ज हुई। फूल बेचने , पंडिताई करने, भनसिया ( खाना बनाने का काम ) बनने से ले कर हर तरह के अनस्किल्ड काम वे करने लगे ।
कलकत्ता, ढाका और असम जैसी जगहों पर इन्होने आधुनिक आर्थिक गतिविधियों के गुर सीखे। इसके अलावा एक वर्ग बाल मजदूरों का उभरा जो भदोही के कालीन उद्योग में भेजे जाने लगे। समय के साथ इस फेहरिस्त में कई जाति के बच्चे शामिल हो गए। वे अपने परिवार की दरिद्रता मिटाने में संबल बने।
बिहार की सत्ता में लालू का आधिपत्य यहाँ के जन-जीवन में अनेक तरह के बदलाव लेकर आया। इसी दौर ने पलायन की पराकाष्ठा देखी। आम-जन से संवाद की देसज शैली के कारण लालू राजनीति में नए तेवर कायम करने में सफल हुए। लीक से हट कर सोसल इंजीनियरिंग को आजमाया। पिछड़ों के उभार में जबरदस्त कामयाबी मिली....और उनका डंका बजने लगा। लेकिन स्पष्ट ध्रुवीकरण ने गाँवों में सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया। बटाईदारों को बटाई वाली जमीन दे देने की सरकारी प्रतिबद्धता से किसान भयभीत हुए। नतीजतन अधिकतर किसानो ने बटाई वापस ले ली। खेत " परती " जमीन में तब्दील होते गए। किसानी चौपट हो गई। आखिरकार बटाई से विमुख हुए खेतिहर मजदूर पलायन को बाध्य हुए। खेती के अभाव में किसानो की माली हालत खराब होती गई। कुछ साल संकोच में बीता । बाद में वे भी पलायन करने लगे।

लालू युग " किसान के मजदूर " बन जाने की गाथा ही नहीं कहता ....इसी समय ने " विकास नहीं करेंगे " की ठसक भी देखी। सरकारी उदासीनता के कारण एक-एक कर चीनी, जूट, और कागज़ की मिलें बंद होती गई। कामगार विकल हुए। ये उद्योग नकदी फसलों पर टिके थे । लिहाजा किसानो ने इन फसलों से मुंह फेर लिया। समय के साथ उद्योगों से जुड़े कामगारों और किसानों की अच्छी खासी तादात दिल्ली .... बम्बई जाने वालों की टोली में शामिल हो गई। निम्न मध्य वर्ग के अप्रत्याशित पलायन ने गाँव की उमंग छीन ली है। वहां बच्चे, बूढ़े, और महिलाएं तो हैं लेकिन खेत काबिल हाथों के लिए तरस रहा है।
पहले तीन फसल आसानी से हो जाता था । अब दुनिया दारी एक फसल पर आश्रित है। पलायन करने वालों ने भी सुना है कि बिहार का विकास हुआ है...और ये कि अगले पांच सालों में ये विकसित राज्य बन जाएगा। वे बस ...बिहुंस उठते हैं। वे जानते हैं कि पिछले दो विधान सभा चुनावों की तरह इस बार भी चुनाव के समय उनसे गाँव लौट आने की आरजू की जाएगी। अभी तक ये आरजू अनसूनी की गई हैं । पलायन करने वालों को नेताओं का अनुदार चेहरा याद है। उजड़ने का दुःख ....संभलने की चुनौती ...और ठौर जमाने की जद्दोजहद को वे कहाँ भूलना चाहते ।
------------------जारी है................

3.4.10

पलायन पर दुविधा ----- भाग ३

........... संजय मिश्र ..........


उत्तर - प्रदेश की पूर्वी सीमा से लगा एक रेलवे स्टेशन है - सुरेमनपुर । एक तरफ बिहार का प्रमुख शहर छपरा तो दूसरी ओर यू पी का बलिया । संपूर्ण क्रान्ति के अगुवा जेपी और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के इलाकों के बीच बसा है सुरेमनपुर । दिल्ली से बनारस होते हुए किसी सुपर-फास्ट ट्रेन से जब आप बिहार जाएं तो ग्रामीण आवरण समेटे इस स्टेशन पर ट्रेन का ठहराव आपको हैरान करेगा । बिना विस्मय में डाले आपको बता दें कि इस छोटे से स्टेशन पर दिल्ली के लिए टिकट की बिक्री छपरा से ज्यादा होती है। इसी आधार पर सुपर फास्ट ट्रेनों का ठहराव यहाँ दिया गया।


स्थानीय यात्री बिना लाग- लपेट आपको बताएंगे कि इस क्षेत्र से बड़ी संख्या में पलायन होता है। इनकी बातें ख़त्म होंगी भी नहीं कि सरयू नदी आपको यूपी की सीमा से विदा कर रही होगी। कुछ ही देर में आप छपरा में होंगे..... जी हाँ पलायन करने वालों का एक प्रमुख जिला । आपको याद हो आएगा ..... वो पुराना छपरा जिला जिसके सपूत बिहार के नीति- नियंता बनते रहे हैं। इन्होने राज्य की "डेस्टिनी " तो जरूर निर्धारित की लेकिन बिहार की निज समस्याओं से कन्नी काटते रहने का दुराग्रह भी दर्शाया। छपरा से निकलें तो पांच- सात घंटे के बाद ट्रेन आपको दरभंगा स्टेशन पर उतार चुकी होगी ..... एक बड़ा सा स्टेशन....अपेक्षाकृत बेहतर फेसलिफ्ट लिए एक नंबर प्लेटफार्म ..... काफी स्पेसियस । जिस रूट से आपकी ट्रेन आई है .... यकीनन आप बीच रात में पहुंचे होंगे। आपका सामना होगा एक नंबर प्लेटफार्म के फर्श पर लेटे हुए हजारों " लोगों " से। इन्हें इन्तजार है सुबह का ...जब वे अपने " गाम " की बस धरेंगे। व्यग्रता के बीच कमा कर लौटने का संतोष। पलायन....संघर्ष....रूदन...सब पर भारी पड़ती बेसब्री की धमक।


लेकिन " रूदन " से बेपरवाह यहाँ के रेल अधिकारी खुश हैं कि समस्तीपुर रेल मंडल में सबसे अधिक टिकट की बिक्री दरभंगा स्टेशन में ही होती है। इसी को आधार बना कर स्टेशन के विकास के लिए " फंड " की मांग भी की जाती है। टिकट काउंटरों पर यात्रियों की भीड़ को नियंत्रित करने क लिए नियमित पुलिस बंदोबस्त देखना हो तो यहाँ चले आइये ।
कमोबेश ऐसे दृश्य मुजफ्फरपुर, सहरसा, पटना और राजेंद्रनगर स्टेशनों पर आम हैं। ये दृश्य बिहार के हुक्मरानों , पत्रकारों, और अन्य सरोकारी लोगों को विचलित नहीं करते।
पलायन को समस्या मानने वालों के बीच अनेक धाराएं मौजूद हैं। मोटे तौर पर बिहार में तीन तरह का विमर्श दिखेगा। इसके अलावा दिल्ली में बैठे सुधीजन की समझ अलग ही सोच बनाती है। पहली धारा पलायन से जुडी निर्मम परिस्थितियों का आकलन करती है जो असीम दुखों का कारण बनती। ये असहाय लोगों के अथाह गम को रेखांकित करता है...साथ ही पलायन के कारण घर-परिवार और समाज की समस्त अभिव्यक्ति पर पड़ने वाले असर पर भी नजर डालता। इस मौलिक विमर्श ने जो चिंता जताई वो पलायन के दूरगामी नतीजों पर हाहाकार है। इस धारा का मानना है कि बिहार के कर्मठ हाथ दुसरे प्रदेशों की समृधि बढ़ा रहे। इनके अभाव में...फिर अपने प्रदेश का क्या होगा? इनका आग्रह है की पलायन को किसी भी तरह रोका जाना चाहिए। इस धारा के अध्येताओं में अरविन्द मोहन प्रमुख नाम हैं।
दूसरी धारा के प्रणेताओं में अग्रणी हैं हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत । इनके विश्लेषण में संदर्भित बदलाव देखा जा सकता है पर मूल स्वर अभी भी वही है। इस धारा का मर्म लालू युग के दौरान परवान चढ़ा। पलायन को समस्या तो माना गया लेकिन इस शब्द से इस धारा के लोगों का " असहज " होना जगजाहिर है। इनकी नजर में पिछड़ावाद का अलख जगाने वाले लालू को पलायन के " विकराल " रूप का आइना नहीं दिखाया जाना चाहिए। वे मानते रहे हैं कि लालू का वंचितों को जगाना पुनीत काम था लिहाजा पलायन के कारण किसानी चौपट होने और लालू राज में " अविकास " के सरकारी क़दमों को " माइनर एबेरेशन " माना जाना चाहिए। इस धारा के घनघोर समर्थक आपको याद दिलाएंगे कि पलायन तो पहले से होता आया है। श्रीकांत जोर देते हैं कि पलायन करने वालों में कुशलता बढी है।
बेशक उनकी कुशलता में निखार आया है। जो अनस्किल्ड थे वो स्किल्ड हुए। पर इसका फायदा किसे मिल रहा? योजना आयोग ने कुछ समय पहले बिहार टास्क फ़ोर्स का गठन किया। इसके सदस्यों ने जो रिपोर्ट सौंपी उसके मुताबिक़ बिहार में रह रहे " कमासूत " लोगों की कुशलता बढाए बिना राज्य का अपेक्षित विकास संभव नहीं। पलायन करने वाले इस मोर्चे पर वरदान साबित हो सकते हैं। पर उन्हें रोकेगा कौन ? निश्चय ही नीतीश और उनके सिपहसालारों को " पलायन " शब्द अरूचिकर लगता है। नीतीश ने सत्ता संभालते ही घोषणा की थी कि तीन महीने के भीतर पलायन रोक दिया जाएगा। ऐसा हुआ नहीं....घोषणा के पांचवें साल तक भी नहीं। नीतीश के कुनबे को डर सताता रहता है कि कोई इस घोषणा की याद न दिला दे।
ये तीसरी धारा के पैरोकार हैं जो मानते हैं कि पलायन पर अंकुश लगा है। इनका आवेस है की राज्य के सकारात्मक छवि निर्माण की राह में पलायन की सच्चाई " बाधक " न बने। राज्य के ग्रोथ रेट पर वे बाबले हुए जा रहे हैं। ग्रोथ की ये बयार आखिरकार पलायन पर समग्र लगाम कसने वाला साबित होगा... ऐसा भरोसा वे दिलाएंगे। वे बताएंगे कि सामाजिक न्याय के साथ विकास ज्यादा अहम् है इसलिए पलायन जैसी समस्याओं पर चिंता करने की जरूरत नहीं। नीतीश के रूतबे में आंच न आ जाए .... इसलिए ये खेमा मीडिया को छवि निर्माण के लिए राज्य का " पी आर " बन्ने की नसीहत भी दे रहा। पटना की हिन्दी मीडिया का बड़ा वर्ग इस " रोल " से आह्लादित भी है।
..............जारी है .......

27.3.10

पलायन का अर्थशास्त्र -----भाग-2

--------संजय मिश्र ---------
बिहार की फिजा इन दिनों बदली-बदली सी है। ड्राइंग रूम से लेकर चौक - चौराहों तक ' ग्रोथ रेट ' की चर्चा हो रही है। मन पर छाए ग्रोथ रूपी ' ओवर टोन ' के मुत्तलिक सबके अपने अपने दावे हैं.... तर्क और वितर्क में उलझे हुए। और इन सबके बीच ' मनी ऑर्डर इकोनोमी ' की मौजूदगी कहीं गुम हो गई है .....जी हाँ वही ' मनी आर्डर इकोनोमी ' जो ' जंगल राज ' के आरोपों के दौर में बिहार का संबल बनी। ' वाइल्ड इस्ट फेनोमेना ' का प्रतिफल थी ये। इस तरह की इकोनोमी का संबंध असहज परिस्थितियों में पलायन करने वालों के हार - तोड़ मेहनत से उपजी गाढी कमाई से है जो राज्य की अर्थव्यवस्था को संभालती रही।
क्या ' मनी आर्डर इकोनोमी ' आज भी बिहार की गतिशीलता का आधार है ? बिहार के पोस्ट-मास्टर जनरल आफिस के अधिकारियों से इस संबंध में बात हुई तो उन्होंने राज्य में आने वाले मनी आर्डर की संख्या में पिछले दस साल में दस फीसदी से अधिक कमी की और इशारा किया। उधर दरभंगा में पोस्टल डिपार्टमेंट के अधिकारियों ने जो आंकड़े दिए उसके मुताबिक़ जिले में आने वाले मनी आर्डर की संख्या में इस दौरान ११ से १२ फीसदी के बीच गिराबट दर्ज हुई। ये आंकड़े साल २००१ से २००९ तक के हैं। साल २००२ के आंकड़े को छोड़ दें तो साल दर साल की गिरावट एक ' पैटर्न ' बनाती है। ख़ास बात ये है की इस अवधि के दौरान राज्य में राबडी देवी और नीतीश कुमार की सरकारें रही हैं।
क्या इस गिरावट का संबंध पलायन में लगे किसी प्रकार के ब्रेक से है ? पोस्टल अधिकारियों ने हालांकि मनी आर्डर की संख्या में कमी के अलग ही कारण बताए। इनकी माने तो राज्य में बैंकिंग सेवा के बढ़ने के कारण ये ' ट्रेंड ' दिख रहा है। आनलाइन बैंकिंग ने मनी आर्डर सेवा पर असर डाला है ....ऐसा उनका मानना है। इसके अलावा मनी आर्डर के जरिये अधिकतम ५००० रूपये भेजने की सीमा को भी वे इसकी वजह बताते हैं।
अब सवाल उठता है की क्या बिहार में बैंकिंग सेवा का अपेक्षित और एकसमान विस्तार हुआ है ? जिन इलाकों से बड़ी संख्या में पलायन हो रहे हैं उस पर निगाह डालें। दरभंगा जिले के बिरौल , घनश्यामपुर , किरतपुर, कुशेश्वरस्थान , मधुबनी जिले के झंझारपुर और बेनीपट्टी , सीतामढी और शिवहर जिलों के बाढ़ग्रस्त इलाके , मुजफ्फरपुर के पूर्वी- दक्षिणी क्षेत्र , समस्तीपुर का हसनपुर इलाका , खगड़िया जिले के सालो भर जलजमाव झेलने वाले अधिकाँश इलाके , सहरसा और सुपौल जिले के पश्चिमी क्षेत्र , कोसी के पूर्वी और पश्चिमी तटबंध के बीच का विस्तृत भाग .... बैंकिंग सेवा के मामले में हतोत्साहित करने वाला परिदृश्य पेश करता है।
इस बीच फरवरी महीने में ही रिजर्व बैंक की केंद्रीय बोर्ड की पटना में बैठक हुई। बैठक में हिस्सा लेते हुए रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बा राव ने बिहार के सभी ब्लाकों में बैंक की शाखा नहीं होने पर घोर चिंता जताई। इसी बैठक में भाग लेने आए तेंदुलकर कमिटी के अध्यक्ष - एस तेंदुलकर ने खुलासा किया कि राज्य में गरीबों की संख्या में इजाफा हुआ है।
एक तरफ बैंकिंग सुविधा की कमी, दूसरी ओर गरीबों की संख्या में बढ़ोतरी । तो फिर मनी आर्डर की संख्या में गिरावट का रूझान क्या दिखाता है ? दरअसल इसका जवाब जगदीश और बिलट के बीच पनपे लेन- देन में तलाशना होगा ।
.................................जारी है................................

25.3.10

पलायन का अर्थशास्त्र ----भाग-1

संजय मिश्र
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जहाँ से निकले वहाँ दिक्कत ..... जिनके चमन में पहुंचे उन्हें तकलीफ। आखिरकार मन में आशंकाओं के उफान को थामे ही कोई घर-बार छोड़ता है। चित बेजान करने वाला शब्द - पलायन --यानी किसी जन-समूह की वो तस्वीर जिसके हर पिक्सेल में भयावह दर्द तो है लेकिन आज के दौर के राजनीतिक स्पेस में मुद्दा बनने की तपिश से महरूम ....यानी निरीह। लिहाजा ये झांकता है पर देखने वाले को बेदम नहीं करता। पिछले लोक सभा चुनाव के समय से अब तक पलायन की चर्चा गाहे-बगाहे हो रही है। नरेगा को महिमा-मंडित करने , उसे क्रांतिकारी कदम साबित करने के मंसूबों की वजह से भी ऐसा हो रहा है। लुधियाना, बम्बई, और दिल्ली में पलायनकर्ताओं के मौन चीत्कार समय-समय पर इस त्रासदी की याद दिलाते। निश्चित तौर पर कुछ महीनो बाद बिहार में होने वाले विधान-सभा चुनाव तक अखबार के पन्नो में इस शब्द को जगह मिलती रहेगी।
कहा जा रहा है कि नरेगा वो जादुई छडी है जिसने पलायन को ना सिर्फ रोका है बल्कि उसका खात्मा करने वाला है। पलायन पर सालो काम कर चुके तमाम पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, और पोलिटिकल एक्टिविस्ट भौचक हो अपने अनुभवजन्य राय को फिर से टटोलने में मशगूल हैं। हाल ही दिल्ली से बिहार जाना हुआ तो ये सारे सवाल जेहन में घुमड़ रहे थे। नई दिल्ली स्टेशन पर अलग ही तरह की अफरा-तफरी का माहौल था....रिजर्वेशन टिकेट के बावजूद यात्रियों में निरहट बिहारी हडबडाहट के दर्शन हो रहे थे। खैर जैसे-तैसे अपनी बर्थ पर पहुंचा ही था कि कोई जोर से चिल्लाया....अबे हट यहाँ से...
कुछ सोच पाटा तब तक सामान से भरा प्लास्टिक का बोरा मेरे पैर से टकराया। जब तक चोट को सहलाता ....बोरा मेरी बर्थ के नीचे ' एडजस्ट' कर दिया गया था। कुछ ही देर में सामान चढाने वाले ओझल हो चुके थे और रह गए एक सज्जन ..पलथी मार मेरे सामने वाले बर्थ पर आसन जमा चुके थे। चेहरे पर पतली सी मुस्कान...बीच-बीच में मोबाइल पर दबती उनकी अंगुली।
उनके हाव-भाव से इतना तो समझ आ ही गया था कि गाँव-घर छोड़कर पहली बार दिल्ली आने वालों की फेहरिस्त में शामिल नहीं हैं वे। बेतहासा पलायन के शुरूआती दौर में ही दिल्ली आ गए होंगे। अब तजुर्बा हो गया है...सो सफ़र के दौरान सावधान और ' कांफिडेंट' दिखने की हरचंद कोशिश। खैर ...कुछ ही घंटों में बात-चीत का सिलसिला शुरू हो गया। पता चला ...नाम जगदीश साहू है और दरभंगा जिले के कुशेश्वर स्थान के नजदीक किसी गाँव के रहने वाले हैं। दिल्ली के आजादपुर इलाके में कई सालों से खीरा बेच रहे हैं। ' रेडी' पर नहीं... आजादपुर मंडी में बजाप्ता एक पटरी मिल गई है। जगदीश बड़े गर्व से कहते हैं---गद्दी है...खीरा का हौल सेल करते हैं।
पांच किलों से कम माल वे जोखते ही नहीं हैं। आमदनी का सवाल सुनते ही हिसाब लगाने लगते हैं...वही नौ-दस हजार हो जाता है। उनके गाँव के तीन और यात्री ट्रेन में सफ़र कर रहे थे। थोड़ी ही देर में ये आभास हो चला कि जगदीश साहू ' मेठ' की भूमिका में थे। अनायास ही उसने कहा- चार-पांच सौ रूपया ही साथ लेकर चलते हैं। ट्रेन में टीटीई की छीना-झपटी , और दरभंगा स्टेशन पर पाकिटमार गिरोहों के खतरे से वाकिफ ..जगदीश ने काफी रूपये पहले ही घर भेज दिए थे।
मैं गुण-धुन में पडा रहा। कुशेश्वर स्थान तो कालाजार, मलेरिया, और बाढ़ के लिए जाना जाता है। उस इलाके में एटीम काम करता होगा सहसा विश्वास करना मुश्किल। मनी आर्डर का भरोसा नहीं क्योंकि पोस्ट मास्टर की जेब से कितने महीनो बाद ये जरूरतमंदों को मिलता होगा कहना कठिन । मेरी उत्सुकता का निराकरण जगदीश ने ही किया। दरअसल उसके गाँव में एक ही ब्राह्मण परिवार है जिसके मुखिया हैं...बिलट झा। बिलट भी अब दिल्ली में ही रहते हैं। पहले कुछ काम-धंधा किया पर फ़ायदा नहीं हुआ। जैसे तैसे पैसे जोड़कर मोटर साईकिल खरीदी। गाँव में बिलट का छोटा भाई रहता है। जिसके पास कुछ ' रनिंग मनी ' का इंतेजाम बिलट ने कर दिया हुआ है। बिलट का काम है दिल्ली में रह रहे उसके गाँव -जबार के लोगों से संपर्क करना। जिसे भी रूपये गाँव भेजने होते हैं वो बिलट को रकम दे देता है। तत्काल बिलट के भाई को इसकी सूचना दी जाती है। औसतन दो घंटे के भीतर संबंधित व्यक्ति को रूपया ' पे ' कर दिया जाता है। जगदीश के मुताबिक़ रूपये-पैसे भेजने का इस तरह का इंतजाम दिल्ली के हर उस इलाके में जड़ जमा चुका है जहां प्रवासी मजदूर बड़ी संख्या में रह रहे हैं।
यानि बिहार के हर बड़े गाँव के जो लोग ' दिल्ली कमाते हैं '..उनके बीच का कोई एक सदस्य बिलट की भूमिका में है। बिलट होने के लिए कोई बंधन नहीं...महज गाँव में उसके परिजन के पास ' रनिंग मनी ' हो...साथ ही गाँव वालों का उस पर भरोसा हो। जात-पात-धर्म ...का कोई बंधन नहीं। फिलहाल इस व्यवस्था को कोई नाम नहीं दिया गया है। कमीशनखोरी कह लें...निजी बैंकिंग सेवा कह लें...या फिर हवाला कारोवार का देसी संस्करण। अब थोड़ी बात लेन-देन के इस सरोकार के पीछे के फायदे की। जगदीश साहू जैसों को ६ रूपये प्रति सैकड़ा अदा करना पड़ता है। यानि एक हजार के लिए ६० रूपये....ऐसे ही दस हजार रूपये घर भेजने के लिए ६०० रूपये लगेंगे। कमीशन की रकम ...संभव है...बहुतों को अधिक जान पड़े। लेकिन जगदीश साहू समय पर और सुरक्षित सेवा को ज्यादा अहमियत देते हैं। ये भी संभव है की दिल्ली के अन्य इलाकों में ये ' रेट ' कम-ज्यादा हो। वैसे भी दिल्ली में २५ फीसदी मजदूर ही परिवार के संग रह रहे हैं। शेष ७५ फीसदी के लिए तो कमाई का अधिकाँश हिस्सा गाँव भेजना प्राथमिक मकसद है। पंजाब, गुजरात, बम्बई कमाने वालों के बीच भी लेन देन का ये चलन जोर पकड़ रहा है। पलायन के मुद्दे पर काम करने वालों को इस आर्थिक पहलू पर गहन पड़ताल करनी चाहिए।
.......जारी है............

30.1.10

वेलेंटाइन डे और प्रेम


सैसव जीवन दर्शन भेल .....दुहु दल- बलहि दंद परि गेल
कबहु बांधाय कच कबहु बिथार ....कबहु झाँपे अंग कबहु उधार
थीर नयान अथिर किछु भेल .... उरज उदय - थल लालिमा देल
चपल चरन , चित चंचल भान .... जागल मनसिज मुदित नयान
विद्यापति कह करू अवधान .... बाला अंग लागल पञ्च बान
......ये एक तरुणी की व्यथा है .... वो हैरान है अपने शारीरिक परिवर्तन से .... समझ नहीं आता क्या करे .... पहले पैर चंचल थे ... अब मन में भी हलचल है ... नए अहसास ने दे दी है दस्तक ... मालूम नहीं कैसी प्यास सी जग गई है ...शोख बचपन पर अल्हड़ता कितनी हाबी हो गई है ...
ऐसे ही अनजान लेकिन खीझ भरे उहापोहों के बीच कब कौन प्यार की दहलीज पर कदम रख दे ..... पता भी नहीं चलता। ये भान अचानक से होता है।
कौन जाने प्रेम किसे कहते.. परिभाषित करने से चूकने लगते हैं लोग ... कुछ बाते कह पाते हैं बस .... नर -नारी के बीच प्रेम इस खिंचाव के बाद पलने लगता है। अपनेपन की अनुभूति आकार लेने लगती है ... मोह जगने लगता है। प्रकृति भी ऐसे में मुस्कुराने लगती ... पक्षी कलरव कर आपका स्वागत करते। मन चाहता ये मोह परिणति की ओर बढे ।
ऐसे समय में परिणति का पूरा आभास भी कहाँ हो पाता.....तड़प सुख का अहसास कराने लगता ... मिलन पर नजरें टिक जाती... दृढ़ता को संबल मिलता .... पग-पग कदम बढ़ते .... एकाकार होने की चाहत उभर आती । राह हमेशा आसान कहाँ रह जाता... बाधाएं सर उठा लेती हैं। फिर दौर शुरू होता है विरह की ताप का। दुनिया में कितने साहित्य रच डाले गए ....
परिणति जो आकार ले .... साथ देने की उत्कंठा कभी मंद नहीं पड़ती । इसका शिखर समर्पण के रूप में प्रकट होने लगता है। इसके बाद की निष्ठा - लौकिक प्रेम के परलौकिक बन जाने की ओर प्रवृत होता है। आध्यात्म इसे सत चित- आनंद की अवस्था मानने लगता... यहाँ आकर प्रेम देव लोक की अनुभूति में बदल जाता है।

विज्ञान के नजरिए से देखें तो प्रेम नशा लेने के समान है । प्रेम करने वाले दुनिया से विरत भाव रखने लगते । आँखें जब मिलती है तो कहते हैं ब्रेन से - डोपामाइन - नामक रसायन निकलता है । नतीजतन धड़कन सामान्य से तीन गुना ज्यादा हो जाता है । खून का प्रवाह इस समय गाल और ख़ास इन्द्रियों में अधिक होता है ...अचानक पेट में खालीपन का अहसास होने लगता है। इस दौरान हाथ और पांव में खून का प्रवाह कम रहता है यही कारण है की प्रेमी के हाथ ठंढे और स्थूल से हो जाते और शरीर कांपने लगता है... नर्वसनेस चरम पर पहुँच जाता है।

चिकित्सक मानते हैं कि प्रेम का समागम रूप अछा व्यायाम है...भारतीय सौंदर्य शास्त्र में भी समागम को योग आसन के रूप में देखा गया है। प्रेम- रत रहने वाले अनेक रोगों पर अंकुश रखने में समर्थ हो पाते हैं...आकुलता यानी एन्ग्जाईटी भी दब जाती है। शोध बताते हैं कि इससे इम्यून सिस्टम मजबूत बना रहता है॥ यानी प्रेम करिए ....साथ ही इन्फेक्सन की चिंता से दूर रहिये...
सवाल उठता है कि प्रेम महज रासायनिक प्रक्रिया है तो ये सबसे क्यों नहीं हो जाता। शोध बताते हैं कि प्रेम के दौरान ख़ास तरह कि रसायन निकलती है जिसे नाक तो नहीं लेकिन ब्रेन पहचान लेता है। यही कारण है की लोग संबंधियों से आसक्त नहीं होते।
इतनी पवित्र बातें और ब्रेन कि चर्चा ... पर आप हैरान रह जाएंगे ये जान कर कि गहरे प्रेम में रत रहने के समय भी ब्रेन का बहुत ही छोटा हिस्सा सक्रिय रहता है । जबकि दोस्ती की भावना और दोस्तों से मिलने के समय ब्रेन का बड़ा हिस्सा सक्रिय रहता है। तभी तो शायद दो दिलों के बीच के सभी भावों में निजता रहती है। जैसे नशा लेने पर सभी - फील गुड - की दशा में होते... प्रेमी की मनोदशा भी ऐसी ही होती है... ख्यालों में तो वे अक्सर पाए जाते।

प्यार करने वाले कहेंगे कि प्रेम - जीन, रसायन, और हारमोन से ऊपर की चीज है... दुनिया जले या बिहुँसी उठे ....पर प्रेम रत इंसान मुदित, तृप्त, और खुश रहता है। विलक्षण प्रतिभा वाले इंसान ... कहते हैं कि प्रेम में भी अछे रहे होते हैं। पर हे किशोरों ...आप समझ रखने लायक उम्र में प्रवेश तो कर जाएं। वेलेंटाइन डे की आपको शुभकामनाएं .... बसंत सदा मोहक साबित हो....

2.1.10

अलग राज्य की मांग क्यों ? सन्दर्भ मिथिला

अलग राज्य की मांग क्यों ? सन्दर्भ मिथिला



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संजय मिश्र



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तेलंगाना ने कांग्रेस को जोर का झटका दिया है। कड़वा घूँट पीने को मजबूर ये पुरातन पार्टी अब इस चक्रव्यूह से निकालने की कोशिश कर रही है। देश भर में इस मुद्दे पर चर्चाएँ गरम हैं। कोई छोटे राज्य बनाम बड़े राज्य के विमर्श में लगा है तो किसी को राष्ट्रीय अखण्डता पर खतरा नजर आ रहा है। राष्ट्र के जीवन में ऐसे मौके आते हैं जब सरकारों के साथ- साथ राजनीतिक दल , आम जन और सोच-विचार वाले लोग असहजता महसूस करते। अभी चहुँ ओर यही दिख रहा है। के चंद्रशेखर राव ने तेलंगाना के मुद्दे पर हो रहे लुका- छिपी के खेल की सीमा को उघार कर रख दिया है।



आखिर ऐसी मांग उठती ही कयों है ? कहा जा रहा है की विकास में पिछड़ने वाले क्षेत्रों से इतनी बड़ी मांग नहीं उठाई जानी चाहिए । संभव है ऐसे सवाल करने वाले विकास को समग्रता में देखने की जगह संकुचित अर्थों में देखते हों ....दो चार फैक्ट्रियां स्थापित कर देने और सड़कें बना देने को ही वो विकास समझते हों। यानी वे मान रहे हैं की अलग राज्य की मांग करने वाले देश के साथ इन्जस्तिस कर रहे हैं।



दरअसल मामला इतना सरल नहीं है। माहीनी से देखें तो परत-दर-परत सवाल उठते जायेंगे ..... सत्ता में बैठे लोगों के नीयत की निरंकुशता , भेद-भाव पूर्ण नीतियाँ और आकांक्षाओं के दमन की कहानियां निकलती ही चली जाएंगी । इन परतों के बीच से अनदेखी की जो टीस निकलती हैं उसे ' चाहें " तो साफ़ सुन सकते हैं। लेकिन इस कराह की वेदना को समझने के लिए " मलिन ' मन तैयार कहाँ। ये मलिन मन कार्यपालिका , विधायिका , और चौथे स्तम्भ में कब्जा जमाए बैठे हैं । वे तेलंगाना जैसे हालात में भी अपनी कारस्तानी से ध्यान भटकाने में लगे हैं।



ऐसे ही तत्वों को के सी आर के अनशन पर एतराज । सन्दर्भ से पड़े होकर मणिपुर की इरोम शर्मिला के अनशन की याद दिलाई जा रही है। बेशक इरोम श्रधेय हैं... उनकी कुर्बानी नमन योग्य हैं....गांधीजी के संघर्ष की नैतिक गाथा का साक्षात दिग्दर्शन है उनका अनशन । के सी आर ने इसी हथियार को आजमाया। इसका उद्देश्य जो भी हो... पर शायद भारत के नीति-नियंताओं को कोई भी मांग मानने के लिए खून-खाबा देखने की आदत हो गई है। वे भूल जाते हैं की ऐसी आदत देश की संवैधानिक मर्यादाओं के लिए शुभ नहीं।





सन्दर्भ की बात चली तो थोड़ी बात बिहार की कर लें .......मिथिला के मानस के उद्वेग की। आपके जेहन में उमड़ रहे कई सवालों के जवाब शायद आप तलाश पायें। मिथिला इसी राज्य बिहार का एक अंग है। पौराणिक-एतिहासिक मिथिला का दो-तिहाई हिस्सा बिहार में और शेष नेपाल में पड़ता है। कभी मौक़ा मिले और समय हो तो बिहार के हुक्मरानों के भाषण सुने। इन्हें ही क्यों ....बिहार की मीडिया पर भी नजर गड़ाएं । बिहार की महिमा का जब ये बखान करते तो भगवान् बुध ही इन्हें नजर आते। भगवान् महावीर कभी-कभार याद आते....पर जनक नहीं...माता सीता नहीं। मिथिला का स्मरण करा दें तो इनकी भावें तन जाती। इस इलाकेकीमिटटी, पानी, हवा...ये सब बिहार की संपदा हुई पर ' मिथिला' शब्द और यहाँ के लोगों से परहेज। यहाँ की विरासत पर गर्व करने की बजाए इन्हें शर्म का अनुभव क्यों ?


सूना होगा आपने की मैथिली भाषा संविधान की आठवीं सूची में दर्ज है...वो साहित्य अकादमीमेभी है। यानिइन जगहों पर बिहार का मान बढ़ा रही । पर क्या राज्य के शाषकों को इस पर नाज है ? हर सेन्सस रिपोर्ट में मैथिली भाषियों की संख्या कम बताने की इनकी साजिस क्या किसी से छुपी रह गई है ? थोड़ा पीछे जाएं...शिव पूजन सहाए जैसे ख्यातिलब्ध साहित्यकारों ने मैथिली की परिचिति खत्म करने का बीड़ा क्यों उठाया था ? पाठ्यक्रमों से मैथिली को बार-बार हटाने के कुचक्र क्या राजकीय गर्व का अहसास हैं?


मैथिली जब आठवीं अनुसूची में शामिल की गई तो राष्ट्रीय टीवी चैनलों ने भी इसे प्रमुखता से दिखाया। संविधान संशोधन करना पडा था...लिहाजा ये न्यूज़ थी। लेकिन बिहार के सर्वाधिक लोकप्रिय चैनल ने इस खबर को दिखाने की जहमत नहीं उठाई। इस चैनल को बिहार की स्वर कोकिला शारदा सिन्हा की आवाज नहीं सुहाती...क्योंकि वो मिथिला क्षेत्र से आती हैं...जबकि मनोज तिवारी ' अप्पन ' बने हुए हैं।


देश के किसी कोने में चले जाएं...गैर बिहारियों से बात करें। बिहार का नाम लेते ही वो भोजपुरी का जिक्र करेंगे। यही हाल इन जगहों के समझदार समझे जाने वाले पत्रकारों का है। अधिकाँश को पता नहीं की मैथिली बिहार की ही भाषा है। बिहार सरकार की गर्व की अनुभूति और काबिलियत ( ? ) का ये जीता जागता नतीजा है। पटना से छपने वाले हिन्दी के अखबारों को पलट कर देखें। हेडिंग्स और कार्टून के टेक्स्ट आपको भोजपुरी में मिलेंगे। इन अखबारों की ये किर्दानी सालों से है....अछा है...पर मैथिली में क्यों नहीं। इन्हें मिथिला का पाठक/ खरीदार चाहिए पर मैथिली नहीं चाहिए...बिलकुल वैसे ही जैसे राज्यके नेताओं को मिथिला के ' लोग ' चाहिए जिन पर सत्ता की धौंस जमाएं पर इन " लोग ' के हित की परवाह नहीं।


तेलंगाना विवाद के बाद से मिथिला में भी अलग राज्य की मांग को लेकर उबाल है। विभिन्न सांस्कृतिक संगठन शांतिपूर्ण तरीके से ये मांग रख रहे हैं। इनका आवेस है की मिथिला का अस्तित्व अलग राज्य बनाने से ही बचेगा। इस जन-उभार को देख पार्टी लाइन से अलग होकर बड़े राजनीतिक नेता भी इसके समर्थन में वक्तव्य दे रहे हैं। मीडिया में भी इसके मुतलिक खबरें आ रही हैं। लेकिन गौर करें तो हर जगह ' मिथिलांचल ' शब्द पाएंगे। ये जो शब्द है ' मिथिला' वो परिदृश्य से ओझल है। यानि मिथिला बन गई मिथिलांचल। ये कैसे हो गया...क्यों हो गया ? पटना के सत्ता प्रतिष्ठान और मीडिया ने दशकों से ' मिथिलांचल ' शब्द का इतना इस्तेमाल किया है की मिथिला के लोग भी इसी शब्द का प्रयोग करने लगे हैं। इन्हें रत्ती भर अहसास नहीं की इसके पीछे का रहस्य क्या है...इसके क्या मायने हैं ? जिन पत्रकार बंधुओं को रिसर्च की प्रवृति में यकीन हो वे इस साजिश पर से पर्दा उठा सकते हैं।



यही कोई पांचवें दशक के शुरुआत की कथा है ये...आज़ादी मिली ही थी। बिहार को मिथिला से आने वाले राजस्व पर बड़ा अब्लंब था। राज्य के राजस्व में इस इलाके का योगदान ४९ फीसदी था.... यानि लगभग आधा। साल २००० में जब राज्य का बंटवारा हुआ उस समय राज्य के राजस्व में मिथिला का योगदान १२ फीसदी ही रह गया था। सरल भाषा में कहें तो मिथिला के राजस्व देने की क्षमता चार गुना घट चुकी थी। यानि यहाँ के लोग चार गुना गरीब हो चुके थे। ऐसा कैसे हो गया ? क्या मिथिला से मिलने वाले राजस्व को इसी इलाके के विकास में खर्च किया गया ?


बाढ़ से मची तबाही ने इस इलाके को झकझोर कर रख दिया है। बाढ़ पहले भी आती थी। तभी तो लोर्ड वेवेल ने इसके निदान के लिए महत्वाकान्ची परियोजना बनाई थी। बराह क्षेत्र में कोसी पर हाई डैम बनाना था। अनुमान लगाया गया की परियोजना के पूरा होने पर ये इलाका दुनिया के समृध्तम क्षेत्रों में शुमार हो जाएगा। लेकिन आज़ादी क बाद बनी बिहार की पहली सरकार ने बहाने बनाते हुए इस परियोजना से हाथ खींच लिया। उन्हें डर था की मिथिला समृध हो जाएगी तो वहाँ की जनता ' दुहाई सरकार ' .. और ..' जिंदाबाद ' के नारे नहीं लगाएगी। बिहार सरकार की अनिच्छा देख केंद्र सरकार ' भाखड़ा - नांगल ' परियोजना की और उन्मुख हुई । पंजाब का काया-कल्प हो गया। आज उसी पंजाब के खेतों में मिथिला के मजदूर और किसान से मजदूर बन गए लोग फसलें काटने जाते हैं। इधर कोसी डैम में लगने वाले पैसों से दामोदर वैली परियोजना अस्तित्व में आई। साजिश करने वाले झादखंड में हुए निवेश से मालामाल हुए।

दिल्ली की सडकों पर ' बिहारी ' होने के दंश झेलने वाले, पंजाब के खेतों में अफीम मिली चाय पीकर काम करने को मजबूर , अपमान सहकर गुजरात में विकास का सोपान गढ़ने वाले और मुंबई में नफ़रत के बीच पेट की आग बुझाने वाले ७० फीसदी हाथ दर असल उसी मिथिला के हैं। जी हाँ , उसी मिथिला के जिसने ज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में कभी देश का मार्ग-दर्शन किया था। आज वही समाज दो जून रोटी के लिए तड़प रहा है....जिन्हें कुछ मांगने पर मिलती है अवहेला। यहाँ के लोगों की सूनी आँखों में यही सवाल तैर रहे हैं -- क्या उसकी पहिचान और जीवन-शैली मिटा देने से ही बिहार और देश का भला होगा ?

यही घुटन कमोवेश ' malla प्रदेश ', ' ब्रज ' , ' बुंदेलखंड ', और ' बघेलखंड ' में भी है। क्या इनकी पहचान मिटा देने से ही बिहार, यूपी , और एमपी का कल्याण होगा ? ये तीन बड़े कृत्रिम राज्य दिल्ली की कुर्सी के लिए जरूरी हैं लेकिन इस संकुचित लाभ के पीछे ये नहीं भूलना चाहिए की देश के पुनर्गठन का काम रह गया है। उसे पूराकर के ही देश की विविधता के आतंरिक बंधन को मजबूती दी जा सकती है। नहीं तो इन इलाकों में अलग राज्य की अकुलाहट बनी रहेगी। दूसरा राज्य पुनर्गठन आयोग बने तो इस अकुलाहट को महसूस करे। ऐसे आयोग को राजनीतिक फायदे के लिए उठाए जा रहे अलग राज्यों की मांग से सतर्क रहने की जरूरत है। क्योंकि दूरदर्शिता के अभाव में और तात्कालिक लोभ में कई ऐसे राज्य बन गए जो की नहीं बनने चाहिए थे।


5.12.09

झारखण्ड की व्यथा

झारखण्ड की व्यथा

संजय मिश्रा

झारखण्ड में चुनाव हो रहे हैं । इसमे चुनाव के वे सारे रंग दिख रहे हैं जो हमारी खासियत बन गई है। राज्य के बाहर के लोगों को हैरानी हो सकती है कि चुनाव प्रचार के दौरान भ्रष्टाचार मुद्दा नही बन पाया। न तो इसमे राजनितिक दलों की दिलचस्पी है और न ही मीडिया की । मधु कोड़ा बेशक घोटालों के आइकोन बन गए हों लेकिन उनको राजनितिक प्रहसन का पात्र बनने वाले दल चुप्पी साधे बैठे हैं। जिस यूपीए ने राज्य का पहला निर्दलिये मुख्यमंत्री उन्हें बनाया उसके मकसद का पर्दाफास हो चुका है। आदिवासी बेरहमी से लूटे जा चुके हैं। राज्य निर्माण के नौ साल बीत गए पर जिस ललक ने झारखण्ड की नींव रखी सत्ता की आपाधापी के बीच वो कहीं गुम हो गई है।


याद करें साल १९९८ का पन्द्रह अगस्त ... लालू प्रसाद ने अकड़ते हुए कहा था की झारखण्ड उनकी लाश पर बनेगा। दो साल और दो महीने बाद ही झारखण्ड भारतीय संघ का एक हिस्सा बन गया। ऐसा लगा आदिवासी अस्मिता के दिन बहुरने वाले हैं। पर वही लालू मधु कोड़ा की ताजपोशी में जी जान से जुटे थे । चुनाव प्रचार के दौरान आज भी उनके चेहरे पर वही छकाने वाली मुस्कान देखी जा सकती है। कांग्रेस राज्य में जमीन तलाश रही है। उसका निशाना झारखण्ड नामधारी दलों के आधार को संकुचित करने पर है। शिबू सोरेन की रही सही ज़मीं हथियाने की पुरी तैयारी है।

समझदार लोगों के अनुसार झारखण्ड ... आदिवासियों की प्रतिरोध संस्कृति का आइना है। यह संस्कृति ...कमीशन , छल प्रपंच और तिकड़म के जाल से निकल जाने के आवेग में जन्मी थी। लेकिन आज ये राज्य इन्ही के मकडजाल में उलझ गई है।

आदिवासियों का अपना दिसुम हो इसके पीछे सांस्कृतिक ... सामजिक अवधारणा काम कर रही थी। ये अवधारणा प्रकृति के मेल मिलाप के साथ देसी विचारों के सपनो के सामंजस्य पर बनी थी। इसमे स्वशासन का स्वर भी शामिल था। सामुदाइक जीवन और प्राकृतिक सम्पदा पर सामूहिक अधिकार के कारण ये समझ बनी। लेकिन बाहरी ... जिन्हें वे दिकु कहते ... लोगों की चहलकदमी ने उनकी सरलता को झकझोड़ दिया। बिरसा मुंडा से लेकर ताना भगतों ने स्वीकार किया कि निश्छल जीवन की अस्मिता की रक्षा के लिए प्रतिरोध जरूरी है।

जयपाल सिंह ने जब झारखण्ड पार्टी बनाई तब तक आदिवासी समाज ने इस जरूरत को मान लिया था की उनकी जीवन शैली का आधुनिक सोच के साथ सरोकार हो। आदिवासी इलाकों में प्राकृतिक सम्पदा पर आधारित आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ी तो उन्होंने संघर्ष को निर्माण प्रक्रिया की दिशा में मोड़ने को अपना लक्ष्य बनाया। इस दिशा में बढ़ने के बावजूद अपने मौलिक चिंतन को छोड़ना उन्हें जरूरी नही लगा। यही वजह हुई कि उनकी संस्कृति के संगीतमय प्रवाह को इतिहास नही बनने दिया गया।

आदिवासियों के अवचेतन मन को कुरेदे तो ये प्रवाह आज भी दबी हुई पायेंगे। यही कारण है की राज्य में जितने भी निवेश के प्रस्ताव आए वे खुले दिल से उसका स्वागत नही कर पाये। उन्हें डर है कि वे विस्थापन की जिंदगी जीने को मजबूर हो जायेंगे....अपनी प्रकृति से कट जायेंगे। आदिवासी आकांछा की राह में ये एक बड़ा पेंच है।

उनकी दुविधा ये भी है की राज्य में उनकी जनसँख्या तीस फीसदी के आसपास ही है शेष गैर आदिवासी यानि जिन्हें वो दिकु कहते है। देश की संघीय व्यवस्था के साथ उनके जीवन दर्शन के बीच मेल मिलाप में कमी तो चुनौती है ही। देश में राजनीतिक पतन का असर भी उन पर पडा है। मधु कोड़ा इसके प्रतीक हैं।

१५ नवम्बर २००० को जब झारखण्ड अस्तित्व में आया तो ये उम्मीद बंधी कि बिहार की राजनीतिक विरासत की धुंध छ्तेगी और नया सवेरा आएगा। सपने देखे गए कि शासन का मानवीय चेहरा आदिवासी लोकाचार की रक्षा करने में सफल होगा। लेकिन झारखण्ड आन्दोलन में अहम् भूमिका निभाने वाले नेताओं के बदले व्यवहार के कारण आदिवासी अंतर्विरोध और निराशा के दोहरे भंवर में लोग फँस गए हैं। ऐसे राजनीतिक जानकार भी हैं जो ये मानते हैं कि चुनाव बाद मौजूदा हलचल हटेगा। लेकिन वे आदिवासी अकुलाहट को समझ पाने वाली सरकार ही होगी ये कहने का साहस इन जानकारों में भी नही है। दुनिया भर में आदिवासी जीवन दर्शन की झांकी पेश करनेवाले कुमार सुरेश सिंह और आदिवासी कोमल भावों की पैरोकार महाश्वेता देवी की आस्था क्या धरी की धरी रह जाएगी।

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