life is celebration
30.1.10
वेलेंटाइन डे और प्रेम
सैसव जीवन दर्शन भेल .....दुहु दल- बलहि दंद परि गेल
कबहु बांधाय कच कबहु बिथार ....कबहु झाँपे अंग कबहु उधार
थीर नयान अथिर किछु भेल .... उरज उदय - थल लालिमा देल
चपल चरन , चित चंचल भान .... जागल मनसिज मुदित नयान
विद्यापति कह करू अवधान .... बाला अंग लागल पञ्च बान
......ये एक तरुणी की व्यथा है .... वो हैरान है अपने शारीरिक परिवर्तन से .... समझ नहीं आता क्या करे .... पहले पैर चंचल थे ... अब मन में भी हलचल है ... नए अहसास ने दे दी है दस्तक ... मालूम नहीं कैसी प्यास सी जग गई है ...शोख बचपन पर अल्हड़ता कितनी हाबी हो गई है ...
ऐसे ही अनजान लेकिन खीझ भरे उहापोहों के बीच कब कौन प्यार की दहलीज पर कदम रख दे ..... पता भी नहीं चलता। ये भान अचानक से होता है।
कौन जाने प्रेम किसे कहते.. परिभाषित करने से चूकने लगते हैं लोग ... कुछ बाते कह पाते हैं बस .... नर -नारी के बीच प्रेम इस खिंचाव के बाद पलने लगता है। अपनेपन की अनुभूति आकार लेने लगती है ... मोह जगने लगता है। प्रकृति भी ऐसे में मुस्कुराने लगती ... पक्षी कलरव कर आपका स्वागत करते। मन चाहता ये मोह परिणति की ओर बढे ।
ऐसे समय में परिणति का पूरा आभास भी कहाँ हो पाता.....तड़प सुख का अहसास कराने लगता ... मिलन पर नजरें टिक जाती... दृढ़ता को संबल मिलता .... पग-पग कदम बढ़ते .... एकाकार होने की चाहत उभर आती । राह हमेशा आसान कहाँ रह जाता... बाधाएं सर उठा लेती हैं। फिर दौर शुरू होता है विरह की ताप का। दुनिया में कितने साहित्य रच डाले गए ....
परिणति जो आकार ले .... साथ देने की उत्कंठा कभी मंद नहीं पड़ती । इसका शिखर समर्पण के रूप में प्रकट होने लगता है। इसके बाद की निष्ठा - लौकिक प्रेम के परलौकिक बन जाने की ओर प्रवृत होता है। आध्यात्म इसे सत चित- आनंद की अवस्था मानने लगता... यहाँ आकर प्रेम देव लोक की अनुभूति में बदल जाता है।
विज्ञान के नजरिए से देखें तो प्रेम नशा लेने के समान है । प्रेम करने वाले दुनिया से विरत भाव रखने लगते । आँखें जब मिलती है तो कहते हैं ब्रेन से - डोपामाइन - नामक रसायन निकलता है । नतीजतन धड़कन सामान्य से तीन गुना ज्यादा हो जाता है । खून का प्रवाह इस समय गाल और ख़ास इन्द्रियों में अधिक होता है ...अचानक पेट में खालीपन का अहसास होने लगता है। इस दौरान हाथ और पांव में खून का प्रवाह कम रहता है यही कारण है की प्रेमी के हाथ ठंढे और स्थूल से हो जाते और शरीर कांपने लगता है... नर्वसनेस चरम पर पहुँच जाता है।
चिकित्सक मानते हैं कि प्रेम का समागम रूप अछा व्यायाम है...भारतीय सौंदर्य शास्त्र में भी समागम को योग आसन के रूप में देखा गया है। प्रेम- रत रहने वाले अनेक रोगों पर अंकुश रखने में समर्थ हो पाते हैं...आकुलता यानी एन्ग्जाईटी भी दब जाती है। शोध बताते हैं कि इससे इम्यून सिस्टम मजबूत बना रहता है॥ यानी प्रेम करिए ....साथ ही इन्फेक्सन की चिंता से दूर रहिये...
सवाल उठता है कि प्रेम महज रासायनिक प्रक्रिया है तो ये सबसे क्यों नहीं हो जाता। शोध बताते हैं कि प्रेम के दौरान ख़ास तरह कि रसायन निकलती है जिसे नाक तो नहीं लेकिन ब्रेन पहचान लेता है। यही कारण है की लोग संबंधियों से आसक्त नहीं होते।
इतनी पवित्र बातें और ब्रेन कि चर्चा ... पर आप हैरान रह जाएंगे ये जान कर कि गहरे प्रेम में रत रहने के समय भी ब्रेन का बहुत ही छोटा हिस्सा सक्रिय रहता है । जबकि दोस्ती की भावना और दोस्तों से मिलने के समय ब्रेन का बड़ा हिस्सा सक्रिय रहता है। तभी तो शायद दो दिलों के बीच के सभी भावों में निजता रहती है। जैसे नशा लेने पर सभी - फील गुड - की दशा में होते... प्रेमी की मनोदशा भी ऐसी ही होती है... ख्यालों में तो वे अक्सर पाए जाते।
प्यार करने वाले कहेंगे कि प्रेम - जीन, रसायन, और हारमोन से ऊपर की चीज है... दुनिया जले या बिहुँसी उठे ....पर प्रेम रत इंसान मुदित, तृप्त, और खुश रहता है। विलक्षण प्रतिभा वाले इंसान ... कहते हैं कि प्रेम में भी अछे रहे होते हैं। पर हे किशोरों ...आप समझ रखने लायक उम्र में प्रवेश तो कर जाएं। वेलेंटाइन डे की आपको शुभकामनाएं .... बसंत सदा मोहक साबित हो....
2.1.10
अलग राज्य की मांग क्यों ? सन्दर्भ मिथिला
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संजय मिश्र
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तेलंगाना ने कांग्रेस को जोर का झटका दिया है। कड़वा घूँट पीने को मजबूर ये पुरातन पार्टी अब इस चक्रव्यूह से निकालने की कोशिश कर रही है। देश भर में इस मुद्दे पर चर्चाएँ गरम हैं। कोई छोटे राज्य बनाम बड़े राज्य के विमर्श में लगा है तो किसी को राष्ट्रीय अखण्डता पर खतरा नजर आ रहा है। राष्ट्र के जीवन में ऐसे मौके आते हैं जब सरकारों के साथ- साथ राजनीतिक दल , आम जन और सोच-विचार वाले लोग असहजता महसूस करते। अभी चहुँ ओर यही दिख रहा है। के चंद्रशेखर राव ने तेलंगाना के मुद्दे पर हो रहे लुका- छिपी के खेल की सीमा को उघार कर रख दिया है।
आखिर ऐसी मांग उठती ही कयों है ? कहा जा रहा है की विकास में पिछड़ने वाले क्षेत्रों से इतनी बड़ी मांग नहीं उठाई जानी चाहिए । संभव है ऐसे सवाल करने वाले विकास को समग्रता में देखने की जगह संकुचित अर्थों में देखते हों ....दो चार फैक्ट्रियां स्थापित कर देने और सड़कें बना देने को ही वो विकास समझते हों। यानी वे मान रहे हैं की अलग राज्य की मांग करने वाले देश के साथ इन्जस्तिस कर रहे हैं।
दरअसल मामला इतना सरल नहीं है। माहीनी से देखें तो परत-दर-परत सवाल उठते जायेंगे ..... सत्ता में बैठे लोगों के नीयत की निरंकुशता , भेद-भाव पूर्ण नीतियाँ और आकांक्षाओं के दमन की कहानियां निकलती ही चली जाएंगी । इन परतों के बीच से अनदेखी की जो टीस निकलती हैं उसे ' चाहें " तो साफ़ सुन सकते हैं। लेकिन इस कराह की वेदना को समझने के लिए " मलिन ' मन तैयार कहाँ। ये मलिन मन कार्यपालिका , विधायिका , और चौथे स्तम्भ में कब्जा जमाए बैठे हैं । वे तेलंगाना जैसे हालात में भी अपनी कारस्तानी से ध्यान भटकाने में लगे हैं।
ऐसे ही तत्वों को के सी आर के अनशन पर एतराज । सन्दर्भ से पड़े होकर मणिपुर की इरोम शर्मिला के अनशन की याद दिलाई जा रही है। बेशक इरोम श्रधेय हैं... उनकी कुर्बानी नमन योग्य हैं....गांधीजी के संघर्ष की नैतिक गाथा का साक्षात दिग्दर्शन है उनका अनशन । के सी आर ने इसी हथियार को आजमाया। इसका उद्देश्य जो भी हो... पर शायद भारत के नीति-नियंताओं को कोई भी मांग मानने के लिए खून-खाबा देखने की आदत हो गई है। वे भूल जाते हैं की ऐसी आदत देश की संवैधानिक मर्यादाओं के लिए शुभ नहीं।
सन्दर्भ की बात चली तो थोड़ी बात बिहार की कर लें .......मिथिला के मानस के उद्वेग की। आपके जेहन में उमड़ रहे कई सवालों के जवाब शायद आप तलाश पायें। मिथिला इसी राज्य बिहार का एक अंग है। पौराणिक-एतिहासिक मिथिला का दो-तिहाई हिस्सा बिहार में और शेष नेपाल में पड़ता है। कभी मौक़ा मिले और समय हो तो बिहार के हुक्मरानों के भाषण सुने। इन्हें ही क्यों ....बिहार की मीडिया पर भी नजर गड़ाएं । बिहार की महिमा का जब ये बखान करते तो भगवान् बुध ही इन्हें नजर आते। भगवान् महावीर कभी-कभार याद आते....पर जनक नहीं...माता सीता नहीं। मिथिला का स्मरण करा दें तो इनकी भावें तन जाती। इस इलाकेकीमिटटी, पानी, हवा...ये सब बिहार की संपदा हुई पर ' मिथिला' शब्द और यहाँ के लोगों से परहेज। यहाँ की विरासत पर गर्व करने की बजाए इन्हें शर्म का अनुभव क्यों ?
सूना होगा आपने की मैथिली भाषा संविधान की आठवीं सूची में दर्ज है...वो साहित्य अकादमीमेभी है। यानिइन जगहों पर बिहार का मान बढ़ा रही । पर क्या राज्य के शाषकों को इस पर नाज है ? हर सेन्सस रिपोर्ट में मैथिली भाषियों की संख्या कम बताने की इनकी साजिस क्या किसी से छुपी रह गई है ? थोड़ा पीछे जाएं...शिव पूजन सहाए जैसे ख्यातिलब्ध साहित्यकारों ने मैथिली की परिचिति खत्म करने का बीड़ा क्यों उठाया था ? पाठ्यक्रमों से मैथिली को बार-बार हटाने के कुचक्र क्या राजकीय गर्व का अहसास हैं?
मैथिली जब आठवीं अनुसूची में शामिल की गई तो राष्ट्रीय टीवी चैनलों ने भी इसे प्रमुखता से दिखाया। संविधान संशोधन करना पडा था...लिहाजा ये न्यूज़ थी। लेकिन बिहार के सर्वाधिक लोकप्रिय चैनल ने इस खबर को दिखाने की जहमत नहीं उठाई। इस चैनल को बिहार की स्वर कोकिला शारदा सिन्हा की आवाज नहीं सुहाती...क्योंकि वो मिथिला क्षेत्र से आती हैं...जबकि मनोज तिवारी ' अप्पन ' बने हुए हैं।
देश के किसी कोने में चले जाएं...गैर बिहारियों से बात करें। बिहार का नाम लेते ही वो भोजपुरी का जिक्र करेंगे। यही हाल इन जगहों के समझदार समझे जाने वाले पत्रकारों का है। अधिकाँश को पता नहीं की मैथिली बिहार की ही भाषा है। बिहार सरकार की गर्व की अनुभूति और काबिलियत ( ? ) का ये जीता जागता नतीजा है। पटना से छपने वाले हिन्दी के अखबारों को पलट कर देखें। हेडिंग्स और कार्टून के टेक्स्ट आपको भोजपुरी में मिलेंगे। इन अखबारों की ये किर्दानी सालों से है....अछा है...पर मैथिली में क्यों नहीं। इन्हें मिथिला का पाठक/ खरीदार चाहिए पर मैथिली नहीं चाहिए...बिलकुल वैसे ही जैसे राज्यके नेताओं को मिथिला के ' लोग ' चाहिए जिन पर सत्ता की धौंस जमाएं पर इन " लोग ' के हित की परवाह नहीं।
तेलंगाना विवाद के बाद से मिथिला में भी अलग राज्य की मांग को लेकर उबाल है। विभिन्न सांस्कृतिक संगठन शांतिपूर्ण तरीके से ये मांग रख रहे हैं। इनका आवेस है की मिथिला का अस्तित्व अलग राज्य बनाने से ही बचेगा। इस जन-उभार को देख पार्टी लाइन से अलग होकर बड़े राजनीतिक नेता भी इसके समर्थन में वक्तव्य दे रहे हैं। मीडिया में भी इसके मुतलिक खबरें आ रही हैं। लेकिन गौर करें तो हर जगह ' मिथिलांचल ' शब्द पाएंगे। ये जो शब्द है ' मिथिला' वो परिदृश्य से ओझल है। यानि मिथिला बन गई मिथिलांचल। ये कैसे हो गया...क्यों हो गया ? पटना के सत्ता प्रतिष्ठान और मीडिया ने दशकों से ' मिथिलांचल ' शब्द का इतना इस्तेमाल किया है की मिथिला के लोग भी इसी शब्द का प्रयोग करने लगे हैं। इन्हें रत्ती भर अहसास नहीं की इसके पीछे का रहस्य क्या है...इसके क्या मायने हैं ? जिन पत्रकार बंधुओं को रिसर्च की प्रवृति में यकीन हो वे इस साजिश पर से पर्दा उठा सकते हैं।
यही कोई पांचवें दशक के शुरुआत की कथा है ये...आज़ादी मिली ही थी। बिहार को मिथिला से आने वाले राजस्व पर बड़ा अब्लंब था। राज्य के राजस्व में इस इलाके का योगदान ४९ फीसदी था.... यानि लगभग आधा। साल २००० में जब राज्य का बंटवारा हुआ उस समय राज्य के राजस्व में मिथिला का योगदान १२ फीसदी ही रह गया था। सरल भाषा में कहें तो मिथिला के राजस्व देने की क्षमता चार गुना घट चुकी थी। यानि यहाँ के लोग चार गुना गरीब हो चुके थे। ऐसा कैसे हो गया ? क्या मिथिला से मिलने वाले राजस्व को इसी इलाके के विकास में खर्च किया गया ?
बाढ़ से मची तबाही ने इस इलाके को झकझोर कर रख दिया है। बाढ़ पहले भी आती थी। तभी तो लोर्ड वेवेल ने इसके निदान के लिए महत्वाकान्ची परियोजना बनाई थी। बराह क्षेत्र में कोसी पर हाई डैम बनाना था। अनुमान लगाया गया की परियोजना के पूरा होने पर ये इलाका दुनिया के समृध्तम क्षेत्रों में शुमार हो जाएगा। लेकिन आज़ादी क बाद बनी बिहार की पहली सरकार ने बहाने बनाते हुए इस परियोजना से हाथ खींच लिया। उन्हें डर था की मिथिला समृध हो जाएगी तो वहाँ की जनता ' दुहाई सरकार ' .. और ..' जिंदाबाद ' के नारे नहीं लगाएगी। बिहार सरकार की अनिच्छा देख केंद्र सरकार ' भाखड़ा - नांगल ' परियोजना की और उन्मुख हुई । पंजाब का काया-कल्प हो गया। आज उसी पंजाब के खेतों में मिथिला के मजदूर और किसान से मजदूर बन गए लोग फसलें काटने जाते हैं। इधर कोसी डैम में लगने वाले पैसों से दामोदर वैली परियोजना अस्तित्व में आई। साजिश करने वाले झादखंड में हुए निवेश से मालामाल हुए।
दिल्ली की सडकों पर ' बिहारी ' होने के दंश झेलने वाले, पंजाब के खेतों में अफीम मिली चाय पीकर काम करने को मजबूर , अपमान सहकर गुजरात में विकास का सोपान गढ़ने वाले और मुंबई में नफ़रत के बीच पेट की आग बुझाने वाले ७० फीसदी हाथ दर असल उसी मिथिला के हैं। जी हाँ , उसी मिथिला के जिसने ज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में कभी देश का मार्ग-दर्शन किया था। आज वही समाज दो जून रोटी के लिए तड़प रहा है....जिन्हें कुछ मांगने पर मिलती है अवहेला। यहाँ के लोगों की सूनी आँखों में यही सवाल तैर रहे हैं -- क्या उसकी पहिचान और जीवन-शैली मिटा देने से ही बिहार और देश का भला होगा ?
यही घुटन कमोवेश ' malla प्रदेश ', ' ब्रज ' , ' बुंदेलखंड ', और ' बघेलखंड ' में भी है। क्या इनकी पहचान मिटा देने से ही बिहार, यूपी , और एमपी का कल्याण होगा ? ये तीन बड़े कृत्रिम राज्य दिल्ली की कुर्सी के लिए जरूरी हैं लेकिन इस संकुचित लाभ के पीछे ये नहीं भूलना चाहिए की देश के पुनर्गठन का काम रह गया है। उसे पूराकर के ही देश की विविधता के आतंरिक बंधन को मजबूती दी जा सकती है। नहीं तो इन इलाकों में अलग राज्य की अकुलाहट बनी रहेगी। दूसरा राज्य पुनर्गठन आयोग बने तो इस अकुलाहट को महसूस करे। ऐसे आयोग को राजनीतिक फायदे के लिए उठाए जा रहे अलग राज्यों की मांग से सतर्क रहने की जरूरत है। क्योंकि दूरदर्शिता के अभाव में और तात्कालिक लोभ में कई ऐसे राज्य बन गए जो की नहीं बनने चाहिए थे।
5.12.09
झारखण्ड की व्यथा
झारखण्ड की व्यथा
संजय मिश्रा
झारखण्ड में चुनाव हो रहे हैं । इसमे चुनाव के वे सारे रंग दिख रहे हैं जो हमारी खासियत बन गई है। राज्य के बाहर के लोगों को हैरानी हो सकती है कि चुनाव प्रचार के दौरान भ्रष्टाचार मुद्दा नही बन पाया। न तो इसमे राजनितिक दलों की दिलचस्पी है और न ही मीडिया की । मधु कोड़ा बेशक घोटालों के आइकोन बन गए हों लेकिन उनको राजनितिक प्रहसन का पात्र बनने वाले दल चुप्पी साधे बैठे हैं। जिस यूपीए ने राज्य का पहला निर्दलिये मुख्यमंत्री उन्हें बनाया उसके मकसद का पर्दाफास हो चुका है। आदिवासी बेरहमी से लूटे जा चुके हैं। राज्य निर्माण के नौ साल बीत गए पर जिस ललक ने झारखण्ड की नींव रखी सत्ता की आपाधापी के बीच वो कहीं गुम हो गई है।
याद करें साल १९९८ का पन्द्रह अगस्त ... लालू प्रसाद ने अकड़ते हुए कहा था की झारखण्ड उनकी लाश पर बनेगा। दो साल और दो महीने बाद ही झारखण्ड भारतीय संघ का एक हिस्सा बन गया। ऐसा लगा आदिवासी अस्मिता के दिन बहुरने वाले हैं। पर वही लालू मधु कोड़ा की ताजपोशी में जी जान से जुटे थे । चुनाव प्रचार के दौरान आज भी उनके चेहरे पर वही छकाने वाली मुस्कान देखी जा सकती है। कांग्रेस राज्य में जमीन तलाश रही है। उसका निशाना झारखण्ड नामधारी दलों के आधार को संकुचित करने पर है। शिबू सोरेन की रही सही ज़मीं हथियाने की पुरी तैयारी है।
समझदार लोगों के अनुसार झारखण्ड ... आदिवासियों की प्रतिरोध संस्कृति का आइना है। यह संस्कृति ...कमीशन , छल प्रपंच और तिकड़म के जाल से निकल जाने के आवेग में जन्मी थी। लेकिन आज ये राज्य इन्ही के मकडजाल में उलझ गई है।
आदिवासियों का अपना दिसुम हो इसके पीछे सांस्कृतिक ... सामजिक अवधारणा काम कर रही थी। ये अवधारणा प्रकृति के मेल मिलाप के साथ देसी विचारों के सपनो के सामंजस्य पर बनी थी। इसमे स्वशासन का स्वर भी शामिल था। सामुदाइक जीवन और प्राकृतिक सम्पदा पर सामूहिक अधिकार के कारण ये समझ बनी। लेकिन बाहरी ... जिन्हें वे दिकु कहते ... लोगों की चहलकदमी ने उनकी सरलता को झकझोड़ दिया। बिरसा मुंडा से लेकर ताना भगतों ने स्वीकार किया कि निश्छल जीवन की अस्मिता की रक्षा के लिए प्रतिरोध जरूरी है।
जयपाल सिंह ने जब झारखण्ड पार्टी बनाई तब तक आदिवासी समाज ने इस जरूरत को मान लिया था की उनकी जीवन शैली का आधुनिक सोच के साथ सरोकार हो। आदिवासी इलाकों में प्राकृतिक सम्पदा पर आधारित आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ी तो उन्होंने संघर्ष को निर्माण प्रक्रिया की दिशा में मोड़ने को अपना लक्ष्य बनाया। इस दिशा में बढ़ने के बावजूद अपने मौलिक चिंतन को छोड़ना उन्हें जरूरी नही लगा। यही वजह हुई कि उनकी संस्कृति के संगीतमय प्रवाह को इतिहास नही बनने दिया गया।
आदिवासियों के अवचेतन मन को कुरेदे तो ये प्रवाह आज भी दबी हुई पायेंगे। यही कारण है की राज्य में जितने भी निवेश के प्रस्ताव आए वे खुले दिल से उसका स्वागत नही कर पाये। उन्हें डर है कि वे विस्थापन की जिंदगी जीने को मजबूर हो जायेंगे....अपनी प्रकृति से कट जायेंगे। आदिवासी आकांछा की राह में ये एक बड़ा पेंच है।
उनकी दुविधा ये भी है की राज्य में उनकी जनसँख्या तीस फीसदी के आसपास ही है शेष गैर आदिवासी यानि जिन्हें वो दिकु कहते है। देश की संघीय व्यवस्था के साथ उनके जीवन दर्शन के बीच मेल मिलाप में कमी तो चुनौती है ही। देश में राजनीतिक पतन का असर भी उन पर पडा है। मधु कोड़ा इसके प्रतीक हैं।
१५ नवम्बर २००० को जब झारखण्ड अस्तित्व में आया तो ये उम्मीद बंधी कि बिहार की राजनीतिक विरासत की धुंध छ्तेगी और नया सवेरा आएगा। सपने देखे गए कि शासन का मानवीय चेहरा आदिवासी लोकाचार की रक्षा करने में सफल होगा। लेकिन झारखण्ड आन्दोलन में अहम् भूमिका निभाने वाले नेताओं के बदले व्यवहार के कारण आदिवासी अंतर्विरोध और निराशा के दोहरे भंवर में लोग फँस गए हैं। ऐसे राजनीतिक जानकार भी हैं जो ये मानते हैं कि चुनाव बाद मौजूदा हलचल हटेगा। लेकिन वे आदिवासी अकुलाहट को समझ पाने वाली सरकार ही होगी ये कहने का साहस इन जानकारों में भी नही है। दुनिया भर में आदिवासी जीवन दर्शन की झांकी पेश करनेवाले कुमार सुरेश सिंह और आदिवासी कोमल भावों की पैरोकार महाश्वेता देवी की आस्था क्या धरी की धरी रह जाएगी।
11.11.09
भारत क्या करे
भारत संकट में है, झारखण्ड से भ्रष्टाचार की अनूठी दास्तान लोगों ने सुनी और देखी। देश के कई तबकों में rajniti की ऐसी दशा और दिशा पर चिंता जताई जा रही है। कहा जा रहा है की ye घोटाला saare rekard toregi . छापेमारी की जद में कई पत्रकार भी आए हैं। मीडिया ke एक वर्ग में पत्रकारिता के दलदल में phaste जाने पर घोर निराशा छा गई है।
इधर मंदी ke कमरतोड़ असर के साथ साथ महंगाई लोगों के चैन uraa रहे हैं। लेकिन हैरानी की बात ये है की कांग्रेस पार्टी चुनाव डर चुनाव फतह हाशिल करती जा रही है। ऐसा कैसे सम्भव हो रहा है। लोगों को नही सूझ रहा की वे क्या करें। दिली के हुक्मरानों ने साफ़ कह दिया है की महंगाई रोकने में वे असमर्थ हैं।
आतंकी हिंसा से तो देश लहुलुहान है हे नाक्साली हिंशा की बर्बरता रोज नै मिशल कायम कर रही है। सरकारें इनके सामने असहाय महसूस कर रही हैं। अब ये नक्सालियों पर बमों की वर्षा करेंगे। यानि माँ लिया गया है की और कोई रास्ता नहीं। क्या सरकारी तंत्र ने अन्य विकल्पों का सहारा ले लिया। मनमोहन ने लोगों से उपाय सुझाने को कहा है। क्या जनता इस दुरभिसंधि को समझ पा रही है।
किसी भी देस में संत्रास के ऐसे क्षण आते हैं तो उसे विद्वानों का अब्लाम्ब मिलता है। भारत क्या करे। क्या उसके पास ऐसे विद्वान हैं जो उसे राह दिखाए। सर पटक लें तो एक भी ऐसा नाम नहीं सूझेगा।
जो देस पहले दुनिया को जीने का पथ पड़ता था वहां की ये हालत। हालत ऐसे हैं की नेपाल जैसा देश भी उसे धमकी देता है। पाकिस्तान तो पहले से ही संकट बना हुआ है। और चाइना तो लगातार अरुणाचल प्रदेश पर अधिकार जता रहा है। भारतीये नेताओं का रंग फीका पड़ गया है। वे मिमिया रहे हैं। ॥ कहाँ है वो दर्प। एक दब्बू कॉम की छवि वाले इस देश को कौन रह दिखायेगा। क्या कोई अरस्तू भारतीये क्षितिज पर दिखा रहा ।
जरा इतिहास में झांकें । यूनानी हमले के बाद के समय को याद करें। कैसे चाणक्य ने देश को एक सूत्र में बंधा था। इतना पीछे जाने की भी क्या जरूरत। जिस अमेरिकन जीवन शैली की नक़ल करते हम नही अघाते वहाँ भी कोई चोमस्की है। विद्वान समाज के संबल होते हैं। विकत परिस्थितियों में वे राह दिखाते हैं । पर भारत में ....
राजाओं के युग में भी यहाँ विद्वानों को प्रश्रय मिला करता था। लोकतांत्रिक आधुनिक भारत में तो ये प्रक्रिया और भी मजबूत होनी छाहिये थी।
अब जरा आज़ादी के बाद के परिदृश्य को समझाने की कोशिश करें। नेहरू छद्म नाम से अख़बारों में लिखते और अपनी सरकार के निरंकूस होते जाने के खतरे से आगाह करते थे। ये जानकारी कुछेक संपादकों तक सीमित थी। ऐसा कर नेहरू अपनी बद्दापन की धौंस तो जमा ही रहे थे साथ ही मीडिया के रोल पर सवालिया निशान भी लगा रहे थे।
आख़िर नेहरू को ऐसा करने की क्या जरूरत थी। क्या वो ख़ुद को ही विद्वान के रोल में फिट करनाकी भूल कर रहे थे। कम से कम राधाकृष्णन जैसे फिलोसोफेर तो आस पास थे ही...राजेंद्र जैसे पढ़े लोखे लोग भी थे। पर ये हाशिये पर बिठा दिए गए थे। नेहरू के परम मित्र कृष्ण मेनन अपने को विद्वान समझ बैठे थे। उन्हें इसका गुमान भी हो गया था। लेकिन लन्दन विश्वविद्यालय के भारतीये छात्रों ने ही उनका घमंड तोडा था। तिलमिला गए थे वो।
देशवासियों ने विद्वता के दायरे को इतना संकुचित समझ लिया है की मामूली साहित्यकारों को भी वे विद्वान मान बैठते हैं। किसी वामपंथी कार्यकर्ता से बात कर देख लीजिये । वो फक्र से कहेगा वामपंथी नेता विद्वान होते हैं। यही हाल बीजेपी वालों का है। इनके कार्यकर्ता बीजेपी को विद्वानों से भरी पार्टी बताते नही थकते। देश के कथित बोध्हिजीवी तो पहले से ही अपने को विद्वान समझने में गर्व करते हैं। बड़ी ही निर्लज्जता से रोमिला थापर , राम चंद्र गुहा जैसों को विद्वान बताने के लिए गिरोह सक्रिय रहते हैं। उधर बीजेपी वालों के लिए अरुण शौरी , के आर मलकानी और मुरली मनोहर जोशी से बड़ा विद्वान इस जहाँ में नही है।
अब थोडी बात बिहार की भी कर लें । यहाँ सामान्य समझ वाले सज्जन हैं जिनका नाम है शैबाल गुप्ता। लालू राज के दौरान इन्हे विद्वान् बनने पर जो कुछ लोग तुले तो बना कर ही छोड़ा । वे भी गौरब्मय महसूस करते हैं। जी हाँ ये दयनिए हालत उस राज्य का है जहाँ जनक जैसे राजर्षि हुए ,याज्ञवल्क्य , आर्यभट , कुमारिल, मंडन, पक्षधर , गार्गी, भारती जैसे लोग हुए । चोमस्की जब भी भारत आते हैं, मनेका, अरुंधती जैसे लोग उन्हें सुनने जाते हैं। क्या इन्हे ये सवाल नही सताता की भारत में कोई क्यों नही जिसे सुनने जायें। पुजिवादियों के खिलाफ माओवादियों के समर्थन में खड़े तथाकथित बुधीजीवी उसी पूजीवादी देस अमेरिका के विद्वान चोमस्की से सहयोग की गुहार लगते।
ये नौबत क्यों आई । क्योंकि देश में राजनितिक साजिश के तहत विद्वत परम्परा को सुख जाने के लिए कदम उठाये गए। सिक्षा के मंदिरों को विचारधारा का अखारा बनाया गया। विद्वान होंगे तो निरंकुशता पर भी आगाह किया जाएगा। कुर्सी का सुख मिलता रहे इसके लिए पब्लिक ओपिनियन को प्रभावित करना जरूरी । और इसके लिए मीडिया के साथ सिक्ष्सा केन्द्रों पर अपने पसंद की विचारधारा के लोगों को भरने की परम्परा बुलंदी पर पहुंचाई गई।
लोहिया प्रखर थे और उन्हें विद्वान सहयोगिओं का साहचर्य मिला। बिहार में उनके कई ऐसे ही सहयोगियों को जेपी और कांग्रेस ने हाशिये पर डालने की कोशिश की और सफल भी हुए। इंदिरा के शासन के दौरान वामपंथी लोग शिक्षण संस्थानों पर काबिज हुए और वे आज तक जामे हुए हैं। एनडीए की सत्ता आई तो जे एस राजपूत ने खूब मजे किए।
समस्याएं विकराल होती जा रही हैं । भारत ६० सालों से विकासशील ही बना हुआ है। पर किसी को फिकर नही। माओवाद, सेकुलरवाद, और राष्ट्रवाद के नाम पड़ सत्ता छीनने और बनाये रखने में सभी लगे हुए हैं। स्वार्थ की ऐसे घिनोनी सूरत में आशा की किरण कहाँ से आएगी।
विद्वान अपने आप पैदा नही होते। इसके लिए सही माहौल की जरूरत होती है। अब प्राचीन भारत की तरह गुरुकुल नहीं बनाये जायेंगे। मौजूद विस्वविद्यालयों को ही सत्ता के दखल से मुक्त करने की जरूरत है। पढ़ाई का अस्तर ऊँचा करना होगा। शिक्षा मद में बजट को खूब बढ़ाना होगा। क्या भारतीये राजनीती इसके महत्वा को समझेगी। फिलहाल तो उसे जनता की नासमझी पड़ ही भरोसा है।
26.10.09
मीडिया की त्रासदी
मीडिया दोराहे पर खड़ा है । एक तरफ़ पेशे से विलग गतिविधियों के कारण ये आलोचना के केन्द्र में है तो दूसरी ओर विकासशील भारत की परवान चढ़ती उम्मीदों पर खरा रहने की महती जिम्मेदारी का बोझ । मीडिया पर उठ रही उंगली अ़ब नजरंदाज नही की जा सकती । ये विश्वसनीयता का सवाल है...सर्विवल का सवाल है । आवाज बाहर से ज्यादा आ रही है पर इसकी अनुगूंज पत्रकारों में भी कोलाहल पैदा कर रही है । लेकिन अन्दर की आवाज दबी ...सहमी सी ...बोलना चाहती पर जुबान हलक से उपर नही उठ पाती। ऐसे में शुक्रगुजार वेब पत्रकारिता का जिसने एक ऐसा प्लेटफार्म दिया है जहाँ इस पेशे की सिसकी धीरे धीरे शब्द का आकार ले रही है ।
बहुत ज्यादा बरस नही बीते होंगे जब पत्रकारिता पर समाज की आस टिकी होती थी । आज़ादी के दिनों को ही याद करें तो मीडिया ने स्वतंत्रता की ललक पैदा करने में सराहनीय योगदान दिया था। कहा गया की ये मिशन पत्रकारिता थी । बाद के बरसों में भी मिशन का तत्त्व मौजूद रहा । कहीं इसने विचारधारा को फैलाने में योगदान किया तो कहीं समाज सुधार के लिए बड़ा हथियार बनी । लेकिन इस दौरान मिशन के नाम पर न्यूज़ वेलू की बलि नहीं ली गई । ये नहीं भुलाया गया की कुत्ता काटे तो न्यूज़ नहीं और कुत्ते को काट लें तो न्यूज़ ...
कहते हैं विचारधारा की महिमा अब मलिन हो गई है और विचार हावी हो गया है । ग्लोबल विलएज के सपनो के बीच विचार को सर पर रखा गया । इस बीच टीवी पत्रकारिता फलने फूलने लगी । अख़बारों के कलेवर बदले ...रेडियो का सुर बदला । संपादकों की जगह न्यूज़ मैनेजरों ने ले ली । ये सब तेज गति से हुआ । मीडिया में और भी चीजें तेज गति से घटित हुई हैं । समाज में पत्रकारों की साख गिरी है । यहाँ तक की संपादकों के धाक अब बीते दिनों की बात लगती । कहाँ है वो ओज ।
आए दिन पत्रकारों के भ्रस्त आचरण सुर्खियाँ बन रही हैं । फर्जी कामों में लिप्तता ..महिला सहकर्मियों के शारीरिक शोषण ..मालिकों के लिए राजनितिक गलियारों में दलाली ..जुनिअरों की क्षमता तराशने की जगह गिरोहबाजी में दीक्षित करने से लेकर रिपोर्टरों के न्यूज़ लगवाने के एवज में वसूली अब आम है । नतीजा सामने है । कई पत्रकार जहाँ करोरों के मालिक बन बैठे हैं। वहीँ अधिकाँश के सामने रोजीरोटी का संकट पैदा हो गया है।
दरअसल girohbaajon ने मालिकों की नब्ज टटोली और मालिकों ने इनकी अहमियत समझी । कम खर्चे में संस्थान चला देने और दलाली में ये फिट होते । फक्कर और अख्खर पत्रकार हाशिये पर दाल दिए गए । गिरोह के बाहर की दुनिया मुश्किलों से भरी । अखबार हो या टीवी की चौबीस घंटे की जिम्मेदारी । काम का बोझ और छोटी सी गलती पर नौकरी खोने की दहशत। हताशा इतनी की सीखने ki ललक नहीं। सीखेंगे भी किस्से ..असरदार पदों पर काबिज उन पत्रकारों की कमी नहीं जिन्हें न्यूज़ की मामूली समझ भी नहीं ।
टीवी की दुनिया चमकदार लगती। है भी ...कंगाली दूर करने लायक salary , खूबसूरत चेहरे, कमरे के कमाल, देस दुनिया को चेहरा दिखने का मौका ... और इस सबसे बढ़कर ख़बर तत्काल फ्लैश करने का रोमांच । पहले ख़बर परोसी जाती ... अब बेचीं जाने लगी । तरह तरह के प्रयोग होने लगे । इसके साथ ही trp का खेल सामने आया। ख़बरों के नाम पर ऐसी चीजें दिखाई जाने लगी जिसमे आप न्यूज़ एलेमेन्ट खोजते रह जायेंगे। भूत प्रेत से लेकर स्टिंग ऑपरेशन के दुरूपयोग को झेलने की मजबूरी से लोग कराह उठे। इनके लिए एक ही सछ है --एनी थिंग उनुसुअल इस न्यूज़ --...न्यूज़ सेंस की इन्हें परवाह कहाँ।
शहर डर शहर टीवी चैनल ऐसे खुल रहे हैं जैसे पान और गुटके की दूकान खोली जाती । वे जानते हैं की चैनल खर्चीला मध्यम है फिर भी इनके कुकर्मों पर परदा डालने और काली कमाई को सफेदपोश बनने के लिए चैनल खोले ही जा रहे हैं । इन्हें अहसास है की गिरोहबाज उन्हें संभाल लेंगे। कम पैसों में सपने देखने वाले पत्रकाr भी मिल जायेंगे। और वसूली के लिए चुनाव जैसा मौसम तो आता ही रहेगा।
अब वेब जर्नालिस्म दस्तक दे रही है । कल्पना करें इसके आम होने पर पत्रकारिता का स्वरुप कैसा होगा । अभी तो टीवी पत्रकारिता में ही बहाव नही आ पाया है । न तो इसकी भासा स्थिर हो paai है और न ही इसकी अपील में दृढ़ता । विसुअल का सहारा है सो ये भारतीय समाज का अब्लाम्ब बन सकता है लेकिन ...
चौथे खम्भे पर आंसू बहने का अ़ब समय नही ...पत्रकारों को अन्दर झांकना होगा । उन्हें अपनी बिरादरी की कराह सुन्नी ही होगी । मुद्दे बहूत हैं ...आखिरकार कितनी फजीहत झेलेगी पत्रकारिता ।