<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572</id><updated>2012-02-06T22:15:31.228-08:00</updated><category term='बदलती तस्वीर'/><category term='ग्लोबल ट्रेंड'/><category term='कृषि चेतना'/><category term='बाढ़ का कारण'/><category term='बिहार की चिंता किसे ?'/><category term='नीतीश के चारण पत्रकार ( सेवा यात्रा )'/><category term='यादें'/><category term='जलजमाव की समस्या'/><category term='आन्दोलन अन्ना के मायने'/><category term='बाढ़ की बिपदा'/><category term='मनी आर्डर इकोनोमी'/><category term='बर्निंग इशु'/><category term='बसंत'/><category term='पत्रकारिता की दिशा'/><category term='कांग्रेस चली नीतीश की राह...'/><category term='लोक और तंत्र में जंग'/><category term='उधेरबुन में मीडिया'/><category term='पलायन का दर्द'/><category term='मजदूरों के हित'/><category term='चेंजिंग डैमेंसन'/><category term='संकट'/><category term='चेंगिंग पैटर्न'/><category term='पलायन पर संवेदनहीनता'/><category term='पलायन एक त्रासदी'/><category term='वलेंटाइन डे पर विशेष'/><category term='गोदना शैली'/><category term='साहित्य में पलायन का दर्द'/><category term='बिहारी अस्मिता'/><category term='पलायन-- बदलती प्राथमिकता'/><category term='मीडिया'/><category term='कांग्रेस को अन्ना की चुनौती'/><category term='चुनाव'/><title type='text'>ayachee</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>34</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-315875125156066090</id><published>2012-01-26T01:46:00.000-08:00</published><updated>2012-01-26T03:13:06.817-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नीतीश के चारण पत्रकार ( सेवा यात्रा )'/><title type='text'>सेवा यात्रा और मधुबनी को समृद्ध करने वाले पत्रकार</title><content type='html'>संजय मिश्र -- २३-०१-१२&lt;br /&gt;----------------------&lt;br /&gt;मधुबनी की झोली कितनी बड़ी है ....... क्या आपको अनुमान है उसकी जरूरतों और आकांक्षा की ? उम्मीद कर सकते हैं कि आपका जवाब ना में ही होगा । १९ जनवरी २०१२--शाम होते-होते मधुबनी के लोग हैरानी से भर उठे । सेवा यात्रा की कवरेज दिखा रहे एक रीजनल न्यूज चैनल की स्क्रीन पर लगातार एक टेक्स्ट फ्लैश हो रहा था । इसमें लिखा था--मधुबनी हुई मालामाल। असल में ४.३ अरब की योजनाओं के शिलान्यास के मद्देनजर ये कहा जा रहा था। अगले दिन बिहार में सर्वाधिक रीडरशिप का दावा करने वाले एक अखवार की हेडलाइन देख वे अचम्भे में पड़ गए। इसमें कहा गया कि --मधुबनी की भर गई झोली। शहरवासी एक दूसरे से तजबीज करते दिखे कि क्या वाकई उनकी झोली भर गई ?&lt;br /&gt;आम दर्शक या पाठक मीडिया घरानों की परदे के पीछे की हलचल से अनजान होते...लिहाजा उनकी उलझन समझी जा सकती है। लेकिन इन घरानों में काम करने वाले पत्रकार भी हैरान थे....ख़ास कर टीवी पत्रकार। उन्हें पता है कि सेवा यात्रा से जुड़े विज्ञापनों की बंदरबांट में टीवी चैनलों को ठेंगा दिखाया गया है...जबकि अखबारों पर विशेष कृपा की गई। यही कारण है कि सेवा यात्रा के कवरेज में अधिकाँश न्यूज चैनल एंटी इस्तैब्लिस्मेंट मोड में हैं। विज्ञापन की माया के बावजूद ये समझना मुश्किल है की मधुबनी की उम्मीदों का अंदाजा इन संपादकों ने कैसे लगाया?&lt;br /&gt;दरअसल नीतीश बंदना की कोशिश में ये बताया गया मानो मधुबनी का अब कल्याण होने वाला है। लेकिन जमीनी हकीकत इनका मूंह चिढाने के लिए काफी है। यात्रा के दौरान बलिराजगढ़ में मुख्यमंत्री को ये अहसास हो गया कि जिले के ऐतिहासिक धरोहरों की घनघोर उपेक्षा हुई है। स्थानीय लोग इस उपेक्षा को पहचान मिटाने की साजिश का हिस्सा मानते हैं। खुली आँखों से गढ़ को निहारते नीतीश कुमार को अंदाजा हो रहा था कि बिहार में गया, नालंदा और वैशाली से आगे भी संभावनाएं मौजूद हैं। मधुबनी जिले में खुदाई की बाट जोह रहे ऐसे कई पुरातात्विक स्थल हैं जो वैदिक काल तक की कहानी कहने में सक्षम हैं।&lt;br /&gt;मुख्यमंत्री को अपने बीच पाकर लोगों का गद-गद होना स्वाभाविक है लेकिन फ़रियाद लेकर जनता दरबार में पहुचने के लिए हंगामा करने वालों की तादाद बहुत कुछ कह रही थी। मुख्यमंत्री तक नहीं पहुँच पाए ऐसे लोगों के विदीर्ण चेहरे आभास कर रहे थे कि ख़राब माली हालत देर-सवेर उन्हें पलायन करने वालों की भीड़ में धकेलेगी....और अपने सामाजिक सन्दर्भों से दूर ले जाएगी। जहाँ इनमें से कई लोग गलत संगत में भी पड़ेंगे। आतंकवादियों के चंगुल में फंसे जिले के पांच लोगों की दास्तान मधुबनीवासियों को साल रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस जिले में पलायन नासूर बन गया है। इसकी मारक क्षमता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दरभंगा स्टेशन से खुलने वाली लम्बी दूरी की अधिकाश ट्रेनों का एक्सटेंसन जयनगर तक कर दिया गया है। सघन जन्संख्यां और बाढ़ की विभीषिका पलायन के ताप को बढाती है। उपजाऊ मिट्टी और सिंचाई के लिहाज से जमीन का बेहतरीन ढाल इस इलाके को खेती के लिए बेहद अनुकूल बनाता है। लेकिन पांच दशक से निर्माणाधीन पश्चिमी कोसी नहर यहाँ के लोगों के लिए सपना बना हुआ है। क्या सेवा यात्रा में इस महत्वाकांक्षी परियोजना को पूरा करने का संकल्प है ?&lt;br /&gt;कई बार अकाल की मार झेल रहे इस इलाके में सेकेंडरी सेक्टर का हाल बेहाल है। बिजली सप्लाई में मधुबनी प्राथमिकता सूची से कोसों दूर है। नतीजतन उद्योग -धंधों का विकास चौपट है। पंडौल इंडस्ट्रियल एरिया में चिमनियाँ सालों से बुझी पडी हैं। जिले की बंद चीनी मीलों के खुलने की खबर सुन-सुन कर लोग थक चुके हैं। जिन लोगों को बिहार में इन्फ्रास्त्रक्चार के विकास पर गुमान हो उन्हें इस जिले से गुजरने वाली एन एच १०५ पर एक बार जरूर सफ़र कर लेना चाहिए।&lt;br /&gt;अकाल ने ही मिथिला पेंटिंग का परिचय व्यावसायिक दुनिया से कराया था। दो सालों से मिथिला पेंटिंग संस्थान खोलने की बात कही जा रही है। नीतीश ने एक बार फिर इस वायदे को दुहराया है। ये संस्थान सौराठ में स्थापित होगा.....जी हाँ उसी सौराठ में जहां शादी के इच्क्षुक दूल्हों का मेला लगता है। लेकिन केंद्र से विशेष पॅकेज की मांग करने वाले नीतीश इस बात पर चुप्पी साध गए कि इसी जिले में तेल खुदाई के लिए ओ एन जी सी की ड्रीलिंग का काम क्यों ठप पडा है ? आपको बता दें की सौराठ गाँव में ही ओ एन जी सी का लाव-लश्कर महीनो तक रहा लेकिन रहस्यमई तरीके से ड्रीलिंग का काम रोक दिया गया।&lt;br /&gt;सरकार के अनुसार जिले में करीब ४.३ अरब की ४६७ छोटी-बड़ी विकास योजनाओं का शिलान्यास हुआ । मधुबनी को समृद्ध बनाने वाले संपादक ज़रा नालंदा जिले के आंकड़ों पर गौर कर लें । राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं से अलग नालंदा जिले में स्थाई महत्त्व की करीब ७५० अरब की योजनाओं पर काम चल रहा है। इन आंकड़ों से भी मन न भरे तो ये संपादक मधुबनी के काशीनाथ उर्फ़ राधा-कान्त को याद कर लें जिसने तंगहाली में नगर-पालिका परिसर के सामने आत्म-दाह कर लिया था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-315875125156066090?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/315875125156066090/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=315875125156066090' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/315875125156066090'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/315875125156066090'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='सेवा यात्रा और मधुबनी को समृद्ध करने वाले पत्रकार'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-2185240604767863035</id><published>2011-08-22T02:43:00.000-07:00</published><updated>2011-08-22T05:02:13.384-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कांग्रेस को अन्ना की चुनौती'/><title type='text'>अन्ना के आन्दोलन में उलझे सवाल- पार्ट ३</title><content type='html'>संजय मिश्र&lt;br /&gt;-------------&lt;br /&gt;साल १८८६....स्थान कलकत्ता। अधिवेशन के लिए कांग्रेस को जगह नहीं मिल रही थी। ऐन वक्त पर दरभंगा महाराज आगे आते हैं और अपनी जमीन पर अधिवेशन का इंतजाम करवाते हैं। सन २०११.....अगस्त का महीना। अन्ना की टोली अनशन स्थल के लिए दर-दर भटकती रही। कांग्रेस को १८८६ का अपना दर्द याद नहीं आया। अब वो सत्ता में है। गजब का संयोग है कि कभी आन्दोलन कही जाने वाली कांग्रेस आज अन्ना हजारे के आन्दोलन से सहमी हुई है। २१ अगस्त की शाम अन्ना हुंकार भरते हैं कि या तो जन लोकपाल बिल लाना पड़ेगा नहीं तो जाना पडेगा। डेडलाइन ३० अगस्त का है...जिस दिन अभूतपूर्व आन्दोलन का एलान कर दिया गया है। जाहिर है ये दवाब बनाने की रणनीति है। ये २० अगस्त के शाह-मात के उस खेल का जवाब है जब सोनिया गांधी की करीबी अरुणा राय लोकपाल के अपने वर्जन के साथ मैदान में कूद पडी। -------------------------------------------------------------------------------अन्ना ने लोगों से अपने सांसदों के घर के सामने विरोध जताने का आह्वान कर दिया है। इससे सांसद सकते में हैं। दरअसल, आन्दोलन के विराट स्वरूप के लिए कांग्रेस खुद जिम्मेवार है। पिछले छः महीने के घटनाक्रम बेशक ' काट-लिस्ट ' साबित हुए लेकिन कांग्रेस ने जो हथकंडे अपनाए उसने आग में घी का काम किया। लगातार सत्ता में रहते हुए पार्टी ने अपने संबंध में जो धारणाएं विकसित कर ली हैं यू पी ए-२ में इसका विस्तार हुआ। कांग्रेस इस सोच की आदी है कि इस देश को वो ही चला सकती है। ऐसी भावना कांग्रेसियों में अहंकार भरता है।याद करिए छः महीने पहले तक कांग्रेसी इतरा रहे थे। महंगाई और तमाम तरह के घोटालों से देश दंग रह गया लेकिन पार्टी अपनी ही चाल से चलती रही। खुद पक्ष और खुद विपक्ष की चाल चली गई। यानि चित भी मेरी और पट भी मेरी। विपक्ष को पंगु बनाने साजिशें परवान चढी। वो इस बात को भूल गई कि विपक्ष ' पब्लिक एंगर ' के लिए ' सेफ्टी वाल्व ' का काम करता है। इसने जनता से सरकार की संवादहीनता को बढ़ाया। ----------------------------------------------------------------------------------------------------------इसी बीच अन्ना और रामदेव की मुहिम तेज हुई। अन्ना स्वीकार करते हैं कि जंतर-मंतर पर मिले जन-समर्थन की उन्होंने कल्पना नहीं की थी। लेकिन इस जमावड़े के मिजाज की कांग्रेस ने अनदेखी की। ४ जून की रात राम-लीला मैदान में जो कुछ हुआ उसने देश को हिला कर रख दिया। लोग सवाल करते रहे कि रामदेव ने जब समझौते की घोषणा कर दी तब उनके निजी पत्र को सार्वजनिक क्यों किया गया ? संभव है ताकतवर भ्रष्टाचारियों और काला धन विदेश भेजनेवालों का सरकार पर अत्यधिक दवाब हो ? -------------------------------------------------------------------आम जन इस बात से भी असमंजस में पड़ जाते हैं की सरकार और कांग्रेस के बीच खींच-तान का क्या मतलब है ? सरकार में दो गुट और पार्टी में सोनिया और राहुल के दो गुट....यानि केंद्र में चार पावर सेंटर। कांग्रेस का य़े संकट उस उधेरबुन की उपज कि राहुल को कब पी एम बनाया जाए ? इसके लिए जरूरी है कि पी एम ऐसा हो जो अच्छे और कठोर फैसले से देश में लोकप्रिय न होने पाए। नतीजतन एक मजबूर पी एम के दर्शन को देश अभिशप्त है। इसके पीछे दलील य़े कि सरकार और पार्टी के वजूद अलग रखना आदर्श संसदीये राजनीति है। नेहरू के समय भी ऐसी चर्चा होती रहती थी। लेकिन बाद में कांग्रेस ने इस नीति से तौबा किया। -------------------------------------------------------------------------------------------------------गांधी के समर्थन से पी एम बने नेहरू अपने सपनो का भारत बनाना चाहते थे। ' साइंटिफिक टेम्पर ' उनका मूल-मंत्र था। वे रूमानी कहे जाते थे और उनकी भारत दृष्टी ' कोस्मेटिक ' थी। उनके विचारों से प्रेरित नेता और विशेषज्ञों ने जो संविधान बनाया उसमें दुनिया के तमाम संविधानो के अच्छे तत्वों को शामिल किया गया। उस समय ऐसे लोग भी थे जो संविधान को ' इंडीजेनस ' बनाने या यों कहें कि भारतीय जीवन के अनुरूप ढालने के पक्षधर थे। मसलन य़े वर्ग चाहता था कि राष्ट्र का ' पोलिटिकल फाउंडे-सन ' ग्राम-सभा में निहित हो। आई सी एस को ' डिस - बैंड ' करने की भी वकालत हुई। आग्रह होता रहा कि जो संविधान बना वो एक कलाकार की खूबसूरत कृति तो है लेकिन इसमें प्राण डालने की जरूरत है। लेकिन ऐसे विचार दरकिनार किये गए। ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------जवाब आया के संतनम की ओर से जिन्होंने संविधान बनाने में महती भूमिका अदा की थी। उन्होंने संविधान सभा के फाइनल डिबेट्स में गरजते हुए कहा कि संविधान के किसी हिस्से की आलोचना नापाक मानी जाएगी। यानि संविधान ' सेंकतम -सेंक्तोरम ' की तरह देखी गई। फिर भी इस ' होली काव ' में सैकड़ों संसोधन लाए जा चुके हैं। दिलचस्प है कि ऐसे ही एक संसोधन के जरिये राजीव गांधी ने पंचायती व्यवस्था को व्यापक बनाने की पहल की। दिग्विजय सिंह जब मध्य-प्रदेश के सी एम हुए तो उन्होंने सत्ता के विकेंद्रीकरण के प्रयास किये। सत्ता की निष्ठुर माया देखिये आज वही दिग्विजय हाथ-पैर भांजते हैं और ओसामा को ओसामाजी कह कर संबोधित करते हैं। कांग्रेस ब्रांड सेक्युलरिज्म और बी जे पी के हिंदुत्व के बीच भारतीय मानस पिस रहा है। अन्ना का ग्राम-संसद इसी मानस को आवाज देता है। ------------------------------------------------------------------------किसी भी आन्दोलन को अंजाम तक पहुँचने के लिए विचारधारा, नीति और संगठान जरूरी हैं..साथ ही सत्ता हासिल होने पर नीति के हिसाब से बनी योजनाएं अमल में लाइ जाए। अन्ना के पास विचार-धारा तो नहीं पर विचार हैं। लेकिन उनके पास न तो संगठन है और न ही वे सत्ता चाहते हैं। यही असलियत इस अप्रत्याशित आन्दोलन को खतरनाक बनाती है। कांग्रेस को समय की पुकार सुननी चाहिए। तिकरम छोड़ उसे जल्द-से-जल्द सकारात्मक कदम उठाने ही होंगे। आखिरकार, इमर-जेंसी के बाद इंदिरा ने देश से माफी मांग कर बड़प्पन ही दिखाया था।&lt;br /&gt;-------&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-2185240604767863035?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/2185240604767863035/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=2185240604767863035' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/2185240604767863035'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/2185240604767863035'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2011/08/blog-post_22.html' title='अन्ना के आन्दोलन में उलझे सवाल- पार्ट ३'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-1083160317016407877</id><published>2011-08-20T00:53:00.000-07:00</published><updated>2011-08-20T02:04:53.088-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आन्दोलन अन्ना के मायने'/><title type='text'>अन्ना के आन्दोलन में उलझे सवाल-- पार्ट 2</title><content type='html'>संजय मिश्र&lt;br /&gt;---------------&lt;br /&gt;देश आज ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ से कई रास्ते फूटते हैं। कई लोग मानते हैं कि कुछ समय बाद देश पुराने ढर्रे पर लौट आएगा। ऐसा हुआ , तो भी , यकीन मानिये उसकी चाल बदली हुई होगी। सड़कों पर उतरा जन सैलाब कांग्रेस ही नहीं, बल्कि तमाम राजनीतिक दलों के मौजूदा तौर-तरीकों को खारिज करने पर उतारू है। राजनेता जब कहते हैं कि संसद को चुनौती मिल रही है तब वे खतरे की इसी घंटी को कबूल कर रहे होते हैं। " सब चलता है " --की सोच के आदी ये राजनेता जान रहे हैं कि रवैया बदलना होगा और इसे अलग वेव लेंथ पर ले जाना होगा। --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ऐसा मानने वाले भी कम नहीं कि अन्ना का आन्दोलन खतरनाक दिशा में जा सकता है। तुषार गांधी को आशंका है कि इस जन उबाल को " वेस्टेड इंटरेस्ट " हाईजेक भी कर सकते हैं। वरिष्ठ पत्रकार विनोद मेहता मानने लगे हैं कि आन्दोलन का विस्तृत फलक इस दुराग्रह को बेमानी बना चुका है कि ये आर एस एस प्रायोजित है। अब कहा जा रहा है कि राष्ट्रवादी ताकतों के बंधन से ये आन्दोलन १६ अगस्त को ही निकल गया। क्या वाम, क्या दक्षिण और क्या मध्यमार्गी .......किसिम किसिम के विचार वाले तत्त्व इस आन्दोलन में घुस गए हैं। यहाँ तक कि माओवादी भी समर्थन कर रहे हैं...जी हाँ वही माओवादी जिनके लिए अन्ना की अहिंसा नीति चुनौती के समान है। ------------------------------------------------------------------------------------------------------------एक रास्ता कल को उज्जवल बनाने की दिशा का भी है। गाँव से लेकर शहर तक अन्ना को समर्थन कर रहे लोग सुखद भविष्य की कामना पूरा करने वाले राह को खोज रहे हैं। ये कैसी तलाश है ? जो महिलाएं बच्चे को गोद में लेकर पहुँची हैं जरा उनके मिजाज को पढ़िए। गैस सिलेंडर के दाम की याद दिला कर वे कमरतोड़ महंगाई की तरफ इशारा कर रही हैं। सरकार महंगाई की वजह ग्लोबल इकोनोमी में ढूंढ रही है। इस इकोनोमी के बेचैनी बढाने वाले नतीजे दुनिया भर में दिखते हैं। चिंता के बीच वैश्वीकरण की यात्रा के पहले पड़ाव तक के सफ़र की समीक्षा हो रही है। इसके दुष्प्रभावों से " भारत " ही नहीं बल्कि जिसे हम " इंडिया " कहते हैं वो भी अछूता नहीं। अन्ना इस अर्थव्यवस्था की उपज को बढे हुए भ्रष्टाचार में देखना चाह रहे हैं। ------------------------------------------------------------------------------------- पिछले दो दशक में उदारीकरण की नीति से फायदा पाने वाले अमेरिका-मुखी नेट सेवी नौजवानों की भी थोड़ी बात कर लें। किसी भी कीमत पर सफलता और समृधि की चाहत को इन्होने जीवन का मकसद मान रखा है........चाहे इसके लिए नैतिकता की बलि क्यों न चढ़ानी पड़े ? इस तबके का बड़ा हिस्सा आज आन्दोलन के साथ है.......अन्ना के नैतिक बल की आभा से वशीभूत। क्या इस वर्ग को मालूम है कि अन्ना ने भारत की आत्मा से उसका दर्शन कराया है ? क्या अन्ना को अहसास है कि भारत और इंडिया के मिलन का ये प्रस्थान बिंदु हो सकता है ? क्या वे सचेत हैं कि ये आन्दोलन इस मुतल्लिक एक अवसर लेकर खडा है ? क्या अन्ना के मन में इस सन्दर्भ में कोई योजना आकर ले पाई है ? --------------------------------------------------------------------------------------------------------------फिलहाल, दुनिया का सबसे युवा देश धोती-कुर्ता वाले एक शख्स की धमक सुन रहा है। अन्ना के एजेंडे में भ्रष्टाचार, चुनाव-सुधार और ग्राम-संसद जैसे मुद्दे हैं जिसके जरिये राज-सत्ता को लोक-सत्ता में बदलने, राजनेताओं को जिम्मेदारी का अहसास कराने और संविधान की कमियों को पाट कर उसे ज्यादा जीवंत बनाने की लालसा है। साधारण भाषा में कहें तो शायद हर दिन २० रूपये में जिन्दगी बसर करने वाली ८० फीसदी आबादी और समृधि में जी रहे २० फीसदी आबादी के बीच संवाद बनाने की " जिद " है ये। क्या देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस इसे समझ रही है ?&lt;br /&gt;जरी है.........&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-1083160317016407877?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/1083160317016407877/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=1083160317016407877' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/1083160317016407877'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/1083160317016407877'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2011/08/2.html' title='अन्ना के आन्दोलन में उलझे सवाल-- पार्ट 2'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-4668634674630171326</id><published>2011-08-18T00:18:00.000-07:00</published><updated>2011-08-18T02:04:18.343-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लोक और तंत्र में जंग'/><title type='text'>अन्ना के आन्दोलन में उलझे सवाल- पार्ट १</title><content type='html'>संजय मिश्र&lt;br /&gt;-------------&lt;br /&gt;कुछ-कुछ तहरीर स्क्वेर सा नजारा.... पर संयत। फिजा में हर तरफ संयम....कहीं कोई तनाव नहीं। उलटे उमंग और आकांक्षा पसरती हुई। जी हाँ, दिल्ली ने इस तरह का जन सैलाब उमरते कभी न देखा था। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं और उस युवा पीढी की मौजूदगी जिसने हाल ही में " जैस्मिन रेवोल्यूसन "से मौन सहमति जताई है। कभी लगता किसी उत्सव में शरीक होते लोग हैं ये पर अगले ही क्षण बेहतर भविष्य की ललक दिखाते मन को आश्वस्त करते चेहरे। ये सोलह अगस्त २०११ की बात है। ------------------------------------------------------------------ देश ने एक और अद्भुत दृश्य देखा....और वो १५ अगस्त दोपहर बाद का था। हुक्मरानों के अड़ियल रवैये से व्यथित अन्ना राजघाट पहुंचे थे। उस समय चंद लोग ही थे वहाँ। गांधी समाधि के सामने घास पर मौन बैठे अन्ना मानो राष्ट्र-पिता से बात कर रहे हों। अनुमान करिए वे क्या कह रहे होंगे गांधी से? संभव है बापू के सपनो की धज्जियां उड़ने पर अपराध बोध जता रहे हों...इस आत्मालाप के दृश्य जब टीवी स्क्रीन पर दिखे तो देश चकित रह गया। झकझोड़ने वाले इन दृश्यों को महसूस करने दिल्ली के लोग घरों से निकल पड़े। दो घंटों के भीतर आठ हजार लोग जमा हो चुके थे ..... सभी अभिभूत और शांत -चित। ------------------------------------------------------------------------आखिरकार एक बच्चा अन्ना के करीब पहुचता है और बैठ जाता है। अन्ना की तंद्रा भंग होती है। वो उस बच्चे को पुचकारते हैं। बच्चा भी सहट कर अन्ना के बिलकुल करीब आ जाता है। तभी एक और बच्चा अन्ना के पास पहुच कर प्रणाम करता है। अन्ना झट उठ खरे होते हैं। उन्हें जवाब मिल चुका है। शायद ये बच्चे अहसास करा रहे थे कि उनके लिए अन्ना को अपनी मुहिम जारी रखनी है। अन्ना का मन अब हल्का हो चला था। देर शाम अन्ना का देश के नाम संबोधन .............. दिल थाम कर सुनते लोग। ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------आजादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ जब देश-वासी प्रधान-मंत्री के भाषण से ज्यादा किसी दुसरे शख्स के संबोधन के लिए उद्विग्न थे। जो आहट १५ अगस्त को दोपहर बाद सुनाई दी उसे संपूर्णता में लोगों ने १६ अगस्त को देश भर में देखा। जन लोकपाल के धुर विरोधी मशहूर न्यायविद के टी एस तुलसी १६ अगस्त की शाम होते-होते अन्ना को सलाम कर रहे थे। १७ अगस्त का दिन..... आखिरकार पी चिदंबरम को कहना पडा कि अन्ना सच्चे गांधीवादी हैं और उनको नमन करता हूँ। अन्ना की आंधी ने राज-सत्ता को हिला कर रख दिया था ...संसद के गलियारों में मौजूद सहमे राज-नेता बौने नजर आने लगे थे।------------------------------------------------------------------------------क्या जनता ने लोक-जीवन के लिए नया बिम्ब गढ़ा है ? बौध्धिकों ने माना कि जन-भावना को समझने में सरकार ने भूल ही नहीं की बल्कि उसका तिरस्कार किया। सरकार के साथ-साथ राजनीतिक बिम्ब गढ़ने में माहिर रहे लालू इसे स्वीकार करने के बदले संसद की अस्मिता बनाम अन्ना की चाल चलने में मशगूल हैं। दर-असल लोक जीवन का ये नया बिम्ब साफ़ इशारा कर रहा है कि सरकार चलाने और राज करने के फर्क को समझें राजनेता। -----------------------------------------------------------------------------सत्ता से जुड़े लोगों ने आजादी के बाद से ही कई प्रतिमान गढ़ लिए हैं। पिछले दिनों के घटनाक्रमों पर नजर डालें तो इसने निहायत ही कई नए सवाल खड़े कर आम-जानो को चौंका दिया। ज़रा सवालों को याद करें.......&lt;br /&gt;कोई भी(अन्ना और रामदेव की मुहिम) आ-कर अपनी बात नहीं मनवा सकता&lt;br /&gt;पहले चुनाव लड़े तब सवाल करें&lt;br /&gt;संसद सर्वोच्च है.....&lt;br /&gt;जाहिर है ऐसे सवाल लोगों को मथते रहे और समझदार लोगों को भी इस भूल-भुलैया में फंसाते रहे। -----------------------------------------------------ये गहरी चाल थी.....पर अन्ना अडिग। वे कहते रहे कि---आप सेवक हैं और हम मालिक। ये भीतर से लहू-लुहान करनेवाला जवाब होता था। फिर भी सत्ता के लोग नहीं चेते। १६ अगस्त ने इनके सभी प्रतिमान और सवालों को ध्वस्त कर दिया और राजनेताओं की असल हैसियत को आइना दिखा गया। --------------------------------------------------------------------------------------------------१६ अगस्त के बारह घंटे ने अन्ना की मुहिम को आन्दोलन की शक्ल दे दी। ये अलग तरह का आन्दोलन है---जे पी के आन्दोलन से निहायत ही अलग। इसका नेतृत्व गैर-राजनीतिक है जो इसकी ताकत भी है और भविष्य में कमजोरी भी बन सकता है। लोग कहते हैं कि इसने देश को एक-सूत्र में जोड़ दिया है। सुखद आश्चर्य ये कि सारे भेद मिटते नजर आए। लेकिन गौर करें तो इसकी असल ताकत कहीं और नजर आए। दर-असल इसने भारत और इंडिया के द्वंद्व को भोथरा किया है। .... फेस-बुक जेनेरेसन वाले इंडिया का भारत से साक्षात्कार किया है। ...गांधी जरूर निहार रहे होंगे कहीं से.....&lt;br /&gt;जारी है....&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-4668634674630171326?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/4668634674630171326/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=4668634674630171326' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/4668634674630171326'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/4668634674630171326'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='अन्ना के आन्दोलन में उलझे सवाल- पार्ट १'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-228292948755076341</id><published>2011-07-05T22:29:00.000-07:00</published><updated>2011-07-06T01:05:48.251-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गोदना शैली'/><title type='text'>मिथिला चित्रकला----पार्ट ४</title><content type='html'>संजय मिश्र&lt;br /&gt;-------------&lt;br /&gt;जातीय और धार्मिक एक्सक्लूसिव्नेश के बावजूद मिथिला के लोगों में मेल-मिलाप बड़ा ही लोचपूर्ण है। जानकार इस तरह की जीवन्तता के अनेक कारण बताएँगे। समझ ये भी है कि यहाँ की समस्याएँ लोगों में सामूहिकता के भाव की वजह बनती है....आखिर विपत्ति बिना भेद-भाव के कष्ट जो देती है। मसलन बाढ़ का पानी जब तांडव मचाता है तो जीवन बचा लेने की आस में सभी एक हो जाते हैं। साठ के दशक का अकाल ऐसी ही नौबत लेकर आया। सूनी आँखों में चमक लाने के लिए केंद्र की हेंडीक्राफ्ट बोर्ड ने मिथिला की लोक चित्रकला को बाज़ार की रौशनी देने का फैसला लिया। ------------------------------------------------------------------------------------------------------ये प्रयास मधुबनी की गांवों से शुरू हुए। बोर्ड की तरफ से मिथिला चित्रकला लिखने के लिए ख़ास किस्म के कागज़ आने लगे। हर कलाकार को दस रूपये प्रति चित्र की दर से भुगतान होता। ब्राह्मण और कायस्थ महिलायें तो कागज़ पर चित्र बनाने लगी लेकिन वंचित समाज की स्त्रियाँ ऐसा नहीं करतीं। उन्हें मिथिला चित्रकला को कागज़ पर उतारना दुरूह लगता। लिहाजा वे बोर्ड की तरफ से मिले कागजों को अपनी सवर्ण बहनों के हाथ औसतन पांच रूपये में बेच लेतीं। मिथिला चित्रकला को बढ़ावा देने में लगे सोशल एक्टिविस्ट इससे निराश हुए। इन्होने ऐसी महिलाओं को प्रेरित किया कि वे अपने घरों की भीत पर लिखे गए पारंपरिक आकृतियों को ही कागज़ पर उतार लें। --------------------------------------------------------------------------------------------------मेहनत रंग लाई और इनके चित्रों का दर्प धीरे-धीरे कला जगत को लुभाने लगा। ये महिलायें अपने-अपने जातिगत संस्कार और परिवेश की विविधता को आकार देने लगी। कला समीक्षकों में --"थीम के इस प्रस्फुटन "-- को नया नाम देने की होड़ मच गई। कोई इसे मिथिला चित्रकला की 'हरिजन शैली ' कहता तो किसी को 'गोबर पेंटिंग ' कहना अच्छा लगता। ये कथा सातवें दशक के शुरूआत की है। महिलाओं को प्रोत्साहन देने के सिलसिले में इसी दौरान कुछ एक्टिविस्टों ने इन्हें 'गोदना ' को ही कागज़ पर उतारने की सलाह दी। कृति में तात्विक अंतर उभरा लेकिन ये कारगर साबित हुआ। -----------------------------------------------------------------------------दरअसल, दलित आकांक्षा की इस चेतना को रौदी पासवान की सक्रियता से बल मिला। बाद में शिवम् पासवान ने बीड़ा उठाया। ये लोग भाष्कर कुलकर्णी की जिजीविषा से बेहद प्रभावित थे। उधर गोदना को अभिव्यक्ति देने की मुहिम में कृष्ण कुमार कश्यप बढ़-चढ़ कर लगे। लेकिन इस उत्साह को बरकरार रखने के लिए गोदना पैटर्न को जमा करने की जरूरत थी। कश्यप उस समय जितवारपुर में ही रह रहे थे। गोदना पैटर्न को संकलित करने के लिए उन्होंने सालों तक यात्रा की। भारतीय और नेपाली मिथिला क्षेत्र के अलावा वे देश के कई राज्यों में गए। पर मुश्किलें मुंह बाए खड़ी थी। आखिर कोई स्त्री अपनी काया को निर्वस्त्र कर उन्हें गोदना पैटर्न कैसे दिखाए? बाद में इस मुहिम में शशिबाला, अनीता और उत्पल जैसे सहयोगी भी उनसे जुड़े। -------------------------------------------------------------------------------------------------------गोदना की परंपरा वैसे तो हर जाति की स्त्रियों में देखा गया है लेकिन हाशिये पर खड़े समाज में इसकी अधिकता है। मिथिला चित्रकला जहां भीत को सुशोभित करती रही वहीं गोदना शरीर का श्रृंगार हुई। जब मामला शरीर का हो तो स्त्री के भाव को समझा जा सकता है.....&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;............उतरहि राज सं आयले एक नटिनीयां रे जान &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;रे जान , बसि गेलै&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt; चानन बिरिछिया रे जान &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;घर सं बहार भेली सुनरी पुतौह रे जान&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;रे जान, हमुर सांवर गोदना गोदायब रे जान.......&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;ऐसे ही मनोभावों को याद कर महिलाएं जब कागज़ पर गोदना लिखने के लिए उत्साहित हुई , तो फिर पीछे मुड कर नहीं देखा। ---------------------------------------------------------------------------------------------------------लेकिन कला की अपनी ड़ेनामिक्स' होती है। वो महज मनोभावों पर निर्भर कहाँ होती। वो कैसे माने कि करोडी जाति की महिलाएं जो गोदना पैटर्न गृहश्थ स्त्री के अंगों पर बनाती उसे हू-ब-हू चित्र में उतार लिया जाए? जानकार बताते हैं कि गोदना परिचय का प्रतीक है....वंश - कुल की पहचान के रूप में ये चला आ रहा है। पूर्वी भारत में मान्यता है कि गोदना गुदवाने से स्त्रियों की मनोकामना कामख्या देवी पूरा करतीं हैं। कामख्या तंत्र का केंद्र रहा है। तंत्र में चौंसठ योगिनी की चर्चा है......जिसमें नैना योगिन भी एक हुई। मिथिला की विवाह पद्धति में नैना योगिन भी एक विधि है। माना जाता है कि इस विधि से नव-दंपत्ति के कुशल-क्षेम की रक्षा होती है। ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------मेन-स्ट्रीम मिथिला चित्रकला जहां प्रतीकात्मक और सांकेतिक ज्यादा है वहीं तंत्र के असर से लबरेज गोदना को कला की बारीकियों के हिसाब से ढालना कश्यप के लिए परीक्षा के सामान थी। अब तक उनका सरंजाम बरहेता(उनका पैतृक गांव) आ चुका था। बरहेता मिथिला चित्रकला के बड़े केंद्र के रूप मेन उभर रहा है। यहाँ गोदना को शैली देने की कोशिशें साकार हुई। यहाँ बनने वाले चित्र में मेनस्ट्रीम मिथिला चित्र भंगिमा, गोबर शैली और गोदना शैली का ' फ्यूजन' नई पहचान बना रहा है। --------------------------------------------&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;प्रयोग स्वांत-सुखाय हो तो कोई बात नहीं....पर कला की दुनिया में कबूले जाने तक की यात्रा कठिन होती है। प्रचलित मान्यता एक तरफ और थीम का विकल्प दूसरी तरफ। अब जैसे मुसहर जाती की स्त्रियों का उदाहरण लें। इनके लिए शादी तब तक अधूरी...जब तक गोदना न कराया गया हो। दुराग्रह ये कि गोदना नहीं तो ससुराल में रसोई घर जाना वर्जित यानि गोदना होने तक वे अपवित्र मानी जाती। इनके गोदना पैटर्न को कला जगत की जरूरत के हिसाब से सिक्वेंस देना दिलचस्प चुनौती। -----------------------------------------------------------------------------------थोड़ी बात रंग की कर लें। पहले स्त्री के वक्ष से निकले दूध, दीप की ज्वाला से निकली कालिख और पीपल की टहनियों से निचोड़े दूध को मिला कर रंग बनाया जाता था। मुसलमान-कालीन भारत में इसमें बदलाव हुए। अब करोडी जाति की स्त्रियाँ प्रचलित तरीके से बने रंग में सूअर की चर्बी का रस मिलाने लगीं। मकसद ये कि मुसलमान फ़ौज गोदना करवाई महिलाओं को उठा ले जाने से परहेज करें। आज-कल तो करोडी बाजारू रंग का इस्तेमाल भी करने लगे हैं। पहले सुई से गोदना गोदा जाता....उसकी जगह आज ब्लाक (ठाप्पा) का चलन हो गया है। गोदना प्रक्रिया में होते रहे बदलाव के बीच इनके पैटर्न में सोच की निरंतरता के सूत्र को खोजना और समझना कलाकार के लिए जरूरी हो जाता है। ---------------------------------------------------------------------------मिथिला चित्रकला की गोदना शैली में पिंक( ईट जैसा रंग) और हरे रंग को महत्त्व मिल रहा है। दूसरे रंग भी सीमित मात्रा में इस्तेमाल हो रहे हैं। तंत्र में बोर्डर को दिक्पाल माना जाता.....जबकि गोदना शैली के बोर्डर में ये भाव भी झांकता है कि स्त्री की कामना का परिवेश कितना बंधा हुआ है? इस तरह के प्रयोग माटि की गंध देने वाले हैं। ये अलग स्वाद देने का आह्लाद है। लेकिन कहावत है---' सुखक श्रृंगार, दुखक अहार'। यानि मिथिला पेंटिंग्स पेट भरने के लिए बन रहे हैं। ये सौन्दर्य-बोध की कौन सी समा बांधेगा? क्या मिथिला चित्रकला का प्रकम्पन आम प्रयोग-धर्मी महसूस करवाने में समर्थ हो रहे हैं? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;--------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-228292948755076341?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/228292948755076341/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=228292948755076341' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/228292948755076341'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/228292948755076341'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='मिथिला चित्रकला----पार्ट ४'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-7918978572109934652</id><published>2011-06-08T22:01:00.000-07:00</published><updated>2011-06-09T00:14:09.981-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उधेरबुन में मीडिया'/><title type='text'>अन्ना, रामदेव और पीसी में जूता- पार्ट २</title><content type='html'>संजय मिश्र&lt;br /&gt;----------------&lt;br /&gt;गृह मंत्री पी चिदंबरम ने आठ जून को लगभग धमकाने वाले अंदाज में कहा कि ....(जन-आंदोलनों के ) कम्पे-टि-टिव कवरेज से देश की लोकतांत्रिक व्यवश्था को ख़तरा है। दिल्ली के कई टीवी चैनलों ने सरकार के इस खतरनाक इरादे की अनदेखी की। इस बयान का पीसी में जूता प्रकरण के दौरान कांग्रेसी बीट वाले पत्रकारों के रवैये से गहरा नाता है। ये नौबत क्यों आई कि हाल के आंदोलनों को सबक सिखाने के बाद अब निशाना मीडिया पर आ गया है।iskee तह में जाना जरूरी है। -----------------------------------------------------------------------पिछले लोक सभा चुनाव से लेकर झारखंड विधान सभा चुनाव तक दिल्ली के रसूख वाले अधिकाश पत्रकार कांग्रेस की गोद में लोटते नजर आए। इसी दौरान ऐसा माहौल बनाया गया मानो देश की किसी ज्वलंत समस्या को उठाने के लिए पहले आपको इन पत्रकारों से सेक्यूलर होने का सर्टिफिकेट हासिल करना होगा। ये कांग्रेस और वाम प्रतिपक्ष का दुराग्रह रहा है। लेकिन केंद्र की सत्ता को खुश करने के लिए ये पत्रकार ख़म ठोक कर मैदान में आ गए। ऐसा सन्देश दिया जाने लगा मानो सेक्यूलर होने का सर्टिफिकेट लेने में नाकाम हुए तो कम्यूनल करार दिए जाएंगे। जनता हैरान होकर सवाल कर रही है कि सेक्यूलर का --एंटो- निज्म-- कम्यूनल कब से हो गया। ----------------------------------------------------------------------------------------------------समझदार लोग जानते हैं कि सेक्यूलरिज्म की अवधारणा सत्ता और शाशन के लिए है न कि आम जानो के लिए। संविधान कि मूल स्पिरिट मानती है कि भारत के लोग --इन एसेंसिअल -- धार्मिक हैं और रहेंगे। ऐसे में जनता दिग्भ्रमित हो जाती है जब मीडिया के लोग चुनाव विश्लेषण के दौरान सेक्यूलर वोट और कम्यूनल वोट की बात करने लगते हैं। वोटरों को सेक्यूलर और कम्यूनल घोषित करने के बाद अब बारी है समस्याओं को सेक्यूलर और कम्यूनल घोषित करने की। क्या भूख सेक्यूलर या कम्यूनल हो सकता है? ---------------------------तो फिर दिल्ली के इन पत्रकारों ने अन्ना का समर्थन कैसे कर दिया ये जानते हुए कि कांग्रेस अन्ना के पीछे आर एस एस का हाथ देखती है? कांग्रेस को तो ----तहरीर स्क्वयेर फेनोमेना ---- का डर सता रहा था। पर इन पत्रकारों को किसका डर था? दरअसल ये पत्रकार अपनी ही जाल में उलझ गए हैं। अपनी दूसरी पारी में कांग्रेस ने सोची समझी रण-नीति के तहत पक्ष और विपक्ष खुद ही होने का खेल खेल रही है। इशारा ये कि विपक्ष है ही कहाँ? जूता प्रकरण भी इसी सवाल को लेकर था। -----------------------------------------------------------कांग्रेस को खुश करने के लिए ये पत्रकार भी इसी दोहरी भूमिका में आ गए। यानि खुद ही पक्ष और खुद ही विपक्ष। इसके लिए न्यूज़ की एंगल और स्टूडियो में बहष का टोन एंड टेनर बदला गया। बार बार एंकरों ने बताया कि विपक्ष है ही कहाँ? आम तौर पर जनता मीडिया की बातों पर भरोसा करती है। लिहाजा ये दलील उनके दिमाग में बैठने लगी। जनता ने जानने की जहमत नहीं उठाई कि वाम और दक्षिण विपक्ष अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहे या नहीं। जंतर-मंतर पर अन्ना को मिला ये समर्थन इसी समझ का प्रतिफल थी। -----------------------------------नतीजा ये भी सामने है कि वाम विपक्ष जहां डिफेन्स की मुद्रा में है वहीँ दक्षिण विपक्ष हताश। इस असहज स्थिति का नजारा टीवी स्टूडियो की बहसों में देखा गया....जब वाम नेता कई बार एंकरों को फटकारते नजर आए....ये कहते हुए कि ----पत्रकारों की तरह सवाल करो ना कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं की तरह। -----------------------------------------------------------------------------------------विपक्ष दबाव में हो और मीडिया एंटी इस्तेबलिस्मेंट न हो तो सत्ता तानाशाह हो ही जाती है। ऐसा बिहार में भी है और दिल्ली में भी। दोनों जगहों पर पत्रकार सरकारी दबाव झेल रहे और डांट-डपट सुन रहे। इस उलझन से निकल कर ----एंटी एस्तेब्लिस्मेंट मोड़ ---में जाना हमेशा मुश्किल होता है।---------------------------------------------------------रामदेव में आन्दोलन को लीडरशिप देने की अक्षमता सामने है......लिपस्टिक लगाने वालों का मोमवत्ती जलाना बहुतों को रास नहीं आता....बावजूद इसके जनता की निराशा और विपक्ष को ख़त्म दिखाने कि पत्रकारों की जिद्द ने गैर राजनितिक मुहिम को उभरने का मौक़ा दे दिया। लेकिन कई सवाल उठ रहे हैं। लगातार तीन दिनों तक रामदेव की सलवार कमीज में पत्रकारों की दिलचस्पी किस गंभीरता का परिचायक है।---------------------------------------------------------------------------------------------रामदेव के अलावा कई लोग इस बात से वाकिफ हैं कि काला धन से भिड़ना कितना खतरनाक है। काला धन वाले कितने ताकतवर हैं इसे सब जानते। अपनी हैसियत घटा चुके दिल्ली के ये पत्रकार चिदंबरम की चेताबनी के बाद क्या करेंगे? क्या देश फिर उसी राह पर चलेगा जब लोगों की समस्याओं से आर एस एस का भूत दिखा कर मुंह फेर लिया जाएगा?&lt;br /&gt;---------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-7918978572109934652?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/7918978572109934652/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=7918978572109934652' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/7918978572109934652'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/7918978572109934652'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2011/06/blog-post_08.html' title='अन्ना, रामदेव और पीसी में जूता- पार्ट २'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-513482387500737038</id><published>2011-06-07T22:27:00.000-07:00</published><updated>2011-06-08T00:07:41.702-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पत्रकारिता की दिशा'/><title type='text'>अन्ना, रामदेव और पीसी में जूता -----१</title><content type='html'>संजय मिश्र&lt;br /&gt;--------------&lt;br /&gt;राजनीतिक परंपरा के लिहाज से राम-लीला मैदान में हुई बर्बर कार्रवाई को समेटे ४-५ जून काला दिन कहलाने का अधिकारी है.....इसमें संभव है किसी को आपत्ति हो जाए। लेकिन ६ जून को कांग्रेस पीसी में जो कुछ हुआ वो पत्रकारिता के लिए काला दिन कहलाए .....इसमें किसी संजीदा पत्रकार को शक-सुबहां नहीं होना चाहिए। इसलिए नहीं कि कथित पत्रकार ने जनार्दन द्विवेदी को जूता दिखाया....बल्कि इसलिए कि वहां मौजूद पत्रकारों ने राजस्थान के उस अभागे पत्रकार की बेरहमी से धुनाई कर दी। कांग्रेस बीट संभालने वाले दिल्ली के ये पत्रकार यहीं नहीं रुके...इस घटना के बाद वो दिग्विजय सिंह के सामने निर्लज्जता से अपनी बहादुरी का बखान कर रहे थे। टीवी चैनलों के पत्रकार फ़टाफ़ट फ़ो-नो देने लगे। ई टीवी से एनडीटीवी ज्वाइन करने वाले एक पत्रकार ने अपने फ़ो-नो के दौरान पत्रकारिता में तटस्थ रहने की दुहाई दी। जबकि कई एंकर और पत्रकार जनार्दन, दिग्विजय और राजीव से कांग्रेस ऑफिस में सुरक्षा बढाने के लिए मनुहार करते नजर आए।---------------------------------------------------------------------------------------------------------- इस हंगामे के बीच बार-बार इस की खोज हो रही थी कि जूता दिखाने वाला पत्रकार कहीं एक ख़ास विचार-धारा से प्रभावित तो नहीं। हैरानी कि बात तो ये कि इस पड़ताल में कांग्रेस बीट के पत्रकार भी शामिल थे। क्या वे ---तटस्थ भाव---से व्यवहार कर रहे थे। एक अदना सा दर्शक भी इस वाकये को देख कर महसूस कर रहा था कि उस वक्त कांग्रेसी बीट वाले पत्रकारों से ज्यादा संयम वहां मौजूद कांग्रेसी कार्यकर्ता दिखा रहा था। -------------------------------------------------------------इस वाकये के बाद मीडिया में सवाल उठने लगे हैं कि क्या पत्रकारों के ऐसे रवैये के लिए महज --चमचा-- शब्द काफी है? लोब्बीबाज, दलाल और चमचा के बाद अब कौन सा विशेषण तलाशा जाए? दिल्ली के ये पत्रकार ( खास-कर मशहूर टीवी चैनलों के ) किस मनोदशा में जी रहे हैं? वे चाहते क्या हैं? इसे समझने के लिए थोड़े तफसील में जाना होगा। -------------------------------------------------------------------------------------अन्ना हजारे के आन्दोलन से लेकर रामदेव के राम-लीला प्रकरण के बीच के समय पर ही गौर करें। इस दौरान देश ने कई ऐसे सवालों का सामना किया जो मन को मथने वाला है। यहाँ कुछ ही सवालों जिक्र किया जा रहा है। कहा गया है कि क्या --कोई-- भी समर्थकों के साथ दिल्ली आकर अपनी मांग मनवा लेगा? ये सवाल कांग्रेसी कर रहे पर इसे सबसे ज्यादा मुखर होकर दिल्ली के ये स्व-नाम-धन्य पत्रकार उठा रहे हैं। ये पत्रकार अपने आकाओं को खुश करने के लिए चीख-चीख कर पूछ रहे हैं कि साधू-संत ऐसा कब से करने लगे? --------------------------------------------------------बेशक साधू-संत समाज और सत्ता से दूर रहते। लेकिन विषम समय आने पर वे हस्तक्षेप और मार्ग-दर्शन करते हैं। देशों की जीवन-यात्रा में ऐसे मौके कम ही आते हैं। ऐसा तब और जरूरी हो जाता है जब समाज में विद्वत परंपरा को अनुर्वर बना दिया जाता है। -------------------------------------इस सन्दर्भ में चाणक्य के महा-प्रयास और अंग्रेजों के खिलाफ सन्यासी विद्रोह को बखूबी याद किया जा सकता है। नन्द वंश के समय भारत में बिखराव था। सत्ता की निष्ठुरता पराकाष्ठा पर थी और देश की पश्चिमी सीमा खतरे में थी। ऐसे में सन्यासी की तरह रहने वाले विद्वान चाणक्य ने कैसी भूमिका निभाई इसे इतिहास के पन्नो में खोज सकते हैं ये पत्रकार। इससे भी मन न भरे तो सन्यासी विद्रोह के समय पर मंथन कर लें । लेकिन इस विद्रोह की जानकारी लेने में इन्हें मिहनत करनी पड़ेगी। ------------------------------------------------------दिल्ली के ब्रांड बन चुके इन पत्रकारों में पढने के लिए आस्था कहाँ बची है। नामी पत्रकार विनोद दुआ जब कोई किताब पढ़ते हैं तो कैमरे के सामने आकर देश को बताना नहीं भूलते कि ---देखो मैंने कोई किताब पढ़ ली है। देश हैरान रह जाता है जब इस पढ़ाई के बल पर विनोद दुआ मनमोहन की तुलना महात्मा गांधी से कर बैठते हैं। किताब दिखा कर कैमरे के सामने बोलने की इस अदा की नक़ल कुछ अन्य पत्रकार भी करते नजर आ जाते हैं। ऐसे पत्रकारों के लिए सन्यासी विद्रोह की थोड़ी बानगी बताना लाजिमी है.---------------------------------------------------------------१७५७ में पलासी का संग्राम हुआ। इसके बाद पूर्वी भारत में भ्रम की स्थिति बनी। बंगाल और बिहार के उत्तरी हिस्सों में अंग्रेजों की नीति और शोषण ने किसानो की कमर तोड़ दी। १७६९ के अकाल ने इस आपदा को और बढ़ा दिया। हाउस ऑफ़ लोर्ड्स में इस शोषण और दमन का वर्णन करते हुए एड्मोंड बुर्के दुःख से बेहोश हो गए। समझा जा सकता कि लोगों के लिए कोई आस नहीं थी। पर आशा की किरण फूटी। सन्यासियों के समूह ने अंग्रेजों और उसके पिठुओं के खिलाफ हथियार उठा लिया। उत्तरी बंगाल के इलाके इस संघर्ष का गवाह बने। जाहिर था साधनविहीन सन्यासी परस्त हुए लेकिन इनकी देश-भक्ति और दिलेरी ने लोगों का दिल जीता। आजादी के इन गुमनाम सिपाहियों को सरकारी किताबों में अहमियत नहीं मिली। तभी तो अल्प ज्ञान वाले पत्रकार सवाल करते कि साधू-संत का राजनीति से कैसा वास्ता?--------------------------------------------------------------जारी है......&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-513482387500737038?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/513482387500737038/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=513482387500737038' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/513482387500737038'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/513482387500737038'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2011/06/blog-post_07.html' title='अन्ना, रामदेव और पीसी में जूता -----१'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-6542386577155762160</id><published>2011-06-02T21:50:00.000-07:00</published><updated>2011-06-02T23:25:16.491-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चेंजिंग डैमेंसन'/><title type='text'>मिथिला पेंटिंग्स ---पार्ट ३</title><content type='html'>संजय मिश्र&lt;br /&gt;----------------&lt;br /&gt;स्वावलंबी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और धर्म के सनातनी स्वरूप के कारण मिथिला चित्रकला की परंपरा मोटे तौर पर शुद्ध रूप में चलती रही। लेकिन स्थान और समय के असर से किसे इनकार हो सकता है। जब खिड़की खुली तो इसके स्वरूप में बहुत ही परिवर्तन आए। महज मातृभाषा बोलने वाली महिलाएं जब घर से बाहर निकली तो नई दुनिया की सच्चाई ने उनकी कल्पनाशीलता को झक-झोडा। विदेशी धरती में घूंघट और संस्कार अपनी जगह रहे लेकिन थीम के विकल्प बढे.....साथ ही चित्रकला के मानदंडों के दायरे में ही प्रयोग आकार लेने लगी। --------------------------------------------------इधर अपने देश में भी नई प्रवृतियाँ उभरी। रोजी के अवसर की जरूरत महिलाओं के संग पुरूषों को भी थी। सो पहली बार यहाँ के पुरूष भी मिथिला चित्रकला की बारीकियों को समझने लगे। उनके लिए ये पाठ आह्लादकारी अनुभव रहे......इरादा महिलाओं के गढ़ को तोड़ना नहीं था...सब विपत्ति के मारेजो ठहरे । ------------------------------------------------------------------------------------------------------महिलाओं में जातिगत बंधन उतना कठोर न था। ब्राह्मण और कर्ण कायस्थ महिलाओं की रुचि का असर उन्ही के साथ गुजर कर रही वंचित समाज की स्त्रियों पर भी था। इनके घरों की भीत भी अपने परिवेश के छिट-पुट अंशों से सजी होती। लिहाजा विधि-विधान के बहाने चित्रकला की एक समानांतर छटा मौजूद रही। जब मिथिला स्कूल की चित्रकलाओं को नया आयाम मिला तो वंचित समाज को भी अवसर मिले। इनकी कल्पना जब कागज़ पर उतरी तो कला-पारखियों ने इसे -- हरिजन शैली --- कहा। इस तरह की चित्रकला में रंग के रूप में गोबर के घोल का इस्तेमाल होता है लिहाजा इसे कई लोग --गोबर पेंटिंग--- के नाम से भी पुकारते हैं। बरहेता के कलाकारों ने --गोदना शैली---- को विकसित करने में अहम् भूमिका निभाई है। -----------------------------------------------सरकारी सहयोग की बदौलत मिथिला चित्रकला के कलाकार अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, रूस, जापान, इंग्लेंड, स्विट्जर्लेंड, डेनमार्क और चीन में अपनी कला का प्रदर्शन कर आए हैं। गंगा देवी अमेरिका गई और वहां की जीवन-शैली को अपनी पेंटिंग में स्थान दिया। उनके बनाये चित्रों में रोलर-कास्टर, बहुमंजिली इमारतें और अमेरिकी परिधानों को जगह मिली। रोचक है कि बसों के पहियों को उन्होंने कमल के फूल जैसा रखा। इस कला के समीक्षक मानते हैं कि गंगा देवी ने जीवन की सच्चाइयों को आध्यात्मिक रूप दिया। ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------बाद में वो शशिकला देवी और गोदावरी दत्ता के साथ जापान गई। इन्होने जापानी परंपरा को अपनी कृतियों में समावेश किया। जापान में इनके बनाए चित्रों का एक म्यूजियम भी बनाया गया। उधर शांति देवी और शिवन पासवान ने डेनमार्क और जर्मनी में लोगों को गोबर पेंटिंग से परिचित कराया। जगदम्बा देवी भी कई देश हो आयी। उनके नाम पर मधुबनी में एक सड़क का नामकरण किया गया। ये कलाकार अनपढ़ थीं पर प्रयोग करते समय मिथिला चित्रकला के मर्म का ख़याल रखा। -------------------------------------------विदेश जाने वालों का सिलसिला जारी है। इधर पढ़े-लिखे कलाकारों ने बहुत ही प्रयोग किये हैं। सीतामढी के कलाकारों ने कारगिल युध को ही चित्रित कर दिया। तो मधेपुरा की नीलू यादव के चित्रों में बुध का जीवन चरित , सौर-मंडल और डिज्नी-लेंड जैसे थीम आपको दिख जाएंगे। सुनीता झा ने कला समीक्षकों को चौका दिया जब उन्होंने --घसल अठन्नी --- नामक लंबी कविता को ही चित्रित कर डाला। आपको बता दें कि काशी कान्त मिश्र लिखित इस मैथिली कविता में वंचित तबके की एक मजदूर स्त्री के दर्द को दिखाया गया है। ये कविता मिथिला के गाँव में बहुत ही मशहूर हुई और समाजवादी राजनीतिक नेताओं ने भी अपनी नीतियां फैलाने में इस कविता का सहारा लिया। दरभंगा की अनीता मिश्र ने तो इशा-मसीह के जीवन को ही अपनी कृति में जगह दे दी। इधर कृष्ण कुमार कश्यप ने शशिबाला के साथ मिलकर --गीत-गोविन्द --- और --मेघदूत-- को चित्रित किया है। ये इस श्रृंखला की अगली कड़ी में विद्यापति के जीवन को चित्रित कर रहे हैं। मधुबनी के एक कलाकार ने मखाना उत्पादन को ही अपना थीम बना दिया। ----------------------------------------------------------------------------प्रयोगों की फेहरिस्त लम्बी है। इसने उम्मीदें बधाई.....दायरे बढाए...लेकिन मिथिला चित्रकला लिखने वाले पुराने लोग इस बात पर चिंता जता रहे हैं कि इस चित्रकला का लोक-स्वरूप टूटता जा रहा है। &lt;br /&gt;-------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-6542386577155762160?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/6542386577155762160/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=6542386577155762160' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/6542386577155762160'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/6542386577155762160'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='मिथिला पेंटिंग्स ---पार्ट ३'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-895178394564000517</id><published>2011-05-17T22:30:00.000-07:00</published><updated>2011-05-17T23:56:50.720-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चेंगिंग पैटर्न'/><title type='text'>मिथिला पेंटिंग -- पार्ट २</title><content type='html'>संजय मिश्र&lt;br /&gt;------------------&lt;br /&gt;मिथिला में ये धारणा रही है कि बाढ़ के बाद अकाल नहीं आता ......इसलिए कि हिमालय से आने वाली नदियों में पानी के साथ गाद आता है जो खेतों में जमा होता रहता है। ये नई मिट्टी उपज बढाती है। लेकिन नदियों को बाँधने वाली अव्यावहारिक और आधी-अधूरी योजनाएं इस प्राकृतिक सिस्टम से खिलवाड़ करने वाली साबित हुई। इसका असर साठ के दशक से ही दिखना शुरू हुआ ....लिहाजा लोगों का जीवन और दुरूह होता गया। साल १९६७ तक इस इलाके में अकाल की ताप मारक हो गई। इससे निपटने के लिए केंद्र सरकार ने लोगों को रोजगार देने वाली कई योजनाएं बनाई। इसी के तहत मिथिला चित्रकला को दुनिया की पहुँच में लाने और इससे जुड़े कलाकारों को रोजी के अवसर जुटाने पर काम शुरू हुआ। -----------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;साल १९६५ की बात है....चहल-पहल से दूर रहने वाले मधुबनी रेलवे स्टेशन पर एक दुबला व्यक्ति जब उतरा तो उसका सामना लोगों की सूनी आँखों से हुआ। मिथिला चित्रकला को लेकर उसने बहुत मंसूबे बाँध रखे थे। उसके मन में जहां इस परंपरा को दुनिया भर में फैलाने की उत्कंठा थी वहीं इसे पेशेवर रूप देने की लालसा थी। इसका सुलभ उपाय ये था कि चित्रकला को भीत की सतह से उतार कर कागजों पर लाया जाए। पहले तो मिथिला चित्रकला लिखने वाली महिलाएं हिचकिचाई ..... फिर शुरू हुआ ट्रेनिंग का दौर। कुछ ही महीनों की मिहनत के बाद कलाकारों की उंगलियाँ कागज़ पर ही सृजन के सोपान गढ़ने लगी। ----------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;सर जे जे स्कूल ऑफ़ आर्ट्स से ग्रेजुएट ये व्यक्ति भाष्कर कुलकर्णी था। अफ्रीकी देशों की चित्रकला का गहन अध्ययन कर चुके कुलकर्णी ने पहले तो खुद मिथिला चित्रकला सीखी और तब शुरू हुआ प्रयोगों का दौर। ये सिलसिला अवरोधों के बावजूद लगभग दो दशक तक चला। साल १९८३ में लम्बी बीमारी के बाद दरभंगा में कुलकर्णी की मौत हो गई। उनका सबसे बड़ा योगदान ये था कि उन्होंने मिथिला चित्रकला के प्रतीकों को ' सेक्वेन्सिंग ' दी। कागज पर चित्रकला को उतारने के लिए ये बेहद जरूरी था। जबकि समाज-सेविका गौरी मिश्र ने इस चित्रकला को नई थीम देने में बढ़-चढ़ कर दिलचस्पी दिखाई। जानकारी के मुताबिक़ मिथिला चित्रकला से जुड़े कुलकर्णी के कई स्केच और सूत्र उनकी डायरियों में हैं जो प्रकाश में लाइ जानी चाहिए। इनमे कई डायरियां गौरी मिश्र के पास हैं। --------------------------------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;भाष्कर कुलकर्णी अकेले बाहरी व्यक्ति नहीं थे जिन्होंने इस चित्रकला को बढ़ावा दिया। रेमंड, डब्ल्यू सी आर्थर, जोर्ज लूबी, एरिका मोज़े, होसेगावा जैसे कला प्रेमियों ने विदेशों में इसको बढ़ावा देने में काफी सहयोग दिया। जहाँ पुपुल जयकर ने देश के विभिन्न राज्यों में प्रदर्शनी लगाने में सहयोग किया वहीं उपेन्द्र महारथी ने इस कला परंपरा के विभिन्न परतों को खोला। महारथी ने कई गाँव का सघन दौरा किया साथ ही बिहार ललित कला अकादमी के जरिये इसका प्रचार किया। अब ये आलीशान घरों के ड्राइंग रूमों, सितारा होटलों और कोर्पोरेट भवनों की कौरीडोरों की शोभा बढाने लगी। विदेशों में इसका बाज़ार बनाने में पूर्व विदेश व्यापार मंत्री ललित नारायण मिश्र ने बड़ी भूमिका निभाई। --------------------------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;बाज़ार बनते ही बिचौलियों की जाति पनपी। ये वर्ग जरूरी भी था पर कलाकारों के शोषण का कारण भी बना हुआ है। इस जरूरी मुसीबत से पार पाने के रास्ते कलाकारों को नहीं मिले हैं। पेंटिंग के वाह्य स्वरुप में परिवर्तन तो आया ही साथ ही थीम में प्रयोगों की होड़ सी मच गई। कागज के केनवास पीछे छूटे....अब तो कपडे, कार्ड्स से लेकर प्लास्टिक पर भी ये चित्रकला छा गई है। टिकुली, ग्रीटिंग कार्ड्स, अन्तः और वाह्य वस्त्र, चुनाव प्रचार सामग्री तक में ये जगह बना चुकी है। ---------------------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;सीता और राम के कोहबर में इस चित्रकला के लिखे जाने की चर्चा रामायण में है। कोहबर यानि नव-विवाहितों के शयन कक्ष से शुरू हुई ये यात्रा समय के थापेरों से बेपरवाह बनी रही.....लेकिन आज ये बाज़ार की चंगुल में है। प्रयोगों की अधिकता के नतीजे अवसर बढ़ाने के साथ सवाल भी उठा रहे।&lt;br /&gt;----------------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-895178394564000517?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/895178394564000517/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=895178394564000517' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/895178394564000517'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/895178394564000517'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='मिथिला पेंटिंग -- पार्ट २'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-2578243072136222199</id><published>2011-04-10T21:25:00.000-07:00</published><updated>2011-04-11T04:35:15.141-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बिहारी अस्मिता'/><title type='text'>बिहारी उप-राष्ट्रीयता के यथार्थ--पार्ट 3</title><content type='html'>संजय मिश्र ------------ पटना के जो छात्र स्कूलिंग के बाद महानगरों में पढने जाते हैं.....वे वहां अपना परिचय अक्सर ' पटना-एट ' कह कर देते हैं....' बिहारी ' कह कर नहीं। ये मानसिकता ग्लोबलैजेसन के दौर में नहीं पनपी है। इसके दर्शन लालू युग में भी होते थे ...और उससे भी पहले कांग्रेसी शासनों में यही वास्तविकता थी। -----------------------------------------------------बिहार दिवस के मौके पर ऐसे युवा बिहारीपन की कसमें खा रहे थे। ये विलाप, टीवी स्क्रीन पर दिखने की चाहत का कमाल ज्यादा था....वनिस्पत ह्रदय परिवर्तन के। ये मानना खंडित सच होगा कि महज लालू प्रसाद के अ-गंभीर अंदाज की वजह से बिहारीपन को चोट पहुँची थी और अब सब कुछ ठीक हो जाएगा। दर-असल, राज्य के प्रति अनुराग में खालीपन की बुनियाद बिहार बनने के समय ही पर गई। ---------------------------------आज की पीढी को ये जान शायद हैरानी हो कि बिहार का निर्माण इस बात को ध्यान में रख कर किया गया ताकि उस समय के पढ़े-लिखे ख़ास तबकों को नौकरी के अवसर मिलें। असल में उस समय सरकारी नौकरियों में बांग्ला-भाषियों का दब-दबा था। बिहार के हर शहर में बंगाली टोला की मौजूदगी इसे बखूबी बयान करते हैं। आधुनिक शिक्षा पाए कायस्थ वर्ग के लोग बांग्ला-भाषियों के कारण हाशिये पर होते। जबकि बिहार की कचहरियों में खडी बोली के प्रयोग की इजाजत से वे उत्साहित थे। उस समय अन्य जातियों में नौकरी के लिए लगाव नहीं के बराबर था। ------------------------------------------------------------------------------------ उधर, कायस्थ और मुसलमानों में उच्च शिक्षा पाने वाला वर्ग अपनी महत्वाकांक्षा छुपा नहीं पा रहा था। कलकत्ता में इस तबके को भाव नहीं मिल रहा था। सच्चिदानंद सिन्हा, अली इमाम, और हसन इमाम जब बिहार के लिए मुहीम चला रहे थे तो नौकरी के अवसरों और समाज में धाक पर इनकी नजर गरी थी। किसी विराट सपने के वगैर चली ये मुहिम , अंग्रेजों की बांग्ला-भाषियों को कमजोर करने की नीति के कारण आसानी से सफल हुई। ------------------------------------------------------------------------------------------------बिहार बनने के बाद मुहिम चलाने वालों को फायदे हुए। सच्चिदाबाबू, बिहार गवर्नर के ' एक्जेक्युटिव काउनसेलोर ' बनाए गए। ये पद पाने के लिए सच्चिदानंद सिन्हा ने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी। गणेश दत्त सिन्हा ' मिनिस्टर इन चार्ज ' बने। ज्वाला प्रसाद को पटना हाई-कोर्ट का जज बनाया गया। अली इमाम दिल्ली में ' एक्जेक्युटिव काउंसे-लर ' बने। वहीं हसन इमाम पटना हाई-कोर्ट में जज बनाए गए। ये फेहरिस्त लम्बी है। -------------------------------------------------------------------------------------------------------------------जाहिर है स्वार्थ और महत्वाकाक्षा की कोख जे जन्मे बिहार की ' लोंगेविटी ' का सवाल सामने था। बिहार आन्दोलन के समानांतर बंगाल से मिथिला को अलग कर देने की सुगबुगाहट भी आकार ले चुकी थी। फिर भी मिथिला के मुरलीधर झा सरीखे लोग बिहार को ' मगध -मिथिला ' नाम से स्वीकार करना चाह रहे थे। आखिरकार ' बिहार ' नाम ही चला। सच्चिदानंद ने दरभंगा महाराज से अपने इस्टेट के काम-काज में हिन्दी के प्रयोग का अनुरोध किया । दरभंगा महाराज हिन्दी को प्रश्रय देने के लिए राजी हो गए।-----------------------------------------------------------बिहार को बनाए रखने के लिए दो तरह की सोच काम कर रही थी। पहली धारा ये मान कर चल रही थी कि मगध, मिथिला, भोजपुर, झारखण्ड, और उड़ीसा जैसे सांस्कृतिक क्षेत्रों की आकांक्षा का शासन में ' रिफ्लेक्सन ' हो तो लोगों में राज्य के लिए लगाव जगेगा। इस धारा के लोग मानते रहे कि एक साझा संस्कृति बनाई जा सकती । भोजपुरी, मगही और मैथिली के बीच रक्त संबंध में इन्हें सहमति के बिन्दु नजर आ रहे थे। -------------------------------------------------------------------------------------------------------------जबकि दूसरी धारा के लोग समझा रहे थे कि बिहार एक माडर्न स्टेट है लिहाजा इसकी अलग पहचान होनी चाहिए। इनका दुराग्रह रहा कि इसके लिए बिहार के परम्परागत सांस्कृतिक क्षेत्रों की पहचान ' मिटनी' होगी। इस दिशा में बकाएदा कोशिशें हुई। रणनीति बनी कि सबल सांस्कृतिक क्षेत्रों को आर्थिक मोर्चे पर कमजोर किया जाए और इनके सांस्कृतिक अवदान को अहमियत ना दी जाए। इसी कारण इन क्षेत्रों के प्रति ' इंटल - रेन्स ' शासन का स्थायी भाव बन गया। ---------------------------------------------------------------------------दूसरी धारा का प्रभुत्व ज्यादा था लेकिन लक्ष्य मुश्किल। सौरसेनी हिन्दी थोपी गई। एक ' बिहारी ' हिन्दी की कल्पना भी की गई जो कमोवेश बिहार के सरकारी ऑफिसों में में क्लर्कों के बीच प्रचलन में है। हिन्दुस्तानी की भी वकालत हुई। आज भी प्रकाश झा अपने टीवी चैनल के जरिये बिहार की अलग हिन्दी गढ़ने में लगे हैं। ये ' बेतिया ब्रांड ' हिन्दी कहाँ तक चलेगी ..... कहना मुश्किल। ----------------------------------------------------दूसरी धारा के वर्चस्व का नतीजा भयावह तस्वीर पेश करता है। साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कवि सोमदेव के अनुसार भोजपुरी में लिखे जा रहे साहित्य में स्तरीय रचना की संख्या सौ के पार बमुश्किल जाती है। दरअसल, बिहार बनने के बाद भोजपुरी भाषी हिन्दी सेवा में लगे। भोजपुरी में साहित्य रचने की जरूरत का लगभग तिरस्कार किया गया। वे अब सचेत हुए हैं लेकिन भोजपुरी को सम्मान दिलाने की छटपटाहट में वे ' शार्टकट ' की तलाश में हैं.....ये जानते हुए कि साहित्य सृजन उन्हें शार्ट -कट की इजाजत नहीं देता। मगही का हाल बुरा है.....वो अपनी पहचान का मोहताज है। ये एक स्वतन्त्र भाषा है बावजूद इसके मगही साहित्यकार इसे हिन्दी की बोली कहने में शर्म नहीं करते। उधर, मैथिली की जीवन यात्रा का लगभग नब्बे साल संघष में ही बीत गया। -----------------------------------------------------------------------------------------------ये नौबत बिहार की सांस्कृतिक संपदा की अनदेखी के कारण ही नहीं आया। दरअसल, सार्वजनिक जीवन में जातिवादी सोच को मिला प्रश्रय मारक साबित हुआ। इसे एक उदाहरण से समझें। छपरा का एक यादव, मधेपुरा के स्वजातिये से जितनी आत्मीयता दिखाता है....उतना वो छपरा के ही अन्य जाती के पडोशी से नहीं दिखाता। यही भाव अन्य जातियों में भी लागू होता है। शुरुआती दौर में कायाश्थों और मुसलमानों के हाथ लगे वर्चस्व ने अन्य जातियों को भी उकसाया ।  अब बारी थी भूमिहारों और राजपूतों की। त्रिवेणी संघ के तहत कोयरी, कुर्मी और यादव सत्ता में हिस्सेदारी के लिए आगे बढे। ये सिलसिला चल पडा जो कि जारी है। लालू युग में दूसरी धारा नग्न रूप में दिखी। ------------------------------------------------------------------------------------------जातिवादी हथियार इस ललक के साथ आगे बढ़ी कि जातीय उत्थान में ही राज्य का उत्थान है। इस हथियार का इतना प्रचंड असर हुआ कि विभिन्न क्षेत्रों की आशा का मर्दन तो हुआ ही साथ ही बिहार के लिए ममता का भाव पीछे छूट गया। निर्मम होकर सुख-भोग की अभिलाषा को तरजीह मिली। आर्थिक प्रगति में क्षेत्रीय असंतुलन को बढ़ावा मिला। मोहन गुरुस्वामी जब कहते हैं कि केंद्र से बिहार को ४०,००० करोड़ रूपए कम मिले तो इसकी वजह बिहार के सत्ता-धीशों की अलग प्राथमिकता में खोजी जा सकती है। ----------------------------------------नीतीश शायद पहली धारा के लिए रुझान दिखाना चाह रहे हैं। जीवन में बेहतरी की गुंजाइश राज्य के लिए लगाव पैदा करेगा। समस्याओं के अम्बार के बावजूद, नीतीश कुमार राज्य की योजना को संस्कृति सापेक्ष बनाबें। बेहतर होगा स्टेट योजना के अंतर्गत मगध, मिथिला, और भोजपुर के लिए अलग प्लानिंग कमिटी बने। आज का बिहारी युवा ये मानता है कि पुरातन गौरव से प्रेरणा ली जा सकती...पर इसे पुनर-स्थापित नहीं किया जा सकता। आखिरकार, भावी पीढी के लिए वर्तमान में गौरव करने लायक तत्व होने चाहिए। ऐसे में बंशी चाचा, किसान चाची, काशीनाथ और दशरथ मांझी जैसे नाम उम्मीद जगाते हैं। ' हमारा बिहार ' की लौ अभी मध्धम है...इसे तेज करना चुनौती। ' अपना बिहार ' की तमन्ना तो अभी दूर की कौड़ी है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-2578243072136222199?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/2578243072136222199/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=2578243072136222199' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/2578243072136222199'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/2578243072136222199'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2011/04/3.html' title='बिहारी उप-राष्ट्रीयता के यथार्थ--पार्ट 3'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-4954095523192820822</id><published>2011-04-01T20:55:00.000-07:00</published><updated>2011-04-02T21:55:30.626-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बिहारी अस्मिता'/><title type='text'>बिहारी उप-राष्ट्रीयता के यथार्थ --पार्ट २</title><content type='html'>संजय मिश्र ------------ -------साल २००० में जब झारखंड राज्य बनाने की घोषणा हुई , तो बिहार में कोई भूचाल नहीं आया। थोड़ी सी हलचल....और अखबारों में विरोध दर्ज कराने वाले रूटीन से बयान। पटना में कुछ लोग धरने पर बैठे। इस रस्म-अदायगी पर वो वर्ग भी हैरान हुआ जो बिहार की अखण्डता का कायल नहीं था। जी हाँ, ये उस बिहार की दास्ताँ है जिसके राजनीतिक हेवीवेट लालू प्रसाद ने १५ अगस्त १९९८ को दहाड़ते हुए कहा था---" मेरी लाश पर ही बिहार का बंटवारा होगा।" ये उसी बिहार की दास्तान है जिसके निर्माता सच्चिदानंद सिन्हा ने इंग्लेंड में बिहारी कह कर अपना परिचय दिया था.... उस समय....जब बिहार अस्तित्व में भी नहीं आया था। तब से लेकर सन २००० तक गंगा में न जाने कितना पानी बहा होगा। ----------------------------------------------------------------------------------------------आम बिहारी का ये चरित्र दूसरे प्रदेशों के लोगों को विस्मय में डाल देता है। दरअसल , उसके ( बिहारी के ) दिल में बिहार के लिए अपनत्व की कमी हरदम खोजी जा सकती है। जब ये कहा जा रहा है कि &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;राज्य के लोगों में बिहारीपन के लिए आह्लाद जगाया जा रहा है, तो शायद वो बिहारी चरित्र की इसी मनोदशा की ओर&lt;span style="font-size:0;"&gt; &lt;/span&gt;इशारा करता है। गहराई से सोचेंगे तो इस मनोदशा को परत-दर-परत समझा जा सकता है। -----------------------------------------------------------------------------------राज्य के लोग उस अर्थ में ' बिहारी ' नहीं हो पाते जिस अर्थ में एक बंगाली या मराठी होता है। आखिर, किस पहचान से वो नाता जोड़े ? जबकि उसे पता है कि इतिहास में भौगोलिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक इकाई के रूप में बिहार की कोई अनवरत मौजूदगी नहीं रही है। उसे बताया जाता है कि ' बिहार ' शब्द बौध भिक्षुओं के ' विहार ' &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;से निकला है। कोई उसे बिहार-शरीफ में बिहार दिखाने लगता है। नीतीश कुमार को ' बहार ' शब्द में ही बिहार नजर आता है। इस संबंध में जितने भी विवेचन दिए जाते हैं वो बौध काल से पुराने नहीं हैं। बिहारीपन के आग्रही कभी ये नहीं बताते कि बौध विहारों का ' विहार ' शब्द आखिर कहाँ से आया ? -------------------------------------------------------------------------------उस दौर में जब &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;वैदिक ज्ञान और अनुभव को ठोस आकार दिया जा रहा था, ऋषी - मुनियों के आश्रम में चहल-पहल परवान पर होती। वहां रहने वाले छात्र जिजीविषा से भरे होते ......&lt;span style="font-size:0;"&gt; &lt;/span&gt;रोमांचित होकर यज्ञमंडप &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;और आस-पास की गतिविधियों को अनुभूत करते। ये जानते हुए कि इन क्रिया-कलापों के मूल तत्वों को उन्हें ही गृहस्थों के बीच बांटना है। वनों में स्थित आश्रमों का ये परिवेश ' विहार ' कहलाता । आश्रमों के कण - कण में समाई ये फिजा राजाओं की ओर से आयोजित यज्ञ और शास्त्रार्थ से बिलकुल &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;ही अलग होती। ये बातें , भगवान् बुद्ध के समय से पहले की हैं। बुद्ध धर्म के लोगों ने इसी ' विहार ' शब्द को भाव की पवित्रता के साथ आत्मसात किया। ये सच है कि बिहार के सामान्य इतिहासकार इस असलियत से वाकिफ नहीं हैं। लेकिन , कई इतिहासकार इसकी जानकारी रखते हैं। इसकी पड़ताल होनी चाहिए कि किस मजबूरी के तहत इस वास्तविकता को लगातार छुपाया गया।---------------------------- &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;अक्सर कहा जाता है कि बिहार ने दुनिया को प्रजातंत्र की नसीहत दी । यहाँ ये बताना जरूरी है कि जिस काल-खंड के बारे में ये दावा किया जाता है उस समय भारतीय उप-महाद्वीप में कई जगह गणतंत्रात्मक शासन चल रहा था। ...उनमें बिहार भी शामिल था। बावजूद इसके बिहार अकेले इसका श्रेय लेने पर तुला रहता है। --------------------------------------------------------------------------वामपंथ , समाजवाद और बाद के समय में नक्सलबाड़ी आन्दोलन के लिए बिहार उर्वर जमीन साबित हुई। जमींदारों की उपस्थिति , समाज में सांस्कृतिक जागरण का अभाव और बिहारीपन की ठोस अवधारणा की गैर- मौजूदगी ने इन विचारों को संजीवनी दी। इन विचारों से जुड़े जुनूनी नेताओं को लगा कि बिहार ' नो मेंस लैंड ' की तरह है ....और फैलाव के लिए मुफीद जगह। लिहाजा , किसी तरह के बिहारीपन को ' सींचने ' की इन्होने जहमत नहीं उठाई। जबकि बिहार के जो हुक्मरान समाजवादी विचारों को ' ओढ़ने वाले ' रहे उन पर बुद्ध वाद हावी रहा। वामपंथियों के साथ ऐसे समाजवादी नेता भी मानते रहे कि बुद्ध के दर्शन और इस्लाम में ही प्रजातंत्र है। इसलिए बिहार की पहचान में बुद्ध ही ज्यादा दीखते । &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;बुद्ध ईश्वर और आत्मा में यकीन नहीं करते जबकि महावीर ईश्वर और पुनर्जन्म को मानने वाले ठहरे। यही कारण है कि महावीर का गुण-गान गाहे-बगाहे ही होता। ये अकारण नहीं कि पटना के कई सार्वजनिक भवनों की बनावट में स्तूप - शैली और मुग़ल शैली के दर्शन हो जाएंगे। -----------------------------------------------------------------------------------------------&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;रह- रह कर मौर्य साम्राज्य के शौर्य को बिहार का शौर्य बताया जाता है....ये जानते हुए कि मौर्य शासन साम्राज्यवादी और तानाशाही प्रवृति को इंगित करता है। अतीत से प्रेरणा लेना अच्छी बात है लेकिन यहाँ आकर आम बिहारी फंस जाता है। समाजवाद और तानाशाही प्रवृति से एक साथ वो कैसे ताल-मेल बिठाए ? &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;उसे बिहारीपन ' क्रैक्द मिरर ' लगने लगता है। उसे कहा जाता है कि चन्द्रगुप्त, चाणक्य , आर्यभट , बुद्ध, चंपारण के गांधी , और जे पी महान हुए । ऐसा कहने वाले विदेह जनक, सीता , याज्ञवल्क्य , विश्वामित्र , भारती , मंडन , वाचस्पति , कुमारिल &lt;span style="font-size:0;"&gt;, &lt;/span&gt;उदयन , विद्यापति और भिखारी ठाकुर जैसों के बारे में चुप्पी साध लेते। ये राजा अशोक का नाम भी कम ही लेते क्योंकि तब उदार और सहिष्णु बनना पडेगा। बिहार का जनमानस एकबारगी मुदित होता है और फिर उलझन में पर जाता है.... ------------------------------------------------------------------------------------------------&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;वो जानता है कि लालू युग में भी बिहारीपन को खूब उछाला गया। पर वो समझ नहीं पाता कि बिहार में विकास के मुद्दे पर चिढने वाले लालू ने उस समय विन्ध्याचल में धर्म-शाला बनबाने में रूचि कैसे ली ? ज़रा याद कीजीये सारनाथ में हुए आर जे डी सम्मलेन को। लालू ने वहां ' पूर्वांचल राज्य ' बनाने की वकालत ही नहीं की बल्कि उसे अपने एजेंडे में प्रमुखता दी। &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;अब, आम बिहारी के असमंजस को महसूस करिए, जिसे पता है कि पूर्वांचल राज्य का सपना देखने वाले बिहार में भी बड़ी तादाद में हैं। वो (बिहारी) ये सोच कर असहज हो जाता है कि शाहाबाद और सारण क्षेत्र के अधिकाँश बड़े नेताओं की ' आत्मा ' तो पूर्वांचल में होती पर शरीर बिहार में....और नश्वर शरीर को तो सुख-सुविधा और भोग-विलास से मतलब।----------------------------------------------------------------------------------------- मिथिला में आत्मा-सम्मान की चेतना उदयन और अ-याची की गाथा में विराट रूप में प्रकट होती है। वे अपने सद्गुणों से प्रेरणा का स्रोत बने रहे। लेकिन आज का मिथिला जीवन बचा लेने की होड़ में इतना खोया है कि उसके संस्कार में समा गई अवनति-पूर्ण समाज की बुराइयां उसे नजर नहीं आती। मोटे तौर पर, उसकी छटपटाहट में न तो बिहारीपन के लिए स्पष्ट सोच उभर पाती है और न ही मिथिला राज्य के लिए ख़ास दिलचस्पी।--------------------------------------------------------------- मगध एक सांस्कृतिक क्षेत्र है.....मिथिला की तरह पूर्ण -परिभाषित। मगध में ही बिहार की सत्ता का केंद्र है। ऐसे में मगही मानस में गुमान आ जाना लाजिमी है। यही वजह है कि मगही लोग और उसके नेता अक्सर ' फील गुड ' की दशा में पहुँच जाते हैं। वे बताएंगे कि पूरे सूबे की बेहतरी का बोझ है उनपर। संयोग से बिहार में राज करने वाले दो ऐसे मगही नेता हुए जो संयत शासन देने वाले कहलाते। श्री कृष्ण सिंह के बिहार को --एपल्बी -- ने ' बेस्ट एडमिनिस्टर्ड स्टेट ' कहा। अभी के नीतीश कुमार हैं जो ' बिहार मॉडल ' की महक को फैलाने में जी-जान से लगे हैं।------------------------------------------- लेकिन बीच-बीच में इनकी तन्द्रा भंग हो जाती है। &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;२५ मार्च को पटना हाई-कोर्ट ने कह दिया कि ' एल एन एम् यू ' राज्य का सबसे गया गुजरा विश्वविद्यालय है '। ये नीतीश के लिए झटका है। ख़ास कर तब जब वे पटना और आस-पास को शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में वैश्विक पहचान दिलाना चाहते हैं। कोर्ट के रिमार्क के बाद संभव है नीतीश को भान हुआ हो की पटना से नालंदा की दूरी नापने से न तो बिहार का काया-कल्प होने वाला और न ही बिहारीपन को खाद-पानी मिलने वाला।--------------------------- ...अच्छा है ... नालंदा विश्वविद्यालय बन रहा है। काश...इसके चालू होने के बाद नालंदा से निसृत ज्ञान की रौशनी पटना में बैठने वाले सत्ताधारी वर्ग को विवेक-शील बनाता रहे।--------------- &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;....जारी है......&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-4954095523192820822?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/4954095523192820822/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=4954095523192820822' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/4954095523192820822'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/4954095523192820822'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='बिहारी उप-राष्ट्रीयता के यथार्थ --पार्ट २'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-1181108601488526048</id><published>2011-03-25T02:42:00.000-07:00</published><updated>2011-03-25T23:26:41.435-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बिहारी अस्मिता'/><title type='text'>बिहारी उप-राष्ट्रीयता के यथार्थ -- पार्ट १</title><content type='html'>संजय मिश्र&lt;br /&gt;--------------&lt;br /&gt;" सच्चिदानंद सिन्हा&lt;br /&gt;बाय द नाइन गौड्स ही स्वोर ,&lt;br /&gt;दैट इव द इयर वाज ओवर ,&lt;br /&gt;ही सुड बी अ जज एट बांकीपुर । "&lt;br /&gt;इस कविता में बिहार निर्माता सच्चिदानंद सिन्हा का यशोगान है। ये ' कोप्लेट ' साल १९१० में लिखी गई। लेकिन २२ मार्च , २०११ के दिन जब गांधी मैदान में बिहार दिवस को लेकर भव्य आयोजन किया गया तो उस इतिहास पुरुष का कोई नामलेबा नहीं था। जिन्हें सत्ता के खेल की बारीक समझ है , वे भी , उन्हें भुला दिए जाने पर हैरान हुए । क्या ये सच्चिदानंद ब्रांड बिहारीपन युग के अंत का उदघोष है ?&lt;br /&gt;२२ मार्च को ही , उसी बांकीपुर में , एक नए नायक की जय-जयकार हो रही थी। गांधी मैदान के मुख्य समारोह स्थल पर मौजूद सरकारी लोग ये समझाने की कोशिश में लगे थे की नए युग का आगाज हो चुका है और इसके सूत्र-धार नीतीश कुमार हैं। उत्सवी माहौल का लुत्फ़ उठाने आये आम-जन समारोह स्थल के बीच खड़ी सुनहरे रंग की स्त्री की प्रतिमा को जतन से निहार रहे थे। किसी को मेनहटन के सामने खड़ी " स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी " याद हो आई तो कोई सभा-मंच से हो रहे भाषण के मजमून से, इस स्त्री की आकांक्षा का मिलान करने में मशगूल था। कितने ही चेहरे आश्वस्त हो जाना चाह रहे थे की ये मूर्ति नए बिहार के उदय का प्रति-बिम्ब हो । क्या , सचमुच मुक्ति की गाथा के सपने वहाँ बुने जा रहे थे ? किस दुविधा से मुक्ति चाहिए बिहार को?&lt;br /&gt;जब से बिहार दिवस की तैयारियों ने जोर पकड़ा , तभी से बिहारी उप-राष्ट्रीयता , बिहारीपन और बिहारी अस्मिता जैसे शब्दों की अनुगूंज सुनाई देने लगी। कई लोगों का मानना है कि बिहारीपन का भाव प्रबल नहीं है जिस कारण राज्य में पिछडापन है। सरकार दावा करती है कि उसने बिहारी सोच को जगा दिया है और हमें आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता। सवाल उठता है कि जब बिहारी अस्मिता पर गर्व करना लोगों को आ गया है, तो फिर इतने बड़े पैमाने का उत्सव क्यों?&lt;br /&gt;खैर , पूरे राज्य में उत्सव मनाया जा रहा है और साल भर ऐसे आयोजन होते रहेंगे। बिहार के सौवें साल का जश्न है ये। निश्चय ही इससे पहले इतने बड़े आयोजन नहीं हुए। बिहार के जीवन में ये नया ' एलीमेंट ' है। ख़याल है कि इससे ' सेन्स ऑफ़ बिलोंगिंग ' पुख्ता होगा। लेकिन राज्य के दुसरे शहरों से जो जानकारी मिली उसके मुताबिक़ समारोह स्थलों पर लोगों से अधिक कुर्सियां नजर आई। जो टीवी चैनलों के सहारे इस जश्न में शरीक होना चाहते थे उन्हें बिजली की बाधित आपूर्ति ने निराश किया।&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जन-सहभागिता की इस तल्ख़ वास्तविकता के बाद रुख करें गांधी मैदान का। सरकारी सभा-स्थल पर सत्तारूढ़ गठबंधन के नेता विराजमान थे। विपक्ष के बड़े नेताओं को बुलाने की जहमत नहीं उठाई गई। ऐसे मौकों पर अन्य राज्यों में विपक्षी नेता को बुलाने का प्रोटोकॉल है। मंच पर स्वास्थय मंत्री अश्विनी चौबे मौजूद थे जिन्हें रंगदारी नहीं देने पर जान से मारने की धमकी मिली हुई है। लेकिन नीतीश अपनी उपलब्धियां गिनाने में लगे थे।  मौके पर उन्होंने विशेष राज्य की मांग दुहरा दी ।&lt;br /&gt;सरकार मानती है की विकास हुआ है इसलिए बिहारी होने पर जनता गर्व कर रही है। सरकार का ये भी कहना है कि विशेष राज्य का दर्जा मिलने से राज्य का और विकास होगा , नतीजतन बिहारीपन की भावना दृढ़ होगी। सर्कार के साथ मीडिया का दुराग्रह भी सामने है जिसे बिहारीपन के विशेष राज्य की मांग में तब्दील होने में कोई राजनीति नहीं दिखता। ऐसे पत्रकारों का आग्रह है कि उत्सव के इन शानदार पलों में डूब जाएँ सब। उन्हें अहसास नहीं  कि इस कोशिश में वे नीतीश के गुण-गान को ही पराकाष्ठा पर पहुंचा रहे हैं।  ये पत्रकार लगातार इस बात को उछाल रहे हैं कि बिहारी मेहनती, मेधावी और देश को नई राह दिखाने वाले होते हैं ।  क्या, बिहारी मीडिया का ये वर्ग जताना चाहता है कि दुसरे प्रदेशों के लोग काहिल, भुसकोल, और सामाजिक बदलाव को समझने में नाकाबिल होते हैं ?&lt;br /&gt;बेशक , बिहार में बदलाव हुए हैं ।  लेकिन इसे अतिरंजित करने में मीडिया झूठ का सहारा भी लेता है। एक उदाहरण काफी होगा । बालिका साईकिल योजना को बिहार की देन बता कर प्रचारित किया जाता है। जबकि असलियत ये है कि ऐसी योजना छतीसगढ़ में पहले से अमल में है। मीडिया के इस फरेब से आत्मा-गौरव कितना मजबूत होगा ..... ये तो वही जाने।&lt;br /&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;गांधी मैदान में जिस मंच से नीतीश का संबोधन चल रहा था उस पर बिहार दिवस का ' लोगो ' अंकित था जिसके नीचे लिखा था -' हमारा बिहार ' ।   ये दो शब्द सरकार की ओर से बिहारीपन की ब्रांडिंग के लिए बनाए गए तीन सूत्रों का हिस्सा हैं । लेकिन लोगों के जेहन में तो ब्रांड के रूप में उस सुनहरी स्त्री की आकृति बस गई जो उनकी आकांक्षा को रिफ्लेक्ट कर रही थी । नीतीश ने भी इस प्रतिमा को बड़े गौर से देखा .... जो शायद सवाल कर रही थी कि - हमारा बिहार - कब - अपना बिहार - बनेगा ।&lt;br /&gt;सच्चिदानंद की प्रशंसा वाली कविता को एक बार फिर पढ़ें ....ख़ास कर इसके अंतिम लाइन को ।  जी हाँ , यहाँ सत्ता और स्वार्थ की गंध है । आज के बिहारी नायकों को इसे जरूर याद रखना चाहिए .... वरना फिर कोई प्रतिमा ' बांकीपुर ' में लगी होगी ....जो किसी युग के अंत का गवाह बनेगी ।&lt;br /&gt;जारी है .....&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-1181108601488526048?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/1181108601488526048/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=1181108601488526048' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/1181108601488526048'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/1181108601488526048'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2011/03/blog-post_25.html' title='बिहारी उप-राष्ट्रीयता के यथार्थ -- पार्ट १'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-429041225077756835</id><published>2011-03-17T00:23:00.000-07:00</published><updated>2011-03-17T01:32:49.142-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बदलती तस्वीर'/><title type='text'>मिथिला पेंटिंग - पार्ट १</title><content type='html'>संजय मिश्र&lt;br /&gt;-------------&lt;br /&gt;कोई पांच हज़ार साल पहले की ही बात होगी..... जब आर्य मिथिला में बसने आये। यहाँ की अनुकूल परिस्थितियों और व्यवस्थित जीवन ने उन्हें ज्ञान की मीमांसा के लिए पर्याप्त समय दिया। चिंतन प्रवाह कुलाचें मार रहा था ... यही कारण है कि मिथिला में विद्वान महिलाओं के उदाहरण हमें मिलते हैं।  ऐसे ही समय में घर संभाल रही महिलाओं की सोच भीत की सतहों पर फूट पडी। साधारण सी दिखने वाली ये चित्रकारी उनकी कल्पनाशीलता का दायरा दिखने के लिए काफी है। इसमें जहाँ आस्था और सौन्दर्यबोध से मिलने वाली खुशियों का संगम है वहीं जीवन की संगीतात्मकता के परम सत्य से संयोग के दर्शन भी हैं।&lt;br /&gt;मिथिला आज भी कृषि प्रधान समाज है। यही कारण है कि यहाँ के मिजाज में जननी रूप का भाव रचा-बसा है। ये भाव इस चित्रकारी में भी प्रखरता से झलकता है। जहाँ बंगाल की ---अल्पना -- में तंत्र की प्रधानता है वहीं मिथिला चित्रकला --प्रतीकात्मक -- है। ये प्रतीक यहाँ के ग्रामीण जीवन की व्यवहारिक तस्वीर दिखाते हैं साथ ही आपको कल्पना लोक में भी ले जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;-सुग्गा- को प्रेम दिखाने &lt;/span&gt;के लिए उपयोग किया जाता है जबकि - मोर - प्रणयलीला का परिचायक होता है।  वहीं - बांस, केला का पेड़ और कमल का फूल -  ये तीनो ही उर्वरता के प्रतीक हैं।&lt;br /&gt;इस चित्रकारी में प्रयोग किये जाने वाले रंग मिथिला की वानस्पतिक सम्पदा से ही निकाले जाते हैं। सिंदूरी रंग का स्रोत -कुसुम का फूल- है जबकी लकड़ी को जला कर काला रंग बनाया जाता है। पलास के फूल से पीला रंग निचोड़ा जाता है तो हल्दी से गहरा पीला रंग बनाया जाता है। हरी लतिकाओं से हरा रंग निकाला जाता है। सुनहरे रंग के लिए केले के पत्ते का रस , दूध और नीबू के रस को मिलाया जाता है। रंगों को घोलने के लिए बकरी का दूध और पेड़ों से निकलने वाले गोंद का इस्तेमाल किया जाता है।&lt;br /&gt;ये रंग कई बातों को इंगित करते हैं। पीला रंग- पृथ्वी, तो उजला रंग - पानी को दर्शाता है। हवा को काले रंग से दिखाते हैं वहीं  लाल रंग - आग- का परिचायक होता है। नीला तो  आसमान ही होता है। दिलचस्प है कि ब्राह्मण स्त्रियाँ चित्रकारी करने में लाल, गुलाबी, हरे, पीले और नीले रंग को पसंद करती हैं जबकि कायस्थ महिलाओं को लाल और काला रंग विशेष भाता है।&lt;br /&gt;उपरी तौर पर इस चित्रकारी के विषय धार्मिक लगते हैं। रामायण, महाभारत और पुराणों की कथाएँ इसमें दर्शायी जाती हैं। राधा और कृष्ण की लीला को एक वृत में दिखाया जाता है जो जीवन चक्र का संकेत है। इलाके में प्रचलित त्योहार और विधि-विधान भी इसमें जगह पाते हैं। लेकिन दैनिक जीवन की सच्चाई इसके पोर-पोर से झांकती रहती है।&lt;br /&gt;एक मैथिलानी का जीवन दर्शन और उसकी आकांक्षा का प्रस्फुटन मिथिला चित्रकला का मूल स्वर है। स्त्री घर की उन्नति का वाहक मानी जाती है इसलिए लक्ष्मी को बार बार दर्शाया जाता है।  विवाह को बांस के पेड़ से दिखाया जाता है तो गर्भ का प्रतीक -सुग्गा- होता है। वहीं नवजात को बांस के पल्लव से दिखाते हैं। इस चित्रकला में आँखों को वृतात्मक और नुकीला रखा जाता है। ये चित्रकारी कौशल हाल के समय तक पीढी - दर- पीढी माँ से बेटी को मिलती रही।&lt;br /&gt;साल १९६७- के बाद ये चित्रकारी परम्परा भीत की दीवारों से उतार दी गई। अकाल से पस्त जन-समूह को रोजगार के अवसर देने के लिए इस चित्रकारी को व्यवसाय बनाया गया। तब से लेकर अब तक कितने ही प्रयोग किये गए। अब तो इसके पवित्र स्वरूप के दर्शन भी मुश्किल से हो सकते। सबसे बड़ा असर तो ये है कि अब कलाकार इस परंपरा को महसूस नहीं करता बल्कि सीखता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-429041225077756835?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/429041225077756835/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=429041225077756835' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/429041225077756835'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/429041225077756835'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='मिथिला पेंटिंग - पार्ट १'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-6579136865222940879</id><published>2011-02-26T02:11:00.000-08:00</published><updated>2011-02-26T04:33:27.422-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कांग्रेस चली नीतीश की राह...'/><title type='text'>पेड़ न्यूज से आगे....</title><content type='html'>संजय मिश्र&lt;br /&gt;१०, जनपथ उलझन में है। सत्ता का गुरूर टूटा है। जिस दलदल में कांग्रेस-नीत सरकार फंसी है उससे उबरने के रास्ते सीमित हैं। बिहार चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।  जिन मुद्दों के सहारे वो चुनाव में उतरी ...वो बैतरनी पार करने में नाकाफी  साबित हुई।  इस बीच घोटालों की बौछार ने उसे बेदम करने में कोई कसर नहीं छोडी । मजबूर कांग्रेस ने अब छवि सुधारने की कोशिशें तेज कर दी है।&lt;br /&gt;ये मुहिम दो स्तरों पर है और इसे हिंदी पट्टी के सभी राज्यों में आजमाया जा रहा है...पहला संगठनात्मक स्तर पर और दूसरा नीतीश शैली की मीडिया मैनेजमेंट के जरिये। संगठन को कहा गया है कि वो केंद्र सरकार के उद्देश्यों और घोटालों पर पार्टी की राय को लोगों के बीच स्पष्टता से उजागर करे। कांग्रेस का थिंक-टैंक छवि निर्माण को बेहद अहम् मान रहा है। यही  कारण है कि मीडिया के वशीकरण के नीतीश के फार्मूले को तबज्जो दिया जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पार्टी को अहसास है कि छवि बनाने में नीतीश ने मीडिया का किस खूबी से इस्तेमाल किया। हालत ये है कि बिहारीपन के प्रकटीकरण में जुटी मीडिया के सारे प्रयास अपने आप नीतीश की आभा से तारतम्य स्थापित करते नजर आ रहे। यहाँ तक कि किसी बिहारी की व्यक्तिगत उपलब्धि के किस्से मीडिया में इस तरह परोसे जारहे मानो ये सब नीतीश के कारण ही हासिल हुआ हो।&lt;br /&gt;ज्यादा पीछे जाने की जरूरत कहाँ.....यही कोई एक-डेढ़ साल पहले नीतीश ने पत्रकारों से बिहार की छवि निखारने की गुजारिश की थी। पत्रकार गदगद हुए। नीतीश सरकार के " पी आर " के रोल में अपने को फिट करने में इन्हें कोई झिझक नहीं हुई। पत्रकारों का इस तरह निहाल होना समाज के लिए बड़ी खबर थी। ये सदमा देने जैसी थी।&lt;br /&gt;राम विलास पासवान जैसों का मानना है कि नीतीश की " लार्जर देन लाइफ इमेज " बुलबुला है जो कि फूटेगा। कांग्रेस को लगता है कि ऐसा होने में समय भी लगता है और ये अक्सर " रिजनल क्षत्रपों ' पर असर डालता है। कांग्रेस की छवि का बुलबुला भी फूट सकता है। इस पर कांग्रेसी रणनीतिकार सचेत हैं और मान कर चल रहे हैं कि इसको बर्दाश्त करने के लिए उसके पास विशाल संगठन है। वैसे भी कांग्रेसी कवायद अगले लोक-सभा चुनाव के मद्देनजर है जिसकी ट्रेलर यूपी चुनाव में दिखेगी । पार्टी समझती है की राहुल की ताजपोशी के लिए हिन्दी पट्टी में स्वीकार्यता जरूरी है। यही कारण है कि सकारात्मक छवि निर्माण पर भरोसा जताया गया है।&lt;br /&gt;जानकारी के मुताबिक़ हिन्दी पट्टी के स्थापित रिजनल न्यूज चैनलों से " डील " की गई है । ये चैनल मनरेगा, प्रधान-मंत्री ग्रामीण सड़क योजना , इंदिरा आवास, इंदिरा गांधी वृधावस्था पेंशन जैसी योजनाओं पर स्टोरी बनाएँगे और न्यूज स्लॉट में दिखायेंगे । ये विशेष ख़बरें सकारात्मक होंगी। इनका टोन सफलता की कहानी जैसा होगा। ये दिखाया जाएगा कि वंचितों के जीवन में इन योजनाओं के कारण कैसे  खुश-हाली आई है।&lt;br /&gt;जोर इस बात पर है कि इन योजनाओं के तहत जो भी निर्माण कार्य हुए हैं या हो रहे हैं , उसके अच्छे हिस्से को दिखाया जाए। जहाँ काम बंद है वहां स्थानीय मुखिया की मदद से कैमरे के सामने काम होता दिखाया जा रहा है। मजदूरों को ये बताना होता है कि कैसे उनकी किस्मत बदली है। इन मैनेज्ड स्टोरीस के लिए रिसर्च टीम है। रिसर्च टीम के प्रमुखों को कान्ट्रेक्ट पर लाया गया है जो संभवतः केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय से        टिप्स पाते             हैं।&lt;br /&gt;खबर के मुताबिक रिजनल न्यूज चैनल के सबसे बड़े खिलाड़ी को बिहार सहित सात राज्यों का जिम्मा मिला है।  इसके एवज में चैनल को ६० करोड़ रुपये मिलेंगे। एक अन्य स्थापित हिन्दी चैनल को छः राज्यों की जिम्मेवारी सौंपी गई है।  इस चैनल के साथ ४० से ५० करोड़ के लेन-देन की बात है। इसके अलावा एक भोजपूरी चैनल को दो राज्यों में काम सौंपा गया है। उसे २० से ३० करोड़ के बीच मिलेगा। स्टोरी के स्तर पर खासा ध्यान रखा जा रहा है जिस कारण इन चैनलों की प्रोग्रामिंग टीम के सदस्य शूट पर निकल रहे हैं।&lt;br /&gt;जी हाँ ! ये पेड़ न्यूज से आगे की शक्ल है जो अखबारों के साथ चैनलों में भी झाँक रहा है। यहाँ राजनीतिक चेहरों के आख्यान की जगह आम आदमी की खुश-हाली का विमर्श है। इसमें स्वार्थ और छल का सामाजीकरण किया जाता है। ये मानवीय दिखता है लिहाजा " डिसेपटिव " है। आपको अख्यास हो गया होगा कि चैनलों के खांटी स्वभाव को बदलने के किसिम-किसिम के दखल कितने रंग लाने लगे हैं।&lt;br /&gt;याद करिए अर्जुन सिंह के मुख्या-मंत्रित्व काल को।  इस दौरान सरकार को सकून देने देने की जिस पत्रकारिता के बीज बोये गए अब उसका प्रचंड विस्तार सामने है।  मध्य भारत में इस विकृति को " विकास की पत्रकारिता " कही गई। पत्रकार जमात के चतुर खिलाड़ी खूब फले-फूले। पंजाब को भी याद करना चाहिए जहां पत्रकारिता की कब्र खोदने के लिए नए-नए प्रयोग हुए।&lt;br /&gt;हिन्दी पट्टी के अन्य राज्यों की बनिस्पत बिहार में " चेस्ट ' पत्रकारिता होती रही। लेकिन यहाँ पत्रकारिता का मौजूदा कोलाहल अशांत करने वाला है। बिहार की स्थापना के सौ साल होने वाले हैं। इसके लिए जश्न का माहौल बनाया जा रहा है। तैयारी के मिजाज को देखते हुए कहा जा सकता है कि सरकारी और गैर-सरकारी आयोजनों की श्रुंखला सामने आते जाएँगे और बिहारी अस्मिता का " ओवरटोन " मजबूत उपस्थिति दर्ज करता जाएगा । मीडिया में भी इसको लेकर उन्मादी सक्रियता है। लेकिन आशंका है कि मीडिया के इस उत्साह का जश भी नीतीश उठा ले जायेंगे। ये आशंका इसलिए भी है के बिहारी मीडिया का बड़ा हिस्सा नीतीश में चाणक्य और चन्द्रगुप्त के समवेत स्वरूप दिखाने का आदी हो चला है। जबकि इस पेशे में बे-ढव बन चुके समझदार लोग टुकुर-टुकुर ताकने को बाध्य हैं।&lt;br /&gt;इस दारुन परिदृश्य के निहितार्थ हैं। पत्रकारिता " हर क्षण के इतिहास का गवाह " नहीं रहा.....अब वो इसका साझीदार है। समाज और घटना के बीच " इंटरफेस " की बजाय पत्रकार अब कारक हैं। अब आप कुत्ते को नहीं काटेंगे तो भी न्यूज बनेंगे। पानी में रहकर नहीं भींगने की कला दम तोड़ रही है। पत्रकार अब पानी में भींग भी रहे हैं और नंगे भी हो रहे हैं। वे इतने से संतुष्ट नहीं कि पत्रकारिता उन्हें " रिफ्लेक्टिव पावर " देती है....चांदनी जैसी आभा। अब वो सूरज की तरह ना सही , उल्का पिंड की रौशनी के लिए ठुनक रहा है।&lt;br /&gt;नतीजा सामने है। कई पत्रकार खूब पैसे पा रहे हैं। वे " ब्रांड " भी बन रहे हैं। इन्हें देख बांकी के पत्रकार आपा-धापी में हैं। सफल होने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार। ये बात उन्हें नहीं सालती कि वे खुद न्यूज बन रहे हैं।&lt;br /&gt;कांग्रेस को पत्रकारिये कौशल के इस अवतार पर खूब भरोसा है। उसे पता है कि दिल्ली के नाम-चीन पत्रकारों ने एक दिन में ही मंदी को कैसे छू-मंतर कर दिया था। याद है ना पिछली दिवाली। भूल गए हों तो दिवाली के अगले दिन के अखबार फिर से पलट लें । दिल्ली के इन पत्रकारों की माया देखिये पिछले लोक-सभा चुनाव से लेकर झारखण्ड चुनाव तक मंदी, महंगाई, काला-धन कभी मुद्दा नहीं बन सके।  तब दिल्ली की सत्ता खूब खिलखिलाई थी । झारखण्ड चुनाव के पांच-दस दिनों बाद ही महंगाई सुर्खियाँ बनने लगी। अब बारी है रिजनल मीडिया के  भरपूर दोहन की। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई लोग मानने लगे हैं कि चौथा खम्भा जैसा कुछ नहीं होता। कहीं ये आर्त-नाद तो नहीं ? मानो कोई बूढा व्यक्ति बीच सड़क पर चीख-चीख कर कह रहा हो ....कि उसका बाप मर गया ....आस-पास जमा अपेक्षाकृत जवान लोग फूस-फुसा रहे हों कि ये तो खुद बूढा है...फिर किस बाप के लिए विलाप कर रहा है...इनके बीच से बेपरवाह लाल-बत्ती मचलती हुई गुजर रही होगी....&lt;br /&gt;कल को कोई पत्रकार ये पूछे कि पत्रकारिता क्या है तो ...हे लोकतंत्र के " लोक " आपको हैरानी नहीं होनी चाहिए ?...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-6579136865222940879?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/6579136865222940879/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=6579136865222940879' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/6579136865222940879'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/6579136865222940879'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='पेड़ न्यूज से आगे....'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-5434398724844256353</id><published>2011-01-16T21:56:00.000-08:00</published><updated>2011-01-17T00:45:33.164-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वलेंटाइन डे पर विशेष'/><title type='text'>झा-पासवान---मिथिला के मडई दूबे( एक्सेक्लुसिव )</title><content type='html'>संजय मिश्र&lt;br /&gt;----------------&lt;br /&gt;पश्चिम के सरकोजी और उनकी प्रियतमा कार्ला ब्रूनी के उत्कट प्रेम देख पूरब के भारत-वासी सुखद अनुभूति से भर उठे । विकिलिक्स दस्तावेजों में कमजोर पुरूष कहे जाने से बेपरवाह ...पत्नी बन चुकी कार्ला से सरकोजी की प्रतिबद्धता ने बहुतों को चौंकाया। कुछ ही दिन पहले फ्रांसीसी राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी जब भारत आए तो ताजमहल देख लेने की उनकी चाहत छुपाए नहीं छुप रही थी।  इस बार कार्ला भी साथ थी। प्रेम के अनुपम प्रतीक ताजमहल देखने के बाद उन्होंने राहत का इजहार किया। दिल की हसरत पूरी हुई । इतना संतोष उन्होंने भारत से हुए समझौतों पर भी नहीं जताया। &lt;br /&gt;टोकना टोल की खुशबू .... जो कि दो महीने बाद दसवीं क्लास में जाएगी .... इन बातों से निहायत ही अनजान है। उसे नहीं पता कि सरकोजी साल २००८ में जब भारत आए तो प्रोटोकॉल की वजह से कार्ला को साथ नहीं ला पाए थे .... तब तक वे परिणय सूत्र में कहाँ बंधे थे। खुशबू को इसका भी अंदाजा नहीं कि सरकोजी तब कितनी टीस लेकर लौटे होंगे।  खुशबू ...अखबार नहीं पढ़ती...पर उसके दादा यानि झा-पासवान तो घर में ही हैं। फिर भी उसे अहसास नहीं कि उसके दादा ने जो साहसिक कदम उठाया था उसके क्या मायने हैं ? अपने दादा-दादी की प्रेम कहानी पर बार-बार कुरेदने पर भी वो हैरान नहीं होती ...उल्टे ये बोध कराती रही कि उनका पारिवारिक-सामाजिक जीवन बिलकुल सामान्य है। उलझन भरे सवालों को सुन खुशबू की दादी यानि गोदावरी देवी सहट कर पास आई। कुछ ही पलों में गोदावरी की यादें परत-दर - परत खुलती जा रही थी....उधर झा-पासवान पशुओं के चारे के लिए कुट्टी काटने में मग्न रहे।&lt;br /&gt;संघर्ष के दिनों को याद करते हुए गोदावरी बताती हैं कि उनका बालपन समस्तीपुर जिले के मैनका गाँव में बीता। खेत- खरिहान में काम करते हुए वो कब सयानी हो गई---पता नहीं चला। मधुबनी जिले के भेजा गाँव में बहन ब्याही गई थी जिस कारण गोदावरी का वहां आना-जाना लगा रहता। उन दिनों मैनका के पासवान जाति के मजदूर मधुबनी जिले के इस इलाके में काम पर लाये जाते थे। इसी दौरान मैनका में ही वेदानन्द झा की मुलाकात गोदावरी से हुई। वेदानन्द , मधुबनी जिले के बाथ गाँव के जमीन-जथा  वाले गृहस्थ रहे ...लिहाजा मजदूरों को लाने अक्सर मैनका जाते। गोदावरी भी इन मजदूरों में शामिल होती।&lt;br /&gt;सिलसिला चलता रहा...और दोनों में प्रेम के अंकुर फूटने लगे। चेहरे पर चंचल मुस्कान बिखेरते गोदावरी कहती है की तब तक वो इन मजदूरों की मेंठ बन चुकी थी। प्रेम पूर्णता के लिए व्याकुल होने लगा... मिलन की महक चरम आनंद को दस्तक देने लगी। दोनों का साथ बाथ के लोगों को रास नहीं आया। पहले से बिवाहित वेदानन्द ने घर-परिवार त्यागने का अहम् फैसला ले लिया।&lt;br /&gt;इस बीच गोदावरी से मिलने महिला मंडल विकास योजना के सदस्य आ गए। वो उनसे बात-चीत में मशगूल हो गई। तब जा कर पता चला कि चौथी क्लास तक पढी गोदावरी समाज सेवा से भी वास्ता रखती हैं। इधर वेदानन्द पशुओं के चारे का इंतजाम कर चुके थे। पास आए और ये सोच कि कोई सरकारी अमला आया है.... निधोक होकर हर-संभव सहयोग की गुजारिश करने लगे। परिचय-पात के बाद उनके चेहरे का भाव बदला। थोड़ी ही देर में वो अपने जीवन के रोमांचक क्षणों में गोता लगा रहे थे। गोदावरी को लेकर जब वे घर से निकल पड़े तो उनके सामने ठौर की समस्या मुंह बाए खड़ी थी। सारी संपत्ति छोड़ आए थे....जीवन पहाड़ सा लगने लगा।  जगह-जगह भटकने के बाद टोकना टोल ने इन्हें आसरा दिया।&lt;br /&gt;रहुआ और भेजा गाँव के बीच बसा है टोकना टोल। मुख्य सड़क के किनारे स्थित इस टोल में दुसाध जाति के ५० परिवार रहते हैं। एक तरफ रहुआ गाँव है जो प्रगति की रफ़्तार में ठहराव झेल रहा है। इसी ऐतिहासिक गाँव में पारसमणि मंदिर परिसर है ...जहाँ कभी संत लक्ष्मी-नाथ गोसाईं ने तपस्या की थी। इस परिसर के आस-पास की अविरल शांति संत के अनुयाइयों को पुकारती रहती है। लेकिन मुख्य मंदिर की मूर्ती चोरी होने के बाद से यहाँ चहल-पहल ख़त्म सी हो गई है। दूसरी तरफ भेजा गाँव है जो कोसी नदी के पश्चिमी तट-बाँध पर बसा है।  सरकारी कारिंदे यहाँ रहते हैं लिहाजा शुद्ध देहाती आवरण के बीच विकास के बिन्दू दिखेंगे। तट-बांध के पूरब हर साल आने वाले विदेशी पक्षियों के झुण्ड कलरव करते दिखे। ये पक्षी यहाँ आते हैं....प्रजनन करते...और जब नए मेहमान उड़ने लायक हो जाते ....लौट जाते हैं अपने देस। पर वेदानन्द लौटने नहीं आए थे। आस्था और समर्पण का मूर्त रूप रहुआ और चलायमान जिन्दगी की धमक सुनाने वाला भेजा ..मानो उन्हें उथल-पुथल से लड़ने की प्रेरणा दे रहे थे।&lt;br /&gt;अतीत को खंगालते वेदानन्द कहते हैं कि पासवान समाज ने उन्हें स-शर्त पनाह दी थी।  पूरे मधेपुर ब्लाक के पासवान समाज के प्रमुख लोग टोकना टोल में जमा हुए....बैठक हुई। इसमें वेदानन्द को ब्राह्मण से दुसाध बन जाने की शर्त रखी गई। कहा गया कि वे " झा" के साथ " पासवान" शब्द भी अपने उपनाम में जोड़ें....जनेऊ का त्याग करें। ये भी शर्त रखी गई कि होने वाले बच्चों के उपनाम पासवान ही रहेंगे। उद्वेग की इस घड़ी ने वेदानन्द और गोदावरी को और करीब ला दिया। दोनों के बीच प्रेम का संबल था ....और थी निर्वाह की प्रबल भावना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झा-पासवान की कथा सुनते हुए भोजपुर अंचल के मडई दूबे और सुगमोना की अमर दास्तान जेहन में उमड़ने लगी। भोजपुर के सलेमपुर गाँव के रहने वाले मडई ब्राह्मण थे जबकि सुगमोना डोम जाति की । सुगमोना के प्यार में ऐसे बंधे कि मडई ब्राह्मण से डोम बनने के लिए भी तैयार हो गए।  इलाके में हाहाकार मच गया। मडई को कठिन परीक्षा के दौर से गुजरना पड़ा। श्मशान घाट पर उनसे वो सारे काम करवाए गए जो डोम जाति के किसी शख्स को करना होता था। मडई किंवदंती बने। उनकी गाथा पर "पिरितिया के खेल" नामक फिल्म भी बनी पर वो विवादों में फंस गई। झा- पासवान ने मडई की  कथा नहीं सुनी है ...वो अपने जीवन में उठे झंझावातों को याद करते हैं।&lt;br /&gt;मडई की तरह झा-पासवान ने भी ऐतिहासिक कदम उठाया और मिथिला के रुढ़िवादी ढाँचे से लोहा लिया। झा-पासवान जानते थे कि अंतरजातीय बिवाह के लिए भारतीय मानस उर्वर नहीं है। उन्हें इसका भी आभास था कि ऐसी शादियों के पीछे जाति क्रम में ऊपर जाने की लालसा प्रबल रही है। वो इसके विपरीत कदम उठाने जा रहे थे। जाति व्यवस्था के शीर्ष पायदान से सीधे निचले क्रम में जाने का उन्होंने साहस दिखाया।  दुसाध बनने के लिए उन्हें भी कठिन परीक्षा देनी पडी। इसके बाद ही पंचों ने उन्हें अपने समुदाय की हिस्सा कबूल किया।&lt;br /&gt;कर्पूरी ठाकुर को अपना आदर्श मानने वाले वेदानन्द इलाके में झा-पासवान के नाम से ही जाने जाते हैं। गोदावरी से उन्हें तीन बेटे हैं जिनके उपनाम पासवान हैं। ये बच्चे जनेऊ नहीं पहनते और इनकी शादी भी पासवान समाज में ही हुई है। वेदानन्द कहते हैं कि बाथ गाँव में उनके वहिष्कार के बावजूद उनके भाई-बंधु कभी-कभार टोकना टोल आते हैं और अपनी भावज गोदावरी से बात करते हैं।&lt;br /&gt;जाति बदलने के बावजूद अपने उपनाम में झा शब्द रहने के सवाल पर उन्होंने कहा कि ऐसा युवा वर्ग को प्रेरणा देने के लिए किया।  वेदानन्द ने खुलासा किया कि हाल में बनी निर्वाचन सूची में उन्होंने अपने उपनाम से "झा" शब्द भी हटा लिया है। यानि अब वे खालिस वेदानन्द पासवान हो गए हैं। झा से झा-पासवान और फिर झा-पासवान से पासवान तक की यात्रा कितनी दुष्कर रही होगी...एक चक्र पूरा हुआ। उनके चेहरे की झुर्रियां इस पर संतोष वयां कर रही थी। घर के माहौल में अब कुछ भी "अजीब" नहीं है..........खुशबू शायद इसी का बोध करा रही होगी।&lt;br /&gt;वेदानन्द पासवान की मानें तो २०११ में वे सौ साल पूरे करेंगे। सेंट वलेंटाइन डे को उत्सव मनाने वाले भारतीय युवा प्रेम के ऐसे देसी संतों को भी याद करें। निज मामलों में निश्छल सरकोजी तो ताज तक खिंचे चले आए....फिर प्रेम का उत्कर्ष दिखाने वाले देसी प्रतीकों से हमें परहेज क्यों? मडई हैं....और जीवित झा-पासवान भी हैं। सौवें साल में प्रवेश के लिए झा-पासवान को शुभकामनाएँ तो दी ही जा सकती हैं।&lt;br /&gt;........................&lt;br /&gt;संजय मिश्र&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-5434398724844256353?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/5434398724844256353/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=5434398724844256353' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/5434398724844256353'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/5434398724844256353'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='झा-पासवान---मिथिला के मडई दूबे( एक्सेक्लुसिव )'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-2606598112018736704</id><published>2010-12-31T21:19:00.000-08:00</published><updated>2010-12-31T22:19:46.843-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यादें'/><title type='text'>गुदरिया</title><content type='html'>संजय मिश्र&lt;br /&gt;... दिमाग पर थोडा जोर दें तो आपको बचपन के वे दिन याद आ जायेंगे जब गुणा बाबा या गुदरिया बाबा को देखते ही आप मचल उठते थे । उससे भी पहले छुटपन में जब आप सोने में आना-कानी करते थे .... तो आपकी मां गुदरिया बाबा का नाम लेकर आपको डराया करती थी। सारंगी की तान छेड़ते ये घुम्मकड़ बाबा..... नाथ संप्रदाय से ताल्लुक रखते हैं। भले ही आज का बचपन इन्हें बिसरा रहा है.... हर दरवाजे पर दस्तक देते नाथ-पंथियों की यात्रा बदस्तूर जारी है।&lt;br /&gt;कुछ सौ साल पहले देश में जब भक्ति मार्ग का चलन बढ़ा तो शैव आस्था से प्रभावित एक वर्ग ने नई राह पकड़ी । गोरखनाथ इनके अराध्य - पुरुष हुए। ये ब्राह्मण-धर्म की जटिलताओं को नहीं मानते... और न ही भेद-भाव पर यकीन करते। भक्ति के सहारे परम शक्ति से एकाकार हो जाना ही इनका मकसद है।&lt;br /&gt;एक अनुमान के मुताबिक देश भर में इस संप्रदाय के साठ हजार सदस्य हैं।   गोरखपुर इनके लिए तीर्थ-स्थल जैसा ही है। पंद्रह सालों तक भिक्षाटन के बाद जब ये दीक्षित होते हैं तब जाकर इन्हें गोरखपुर में गद्दी नसीब होती है। इस दौरान उन्हें भिक्षा के जरिये चौरासी मन सामग्री जमा करनी होती है.....जिसमें अकेले बारह मन कपडे होने चाहिए। नाथपंथी इन कपड़ों को गुदरी कहते हैं ..... यही कारण है की गृहस्थ इन्हें गुदरिया बाबा कह-कर पुकारते हैं। साल में बस एक दिन यानि १४ जनवरी ...मकर-संक्रांति का दिन इनके लिए ख़ास होता है जब इन्हें गोरखपुर आश्रम के दर्शन होते हैं । फिर लौट आते हैं वे उसी सांसारिक दुनिया में जिससे अलग होना उनका लक्ष्य है।&lt;br /&gt;कहते हैं दैनिक जीवन की कठिनाइयों से जूझते हुए इंसान में जब निराशा का भाव घर कर लेता है तब वह संन्यास की ओर बढ़ता है। इस विरक्त भाव को नजर अंदाज भी कर दें तो भी जीवन की भंगिमाओं से मुक्त होने की लालसा कई लोगों को इस ओर खींचती है। पर मोह-भंग के बावजूद अपनों से दूर हो जाना क्या इतना आसान है ?&lt;br /&gt;गुदरिया बाबा को जब सारंगी की तान पर निर्गुण , सदगुण , गोपीचंद ... गाते गौर से सुनेंगे तो आपको विरह की यही वेदना महसूस होगी।&lt;br /&gt;समाज की बात छोड़ भी दें... लेकिन मां से दूर होना इनके लिए कठिन परीक्षा होती है। मान्यता है कि इन्हें मां का भीख नसीब नहीं होता.... मां भला अपने संतान को योगी कैसे बनने दे। मां से मुक्ति संभव नहीं ...तभी तो परम सत्य से मिलन की आस रखने वाला गुदरिया बाबा छल-पूर्वक मां से भीख लेता है....&lt;br /&gt;यही कारण है कि हर घर की देहरी पर ये माताओं के हाथों ही साड़ी लेने की जिद करते हैं।  मिल गई तो ठीक ....और न मिले तो भी ठीक। आशा-निराशा के इसी चक्र से तो उन्हें पार पाना है। फिर चल पड़ते हैं अगली देहरी पर......जीवन भी कैसी यात्रा है.......&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-2606598112018736704?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/2606598112018736704/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=2606598112018736704' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/2606598112018736704'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/2606598112018736704'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='गुदरिया'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-8101601687418393796</id><published>2010-09-27T20:40:00.000-07:00</published><updated>2010-10-15T02:44:22.523-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बिहार की चिंता किसे ?'/><title type='text'>हे राम !.....बिहार को कौन बचाएगा</title><content type='html'>ज्योति बहुत खुश है। बहेड़ा के राजकीय कन्या प्राथमिक विद्यालय में चौथी क्लास में पढने वाली ये बच्ची चहकते हुए कहती है -- जब वो नौवीं क्लास में जाएगी तो उसे भी साईकिल मिलेगा। ज्योति खुश इसलिए भी है कि अपने सहपाठियों के संग वो भी दरभंगा हो आई ....पहली बार ... ये बच्चे प्रदर्शन करने गए थे। हाथों में तख्तियां लिए ये बच्चे डी एम से गुहार लगा रहे थे कि ---" स्कूल में ताड़ी खाना नहीं चलेगा "। ज्योति प्रदर्शन के मायने नहीं समझती और न ही उसे अहसास है कि उसके स्कूल को ढहा दिया जाएगा।&lt;br /&gt;आप समझ रहे होंगे कि मैं कोई पहेली बूझा रहा हूँ....पर ये सच है। दरभंगा का शिक्षा विभाग जिले के बहेड़ा के इस स्कूल को तोड़ने की मुहिम में लगा है। इसलिए नहीं कि नया भवन बनना है ....इसलिए भी नहीं कि स्कूल को नए परिसर में शिफ्ट करना है। १९ अगस्त २०१० को जिला शिक्षा अधीक्षक ने बेनीपुर के ब्लोक शिक्षा प्रसार अधिकारी को लिखित आदेश दिया कि स शस्त्र बल के साथ स्कूल भवन को तोड़ने की कार्रवाई को अंजाम दिया जाए। अगले ही दिन इसकी तामील के लिए जिले के डी एम संतोष कुमार मल्ल ने .....फ़ोर्स को बहेड़ा भेज दिया। लेकिन ग्रामीणों के भारी विरोध के कारण उन्हें बैरंग लौटना पड़ा।&lt;br /&gt;इस कहानी में कई पात्र हैं। एक पक्ष है बहेड़ा के उन महा दलित परिवारों का जिन्होंने स्कूल बनबाने के लिए जमीन दी थी। ये स्कूल १९५५ में बना जबकि इसका सरकारीकरण १९६१ में हुआ। महा दलित बस्ती के बीच स्थित इस स्कूल के जमीन दाताओं में कुशे राम , राजेंद्र मोची , कमल राम, फेकू राम, उपेन्द्र राम शामिल हैं। वे बताते हैं कि बस्ती के बच्चों का पड़ोस के सवर्ण बहुल गाँव के स्कूल में जाकर पढाई करना उस दौर में कितना मुश्किल था। सरकारीकरण केसाथ ही स्कूल की जमीन बिहार के राज्यपाल के नाम कर दी गई। यही कारण है कि १९६१ से २०१० तक राज्यपाल के पदनाम से ही जमीन की रसीद कटी है। महा दलितों के बीच शिक्षा के प्रसार के लिए बस्ती के लोग इस स्कूल को कन्या उच्च विद्यालय में उत्क्रमित करने के लिए प्रयासरत हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस कहानी की दूसरी पात्र हैं भगवनिया देवी .... महा दलित वर्ग से ही आती हैं। ठसक के साथ कहती हैं कि बहेड़ा के विधायक और आर जे डी के प्रदेश अध्यक्ष अब्दुल बारी सिद्दीकी का उन्हें आशीर्वाद मिला हुआ है। इसी राजनीतिक नजदीकी की बदौलत भगवनिया देवी साल १९८९ में स्कूल भवन के हिस्से में कब्ज़ा ज़माने में कामयाब हो गई। जमीन दाताओं के लगातार विरोध के बाद साल १९९० में प्रशासन ने स्कूल से कब्ज़ा हटा दिया। कुछ साल चुप बैठने के बाद , साल १९९६ में भगवनिया देवी एक बार फिर स्कूल भवन में कब्ज़ा ज़माने में सफल हुई। इस बार उसने स्कूल भवन में ताड़ी खाना ही खोल लिया। भगवनिया देवी ने दावा किया कि उसके पास जमीन के कागजात मौजूद हैं। ग्रामीणों के लगातार विरोध के बाद प्रशासन ने जांच के आदेश दिए। जांच में कागजात फर्जी पाए गए। आखिरकार प्रशासन ने साल २००९ के जनवरी में ताड़ी खाने को हटा दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकरण में तीसरा कोना आर जे डी नेता सिद्दीकी का है। वो जे पी आन्दोलन की उपज हैं और देश का मीडिया उन्हें साफ़ छवि वाला नेता मानता है। उन्हें चुनाव जीतने के लिए महा दलित कार्ड की जरूरत हो ...ऐसी विवशता नहीं है। दर असल उन्होंने इसे प्रतिष्ठा का सवाल बना दिया है। भगवनिया देवी को फायदा दिलाने की उनकी बेचैनी पर बहेड़ा के पूर्व मुखिया बैद्यनाथ मल्लिक रौशनी डालते हैं। उनका कहना है कि भगवनिया देवी की नतनी सिद्दीकी के पटना आवास में नौकरी करती हैं। अपने इसी स्टाफ को उपकृत करने के लिए आर जे डी नेता ने विधान सभा में कई बार ध्यानाकर्षण प्रस्ताव रखा। इसमें भगवनिया देवी के साथ न्याय करने कि गुहार लगाई गई। अपने मकसद में कामयाबी नहीं मिलने के बाद सिद्दीकी ने इसी साल अगस्त महीने में एक बार फिर ध्यानाकर्षण प्रस्ताव रखा। उन्होंने सरकार के मंसूबे पर एतराज जताते हुए स्पीकर से मामले में हस्तक्षेप का आग्रह किया। स्पीकर उदय नारायण चौधरी महा दलित वर्ग से आते हैं। आपको याद हो आएगा वो प्रकरण जब स्पीकर चौधरी ने मुख्य मंत्री नीतीश कुमार के समर्थन में नारा लगा दिया था। खैर , अब भगवनिया देवी के मामले में दरभंगा के अधिकारियों को स्पीकर कार्यालय से ही लिखित और मौखिक आदेश मिल रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मामले का चौथा बिंदू जिले के अधिकारियों से जुड़ा है। उनकी मनोदशा जानने के लिए फिर रूख करते हैं दरभंगा समाहरणालय के उस वाकये का जब बहेड़ा स्कूल के छात्रों ने २१ अगस्त को वहां प्रदर्शन किया था। प्रदर्शन के संबंध में जब पत्रकारों ने डी एम मल्ल की प्रतिक्रिया चाही , तो वे मीडिया कर्मियों से ही उलझ गए। इस दौरान कई टी वी चैनलों के कैमरे टूट गए। बाद में डी एम ने पत्रकारों के साथ बैठक में खेद जताया और अपनी बेबसी बताई। उन्होंने खुलासा किया कि स्कूल भवन गिराने के लिए उन पर पटना से जबरदस्त दबाव बनाया जा रहा है। इस दबाव को जिला शिक्षा विभाग की लाचारी में भी टटोला जा सकता है....अपने ही स्कूल को ढहाने का फरमान और वो भी बिना कोई वजह बताए। सूत्रों की माने तो शिक्षा विभाग स्कूल भवन तोड़ लेगा और तब भगवनिया देवी को कब्ज़ा दिलानेका मार्ग प्रशस्त होगा।&lt;br /&gt;स्कूल बचाने की मुहिम में लगे लोगों ने अब हाई कोर्ट की शरण ली है। इस बीच बेनीपुर अनुमंडल कोर्ट में पहले से पेंडिंग इस मामले के जल्द निष्पादन का आदेश दरभंगा जिला कोर्ट ने दिया है। इसके लिए ४ अक्टूबर तक का समय दिया गया है।&lt;br /&gt;विधान सभा चुनाव की प्रक्रिया चालू है। सत्ताधारी दल की ओर से मुख्य मंत्री नीतीश कुमार स्टार प्रचारक हैं। उनकी पिछली जन सभाओं को याद करें तो चुनाव प्रचार के दौरान वे महा दलितों के उत्थान की बात करेंगे। सबसे ज्यादा जोर बालिका शिक्षा योजना पर होगा उनका.... छात्राओं को साईकिल देने की स्कीम पर वे इतराने से नहीं चूकेंगे । जाहिर है बहेड़ा स्कूल की ज्योति भी ऐसे भाषण सुन आह्लादित होगी...अपने अरमानों को पंख लगने के सपने देखेगी....इस बात से बे-खबर कि उसके स्कूल को जमींदोज करने की कोशिशें जारी हैं....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-8101601687418393796?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/8101601687418393796/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=8101601687418393796' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/8101601687418393796'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/8101601687418393796'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='हे राम !.....बिहार को कौन बचाएगा'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-3432409376642978457</id><published>2010-09-12T01:34:00.000-07:00</published><updated>2010-09-12T04:05:26.118-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जलजमाव की समस्या'/><title type='text'>बाढ़ ----- भाग 3</title><content type='html'>हर खेत को पानी, हर हाथ को काम......&lt;br /&gt;जी हाँ ! ये नारा है बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग का। विभाग के इरादों पर शक करना मुनासिब नहीं लेकिन परबत्ता और गई जोरी जैसे इलाकों के हालात सरकार के पैगाम की कलई खोलते हैं। इन गांवों  के खेत जल -जमाव से सालो भर डूबे रहते हैं। जबकि यहाँ के अधिकतर कमाऊ हाथ दूसरे प्रदेशों में जीवन बचा लेने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जो उत्पादक हाथ बाहर नहीं जा सके उनमें से कईयों ने माओ वादियों का दामन थाम लिया। यहाँ का आवागमन नाव पर टिका है। ये दशा महज परबत्ता और गैजोरी की नहीं है .... राज्य के सैकड़ो गावों की यही नियति है।&lt;br /&gt;बाढ़ग्रस्त इलाकों में जल-जमाव विकराल समस्या बन गया है।  इसे आंकड़ों से समझें तो सहूलियत होगी। मोटे अनुमान के मुताबिक़ दस लाख हेक्टेयर जमीन जल-जमाव से ग्रस्त है जबकि इससे प्रभावित जनसंख्या पोने एक करोड़ के आस-पास है।  अकेले कोसी परियोजना के पूर्वी  नहर  प्रणाली के दायरे में  जल  जमाव  वाले  एक लाख २६ हजार हेक्टेयर से जल निस्सरण की योजना सरकार को बनानी पडी। इसी तरह गंडक से निकली तिरहुत नहर प्रणाली के तहत जल- जमाव वाली दो लाख हेक्टेयर को खरीफ की फसल लायक बनाने की योजना बनाई गई।  आंकड़ों पर असहमति हो सकती है क्योंकि जल-जमाव को समझने और मान ने के अपने अपने दृष्टिकोण हो सकते हैं। लेकिन इतना तो तय   है कि १९५४ में बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र २५ लाख हेक्टेयर था जो कि आज तीन गुना हो गया है।   जाहिर है जल-जमाव क्षेत्र भी साल-दर-साल बढ़ता ही गया।&lt;br /&gt;दर असल , जल-जमाव प्राकृतिक और मानवीय प्रयासों के प्रतिफल के रूप में सामने आता है। मिट्टी निर्माण की प्रक्रिया के साथ ही अधिसंख्य जल-जमाव वाले इलाके बन गए जिनके साथ लोगों ने ताल-मेल बिठा लिया। लेकिन जबसे बाढ़ से सुरक्षा के उपाय करने में तेजी आई नए जल-जमाव वाले क्षेत्र आकार लेने लगे। इसने कई क्षेत्रों का भूगोल ही बदल दिया।&lt;br /&gt;पहले प्राकृतिक प्रक्रिया को समझें। नदियों में बाढ़ आने के बाद इसका पानी नदी के तट से दूर तक फैलता है। नदी में पानी का दबाव कम होने पर बाहरी पानी वापस नदी में आना चाहता है। ये पानी बड़े इलाके में फैला हो तो ये आगे जाकर नदी में मिलने की कोशिश करता है। दोनों ही स्थितियों  में आबादी वाले क्षेतों के अवरोध और जगह जगह जमीन की नीची सतह के कारण सारा पानी नदी में नहीं लौट पाता है। नतीजतन कई जगहों पर पानी का स्थाई जमाव हो जाता है। स्थानीय भाषा में इसे " चौर" कहते हैं।&lt;br /&gt;नदियों में सिल्ट अधिक रहने पर बाढ़ के समय कई उप धाराएं फूट पड़ती हैं। ये वैज्ञानिक भाषा में " उमड़ धाराएं " कहलाती हैं। उमड़ धाराएं नदी के समानांतर बहती हुई आगे जा कर फिर से नदी में मिल जाती है। नदी के निचले हिस्सों में जमीन का ढाल कम रहने के कारण जल प्रवाह की रफ़्तार धीमी हो जाती है। जिस वजह से सिल्ट  को जमने का मौक़ा मिल जाता है। अधिक मात्रा में पसरा ये सिल्ट कभी- कभी संगम से पहले ही उमड़ धारा का मुहाना बंद कर देता है। उमड़ धाराओं का अवरुद्ध पानी आखिरकार बड़े चौरों का निर्माण करता है।  चंपारण में झीलों और चौरों की श्रुंखला इस प्रक्रिया की याद दिलाते हैं।&lt;br /&gt;अधिक सिल्ट वाली नदियों का ये स्वाभाव होता है कि कुछ सालों के अंतराल पर ये उमड़ धारा को ही मुख्या धारा बना लेती हैं। छोडी गई मुख्या धारा को स्थानीय भाषा में " छाडन धारा" कहते हैं। बाढ़ के समय में तो छाडन धारा में खूब पानी रहता है लेकिन अन्य समय में इनमे कई जगह जमीन की सतह जग जाती है। इस तरह कई झीलों की श्रुंखला का रूप ये अख तियार करती हैं। कोसी इलाके में इसके अनेको उदाहरण आपको मिल जाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तटबंधों के निर्माण ने नदियों के स्वाभाविक प्रवाह को बेतरह प्रभावित किया है। असल में इसके कारण उमड़ धाराओं का उद्गम और संगम दोनों बाधित हो जाता है। नतीजा ये हुआ कि कई उमड़ धाराएं तट बंधों के कारण जल-लमाव वाले क्षेत्रों में तब्दील हो गए हैं। इसके अलावा कई सहायक नदियों का संगम बाधित हो गया। कोसी पश्चिमी तट बांध के बनने की वजह से भूतही बालन नदी का इस नदी में मिलन बाधित हो गया।  अब ये दूर का साफर तय कर कोसी में मिलती है। जिस कारण भेजा से कुशेश्वर स्थान के बीच का अवादी वाला हिस्सा जल-जमाव से ग्रस्त रहता है।&lt;br /&gt;तट बंधों के कच्चे अस्तर और रख-रखाव में कोताही के कारण तट बांध के बाहर स्थाई तौर पर पानी का जमाव हो जाता है। ये रिसाव के कारण भी होता है साथ ही जमीन के अन्दर पानी के तल को मिलने वाले दबाव के कारण भी । तट बांध के भीतर पानी का दबाव बढ़ने से तट बांध के बाहर जमीन के अन्दर के पानी का तल ऊपर उठ जाता है। कई बार ये जमीन के ऊपर भी आ जता है। ये जमा हुआ पानी तट बांध के बाहरी ढलान को कमजोर बनता है जिस कारण तट बांध टूट भी जाते हैं। कोसी पूर्वी तटबंध के बाहर भाप्तियाही से कोपडिया के बीच ३७००० एकड़ में जल-जमाव इसका अनूठा उदहारण है।&lt;br /&gt;जल-जमाव वाले क्षेत्रों के दुःख का अनुमान लगाना हो तो कुशेश्वर स्थान, घनश्यामपुर, किरतपुर, बिरौल, हायाघाट, सिघिया, महिषी, नौहट्टा, सिमरी बख्तियारपुर, सलखुआ , महनार, बैर्गेनिया, पिपराही, कतरा, खगरिया, चौथम, परबत्ता, गोगरी, काढ़ा-कोला , प्राण-पुर, आजम नगर, नौगछिया, बीहपुर, गोपालपुर जैसी जगहों पर हो आयें। कुशेश्वर स्थान और खगडिया इलाके में कई नदियाँ कोसी से संगम करती हैं। इन्ही इलाकों में कई तटबंधों समाप्त हो जाते हैं। जिससे इन नदियों का पानी संगम से पहले ही पसर जाता है।  विस्तृत जल-राशि की ये तस्वीर आपको विचलित कर सकती है। लोगों की पीड़ा को धैर्य से महसूसना हो तो कोसी तटबंधों के बीच के दो लाख ६० हजार एकड़ जल-जमाव वाले इलाके में जाने का साहस करें। इन इलाकों में नहीं आ सके तो टाल क्षेत्र में ही जाकर इस दुःख का ट्रेलर देख लें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सोचने वाली बात है की एक तरफ सिंचाई प्रणाली का विस्तार किया जा रहा है तो दूसरी और जल-जमाव वाले इलाके से पानी निकालने की कवायद की जा रही है। ये दोनों ही उल्टी प्रक्रिया हैं। और एक ही नदी बेसिन में चालू हैं। नदियों के पानी का ड्रेनेज कितना कारगर रह पाया है ये सोचना भी अबूह लगता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-3432409376642978457?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/3432409376642978457/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=3432409376642978457' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/3432409376642978457'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/3432409376642978457'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2010/09/3.html' title='बाढ़ ----- भाग 3'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-2799954279260996862</id><published>2010-09-04T22:03:00.000-07:00</published><updated>2010-09-04T23:49:34.429-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाढ़ का कारण'/><title type='text'>बाढ़ क्यों आती है ?  bhaag - २</title><content type='html'>बिहार में इस साल इन्द्रदेव मेहरबान नहीं हैं। मौसम विभाग का अनुमान भी गलत साबित हो रहा है। राज्य के सभी जिले सूखाग्रस्त घोषित हो चुके हैं जबकि बड़ी आबादी बाढ़ से जूझ रही है। लोग समझ नहीं पा रहे की औसत से कम बारिश के बावजूद बाढ़ तांडव क्यों मचा रही है? आम लोगों को बताया जा रहा है कि नेपाल ने पानी छोड़ दिया .... इसलिए ऐसी नौबत आई है। इसी समझ के सहारे चंपारण के लोग बाल्मिकीनगर बराज को " विलेन " मान कोस रहे होंगे। फर्ज करिए ये सही हो ...फिर बागमती बेसिन में मची तबाही के लिए किसे दोष देंगे .....बागमती पर तो बराज नहीं है। इतना ही क्यों... कुशेश्वर स्थान और खगडिया की दुर्दशा के लिए किसे कसूरवार ठहराएंगे?&lt;br /&gt;दर असल , बिहार का भूगोल ही ऐसा है कि हर क्षेत्र के लोग बाढ़ की प्रक्रिया को अच्छे तरीके से समझ नहीं पाते। पहाडी इलाके के लोगों की इस संबंध में जो सोच है उससे अलग समझ गंगा के दक्षिण के मैदानी इलाके के लोगों की है। गंगा के उत्तर के लोग कमोवेश पूर्णता के साथ बाढ़ के चक्रव्यूह में फंसते हैं। सामान्य भाषा में कहें तो प्रकृति से जो पानी हमें मिलता हैकुछ हिस्सा रिसकर जमीन के अन्दर चला जाता है जबकि अधिकाँश हिस्सा बहते हुए समुद्र में जा मिलता है। इन्हें हम नदियाँ कहते हैं। यानि ये पानी के ' ड्रेनेज" का जरिया हैं। जमीन का ढाल नदियों के प्रवाह का " डा इनेमिक्स " तय करता है। ज्यादातर नदियाँ पहाड़ों से निकलती हैं जिनके पानी का स्रोत वर्षा, वर्फ और बड़े झील होते हैं। मैदानी इलाकों में कई नदियाँ बड़े चौरों से निकलती हैं। इसका बड़ा उदाहरण है बूढ़ी गंडक, जो कि पश्चिम चंपारण के चौतरवा चौर से निकलती है।&lt;br /&gt;पहाड़ों और मैदानी भागों में जब मूसलाधार बारिश होती है तो पानी नदी के किनारों को पार कर जाता है। ऊँचे पहाड़ों पर बर्फ पिघलने से भी नदियाँ इस दशा में आती हैं। ये पानी बढ़ते हुए ख़ास दूरी तक जाता है जिसे नदी का " कैचमेंट एरिया " यानि डूब क्षेत्र कहते हैं। ये भौगोलिक प्रक्रिया है...जिसे वैज्ञानिक भाषा में " बाढ़" कहते हैं। लेकिन जब डूब क्षेत्र की सीमा को भी नदी का पानी पार कर लेता है तो ये तबाही का कारण बनता है। जब हम कहते हैं कि बाढ़ से राज्य तबाह है तो हम इसी स्थिति की ओर इशारा कर रहे होते हैं.... यानि पानी का डूब क्षेत्र को भी पार कर जाने वाली स्थिति। अमूमन डूब क्षेत्र के बाहर आबादी अधिक रहती है। हर साल ये आबादी इस नौबत से गुजरती है।&lt;br /&gt;गंगा के दक्षिण की नदियाँ हिम पोषित नहीं हैं। भारी बारिश से ही इनमे सैलाब आता है। जबकि गंगा के उत्तर की अधिकाँश नदियाँ हिम पोषित हैं। हिम पोषित रहने के कारण ये " पेरेनियल रिवर " कहलाती हैं यानि  ऐसी नदी जिसमे सालो भर पानी आता हो। यही कारण है कि मानसून की दस्तक से पहले भी इनमे बाढ़ आती है। कभी-कभार ये पानी डूब क्षेत्र को भी पार कर जाता है। ऐसा अक्सर मई के दुसरे और जून के पहले पखवाड़े में देखने में आता है। कमला- बलान नदी के किनारे रहने वाले हर साल इस स्थिति से दो-चार होते रहते हैं।&lt;br /&gt;नदियों के अत्यधिक फैलाव के अन्य कारण भी हैं।  पहाड़ों पर पेड़ों की अंधा-धुन कटाई के कारण नदियों के पानी का बहाव तेज हो जाता है। तेज गति " सिल्ट" की अधिक मात्रा मैदानों तक पहुंचता है। नदी का ताल उठाता जाता है .... जिससे बाढ़ का पानी बड़े इलाके में फ़ैल जाता है।&lt;br /&gt;बाढ़ के विस्तार की बड़ी वजह सिंचाई परियोजनाएं भी हैं। इन परियोजनाओं के तहत बराज या डैम और साथ ही नदी के दोनों किनारों पर तट बंध बनाए जाते हैं। तट बंधों के बीच की दूरी बहुत ज्यादा नहीं होती। नदी का पानी इन्हीं तट बंधों के बीच सिमटने को बाध्य रहता है। पानी के साथ जो सिल्ट आता है वो साल-दर-साल जमा होता रहता है। नतीजतन , तट बंधों के अन्दर जमीन का तल उठता रहता है। उधर तट बंध के बाहर की जमीन पहले की तरह रहती है यानि तट बंध के अन्दर की जमीन की अपेक्षा नीची । यही कारण है कि तट बांध के अन्दर पानी का दबाव बढ़ने पर तट बंध टूट जाता है.... और पानी नीची जमीन की तरफ भागता है। इस पानी का बेग इतना अधिक होता है कि लोगों को सुरक्षित स्थानों तक जाने का मौक़ा तक नहीं मिलता . इस साल भी सिकरहना, लखन्देइ, जमींदारी, त्रिवेणी नहर और दोन नहरों के तट बंध जब टूटे तो लोगों को भारी दुःख झेलना पड़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिंचाई परियोजनाएं जब पूरी हो जाती हैं तब लाभ के साथ साथ जो कष्ट भोगना पर सकता है उसकी बानगी की ओर इशारा किया हमने। अब हम बताते हैं आधी-अधूरी परियोजनाओं के खतरनाक परिदृश्य के संबंध में।  अब बागमती परियोजना को ही लीजीये। ये बहु-उद्देशीये परियोजना अभी शुरू भी नहीं हुई है लेकिन इस नदी पर कई जगह तट बंध बना दिए गए हैं। ढ़ंग से रूनी सैदपुर तक नदी का पानी तट बंधों के बीच कैद रहता है जिसे  रूनी सैदपुर से आगे खुला छोड़ दिया गया है। लिहाजा कट रा इलाका पूरी तरह जलमग्न हो जाता है। इससे भी विकत स्थिति कुशेश्वर स्थान और  खगडिया की है। ये बताना दिलचस्प होगा कि २३ अगस्त को जिस समय कुशेश्वर स्थान में सूखे की स्थिति पर सरकारी अधिकारियों की बैठक चल रही थी उसी समय इस प्रखंड का सड़क संपर्क अनुमंडल मुख्यालय बिरौल से भंग हो गया। बाढ़ के पानी में सड़क डूब चुकी थी।&lt;br /&gt;ना तो नेपाल में वर्षा ऋतू अलोपित हो जाएगी और ना ही हिमालय पर बर्फ पिघलना बंद होगा... ये भी अपेक्षा नहीं राखी जा सकती कि नेपाल भगवान् शिव की तरह ये सारा पानी जटाओं में कैद कर ले। समस्या के निपटारे के लिए नेपाल की सहभागिता को बल देना ही पडेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-2799954279260996862?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/2799954279260996862/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=2799954279260996862' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/2799954279260996862'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/2799954279260996862'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2010/09/bhaag.html' title='बाढ़ क्यों आती है ?  bhaag - २'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-6706380193555109516</id><published>2010-08-31T01:23:00.000-07:00</published><updated>2010-08-31T03:27:35.978-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाढ़ की बिपदा'/><title type='text'>बाढ़ का तांडव -- भाग 1</title><content type='html'>२३ - अगस्त .... सावन की अंतिम सोमवारी के दिन जब हजारो आस्थावानों ने कुशेश्वर स्थान मंदिर में जलाभिषेक किया तो उन्हें सहसा यकीन नहीं हो रहा था। जहां कई लोग भक्तिभाव में डूबे थे वहीं अन्य श्रधालु इस बात की तज-बीज कर रहे थे कि बीते सालों में सोमवारी के दिन इस मंदिर परिसर में कितना पानी हुआ करता था।  बाढ़ की बिभीषिका झेलने वाले दरभंगा जिले के लोगों को उस समय भी हैरानी हुई जब अलीनगर के गरौल गाँव के पास सूखे खेतों में पानी पहुचाने के लिए ग्रामीणों ने कमला नदी के मूंह को ही बाँध डाला । ये अगस्त के दूसरे सप्ताह का वाकया है। हर तरफ जन-सहयोग के इस मिसाल की चर्चा हुई। अधिकारियों ने भी लोगों को रोकने की कोई कोशिश नहीं की।&lt;br /&gt;हालांकि जन भागीदारी से बना ये बाँध बाढ़ आते ही ध्वस्त हो गया। उधर बाढ़ के कारण कुशेश्वर स्थान का सड़क संपर्क २५ अगस्त को भंग हो गया। यहाँ के उन किसानो को मायूसी हुई जिन्होंने हजारो एकड़ में धान, सब्जी, और दलहन की खेती की थी। कम बारिश के कारण सिमरटोका,  गईजोरी, इटहर , और भरेन गाँव के जल-जमाव वाले खेत भी सूख गए थे जिसको किसानो ने इन फसलों से आबाद किया था।   आम तौर पर १५ अगस्त के बाद इस नक्सल प्रभावित इलाके में बाढ़ नहीं आती है। लेकिन किसानो के भरोसे पर फिलहाल पानी फिर गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल के दिनों में बिहार में सूखे का मुद्दा इतना गरमाया कि पुर्णिया जिले में बाढ़ की दस्तक लोगों के जेहन को झकझोड़ नहीं पाया। दर असल बाढ़ के संबंध में बिहार में दो तरह के दृश्य उभरते हैं। एक दृश्य उस वर्ग का है जो बाढ़ का कहर झेलता है। दूसरा वर्ग है नेताओं, पत्रकारों और एन जी ओ का जो इसे उत्सव के रूप में लेता है।  इस वर्ग को अपनी छवि चमकाने के लिए पहले वर्ग की असीम पीड़ा चाहिए। ऐसा इस बार नहीं हुआ है। इनकी नजर में बाढ़ से मरने वालों की संख्या इतनी नहीं बढी है कि आंसू बहाए जाएं। हालांकि पुर्णिया ने टीवी चैनलों को अच्छे विजुअल जरूर दे दिए .....नदी के कटाव से  एक स्कूल भवन का लटकता हुआ आधा हिस्सा जिसके नीचे बहती तेज धारा.....&lt;br /&gt;कुछ ही दिन बीते कि चंपारण में बाढ़ ने उग्र रूप दिखाना शुरू कर दिया। गंडक, बूढ़ी गंडक, और अन्य सहायक नदियों के उफान से लोग सहमे हुए हैं। कई जाने जा चुकी हैं। बाल्मिकी नगर का टाइगर प्रोजेक्ट इलाका भी बाढ़ से अछूता नहीं रहा।  पर्यटकों को आकर्षित करने वाले सैकड़ो वन्य जीव अचानक आई उफनती धारा में बह गए। नरकटिया गंज रेल-खंड पर ट्रेन परिचालन कई बार ठप करना पड़ा है। बगहा का सड़क संपर्क टूटा.....दोन नहर तो कई स्थानों पर तास के पत्ते की तरह भहर गई। बंगरा और तिलावे नदी का तट बंध ध्वस्त हो गया। सिकरहना तट बंध टूटने से सुगौली इलाके में जल- प्रलय का दृश्य बन गया। त्रि वेणी  तट बंध भी धराशाई हो चुका है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर बागमती नदी के उपद्रव से लोग सांसत में हैं। कटरा और औराई प्रखंड में स्थिति सोचनीये बनी हुई है।  कटरा इलाके में तट बंधों के बीच के सैकड़ो घरों के ऊपर से पानी बह निकला। औराई के कई गाँव में लोगों ने पेड़ पर चढ़ कर जान बचाई। २५ अगस्त को सरकार ने आखिरकार गंडक, बागमती, और कोसी बेसिन में रेड अलर्ट जारी कर दिया।  कोसी के पश्चिमी तट बंध पर जबरदस्त दबाव से अधिकारी सहमे हुए हैं। पानी का ये दबाव निर्मली के दक्षिण से जमालपुर तक बना हुआ है। दबाव को भांफ्ते हुए ही इस तट बंध की उंचाई तीन मीटर बढाने का फरमान जारी किया गया था। लेकिन महज एक मीटर उंचाई बढ़ा कर खाना पूरी कर ली गई। किरतपुर ढलान के निकट इस तट बंध के टूटने की आशंका से ग्रामीण डरे हुए हैं। तट बंध के अन्दर फंसे पचीसो गाँव टापू में तब्दील हो चुके हैं। अधिकाँश बाढ़-पीड़ित तट बंध और सरकार कि ओर से बने " रेज्ड प्लेटफार्म " पर शरण लिए हुए हैं।&lt;br /&gt;बिहार में इस बार औसत से काफी कम बारिश हुई है। बावजूद इसके बाढ़ का कहर चिंता का कारण है। गंगा के उत्तर में बहने वाली अधिकाश नदियों का उदगम हिमालय है। बरसाती नदियाँ इन्हीं हिम-पोषित नदियों में मिलती हैं। ये हिम-पोषित नदियाँ बाद में गंगा में " डिसजोर्ज " होती हैं।  गंडक सोनपुर के पास गंगा में मिल जाती है। इस इलाके की  सबसे लम्बी नदी है- बूढ़ी गंडक । ये हिम-पोषित नहीं है और खगडिया के पास गंगा में जा मिलती है। जबकि कोसी , कुरसेला के निकट गंगा से संगम करती है। संगम से पहले कोसी बड़ा डेल्टा बनाती है। उधर, महानंदा , कटिहार जिले के गोदागरी के पास गंगा में समाहित होती है।&lt;br /&gt;दर असल, गंडक से महानंदा तक नदियों का जाल बिछा है जो इस पूरे भू-भाग को एक-सूत्र में बांधता है। अधिकाश नदियों का ढाल उत्तर से दक्षिण-पूर्व की दिशा में है। शरीर की शिराओं की तरह बहती ये नदियाँ सुख और दुःख का " पैटर्न " बनाती है ... ये नदियाँ एक सामान जीवन शैली का निर्माण भी करती। हर साल चंपारण से कटिहार तक बाढ़ तांडव मचाती है। दुःख लोगों को जोड़ता है। इनकी समृधि की राह में इन नदियों पर चल रह़ी आधी-अधूरी  सिंचाई परियोजनाएं बाधक बन खडी हो जाती। कई इलाकों को सालो भर इसका खामियाजा भोगना पड़ता है। कुशेश्वर स्थान इसका " क्लासिक " उदाहरण है।&lt;br /&gt;कुशेश्वर स्थान में बारिश हो या ना हो ....यहाँ बाढ़ जरूर आती है। इसी इलाके में बागमती , कमला-बलान, और कोसी के तट बंध जाकर ख़त्म होते। इसके आगे इन नदियों का सारा पानी पूरे क्षेत्र में पसर जाता है। बागमती बाद में बदला-घाट के पास कोसी में समाहित हो जाती है। इस साल भी बागमती कुशेश्वर स्थान में काफी पानी उड़ेल आई है। अधवारा समूह की नदियों का पानी भी हायाघाट में बागमती से जा मिलती है...जहां से आगे ये संयुक्त धारा करेह नाम धारण करती है।&lt;br /&gt;अधवारा समूह और कमला बलान उफान पर हैं। ख़ास कर तट बंधों के बीच के गाँव और टोलों में रहने वाले सुरक्षित स्थानों पर चले गए हैं। यहाँ इनके सामने हर तरह की दिक्कतें हैं। रहने के लिए ठौर , भोजन, जलावन, पेय जल की व्यवस्था तो मुश्किल है ही साथ ही सर्प दंश की समस्या से भी इन्हें जूझना पर रहा है। महिलाओं को तो खासी परेशानी है। ये मुश्किलें हर बाढ़-पीड़ित इलाके में एक सामान है। राहत का काम अभी शुरू नहीं हुआ है। अधिकारी फिलहाल बाढ़ में फंसे लोगों को निकालने की चिंता में दुबले हुए जा रहे हैं। नाव की कमी आड़े आ रह़ी है। कमला-बलान तट बंध पर अधिकारियों की असल चिंता पेट्रालिंग की है। पिछले सालों में इस तट बंध को ग्रामीण कई बार काट चुके हैं। &lt;br /&gt;.............................जारी है ..............................&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-6706380193555109516?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/6706380193555109516/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=6706380193555109516' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/6706380193555109516'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/6706380193555109516'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2010/08/1.html' title='बाढ़ का तांडव -- भाग 1'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-2843112860406153128</id><published>2010-07-31T21:50:00.000-07:00</published><updated>2010-07-31T22:41:02.599-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ग्लोबल ट्रेंड'/><title type='text'>आल गर्ल गेटअवे....</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;....संजय मिश्र... &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पहाड़ों की वादियाँ.... कल कल करते झड़ने .... और पास ही छोटा सा घर। लोगों से दूर.... उस आबोहवा से दूर  जहां बीते सालों की करवट मद्धम पद जाए....और इस घर में हो साजन का साथ....... ऐसे ही सपने देख तरुणाई बड़ी जिम्मेदारी ओढ़ लेती है... साथ साथ होने का ये अहसास आखिर दम  तक फीका नहीं पड़ता...&lt;br /&gt;लेकिन अमेरिका औए कनाडा की " लिबरेटेड " नारी इससे आगे देखने की आदी हो रही हैं। शादी से इनकार नहीं है ....प्रकृति - पुरूष  मिलन से भी तौबा नहीं... पर महिला संगिनी का साथ इन्हें रास आने लगा है।  जिन्दगी की भाग-दौर से फुर्सत मिली नहीं कि निकल पड़ती हैं देश- दुनिया की सैर पर...महिला मित्रों के साथ। --- आल गर्ल गेट अवे ---- का ये चलन पर्यटन उद्योग को नया आयाम दे रहा है। &lt;br /&gt;सफल महिलाओं में बढ़ रही इस प्रवृति पर कई सर्वे हुए हैं। इनके मुताबिक़ घुमक्कड़ी के दौरान परिवार की महिलाऐं और संगिनी का साथ होने से सकून मिलता है और स्ट्रेस से निजात मिलती है। ये चलन हर तरह की आउटिंग में देखने को मिल रहा है।  इस अनुभूति से वे इतनी रोमांचित हैं कि पर्यटन गाइड के तौर पर महिलाओं की ही मांग करने लगी हैं। ख़ास बात ये है कि हर उम्र की महिलाओं का रुझान इस तरफ बढ़ा है।&lt;br /&gt;विशेषज्ञों की माने तो इससे -- सोसिअलाइजेसन -- की भावना मजबूत हो रही है। बड़ी बात ये है कि इन मौकों पर वो अपने बारे में सोच पाती हैं   ....पति और बच्चों से दूर रह कर।।  ये अहसास कि वो एक व्यक्ति हैं .... उन्हें बन्धनों से मुक्त होकर  सोचने का अवसर मिलता है।&lt;br /&gt;पर्यटन व्यवसाए के सर्वे के अनुसार करीब तीस फीसदी महिलाओं ने पिछले पांच सालों में इसका लुत्फ़ उठाया है। ये आंकडा चालीस फीसदी तक जाने का अनुमान है। आनंददायक पहलू ये है कि पुरूष इस ट्रेंड को उत्सुकता से देख रहे हैं।&lt;br /&gt;भारत में " लिबरेटेड " और सफल महिलाओं की संख्या अच्छी- खासी है। जानकारों के अनुसार इनमे  भी इस चलन का साझीदार होने का उताबलापन है। पर्यटन उद्योग को इस तरफ देखना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-2843112860406153128?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/2843112860406153128/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=2843112860406153128' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/2843112860406153128'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/2843112860406153128'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2010/07/blog-post_31.html' title='आल गर्ल गेटअवे....'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-3653310694462826424</id><published>2010-07-05T22:15:00.000-07:00</published><updated>2010-07-06T00:31:03.915-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साहित्य में पलायन का दर्द'/><title type='text'>पलायन -----------भाग ७</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;                                 करिके गवनमा &lt;/span&gt;भवनमा में छोरि के&lt;br /&gt;                                 अपने पड़इले पूरबवा बलमुआ&lt;br /&gt;                                 अंखिया से दिन भर गीरे लोर ठर ठर&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                 बटिया &lt;/span&gt;जोहत दिन बीतेला बलमुआ......&lt;br /&gt;पलायन के आगोश में दुखों का अंबार रहता है।  ये किसी का दिल दहलाने के लिए काफी है........ फिर कवि ह्रदय क्यों न चीत्कार करे। बिहार के साहित्य में पलायन का दर्द रह रह कर झांकता रहा है। इसमें मुरझाए चेहरों के पोर पोर से उभरते दर्द हैं....विरह की वेदना है....साथ ही जिम्मेदारिओं के बोझ से जूझते अफ़साने हैं। जब कोई व्यक्ति घर-बार छोर कमाने निकलता है तो भावनात्मक उफान और गृहस्थी चलाने की विवशता का असर सबसे ज्यादा उसकी पत्नी पर पड़ता है। आज की कवितायेँ हों या पुराने कवियों के पद....परदेस जाने की कसक फूट पड़े हैं। भिखारी ठाकुर और विद्यापति के पदों में पलायन की पीड़ा के सूक्ष्म आयाम आज भी विचलित करने की क्षमता रखते हैं।&lt;br /&gt;                                 सुखल सर सरसिज भेल झाल&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                 तरुण तरनि &lt;/span&gt;तरु न रहल हाल&lt;br /&gt;                                 देखि   दरनि दरसाव पताल.........&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;विद्यापति के इस पद में अकाल का वर्णन है। रौदी की वजह से तालाब सूख रहे  हैं.... &lt;/span&gt;पल्लव सूख गए हैं.....खेतों में दरार आ गया है।   ऐसे में गृहस्थी कैसे चले....परदेस तो जाना ही पडेगा। पत्नी घबराती है कि सुख तो जाएगा ही साथ ही परदेस जाकर पति कहीं उसे भूल न जाए। विद्यापति के एक पद में ये दुविधा है....&lt;br /&gt;                                 माधव तोंहे जनु जाह विदेसे&lt;br /&gt;                                 हमरो रंग- रभस लय जैबह लैबह कोण सनेसे .........&lt;br /&gt;एक और पद देखें----&lt;br /&gt;                                 हीरा मनि मानिक एको नहि मांगब&lt;br /&gt;                                 फेरि मांगब पहु तोरा .......&lt;br /&gt;बावजूद इसके जब पति पत्नी से विदेस जाने की अनुमति माँगता है तो पत्नी मूर्छित हो जाती है। ये पद देखें...&lt;br /&gt;                                 कानु मुख हेरइते भावनि रमनि&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                 फूकर&lt;/span&gt;इ रोअत झर झर नयनी&lt;br /&gt;                                 अनुमति मंगिते वर विधु वदनी&lt;br /&gt;                                 हर हर शबदे मुरछि पडु धरनी ........&lt;br /&gt;भाव-विह्वल पति जब रात में सोई हुई पत्नी को जगा कर विदेस जाने की सूचना देता है तो पत्नी घबरा कर उठती है..... लेकिन अपना गम पीकर पति की यात्रा मंगलमय बनाने के लिए विधान में लग जाती है । देखें ये पद --&lt;br /&gt;                                 उठु उठु सुन्दरि हम जाईछी विदेस&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                 सपनहु रूप नहि मिळत उदेश &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                 से सुनि &lt;/span&gt;सुन्दरि उठल चेहाई&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                 पहुक बचन सुनि बैसलि &lt;/span&gt;झमाई&lt;br /&gt;                                 उठैत उठलि बैसलि मन मारि......&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;लेकिन पत्नी इतनी विकल है कि पति के लिए मंगल तिलक लाने &lt;/span&gt;की जगह एक हाथ में उबटन और दूसरे हाथ में तेल ( जो कि यात्रा के समय अशुभ माना जाता है ) ले आती है।  देखें ये पद -----&lt;br /&gt;                                 एक हाथ उबटन एक हाथ तेल&lt;br /&gt;                                 पिय के नमनाओ सुन्दरि चलि भेलि ........&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;पति जा चुका है....पत्नी व्यथित है... भिखारी ठाकुर के पद में इस मनोभाव को महसूसें----&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;                                 पिया&lt;/span&gt; मोर गई&lt;/span&gt;ले परदेस ए बटोही भैया&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                 रात नहि नींद दिन तुनीना चैन बा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                 चाह&lt;/span&gt;तानी बहुत कलेश ए बटोही भैया .......&lt;br /&gt;पत्नी चाहती है कि वो सारे सुख त्याग दे लेकिन उसका पति लौट आये । कवि रवींद्र का ए गीतल देखें---&lt;br /&gt;                                 हम गुदरी पहीरि रहि जेबै&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                 हमरा चाही ने रेशम के नुआ &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                 हमर सासु जी के बेटा दुलरूआ &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                 कतेक दिन रहबै यौ मोरंग मे&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                            आम मजरल मजरि गेलै महुआ &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                            हे यौ सपने मे बीति गेलै फगुआ &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                            हमर बाबूजी के कीनल जमैया&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                            कतेक दिन रहबै यौ मोरंग मे ......&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;रोना धोना छोड़ पत्नी घर की जिम्मेदारिओं मे रत हो जाती है। समस्याएँ फुफकारती हैं। भिखारी ठाकुर का ए पद बड़ा ही मार्मिक है -----&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                गंगा जी के भरली अररिया &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                नगरिया दहात बाटे हो &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                गंगा मैया , पनिया में जुनिया रोअत बानी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                कंट विदेस मोर हो .....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;घरेलू समस्याएँ सुलझाते सुलझाते वो न जाने कब पति की जिम्मेदारी ओढ़ लेती है .... इस काम मे वो इतनी मग्न है कि अपने आप को पति समझने लगती । अचानक से उसे भान होता कि वो तो नारी स्वभाव ही भूल गई। विद्यापति का इस अहसास का वर्णन दुनिया भर में अन्यतम माना जाता है-----&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                अनुखन माधव माधव सुमिरैत सुन्दरि भेल मधाई&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                ओ निज भाव स्वभावहि बिसरल अप्पन गुण लुब्धाई &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                अनुखन राधा राधा रटतहि आधा आधा वानि&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                राधा सौं जब पुन तहि माधव माधव सों जब राधा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                दारुण प्रेम तबहु नहि टूटत बाढ़त विरहक बाधा .......&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;विपत्ति कम होने का नाम नहीं लेती ...उसके ह्रदय का हाहाकार विद्यापति के इस पद मे देखें---&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                                सखि हे हमर दुखक नहि ओर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                               ए भर बादर माह भादर &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                               शून्य मंदिर ओर .....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;अब वो मरना चाहती है ...... सखि से कहती है कि उसमे व्याप्त पति के गुण निधि किसे सौप कर जाए ----&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                               मरिब मरिब सखि निश्चय मरिब &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;                               कानु हेन गुण निधि कारे दिए जाब .....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;...........समाप्त......&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;नोट-- संबंधित मगही पद नहीं जुटा पाया .... इस ब्लॉग को सर्फ़ करने वाले ऐसे पद भेज कर मुझे अनुगृहित करें....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;संजय मिश्र ।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-3653310694462826424?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/3653310694462826424/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=3653310694462826424' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/3653310694462826424'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/3653310694462826424'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='पलायन -----------भाग ७'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-2215181178532632105</id><published>2010-07-04T00:16:00.000-07:00</published><updated>2010-07-04T01:59:13.081-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मजदूरों के हित'/><title type='text'>पलायन का दर्द - भाग 6</title><content type='html'>बिहार के मजदूरों को पंजाब के किसान सेल फोन सहित अन्य सुविधाएँ देंगे ...... इस खबर की चहुँ ओर चर्चा हो रही है। इस शोर में केरल की सरकार की ओर से बाहरी मजदूरों के लिए कल्याण बोर्ड बनाने की खबर दब सी गई। केरल ही नहीं बल्कि कई अन्य राज्य सरकारें समय समय पर इन मजदूरों के हित के लिए चिंता जताती रहती हैं। इनके कल्याण के कई कदम उठाए भी गए हैं।&lt;br /&gt;दरअसल , पलायन पर ये चौथी धारा के विमर्श का प्रतिफल है। ये समझ दिल्ली में विकसित हुई जिसके पैरोकार एन जी ओ से जुड़े लोग और सोसल एक्टिविस्ट हुए। इसके तहत ये राए बनी कि ये मजदूर दिल्ली ( या ये जहाँ भी कमाने जाते हैं ) के लिए " दाग " नहीं हैं बल्कि इनका " असिस्टिंग रोल " उस जगह की समृधि का बाहक हैं। इनके रहने की जगह यानि झुग्गी झोपड़ियों को उजाड़ने की जगह उनमे बुनियादी सुविधाएं बधाई जाए। सुविधाएं बढ़ने से ये मजदूर अधिक उत्पादक साबित होंगे....ऐसा इस धारा के लोगों का मानना था। असल में " ल्यूटिन दिल्ली " के दायरे में आने वाले सभी झुग्गी बस्तियों को राज्य सरकार हटाना चाहती थी। आखिरकार उद्योगों को एन सी आर में धकेलने के बाद ल्यूटिन दिल्ली को " स्लामिश लुक " से लगभग मुक्त कर दिया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजदूरों को सुविधाएं देने की वकालत इनके जरूरी " प्राडक्ट " बन जाने की कथा भी कहता है। मजदूर अब "स्किल्ड " हैं लिहाजा उनकी अवहेलना संभव नहीं....उलटे मजदूरों के " पेशेवर " बनते जाने की आहट है ये। बिहार के सरकारी महकमे के लोग अच्छी तरह जानते हैं की उनके प्रयासों की बदौलत ये स्थिति नहीं आई है। दरअसल मजदूरों की सुध लेने में उनकी दिलचस्पी है भी नहीं ..... सेल फोन मिलने की घटना पर खुशी का इजहार कर वे बस इतना जताना चाहते हैं कि ये सब पलायन थम जाने का नतीजा है। लेकिन मई महीने में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हुई त्रासद भगदड़ और ऐसी ही अन्य घटनाएं उन्हें बार-बार  याद दिला जाती हैं कि  " पलायन थम गया " की जुगलबंदी के लिए फिलहाल स्पेस नहीं है। &lt;br /&gt;दिल्ली सरकार ने ये फैसला लिया कि कामगारों को अब प्रतिदिन कम से कम २०० रूपए मजदूरी मिलेंगे। ये फरमान लागू हो चुका है। इसने बिहारी मजदूरों को राहत तो दी है लेकिन मुस्कान नहीं। ये उनकी अदम्य इच्छा शक्ति और जीवन संघर्ष की मौन  स्वीकारोक्ति का नतीजा माना जा सकता है। विदर्भ के किसानो की आत्महंता कोशिशों की बजाए बिहारी मजदूरों ने अलग राह पकड़ी ।  ये सफ़र आसान नहीं रहा है।   वो जानते हैं कि दिल्ली " मायावी " भी है और उसकी " क्रूरता " का इतिहास भी पुराना है। यहाँ इनकी आबादी चालीस लाख के करीब है फिर भी " बिहारी" कह कर दुत्कारे जा रहे हैं।  इस शब्द के साथ जिस हिकारत का भाव झलकता है वो " हिन्दू" शब्द की उत्पत्ति की याद दिला जाता है। जब अरब दुनिया के लोग काफी विकसित हुए तो वहां जाने वाले सिन्धु नदी के पूरब के लोगों को " हिन्दू" कह कर चिढाया जाता ....  गंवाद  कह कर उनका उपहास किया जाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पलायन के साथ पारिवारिक बिखराव की गाथा जुड़ जाती है । कुछ मजदूर तो बिछोह के साथ प्रवास में समय बिताते वहीं कई लोग परिवार साथ ले आते हैं। जो अकेले हैं उन्हें गाँव की चुनौती से मुकाबला करते रहना होता है...जबकि दिल्ली में परिवार के संग रहने वालों को कमाने के संघर्ष के साथ घर की महिलाओं के शारीरिक शोषण कि चिंता सताती रहती है। जाहिर सी बात है इनका बसेरा बाहरी इलाकों में होता है जहां पीने का पानी भी जुटाने के लिए इनकी महिलाओं को दूर जाना होता है। ऐसे मौके गिध्ह दृष्टी वालों के लिए मुफीद होते। सीमा पूरी, करावल नगर, खजूरी, बुराड़ी, विनोद्नगर, मंडावली, पटपडगंज, खोदा, उत्तम नगर, नागलोई, नजफ़ गढ़, पालम, संगम विहार, महरौली, सरूप नगर, नोएडा, फरीदाबाद, गांधी नगर, खुरेजी, आजादपुर, और शकूर बस्ती जैसे इलाके शारीरिक शोषण की ऐसी अनेक दास्तानों को दफ़न करते हुए मौजूदा आकार में आई हैं। इन इलाकों में रहने वाले मजदूरों को अब बुनियादी सुविधाएं मिलने लगी हैं। चौथी धारा की सोच और प्रवास की क्रूरता के बीच द्वंद्व जारी है।&lt;br /&gt; बे ढव जिन्दगी में तारतम्य बिठाते इन मजदूरों को मालूम है कि बिहार उन्हें बुलाएगा नहीं...उनकी आस अपनी अगली पीढी की सफलता पर टिकी है।&lt;br /&gt;।&lt;br /&gt;........ जारी है ....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-2215181178532632105?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/2215181178532632105/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=2215181178532632105' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/2215181178532632105'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/2215181178532632105'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2010/07/6.html' title='पलायन का दर्द - भाग 6'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-2841779848805961297</id><published>2010-07-02T04:03:00.000-07:00</published><updated>2010-07-02T05:03:52.064-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पलायन-- बदलती प्राथमिकता'/><title type='text'>पलायन --भाग 5</title><content type='html'>पंजाब के उप-मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि उनके राज्य में कृषि कार्य के लिए मजदूरों की कमी हो गयी है। इतना कहना था कि बिहार के सत्ताधारी नेताओं की बाछें खिल उठी। बिहार के ग्रामीण विकास मंत्री ने दावा किया कि राज्य से खेतिहर मजदूरों का पलायन कम हो रहा है। बादल के बयान के एक दिन बाद यानि ५ मई को बिहार के प्रमुख हिन्दी अखबार में लीड खबर आई --- " बिहार से थमा पलायन "। बिहार के मुखिया ने तो इतना तक कह दिया कि राज्य के पुनर्निर्माण में इन मजदूरों का सहयोग मिल रहा है। बादल के बयान पर जिस अंदाज में नेताओं ने प्रतिक्रिया दी उसमे आपाधापी तो थी लेकिन उसका स्वर सहमा हुआ था।&lt;br /&gt;बीते अगहन की ही बात है जब दरभंगा के हायाघाट इलाके से मजदूरों का एक जत्था पंजाब गया। लगभग दो महीने तक ये मजदूर फसल काटने की आस में वहाँ जमे रहे....लेकिन उन्हें काम नहीं मिला। साथ में जो जमा-पूंजी थी ..... खोरिस में चली गई। हताश....बेहाल ये मजदूर अपने गाँव लौट आये। आपको ये जान कर ताज्जुब होगा कि इन मजदूरों की आप-बीती उसी अखबार में प्रमुखता से छपी थी .......जिसने पलायन थम जाने की खबर दी।  इन दोनों ख़बरों के बीच तीन महीने का फासला। तीन महीने में ऐसा क्या हो गया कि पलायन की समस्या हल होने के दावे होने लगे ? दरअसल , पलायन की चर्चा होते ही दावे किये जाते हैं लेकिन उसके पीछे की दृढ़ता का साहस कोई नहीं दिखा रहा। इस तरह का दावा तभी किया जाता है जब कहीं से कोई " फेवरेबल " बयान आ जाए। क्या बिहार सरकार के पास पलायन करने वाले मजदूरों का सही-सही  आंकड़ा है ?&lt;br /&gt;बादल को बिहार से होने वाले पलायन की कितनी समझ है ये कहना मुश्किल । हर सीजन में ... ये संभव है कि पंजाब के किसी इलाके में बिहारी मजदूर अधिक संख्या में पहुच जाते हैं तो दूसरे इलाके में इनकी संख्या कम पड़ जाती है। इनके पंजाब जाने का सिलसिला सालों से जारी है। इस दौरान नियमित पंजाब जाने वालों को दिल्ली में अवसर दिखा और इनकी अच्छी-खासी तादाद पंजाब की बजे दिल्ली में अटकने लगी। खेतिहर मजदूर...मजदूर बनते गए। पंजाब के किसानो की चिंता बढी। नतीजतन कृषि मजदूरों को लाने के लिए पगडीधारी सिख सीधे बिहार के गाँव पहुँचने लगे। ये सिलसिला उस समय शुरू हुआ जब दिल्ली में बिहारियों की इतनी भीड़ नहीं हुई थी। बाद के समय में बिहार के अधिकाश गाँव में मजदूरों को पंजाब और अन्य जगह ले जाने वाले एक नए वर्ग का उदय हुआ जिन्हें " ठेकेदार" या " दलाल " कहा जाता है।&lt;br /&gt;जब दिल्ली में भी अवसर " सेचुरेट " होने लगे तो इन मजदूरों ने गुजरात में ठौर ली। पंजाब और बम्बई की हिंसक वारदातों ने इस प्रक्रिया को गति दी है। अब पंजाब और दिल्ली का अधिकाँश " लोड " गुजरात उठाने लगी। इस राज्य में शहर-दर-शहर बिहारी मजदूरों की भीड़ देखी जा सकती है। नए अवसर की तलाश ने इन मजदूरों की प्राथमिकता यहीं तक सीमित नहीं रहने दी।&lt;br /&gt;शुरू-शुरू में दक्षिन भारत में इनका जाना नहीं हो पाया। भाषा की समझ नहीं होना आड़े आया। लेकिन देश के इस हिस्से में भी इन मजदूरों ने पैठ बना ली है। हैदराबाद - विजयवाड़ा हाइवे पर पहाड़ की गोद में बसे रामोजी फिल्म सिटी में बिहारी मजदूर मिल जाएं तो आपको हैरानी नहीं होनी चाहिए। आंध्र-प्रदेश के निर्माण उद्योग  में इनकी अच्छी-खासी संख्या लगी है। कर्णाटक और केरल के प्लान्टेशन उद्योग में भी इनकी पहुँच बनी है। मजदूरों के ठेकेदार भाषा की समस्या से इन्हें निजात दिलाते। धीरे-धीरे बिहारी मजदूर तमिलनाडू में भी दस्तक दे रहे हैं।&lt;br /&gt;.............जारी है..............&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-2841779848805961297?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/2841779848805961297/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=2841779848805961297' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/2841779848805961297'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/2841779848805961297'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2010/07/5.html' title='पलायन --भाग 5'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-4258463472490817214</id><published>2010-06-03T02:18:00.000-07:00</published><updated>2010-06-03T03:09:43.558-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कृषि चेतना'/><title type='text'>सिलमासी.....</title><content type='html'>संजय मिश्र&lt;br /&gt;धारिणी , जननी ... ये शब्द न जाने कब से हमारे कल्पनालोक में समाए होंगे ...... जीवन यात्रा के लिए उत्पादन की जरूरत शायद जब से महसूस हुई होगी। ये जान आप कौतुहल से भर उठेंगे की लातविया में भी --उत्पादन -- से जुडा त्योहार -- मिडसमर-- वहाँ के चिंतन प्रवाह को झक झोरता रहा है।&lt;br /&gt;रात भर जगना....मदिरा में डूब जाना .... फूल तोडती तरूणी .... और पेड़ों की झुरमुट के पीछे विचरते पुरूष .... सूरज उगने का इंतज़ार करते .... पर सुबह की आहट भर से जलन महसूस करते। यही पहचान है ...२३ जून ... को मनाए जाने वाले सालाना जलसे की। लेकिन ये त्योहार -- टेलर डेज इन सिलमासी -- के बिना अधूरा माना जाता है।&lt;br /&gt;- टेलर डेज इन सिलमासी - नाटक साल १९०२ में लिखा गया। सौ सालों में इसने लोकप्रिएता के सोपान गढ़े हैं। लातविया के रीगा शहर का नॅशनल थियेटर - सिलमासी - का पर्याय बन चुका है। कहते हैं बच्चे ही नहीं बड़ों के जेहन में भी -- परी कथा -- जैसी ललक रहती है। सिलमासी इसी ललक को पूरा करता है।&lt;br /&gt;२३ जून की शाम -- लाईगो -- कहलाती है। बेकरारी के इस समय में ये नाटक लोगों को मसखरी, उदारता, पीड़ा और चाहत की दुनिया में ले जाता है। इसमें तीन जोड़ों के जटिल प्रेम संबंध की कहानी है। ख़ास बात ये कि नाटक की मुख्य पात्र खेतिहर महिला है।&lt;br /&gt;लातविया जब सोवियत संघ का हिस्सा बना तो इस नाटक पर पाबंदी लग गई। लेकिन स्टालिन की मृत्यु के बाद इसका मंचन फिर शुरू हुआ.... इसकी कहानी लोगों की जुबान पर है... जिसमे है लातविया के जीवन दर्शन की झांकी ....मंचन का सिलसिला जारी है...&lt;br /&gt;कृषि प्रधान भारत में वैसे तो खेती से जुड़े त्योहारों की भरमार है लेकिन कृषि चेतना का संचार करने वाले नाटक इनका हिस्सा नहीं बन पाए ..... किसानी त्रस्त है। सरकार की सोच ने इसे पस्त कर दिया। नक्सली आन्दोलन ने भी किसान की जगह आदिवासियों को दे दी है। - सहमत - वालों आपको नहीं लगता की भारत को भी कोई -- सिलमासी -- चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-4258463472490817214?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/4258463472490817214/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=4258463472490817214' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/4258463472490817214'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/4258463472490817214'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='सिलमासी.....'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-2500615922869359292</id><published>2010-04-15T23:39:00.000-07:00</published><updated>2010-04-16T01:34:55.349-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पलायन का दर्द'/><title type='text'>पलायन का सच --- भाग ४</title><content type='html'>-------------संजय मिश्र -------------&lt;br /&gt;ये उस समय की बात है जब " कालाहांडी " की मानवीय विपदा ने दुनिया भर में चिंतनशील मानस को झकझोर दिया। इस त्रासदी को "कवर " करने गए पत्रकार याद कर सकते हैं उन लम्हों को जब संवेदनशील लोगों का वहाँ जाना मक्का जाने के समान था। कुर्सी पर बैठे लोग भी तब हरकत में आये थे। वहाँ एक स्त्री इसलिए बेच दी गई थी ताकि उन पैसों से अपनों का पेट भरा जाता। उड़ीसा में भूख मिटा नहीं पाने की बेबसी आज भी है। हार कर लोगों ने पलायन का रूख किया है। पलायन करनेवालों में आदिवासियों की संख्या अधिक है। कई आदिवासी महिलाएं ब्याह के नाम पर हरियाणा में बेच दी जाती हैं। उड़ीसा की ही सीमा से लगे छतीसगढ़ की एक आदिवासी महिला को पिछले साल इसी तरीके से बेचा गया। मामले ने इतना तूल पकड़ा कि छतीसगढ़ सरकार को हस्तक्षेप करना पडा।&lt;br /&gt;बिहार के कई पत्रकार भी उस दौर में कालाहांडी हो आए थे। वे हैरान हैं कि बिहार से होने वाले पलायन पर राज्य के हुक्म रानो का दिल क्यों नहीं पसीजता ? कुछ महीने पहले लुधियाना में हुई पुलिस फायरिंग में कई बिहारी मजदूर मारे गए। कहीं कोई हलचल नहीं ....... सब कुछ रूटीन सा। मरनेवालों के परिजन यहाँ बिलखते रहे...नेताओं के बयान आते रहे। इन मजदूरों को पता है कि उनकी पीड़ा से राज-काज वाले बिदकते हैं। यही कारण है कि इनकी प्राथमिकता अपनी काया को ज़िंदा रखने की है ... चाहे कहीं भी जाकर कमाना पड़े। पेट की आग के सामने सामाजिक दुराग्रह- पूर्वाग्रह टूटते गए हैं।&lt;br /&gt;पलायन पहिले भी होता था। मोरंग, धरान, और ढाका जैसी जगहों पर इनके जाने का वर्णन आपको मिल जाएगा। शुरूआती खेप में उन लोगों ने बाहर का रास्ता पकड़ा जो स्वावलंबी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में छोटे और मझोले किसानों के मजदूर थे। इन्हें हम इतिहास में बंधुआ मजदूर कहते हैं। ये खेती-बाडी में किसान के सहयोग में दत्त-चित रहते। इनकी स्त्रियाँ किसान के घरों की महिलाओं की सहायता करती। बदले में किसान अपनी जमीन पर ही इन्हें घर बना देते और इनके गुजर-बसर की चिंता करते। इन मजदूरों को दूसरे किसान के खेत में काम करने की इजाजत नहीं होती। मुक्ति की कामना , सांस लेने लायक आर्थिक साधन जुटाने, अकाल, रौदी, और बाढ़ जैसी मुसीबतों के चलते वे गाँव त्यागने को मजबूर होते। बिहार के साहित्यिक स्रोतों में " कल्लर खाना " और " खैरात " जैसे शब्द इन कारणों पर बहुत कुछ बता जाते हैं।&lt;br /&gt;बाद के समय में भूमिहीन खेतिहर मजदूर भी इनके साथ हो लिए। इनके साथ समस्या हुई कि किसानी से होने वाली आमदनी साल भर का सरंजाम जुटाने में नाकाफी होती। कष्ट  के समय में बंधुआ मजदूरों को अपने किसान से जो आस रहती वो भूमिहीन मजदूरों को नसीब नहीं । आजादी के बाद योजनाबद्ध विकास की हवा बही। इसमें गाँव को आर्थिक इकाई के रूप में देखने पर कोई विचार नहीं हुआ। नतीजतन स्वावलंबी ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमराने लगी। जातिगत पेशों से जुड़े लोगों पर इसका मारक असर हुआ। हर परिवार के कुछ सदस्य परदेस जाने लगे। प्राकृतिक मार से भी जिन्दगी तबाह हुई.... गृहस्थी चलानी मुश्किल। इस दौर में ब्राह्मण भी बाहर जाने लगे। पुरनियां ( पुर्णियां ) , कलकत्ता, और असम के चाय बागानों में इनकी उपस्थिति दर्ज हुई। फूल बेचने , पंडिताई करने, भनसिया ( खाना बनाने का काम ) बनने से ले कर हर तरह  के अनस्किल्ड काम वे करने लगे । &lt;br /&gt;कलकत्ता, ढाका और असम जैसी जगहों पर इन्होने आधुनिक आर्थिक गतिविधियों के गुर सीखे।  इसके अलावा एक वर्ग बाल मजदूरों का उभरा जो भदोही के कालीन उद्योग में भेजे जाने लगे। समय के साथ इस फेहरिस्त में कई जाति के बच्चे शामिल हो गए। वे अपने परिवार की दरिद्रता मिटाने में संबल बने।&lt;br /&gt;बिहार की सत्ता में लालू का आधिपत्य यहाँ के जन-जीवन में अनेक तरह के बदलाव लेकर आया। इसी दौर ने पलायन की पराकाष्ठा देखी। आम-जन से संवाद की देसज शैली के कारण लालू राजनीति में नए तेवर कायम करने में सफल हुए। लीक से हट कर सोसल इंजीनियरिंग को आजमाया। पिछड़ों के उभार में जबरदस्त कामयाबी मिली....और उनका डंका बजने लगा। लेकिन स्पष्ट ध्रुवीकरण ने गाँवों में सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया। बटाईदारों को बटाई वाली जमीन दे देने की सरकारी प्रतिबद्धता से किसान भयभीत हुए।  नतीजतन अधिकतर किसानो ने बटाई वापस ले ली। खेत " परती " जमीन में तब्दील होते गए। किसानी चौपट हो गई। आखिरकार बटाई से विमुख हुए खेतिहर मजदूर पलायन को बाध्य हुए।  खेती के अभाव में किसानो की माली हालत खराब होती गई। कुछ  साल संकोच में बीता । बाद में वे भी पलायन करने लगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालू युग " किसान के मजदूर " बन जाने की गाथा ही नहीं कहता ....इसी समय ने " विकास नहीं करेंगे " की ठसक भी देखी। सरकारी उदासीनता के कारण एक-एक कर चीनी, जूट, और कागज़ की मिलें बंद होती गई। कामगार विकल हुए। ये उद्योग नकदी फसलों पर टिके थे । लिहाजा किसानो ने इन फसलों से मुंह फेर लिया। समय के साथ उद्योगों से जुड़े कामगारों और किसानों की अच्छी खासी तादात दिल्ली .... बम्बई जाने वालों की टोली में शामिल हो गई। निम्न मध्य वर्ग के अप्रत्याशित पलायन ने गाँव की उमंग छीन ली है। वहां बच्चे, बूढ़े, और महिलाएं तो हैं लेकिन खेत काबिल हाथों के लिए तरस रहा है।&lt;br /&gt;पहले तीन फसल आसानी से हो जाता था । अब दुनिया दारी एक फसल पर आश्रित है। पलायन करने वालों ने भी सुना है कि बिहार का विकास हुआ है...और ये कि अगले पांच सालों में ये विकसित राज्य बन जाएगा। वे बस ...बिहुंस उठते हैं। वे जानते हैं कि पिछले दो विधान सभा चुनावों की तरह इस बार भी चुनाव के समय उनसे गाँव लौट आने की आरजू की जाएगी। अभी तक ये आरजू अनसूनी की गई हैं । पलायन करने वालों को नेताओं का अनुदार चेहरा याद है। उजड़ने का दुःख ....संभलने की चुनौती ...और ठौर जमाने की जद्दोजहद को वे कहाँ भूलना चाहते ।&lt;br /&gt;------------------जारी है................&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-2500615922869359292?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/2500615922869359292/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=2500615922869359292' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/2500615922869359292'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/2500615922869359292'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2010/04/blog-post_15.html' title='पलायन का सच --- भाग ४'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-1968352194835537570</id><published>2010-04-03T03:50:00.000-07:00</published><updated>2010-04-04T02:36:37.297-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पलायन पर संवेदनहीनता'/><title type='text'>पलायन पर दुविधा ----- भाग ३</title><content type='html'>........... संजय मिश्र ..........&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर - प्रदेश की पूर्वी सीमा से लगा एक रेलवे स्टेशन है - सुरेमनपुर । एक तरफ बिहार का प्रमुख शहर छपरा तो दूसरी &lt;span class=""&gt;ओर &lt;/span&gt;यू &lt;span class=""&gt;पी &lt;/span&gt;का बलिया । संपूर्ण क्रान्ति के अगुवा जेपी और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के इलाकों के बीच बसा है सुरेमनपुर । दिल्ली से बनारस होते हुए किसी सुपर-फास्ट ट्रेन से जब आप बिहार जाएं तो ग्रामीण आवरण समेटे इस स्टेशन पर ट्रेन का ठहराव आपको हैरान करेगा । बिना विस्मय में डाले आपको बता दें &lt;span class=""&gt;कि &lt;/span&gt;इस छोटे से स्टेशन पर दिल्ली के लिए टिकट की बिक्री छपरा से ज्यादा होती है। इसी आधार पर सुपर फास्ट ट्रेनों का ठहराव यहाँ दिया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्थानीय यात्री बिना लाग- लपेट आपको बताएंगे कि इस क्षेत्र से बड़ी संख्या में पलायन होता है। इनकी बातें ख़त्म होंगी भी नहीं कि सरयू नदी आपको यूपी की सीमा से विदा कर रही होगी। कुछ ही देर में आप छपरा में &lt;span class=""&gt;होंगे..... &lt;/span&gt;जी हाँ पलायन करने वालों का एक प्रमुख जिला । आपको याद हो आएगा ..... वो पुराना छपरा जिला जिसके सपूत बिहार के नीति- नियंता बनते रहे हैं। इन्होने राज्य की "डेस्टिनी " तो जरूर निर्धारित की लेकिन बिहार की निज समस्याओं से कन्नी काटते रहने का दुराग्रह भी दर्शाया। छपरा से निकलें तो पांच- सात घंटे के बाद ट्रेन आपको दरभंगा स्टेशन पर उतार चुकी होगी ..... एक बड़ा सा स्टेशन....अपेक्षाकृत बेहतर फेसलिफ्ट लिए एक नंबर प्लेटफार्म ..... काफी स्पेसियस । जिस रूट से आपकी ट्रेन आई है .... यकीनन आप बीच रात में पहुंचे होंगे। आपका सामना होगा एक नंबर प्लेटफार्म के फर्श पर &lt;span class=""&gt;लेटे &lt;/span&gt;हुए हजारों " लोगों " से। इन्हें इन्तजार है सुबह का ...जब वे अपने " गाम " की बस धरेंगे। व्यग्रता के बीच कमा कर लौटने का संतोष। पलायन....संघर्ष....रूदन...सब पर भारी पड़ती बेसब्री की धमक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन " रूदन " से बेपरवाह यहाँ के रेल अधिकारी खुश हैं कि समस्तीपुर रेल मंडल में सबसे अधिक टिकट की बिक्री दरभंगा स्टेशन में ही होती है।  इसी को आधार बना कर स्टेशन के विकास के लिए " फंड " की मांग भी की जाती है। टिकट काउंटरों पर यात्रियों की भीड़ को नियंत्रित करने क  लिए  नियमित पुलिस बंदोबस्त  देखना हो  तो यहाँ चले आइये ।&lt;br /&gt;कमोबेश ऐसे दृश्य मुजफ्फरपुर, सहरसा, पटना और राजेंद्रनगर स्टेशनों पर आम हैं। ये दृश्य बिहार के हुक्मरानों , पत्रकारों, और अन्य सरोकारी लोगों को विचलित नहीं करते।&lt;br /&gt;पलायन को समस्या मानने वालों के बीच अनेक धाराएं मौजूद हैं। मोटे तौर पर बिहार में तीन तरह का विमर्श दिखेगा। इसके अलावा दिल्ली में बैठे सुधीजन की समझ अलग ही सोच बनाती है। पहली धारा पलायन से जुडी निर्मम परिस्थितियों का आकलन करती है जो असीम दुखों का कारण बनती। ये असहाय लोगों के अथाह गम को रेखांकित करता है...साथ ही पलायन के कारण घर-परिवार और समाज की समस्त अभिव्यक्ति पर पड़ने वाले असर पर भी नजर डालता। इस मौलिक विमर्श ने जो चिंता जताई वो पलायन के दूरगामी नतीजों पर हाहाकार है। इस धारा का मानना है कि बिहार के कर्मठ हाथ दुसरे प्रदेशों की समृधि बढ़ा रहे। इनके अभाव में...फिर अपने प्रदेश का क्या होगा? इनका आग्रह है की पलायन को किसी भी तरह रोका जाना चाहिए। इस धारा के अध्येताओं में अरविन्द मोहन प्रमुख नाम हैं।&lt;br /&gt;दूसरी धारा के प्रणेताओं में अग्रणी हैं हिन्दी  के वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत । इनके विश्लेषण में संदर्भित बदलाव देखा जा सकता है पर मूल स्वर अभी भी वही है। इस धारा का मर्म लालू युग के दौरान परवान चढ़ा। पलायन को समस्या तो माना गया लेकिन इस शब्द से इस धारा के लोगों का " असहज " होना जगजाहिर है। इनकी नजर में पिछड़ावाद का अलख जगाने वाले लालू को पलायन के " विकराल " रूप का आइना नहीं दिखाया जाना चाहिए। वे मानते रहे हैं कि लालू का वंचितों को जगाना पुनीत काम था लिहाजा पलायन के कारण किसानी चौपट होने और लालू राज में " अविकास " के सरकारी क़दमों को " माइनर एबेरेशन " माना जाना चाहिए। इस धारा के घनघोर समर्थक आपको याद दिलाएंगे कि पलायन तो पहले से होता आया है। श्रीकांत जोर देते हैं कि पलायन करने वालों में कुशलता बढी है।&lt;br /&gt;बेशक उनकी कुशलता में निखार आया है। जो अनस्किल्ड थे वो स्किल्ड हुए। पर इसका फायदा किसे मिल रहा? योजना आयोग ने कुछ समय पहले बिहार टास्क फ़ोर्स का गठन किया। इसके सदस्यों ने जो रिपोर्ट सौंपी उसके मुताबिक़ बिहार में रह रहे " कमासूत " लोगों की कुशलता बढाए बिना राज्य का अपेक्षित विकास संभव नहीं। पलायन करने वाले इस मोर्चे पर वरदान साबित हो सकते हैं। पर उन्हें रोकेगा कौन ? निश्चय ही नीतीश और उनके सिपहसालारों को " पलायन " शब्द अरूचिकर लगता है। नीतीश ने सत्ता संभालते ही घोषणा की थी कि तीन महीने के भीतर पलायन रोक दिया जाएगा। ऐसा हुआ नहीं....घोषणा के पांचवें साल तक भी नहीं। नीतीश के कुनबे को डर सताता रहता है कि कोई इस घोषणा की याद न दिला दे।&lt;br /&gt;ये तीसरी धारा के पैरोकार हैं जो मानते हैं कि पलायन पर अंकुश लगा है। इनका आवेस है की राज्य के सकारात्मक छवि निर्माण की राह में पलायन की सच्चाई " बाधक " न बने। राज्य के ग्रोथ रेट पर वे बाबले हुए जा रहे हैं। ग्रोथ की ये बयार आखिरकार पलायन पर समग्र लगाम कसने वाला साबित होगा... ऐसा भरोसा वे दिलाएंगे। वे बताएंगे कि सामाजिक न्याय के साथ विकास ज्यादा अहम् है इसलिए पलायन जैसी समस्याओं पर चिंता करने की जरूरत नहीं। नीतीश के रूतबे में आंच न आ जाए .... इसलिए ये खेमा मीडिया को छवि निर्माण के लिए राज्य का " पी आर " बन्ने की नसीहत भी दे रहा। पटना की हिन्दी मीडिया का बड़ा वर्ग इस " रोल " से आह्लादित भी है।&lt;br /&gt;..............जारी है .......&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-1968352194835537570?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/1968352194835537570/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=1968352194835537570' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/1968352194835537570'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/1968352194835537570'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='पलायन पर दुविधा ----- भाग ३'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-3116848825022000638</id><published>2010-03-27T22:14:00.000-07:00</published><updated>2010-05-06T04:31:13.264-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मनी आर्डर इकोनोमी'/><title type='text'>पलायन का अर्थशास्त्र -----भाग-2</title><content type='html'>--------संजय मिश्र ---------&lt;br /&gt;बिहार की फिजा इन दिनों बदली-बदली सी है। ड्राइंग रूम से लेकर चौक - चौराहों तक ' ग्रोथ रेट ' की चर्चा हो रही है। मन पर छाए ग्रोथ रूपी ' ओवर टोन ' के मुत्तलिक सबके अपने अपने दावे हैं.... तर्क और वितर्क में उलझे हुए। और इन सबके बीच ' मनी ऑर्डर इकोनोमी ' की मौजूदगी कहीं गुम हो गई है .....जी हाँ वही ' मनी आर्डर इकोनोमी ' जो ' जंगल राज ' के आरोपों के दौर में बिहार का संबल बनी। ' वाइल्ड इस्ट फेनोमेना ' का प्रतिफल थी ये। इस तरह की इकोनोमी का संबंध असहज परिस्थितियों में पलायन करने वालों के हार - तोड़ मेहनत से उपजी गाढी कमाई से है जो राज्य की अर्थव्यवस्था को संभालती रही।&lt;br /&gt;क्या ' मनी आर्डर इकोनोमी ' आज भी बिहार की गतिशीलता का आधार है ? बिहार के पोस्ट-मास्टर जनरल आफिस के अधिकारियों से इस संबंध में बात हुई तो उन्होंने राज्य में आने वाले मनी आर्डर की संख्या में पिछले दस साल में दस फीसदी से अधिक कमी की और इशारा किया। उधर दरभंगा में पोस्टल डिपार्टमेंट के अधिकारियों ने जो आंकड़े दिए उसके मुताबिक़ जिले में आने वाले मनी आर्डर की संख्या में इस दौरान ११ से १२ फीसदी के बीच गिराबट दर्ज हुई। ये आंकड़े साल २००१ से २००९ तक के हैं। साल २००२ के आंकड़े को छोड़ दें तो साल दर साल की गिरावट एक ' पैटर्न ' बनाती है। ख़ास बात ये है की इस अवधि के दौरान राज्य में राबडी देवी और नीतीश कुमार की सरकारें रही हैं।&lt;br /&gt;क्या इस गिरावट का संबंध पलायन में लगे किसी प्रकार के ब्रेक से है ? पोस्टल अधिकारियों ने हालांकि मनी आर्डर की संख्या में कमी के अलग ही कारण बताए। इनकी माने तो राज्य में बैंकिंग सेवा के बढ़ने के कारण ये ' ट्रेंड ' दिख रहा है। आनलाइन बैंकिंग ने मनी आर्डर सेवा पर असर डाला है ....ऐसा उनका मानना है। इसके अलावा मनी आर्डर के जरिये अधिकतम ५००० रूपये भेजने की सीमा को भी वे इसकी वजह बताते हैं।&lt;br /&gt;अब सवाल उठता है की क्या बिहार में बैंकिंग सेवा का अपेक्षित और एकसमान विस्तार हुआ है ? जिन इलाकों से बड़ी संख्या में पलायन हो रहे हैं उस पर निगाह डालें। दरभंगा जिले के बिरौल , घनश्यामपुर , किरतपुर, कुशेश्वरस्थान , मधुबनी जिले के झंझारपुर और बेनीपट्टी , सीतामढी और शिवहर जिलों के बाढ़ग्रस्त इलाके , मुजफ्फरपुर के पूर्वी- दक्षिणी क्षेत्र , समस्तीपुर का हसनपुर इलाका , खगड़िया जिले के सालो भर जलजमाव झेलने वाले अधिकाँश इलाके , सहरसा और सुपौल जिले के पश्चिमी क्षेत्र , कोसी के पूर्वी और पश्चिमी तटबंध के बीच का विस्तृत भाग .... बैंकिंग सेवा के मामले में हतोत्साहित करने वाला परिदृश्य पेश करता है।&lt;br /&gt;इस बीच फरवरी महीने में ही रिजर्व बैंक की केंद्रीय बोर्ड की पटना में बैठक हुई। बैठक में हिस्सा लेते हुए रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बा राव ने बिहार के सभी ब्लाकों में बैंक की शाखा नहीं होने पर घोर चिंता जताई। इसी बैठक में भाग लेने आए तेंदुलकर कमिटी के अध्यक्ष - एस तेंदुलकर ने खुलासा किया कि राज्य में गरीबों की संख्या में इजाफा हुआ है।&lt;br /&gt;एक तरफ बैंकिंग सुविधा की कमी, दूसरी ओर गरीबों की संख्या में बढ़ोतरी । तो फिर मनी आर्डर की संख्या में गिरावट का रूझान क्या दिखाता है ? दरअसल इसका जवाब जगदीश और बिलट के बीच पनपे लेन- देन में तलाशना होगा ।&lt;br /&gt;.................................जारी है................................&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-3116848825022000638?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/3116848825022000638/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=3116848825022000638' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/3116848825022000638'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/3116848825022000638'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2010/03/2.html' title='पलायन का अर्थशास्त्र -----भाग-2'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-3910594939275169638</id><published>2010-03-25T00:43:00.000-07:00</published><updated>2010-03-25T03:09:59.036-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पलायन एक त्रासदी'/><title type='text'>पलायन का अर्थशास्त्र ----भाग-1</title><content type='html'>संजय मिश्र&lt;br /&gt;                                     -------------&lt;br /&gt;जहाँ से निकले वहाँ दिक्कत ..... जिनके चमन में पहुंचे उन्हें तकलीफ। आखिरकार मन में आशंकाओं के उफान को थामे ही कोई घर-बार छोड़ता है। चित बेजान करने वाला शब्द -  &lt;span&gt;पलायन &lt;/span&gt;--यानी किसी जन-समूह की वो तस्वीर जिसके हर पिक्सेल में भयावह दर्द तो है लेकिन आज के दौर के राजनीतिक स्पेस में मुद्दा बनने  की तपिश से महरूम ....यानी निरीह। लिहाजा ये झांकता है पर देखने वाले को बेदम नहीं &lt;span&gt;करता। &lt;/span&gt; पिछले लोक  सभा चुनाव के समय से अब तक पलायन की चर्चा गाहे-बगाहे हो रही है। नरेगा को महिमा-मंडित करने , उसे क्रांतिकारी कदम साबित करने के मंसूबों की वजह से भी ऐसा हो रहा है। लुधियाना, बम्बई, और दिल्ली में पलायनकर्ताओं के मौन चीत्कार समय-समय पर इस त्रासदी की याद दिलाते। निश्चित तौर पर कुछ महीनो बाद बिहार में होने वाले विधान-सभा चुनाव तक अखबार के पन्नो में इस शब्द को जगह &lt;span&gt;&lt;/span&gt; मिलती रहेगी।&lt;br /&gt;कहा जा रहा है कि नरेगा वो जादुई छडी है जिसने पलायन को  ना &lt;span&gt;सिर्फ &lt;/span&gt;रोका है बल्कि उसका खात्मा करने वाला है। पलायन पर सालो काम कर चुके तमाम पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, और पोलिटिकल एक्टिविस्ट भौचक हो अपने अनुभवजन्य राय को फिर से टटोलने में मशगूल हैं। हाल ही दिल्ली से बिहार जाना हुआ तो ये सारे सवाल जेहन में घुमड़ रहे थे। नई दिल्ली स्टेशन पर अलग ही तरह की अफरा-तफरी का माहौल था....रिजर्वेशन टिकेट के बावजूद यात्रियों में निरहट बिहारी हडबडाहट के दर्शन हो रहे थे। खैर जैसे-तैसे अपनी बर्थ पर पहुंचा ही था कि कोई जोर से चिल्लाया....अबे हट  यहाँ से...&lt;br /&gt;कुछ सोच &lt;span&gt;&lt;/span&gt;पाटा तब तक सामान &lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;से भरा प्लास्टिक का बोरा मेरे पैर से टकराया। जब तक चोट को सहलाता ....बोरा मेरी बर्थ &lt;span&gt;के &lt;/span&gt;नीचे ' एडजस्ट' कर दिया गया था। कुछ ही देर में सामान चढाने वाले ओझल हो चुके थे और रह गए एक सज्जन ..पलथी मार मेरे सामने वाले बर्थ पर आसन जमा चुके थे। चेहरे पर पतली सी मुस्कान...बीच-बीच में मोबाइल पर दबती उनकी अंगुली।&lt;br /&gt;उनके हाव-भाव से इतना तो समझ आ ही गया था कि गाँव-घर छोड़कर पहली बार दिल्ली आने वालों की फेहरिस्त में शामिल नहीं हैं वे। बेतहासा पलायन के शुरूआती दौर में ही दिल्ली आ गए होंगे। अब तजुर्बा हो गया है...सो सफ़र के दौरान सावधान और ' कांफिडेंट' दिखने की हरचंद कोशिश। खैर ...कुछ ही घंटों में बात-चीत का सिलसिला शुरू हो गया। पता चला ...नाम जगदीश साहू है और दरभंगा जिले के कुशेश्वर स्थान के नजदीक किसी गाँव के रहने वाले हैं। दिल्ली के आजादपुर इलाके में कई सालों से खीरा बेच रहे हैं। ' रेडी' पर नहीं... आजादपुर मंडी में बजाप्ता एक पटरी मिल गई है। जगदीश बड़े गर्व से कहते हैं---गद्दी है...खीरा का हौल सेल  करते हैं।&lt;br /&gt;पांच किलों से कम माल वे जोखते ही नहीं हैं। आमदनी का सवाल सुनते ही हिसाब लगाने लगते हैं...वही नौ-दस हजार हो जाता है। उनके गाँव के तीन और यात्री ट्रेन में सफ़र कर रहे थे। थोड़ी ही देर में ये आभास हो चला कि जगदीश साहू ' मेठ' की भूमिका में थे। अनायास ही उसने कहा- चार-पांच सौ रूपया ही साथ लेकर चलते हैं। ट्रेन में टीटीई की छीना-झपटी , और दरभंगा स्टेशन पर पाकिटमार गिरोहों के खतरे से वाकिफ ..जगदीश ने काफी रूपये पहले ही घर भेज दिए थे।&lt;br /&gt;मैं गुण-धुन में पडा रहा। कुशेश्वर स्थान तो कालाजार, मलेरिया, और बाढ़ के लिए जाना जाता है। उस इलाके में एटीम काम करता होगा सहसा विश्वास करना मुश्किल। मनी आर्डर का भरोसा नहीं क्योंकि पोस्ट मास्टर की जेब से कितने महीनो बाद ये जरूरतमंदों को मिलता होगा कहना कठिन । मेरी उत्सुकता का निराकरण जगदीश ने ही किया। दरअसल उसके गाँव में एक ही ब्राह्मण परिवार है जिसके मुखिया हैं...बिलट झा। बिलट भी अब दिल्ली में ही रहते हैं। पहले कुछ काम-धंधा किया पर फ़ायदा  नहीं हुआ। जैसे तैसे पैसे जोड़कर मोटर साईकिल खरीदी। गाँव में बिलट का छोटा भाई रहता है। जिसके पास कुछ ' रनिंग मनी ' का इंतेजाम बिलट ने कर दिया हुआ है। बिलट का काम है दिल्ली में रह रहे उसके गाँव -जबार के लोगों से संपर्क करना। जिसे भी  रूपये गाँव भेजने होते हैं वो बिलट को रकम दे देता है। तत्काल बिलट के भाई को इसकी सूचना दी जाती है। औसतन दो घंटे के भीतर संबंधित व्यक्ति को रूपया ' पे ' कर दिया जाता है। जगदीश के मुताबिक़ रूपये-पैसे भेजने का इस तरह का इंतजाम दिल्ली के हर उस इलाके में जड़ जमा चुका है जहां प्रवासी मजदूर बड़ी संख्या में रह रहे हैं।&lt;br /&gt;यानि बिहार के हर बड़े गाँव के जो लोग ' दिल्ली कमाते हैं '..उनके बीच का कोई एक सदस्य बिलट की भूमिका में है। बिलट होने के लिए कोई बंधन नहीं...महज गाँव में उसके परिजन के पास ' रनिंग मनी ' हो...साथ ही गाँव वालों का उस पर भरोसा हो। जात-पात-धर्म ...का कोई बंधन नहीं। फिलहाल इस व्यवस्था को कोई नाम नहीं दिया गया है। कमीशनखोरी कह लें...निजी बैंकिंग सेवा कह लें...या फिर हवाला कारोवार का देसी संस्करण। अब थोड़ी बात लेन-देन के इस सरोकार के पीछे के फायदे की। जगदीश साहू जैसों को ६ रूपये प्रति सैकड़ा अदा करना पड़ता है। यानि एक हजार के लिए ६० रूपये....ऐसे ही दस हजार रूपये घर भेजने के &lt;span&gt;लिए &lt;/span&gt;६०० रूपये लगेंगे। कमीशन की रकम ...संभव &lt;span&gt;है...&lt;/span&gt;बहुतों को अधिक जान पड़े। लेकिन जगदीश साहू समय पर और सुरक्षित सेवा को ज्यादा अहमियत देते हैं। ये भी संभव है की दिल्ली के अन्य इलाकों में ये ' रेट ' कम-ज्यादा हो। वैसे भी दिल्ली में २५ फीसदी मजदूर ही परिवार के संग रह रहे हैं। शेष ७५ फीसदी के लिए तो कमाई  का अधिकाँश हिस्सा गाँव भेजना प्राथमिक मकसद है। पंजाब, गुजरात, बम्बई कमाने वालों के बीच भी लेन देन का ये चलन जोर पकड़ रहा है। पलायन के मुद्दे पर काम करने वालों को इस आर्थिक पहलू पर गहन पड़ताल करनी चाहिए।&lt;br /&gt;                                                                                        .......जारी है............&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-3910594939275169638?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/3910594939275169638/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=3910594939275169638' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/3910594939275169638'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/3910594939275169638'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2010/03/1.html' title='पलायन का अर्थशास्त्र ----भाग-1'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-6651032417231074520</id><published>2010-01-30T23:02:00.000-08:00</published><updated>2010-01-31T01:08:21.568-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बसंत'/><title type='text'>वेलेंटाइन डे और प्रेम</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सैसव जीवन दर्शन भेल .....दुहु दल- बलहि दंद परि गेल&lt;br /&gt;कबहु बांधाय कच कबहु बिथार ....कबहु झाँपे अंग कबहु उधार&lt;br /&gt;थीर नयान अथिर किछु भेल .... उरज उदय - थल लालिमा देल&lt;br /&gt;चपल चरन , चित चंचल भान .... जागल मनसिज मुदित नयान&lt;br /&gt;विद्यापति कह करू अवधान .... बाला अंग लागल पञ्च बान&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;......ये एक तरुणी की व्यथा है .... वो हैरान है अपने शारीरिक परिवर्तन से .... समझ नहीं आता क्या करे .... पहले पैर चंचल थे ... अब मन में भी हलचल है ... नए अहसास ने दे दी है दस्तक ... मालूम नहीं कैसी प्यास सी जग गई है ...शोख बचपन पर अल्हड़ता कितनी हाबी हो गई है ...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;ऐसे ही अनजान लेकिन खीझ भरे उहापोहों के बीच कब कौन प्यार की दहलीज पर कदम रख दे ..... पता भी नहीं चलता। ये भान अचानक से होता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;कौन जाने प्रेम किसे कहते.. परिभाषित करने से चूकने लगते हैं लोग ... कुछ बाते कह पाते हैं बस .... नर -नारी के बीच प्रेम इस खिंचाव के बाद पलने लगता है। अपनेपन की अनुभूति आकार लेने लगती है ... मोह जगने लगता है। प्रकृति भी ऐसे में मुस्कुराने लगती ... पक्षी कलरव कर आपका स्वागत करते। मन चाहता ये मोह परिणति की ओर बढे । &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;ऐसे समय में परिणति का पूरा आभास भी कहाँ हो पाता.....तड़प सुख का अहसास कराने लगता ... मिलन पर नजरें टिक जाती... दृढ़ता को संबल मिलता .... पग-पग कदम बढ़ते .... एकाकार होने की चाहत उभर आती । राह हमेशा आसान कहाँ रह जाता... बाधाएं सर उठा लेती हैं। फिर दौर शुरू होता है विरह की ताप का। दुनिया में कितने साहित्य रच डाले गए ....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;परिणति जो आकार ले .... साथ देने की उत्कंठा कभी मंद नहीं पड़ती । इसका शिखर समर्पण के रूप में प्रकट होने लगता है। इसके बाद की निष्ठा - लौकिक प्रेम के परलौकिक बन जाने की ओर प्रवृत होता है। आध्यात्म इसे सत चित- आनंद की अवस्था मानने लगता... यहाँ आकर प्रेम देव लोक की अनुभूति में बदल जाता है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;विज्ञान के नजरिए से देखें तो प्रेम नशा लेने के समान है । प्रेम करने वाले दुनिया से विरत भाव रखने लगते । आँखें जब मिलती है तो कहते हैं ब्रेन से - डोपामाइन - नामक रसायन निकलता है । नतीजतन धड़कन सामान्य से तीन गुना ज्यादा हो जाता है । खून का प्रवाह इस समय गाल और ख़ास इन्द्रियों में अधिक होता है ...अचानक पेट में खालीपन का अहसास होने लगता है। इस दौरान हाथ और पांव में खून का प्रवाह कम रहता है यही कारण है की प्रेमी के हाथ ठंढे और स्थूल से हो जाते और शरीर कांपने लगता है... नर्वसनेस चरम पर पहुँच जाता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;चिकित्सक मानते हैं कि प्रेम का समागम रूप अछा व्यायाम है...भारतीय सौंदर्य शास्त्र में भी समागम को योग आसन के रूप में देखा गया है। प्रेम- रत रहने वाले अनेक रोगों पर अंकुश रखने में समर्थ हो पाते हैं...आकुलता यानी एन्ग्जाईटी भी दब जाती है। शोध बताते हैं कि इससे इम्यून सिस्टम मजबूत बना रहता है॥ यानी प्रेम करिए ....साथ ही इन्फेक्सन की चिंता से दूर रहिये...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;सवाल उठता है कि प्रेम महज रासायनिक प्रक्रिया है तो ये सबसे क्यों नहीं हो जाता। शोध बताते हैं कि प्रेम के दौरान ख़ास तरह कि रसायन निकलती है जिसे नाक तो नहीं लेकिन ब्रेन पहचान लेता है। यही कारण है की लोग संबंधियों से आसक्त नहीं होते। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;इतनी पवित्र बातें और ब्रेन कि चर्चा ... पर आप हैरान रह जाएंगे ये जान कर कि गहरे प्रेम में रत रहने के समय भी ब्रेन का बहुत ही छोटा हिस्सा सक्रिय रहता है । जबकि दोस्ती की भावना और दोस्तों से मिलने के समय ब्रेन का बड़ा हिस्सा सक्रिय रहता है। तभी तो शायद दो दिलों के बीच के सभी भावों में निजता रहती है। जैसे नशा लेने पर सभी - फील गुड - की दशा में होते... प्रेमी की मनोदशा भी ऐसी ही होती है... ख्यालों में तो वे अक्सर पाए जाते।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;प्यार करने वाले कहेंगे कि प्रेम - जीन, रसायन, और हारमोन से ऊपर की चीज है... दुनिया जले या बिहुँसी उठे ....पर प्रेम रत इंसान मुदित, तृप्त, और खुश रहता है। विलक्षण प्रतिभा वाले इंसान ... कहते हैं कि प्रेम में भी अछे रहे होते हैं। पर हे किशोरों ...आप समझ रखने लायक उम्र में प्रवेश तो कर जाएं। वेलेंटाइन डे की आपको शुभकामनाएं .... बसंत सदा मोहक साबित हो....&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-6651032417231074520?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/6651032417231074520/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=6651032417231074520' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/6651032417231074520'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/6651032417231074520'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2010/01/blog-post_30.html' title='वेलेंटाइन डे और प्रेम'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-5845149255316552225</id><published>2010-01-02T04:24:00.000-08:00</published><updated>2010-03-25T21:53:51.533-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बर्निंग इशु'/><title type='text'>अलग राज्य की मांग क्यों ? सन्दर्भ मिथिला</title><content type='html'>अलग राज्य की मांग क्यों ? सन्दर्भ मिथिला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संजय मिश्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;--------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेलंगाना ने कांग्रेस को जोर का झटका दिया है। कड़वा घूँट पीने को मजबूर ये पुरातन पार्टी अब इस चक्रव्यूह से निकालने की कोशिश कर रही है। देश भर में इस मुद्दे पर चर्चाएँ गरम हैं। कोई छोटे राज्य बनाम बड़े राज्य के विमर्श में लगा है तो किसी को राष्ट्रीय अखण्डता पर खतरा नजर आ रहा है। राष्ट्र के जीवन में ऐसे मौके आते हैं जब सरकारों के साथ- साथ राजनीतिक दल &lt;span style="font-size:0pt;"&gt;, &lt;/span&gt;आम जन और सोच-विचार वाले लोग असहजता महसूस करते। अभी चहुँ &lt;span&gt;ओर &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:0pt;"&gt; &lt;/span&gt;यही दिख रहा है। के चंद्रशेखर राव ने तेलंगाना के मुद्दे पर हो रहे लुका- छिपी के खेल की सीमा को उघार कर रख दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर ऐसी &lt;span&gt;मांग  &lt;/span&gt;उठती&lt;span style="font-size:0pt;"&gt; &lt;/span&gt;ही कयों है ?&lt;span style="font-size:0pt;"&gt;  &lt;/span&gt;कहा जा रहा है की विकास में पिछड़ने वाले क्षेत्रों से इतनी बड़ी मांग नहीं उठाई जानी चाहिए । संभव है ऐसे सवाल करने वाले विकास को समग्रता में देखने की जगह संकुचित अर्थों में देखते हों ....दो चार फैक्ट्रियां स्थापित कर देने और सड़कें बना देने को ही वो विकास समझते हों। यानी वे मान रहे हैं की अलग राज्य की मांग करने वाले देश के साथ इन्जस्तिस &lt;span style="font-size:0pt;"&gt; &lt;/span&gt;कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल मामला इतना सरल नहीं है। माहीनी से देखें तो परत-दर-परत सवाल उठते जायेंगे ..... सत्ता में बैठे लोगों के नीयत की निरंकुशता , भेद-भाव पूर्ण नीतियाँ और आकांक्षाओं के दमन की कहानियां निकलती ही चली जाएंगी । इन परतों के बीच से अनदेखी की जो टीस &lt;span style="font-size:0pt;"&gt;  &lt;/span&gt;निकलती हैं उसे ' चाहें " तो साफ़ सुन सकते हैं। लेकिन इस कराह की वेदना को समझने के लिए " मलिन ' मन तैयार कहाँ। ये मलिन मन कार्यपालिका , विधायिका , और चौथे स्तम्भ में कब्जा जमाए बैठे हैं । वे तेलंगाना जैसे हालात में भी अपनी कारस्तानी से ध्यान भटकाने में लगे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे ही तत्वों को के सी आर के अनशन पर एतराज । सन्दर्भ से  पड़े होकर मणिपुर &lt;span style="font-size:0pt;"&gt; &lt;/span&gt;की इरोम शर्मिला के अनशन की याद दिलाई जा रही है। बेशक इरोम श्रधेय हैं... उनकी कुर्बानी नमन योग्य हैं....गांधीजी के संघर्ष की नैतिक गाथा का साक्षात दिग्दर्शन है उनका अनशन । के सी आर ने इसी हथियार को आजमाया। इसका उद्देश्य जो भी हो... पर शायद भारत के नीति-नियंताओं को कोई भी मांग मानने के लिए खून-खाबा देखने की आदत हो गई है। वे भूल जाते हैं की ऐसी आदत देश की संवैधानिक मर्यादाओं  के लिए शुभ नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;सन्दर्भ की बात चली तो थोड़ी बात &lt;span style="font-size:0pt;"&gt; &lt;/span&gt;बिहार की कर लें &lt;span style="font-size:0pt;"&gt;.......&lt;/span&gt;मिथिला के मानस के उद्वेग की। आपके जेहन में उमड़ रहे कई सवालों के जवाब शायद आप तलाश पायें। मिथिला इसी राज्य बिहार का एक अंग है। पौराणिक-एतिहासिक मिथिला का दो-तिहाई हिस्सा बिहार में और शेष नेपाल में पड़ता है। कभी मौक़ा मिले और समय हो तो बिहार के हुक्मरानों के भाषण सुने। इन्हें ही क्यों ....बिहार की मीडिया पर भी नजर गड़ाएं । बिहार की महिमा का जब ये बखान करते तो भगवान् बुध ही इन्हें नजर आते। भगवान् महावीर कभी-कभार याद आते....पर जनक नहीं...माता सीता नहीं। मिथिला का स्मरण करा दें तो इनकी भावें तन जाती। इस इलाकेकीमिटटी, पानी, हवा...ये सब बिहार की संपदा हुई पर ' मिथिला' शब्द और यहाँ के लोगों से परहेज। यहाँ की विरासत पर गर्व करने की बजाए  इन्हें शर्म का अनुभव क्यों ? &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;सूना होगा आपने की मैथिली भाषा संविधान की आठवीं सूची में दर्ज है...वो साहित्य अकादमीमेभी है। यानिइन जगहों पर बिहार का मान बढ़ा रही । पर क्या राज्य के शाषकों &lt;span style="font-size:0pt;"&gt; &lt;/span&gt;को इस पर नाज है ? हर सेन्सस रिपोर्ट में मैथिली भाषियों की संख्या कम बताने की इनकी साजिस क्या किसी से छुपी रह गई है ? थोड़ा पीछे जाएं...शिव पूजन सहाए &lt;span style="font-size:0pt;"&gt; &lt;/span&gt;जैसे ख्यातिलब्ध साहित्यकारों ने मैथिली की परिचिति खत्म करने का बीड़ा क्यों उठाया था ? पाठ्यक्रमों से मैथिली को बार-बार हटाने के कुचक्र क्या राजकीय गर्व का अहसास हैं? &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;मैथिली जब आठवीं अनुसूची में शामिल की गई तो राष्ट्रीय टीवी चैनलों ने भी इसे प्रमुखता से दिखाया। संविधान संशोधन करना पडा था...लिहाजा ये न्यूज़ थी। लेकिन बिहार के सर्वाधिक लोकप्रिय चैनल ने इस खबर को दिखाने की जहमत नहीं उठाई। इस चैनल को बिहार की स्वर कोकिला शारदा सिन्हा की आवाज नहीं सुहाती...क्योंकि वो मिथिला क्षेत्र से आती हैं...जबकि मनोज तिवारी ' अप्पन ' बने हुए हैं। &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;देश के किसी कोने में चले जाएं...गैर बिहारियों से बात करें। बिहार का नाम लेते ही वो भोजपुरी का जिक्र करेंगे। यही हाल इन जगहों के समझदार समझे जाने वाले पत्रकारों का है। अधिकाँश को पता नहीं की मैथिली बिहार की ही भाषा है। बिहार &lt;span style="font-size:0pt;"&gt; &lt;/span&gt;सरकार की गर्व की अनुभूति और काबिलियत ( ? ) का ये जीता जागता नतीजा है। पटना से छपने वाले हिन्दी के अखबारों को पलट कर देखें। हेडिंग्स और कार्टून के टेक्स्ट आपको भोजपुरी में मिलेंगे। इन अखबारों की ये किर्दानी सालों से है....अछा है...पर मैथिली में क्यों नहीं। इन्हें मिथिला का पाठक/ खरीदार चाहिए पर मैथिली नहीं चाहिए...बिलकुल वैसे ही जैसे राज्यके नेताओं को मिथिला के ' लोग ' चाहिए जिन पर सत्ता की धौंस जमाएं पर इन " लोग ' के हित की परवाह नहीं। &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;तेलंगाना विवाद के बाद से मिथिला में भी अलग राज्य की मांग को लेकर उबाल है। विभिन्न सांस्कृतिक संगठन शांतिपूर्ण तरीके से ये मांग रख रहे हैं। इनका आवेस है की मिथिला का अस्तित्व अलग राज्य बनाने से ही बचेगा। इस जन-उभार को देख पार्टी लाइन से अलग होकर बड़े राजनीतिक नेता भी इसके समर्थन में वक्तव्य दे रहे हैं। मीडिया में भी इसके मुतलिक खबरें आ रही हैं। लेकिन गौर करें तो हर जगह ' मिथिलांचल ' शब्द पाएंगे। ये जो शब्द है ' मिथिला' वो परिदृश्य से ओझल है। यानि मिथिला बन गई मिथिलांचल। ये कैसे हो गया...क्यों हो गया ? पटना के सत्ता प्रतिष्ठान और मीडिया ने दशकों से ' मिथिलांचल ' शब्द का इतना इस्तेमाल किया है की मिथिला के लोग भी इसी शब्द का प्रयोग करने लगे हैं। इन्हें रत्ती भर अहसास नहीं की इसके पीछे का रहस्य क्या है...इसके क्या मायने हैं ? जिन पत्रकार बंधुओं को रिसर्च की प्रवृति में यकीन हो वे इस साजिश पर से पर्दा उठा सकते हैं। &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;यही कोई पांचवें दशक के शुरुआत की कथा है ये...आज़ादी मिली ही थी। बिहार को मिथिला से आने वाले &lt;span style="font-size:0pt;"&gt; &lt;/span&gt;राजस्व पर बड़ा अब्लंब &lt;span style="font-size:0pt;"&gt; &lt;/span&gt;था। राज्य के राजस्व में इस इलाके का योगदान ४९ फीसदी था.... यानि लगभग आधा। साल २००० में जब राज्य का बंटवारा हुआ उस समय राज्य के राजस्व में मिथिला का योगदान १२ फीसदी ही रह गया था। सरल भाषा में कहें तो मिथिला के राजस्व देने की क्षमता चार गुना घट चुकी थी। यानि यहाँ के लोग चार गुना गरीब हो चुके थे। ऐसा कैसे हो गया ? क्या मिथिला से मिलने वाले राजस्व को इसी इलाके के विकास में खर्च किया गया ? &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;बाढ़ से मची तबाही ने इस इलाके को झकझोर कर रख दिया है। बाढ़ पहले भी आती थी। तभी तो लोर्ड वेवेल ने इसके निदान के लिए महत्वाकान्ची परियोजना बनाई थी। बराह क्षेत्र में कोसी पर हाई डैम बनाना था। अनुमान लगाया गया की परियोजना के पूरा होने पर ये इलाका दुनिया &lt;span style="font-size:0pt;"&gt; &lt;/span&gt;के समृध्तम क्षेत्रों में शुमार हो जाएगा। लेकिन आज़ादी क बाद बनी बिहार की पहली सरकार ने बहाने बनाते हुए इस परियोजना से हाथ खींच लिया। उन्हें डर था की मिथिला समृध हो जाएगी तो वहाँ की जनता ' दुहाई सरकार ' .. और ..' जिंदाबाद ' के नारे नहीं लगाएगी। बिहार सरकार की अनिच्छा देख केंद्र सरकार ' भाखड़ा - नांगल ' परियोजना की और उन्मुख हुई । पंजाब का काया-कल्प हो गया। आज उसी पंजाब के खेतों में मिथिला के मजदूर और किसान से मजदूर बन गए लोग फसलें काटने जाते हैं। इधर कोसी डैम में लगने वाले पैसों से दामोदर वैली परियोजना अस्तित्व में आई। साजिश करने वाले झादखंड में हुए निवेश से मालामाल हुए। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;दिल्ली की सडकों पर ' बिहारी ' होने के दंश झेलने वाले, पंजाब के खेतों में अफीम मिली चाय पीकर काम करने को मजबूर , अपमान सहकर गुजरात में विकास का सोपान गढ़ने वाले और मुंबई में नफ़रत के बीच पेट की आग बुझाने वाले ७० फीसदी हाथ दर असल उसी मिथिला के हैं। जी हाँ , उसी मिथिला के जिसने ज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में कभी देश का मार्ग-दर्शन किया था। आज वही समाज दो जून रोटी के लिए तड़प रहा है....जिन्हें कुछ मांगने पर मिलती है अवहेला। यहाँ के लोगों की सूनी आँखों में यही सवाल तैर रहे हैं -- क्या उसकी पहिचान और जीवन-शैली मिटा देने से ही बिहार और देश का भला होगा ? &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;यही घुटन कमोवेश ' malla प्रदेश ', ' ब्रज ' , ' बुंदेलखंड ', और ' बघेलखंड ' में भी है। क्या इनकी पहचान मिटा देने से ही बिहार, यूपी , और एमपी का कल्याण होगा ? ये तीन बड़े कृत्रिम राज्य दिल्ली की कुर्सी के लिए जरूरी हैं लेकिन इस संकुचित लाभ के पीछे ये नहीं भूलना चाहिए की देश के पुनर्गठन का काम रह गया है। उसे पूराकर के ही देश की विविधता के आतंरिक बंधन को मजबूती दी जा सकती है। नहीं तो इन इलाकों में अलग राज्य की अकुलाहट बनी रहेगी। दूसरा राज्य पुनर्गठन आयोग बने तो इस अकुलाहट को महसूस करे। ऐसे आयोग को राजनीतिक फायदे के लिए उठाए जा रहे अलग राज्यों की मांग से सतर्क रहने की जरूरत है। क्योंकि दूरदर्शिता के अभाव में और तात्कालिक लोभ में कई ऐसे राज्य बन गए जो की नहीं बनने चाहिए थे। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-5845149255316552225?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/5845149255316552225/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=5845149255316552225' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/5845149255316552225'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/5845149255316552225'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='अलग राज्य की मांग क्यों ? सन्दर्भ मिथिला'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-1642433140808160709</id><published>2009-12-05T00:30:00.000-08:00</published><updated>2009-12-05T23:47:57.405-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चुनाव'/><title type='text'>झारखण्ड की व्यथा</title><content type='html'>&lt;p&gt;झारखण्ड की व्यथा &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;संजय मिश्रा&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;झारखण्ड में चुनाव हो रहे हैं । इसमे चुनाव के वे सारे रंग दिख रहे हैं जो हमारी खासियत बन गई है। राज्य के बाहर के लोगों को हैरानी हो सकती है कि चुनाव प्रचार के दौरान भ्रष्टाचार मुद्दा नही बन पाया। न तो इसमे राजनितिक दलों की दिलचस्पी है और न ही मीडिया की । मधु कोड़ा बेशक घोटालों के आइकोन बन गए हों लेकिन उनको राजनितिक प्रहसन का पात्र बनने वाले दल चुप्पी साधे बैठे हैं। &lt;span class=""&gt;जिस &lt;/span&gt;यूपीए ने राज्य का पहला निर्दलिये मुख्यमंत्री उन्हें बनाया उसके मकसद का पर्दाफास हो चुका है। आदिवासी बेरहमी से लूटे जा चुके हैं। राज्य निर्माण के नौ साल बीत गए पर जिस ललक ने झारखण्ड की नींव &lt;span class=""&gt;रखी &lt;/span&gt;सत्ता की आपाधापी के बीच वो कहीं &lt;span class=""&gt;गुम &lt;/span&gt;हो गई है। &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;याद करें साल १९९८ का पन्द्रह अगस्त ... लालू प्रसाद ने अकड़ते हुए कहा था की झारखण्ड उनकी लाश पर बनेगा। दो साल और दो महीने बाद ही झारखण्ड भारतीय संघ का एक हिस्सा बन गया। ऐसा लगा आदिवासी अस्मिता के दिन बहुरने वाले हैं। पर वही लालू मधु कोड़ा की ताजपोशी में जी जान से&lt;span class=""&gt; जुटे थे । चुनाव &lt;/span&gt;प्रचार के दौरान आज भी उनके चेहरे पर वही छकाने वाली मुस्कान देखी जा सकती है। कांग्रेस राज्य में जमीन तलाश रही है। उसका निशाना झारखण्ड नामधारी दलों के आधार को संकुचित करने पर है। शिबू सोरेन की रही सही ज़मीं हथियाने की पुरी तैयारी है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;समझदार लोगों के अनुसार झारखण्ड ... आदिवासियों की प्रतिरोध संस्कृति का आइना है। यह संस्कृति ...कमीशन , छल प्रपंच और तिकड़म के जाल से निकल जाने के आवेग में जन्मी थी। लेकिन आज ये राज्य इन्ही के मकडजाल में उलझ गई है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;आदिवासियों &lt;/span&gt;का अपना दिसुम हो इसके पीछे सांस्कृतिक ... सामजिक अवधारणा काम कर रही थी। ये अवधारणा प्रकृति के मेल मिलाप के साथ देसी विचारों के सपनो के सामंजस्य पर बनी थी। इसमे स्वशासन का स्वर भी शामिल था। सामुदाइक जीवन और प्राकृतिक सम्पदा पर सामूहिक अधिकार के कारण ये समझ बनी। लेकिन बाहरी ... जिन्हें वे दिकु कहते ... लोगों की चहलकदमी ने उनकी सरलता को झकझोड़ दिया। बिरसा मुंडा से लेकर ताना भगतों ने स्वीकार किया कि निश्छल जीवन की अस्मिता की रक्षा के लिए प्रतिरोध जरूरी है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;जयपाल सिंह ने जब झारखण्ड पार्टी बनाई तब तक आदिवासी समाज ने इस जरूरत को मान लिया था की उनकी जीवन शैली का आधुनिक सोच के साथ सरोकार हो। आदिवासी इलाकों में प्राकृतिक सम्पदा पर आधारित आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ी तो उन्होंने संघर्ष को निर्माण प्रक्रिया की दिशा में मोड़ने को अपना लक्ष्य बनाया। इस दिशा में बढ़ने के बावजूद अपने मौलिक चिंतन को छोड़ना उन्हें जरूरी नही लगा। यही वजह हुई कि उनकी संस्कृति के संगीतमय प्रवाह को इतिहास नही बनने दिया गया। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;आदिवासियों के अवचेतन मन को कुरेदे तो ये प्रवाह आज भी दबी हुई पायेंगे। यही कारण है की राज्य में जितने भी निवेश के प्रस्ताव आए वे खुले दिल से उसका स्वागत नही कर पाये। उन्हें डर है कि वे विस्थापन की जिंदगी जीने को मजबूर हो जायेंगे....अपनी प्रकृति से कट जायेंगे। आदिवासी आकांछा की राह में ये एक बड़ा पेंच है। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;उनकी दुविधा ये भी है की राज्य में उनकी जनसँख्या तीस फीसदी के आसपास ही है शेष गैर आदिवासी यानि जिन्हें वो दिकु कहते है। देश की संघीय व्यवस्था के साथ उनके जीवन दर्शन के बीच मेल मिलाप में कमी तो चुनौती है ही। देश में राजनीतिक पतन का असर भी उन पर पडा है। मधु कोड़ा इसके प्रतीक हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;१५ नवम्बर २००० को जब झारखण्ड अस्तित्व में आया तो ये उम्मीद बंधी कि बिहार की राजनीतिक विरासत की धुंध छ्तेगी और नया सवेरा आएगा। सपने देखे गए कि शासन का मानवीय चेहरा आदिवासी लोकाचार की रक्षा करने में सफल होगा। लेकिन झारखण्ड आन्दोलन में अहम् भूमिका निभाने वाले नेताओं के बदले व्यवहार के कारण आदिवासी अंतर्विरोध और निराशा के दोहरे भंवर में लोग फँस गए हैं। ऐसे राजनीतिक जानकार भी हैं जो ये मानते हैं कि चुनाव बाद मौजूदा हलचल हटेगा। लेकिन वे आदिवासी अकुलाहट को समझ पाने वाली सरकार ही होगी ये कहने का साहस इन जानकारों में भी नही है। दुनिया भर में आदिवासी जीवन दर्शन की झांकी पेश करनेवाले कुमार सुरेश सिंह और आदिवासी कोमल भावों की पैरोकार महाश्वेता देवी की आस्था क्या धरी की धरी रह जाएगी। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-1642433140808160709?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/1642433140808160709/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=1642433140808160709' title='10 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/1642433140808160709'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/1642433140808160709'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='झारखण्ड की व्यथा'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-3965208077799005402</id><published>2009-11-11T06:08:00.000-08:00</published><updated>2009-12-20T03:44:40.705-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संकट'/><title type='text'>भारत क्या करे</title><content type='html'>संजय मिश्रा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत संकट में है, झारखण्ड से भ्रष्टाचार की अनूठी दास्तान लोगों ने सुनी और देखी। देश के कई तबकों में rajniti की ऐसी दशा और दिशा पर चिंता जताई जा रही है। कहा जा रहा है की ye &lt;span style="font-size:0;"&gt;घोटाला saare rekard toregi . &lt;/span&gt;छापेमारी की जद में कई पत्रकार भी आए हैं। मीडिया ke एक वर्ग में पत्रकारिता के दलदल में phaste जाने पर घोर निराशा छा गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर मंदी ke कमरतोड़ असर के साथ साथ महंगाई लोगों के चैन uraa रहे हैं। लेकिन हैरानी की बात ये है की कांग्रेस पार्टी चुनाव डर चुनाव फतह हाशिल करती जा रही है। ऐसा कैसे सम्भव हो रहा है। लोगों को नही सूझ रहा की वे क्या करें। दिली के हुक्मरानों ने साफ़ कह दिया है की महंगाई रोकने में वे असमर्थ हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आतंकी हिंसा से तो देश लहुलुहान है हे नाक्साली हिंशा की बर्बरता रोज नै मिशल कायम कर रही है। सरकारें इनके सामने असहाय महसूस कर रही हैं। अब ये नक्सालियों पर बमों की वर्षा करेंगे। यानि माँ लिया गया है की और कोई रास्ता नहीं। क्या सरकारी तंत्र ने अन्य विकल्पों का सहारा ले लिया। मनमोहन ने लोगों से उपाय सुझाने को कहा है। क्या जनता इस दुरभिसंधि को समझ पा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी देस में संत्रास के ऐसे क्षण आते हैं तो उसे विद्वानों का अब्लाम्ब मिलता है। भारत क्या करे। क्या उसके पास ऐसे विद्वान हैं जो उसे राह दिखाए। सर पटक लें तो एक भी ऐसा नाम नहीं सूझेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो देस पहले दुनिया को जीने का पथ पड़ता था वहां की ये हालत। हालत ऐसे हैं की नेपाल जैसा देश भी उसे धमकी देता है। पाकिस्तान तो पहले से ही संकट बना हुआ है। और चाइना तो लगातार अरुणाचल प्रदेश पर अधिकार जता रहा है। भारतीये नेताओं का रंग फीका पड़ गया है। वे मिमिया रहे हैं। ॥ कहाँ है वो दर्प। एक दब्बू कॉम की छवि वाले इस देश को कौन रह दिखायेगा। क्या कोई अरस्तू भारतीये क्षितिज पर &lt;span style="font-size:0;"&gt;दिखा &lt;/span&gt;रहा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जरा इतिहास में झांकें । यूनानी हमले के बाद के समय को याद करें। कैसे चाणक्य ने देश को एक सूत्र में बंधा था। इतना पीछे जाने की भी क्या जरूरत। जिस अमेरिकन जीवन शैली की नक़ल करते हम नही अघाते वहाँ भी कोई चोमस्की है। विद्वान समाज के संबल होते हैं। विकत परिस्थितियों में वे राह दिखाते हैं । पर भारत में ....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजाओं के युग में भी यहाँ विद्वानों को प्रश्रय मिला करता था। लोकतांत्रिक आधुनिक भारत में तो ये प्रक्रिया और भी मजबूत होनी छाहिये थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब जरा आज़ादी के बाद के परिदृश्य को समझाने की कोशिश करें। नेहरू छद्म नाम से अख़बारों में लिखते और अपनी सरकार के निरंकूस होते जाने के खतरे से आगाह करते थे। ये जानकारी कुछेक संपादकों तक सीमित थी। ऐसा कर नेहरू अपनी बद्दापन की धौंस तो जमा ही रहे थे साथ ही मीडिया के रोल पर सवालिया निशान भी लगा रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आख़िर नेहरू को ऐसा करने की क्या जरूरत थी। क्या वो ख़ुद को ही विद्वान के रोल में फिट करनाकी भूल कर रहे थे। कम से कम राधाकृष्णन जैसे फिलोसोफेर तो आस पास थे ही...राजेंद्र जैसे पढ़े लोखे लोग भी थे। पर ये हाशिये पर बिठा दिए गए थे। नेहरू के परम मित्र कृष्ण मेनन अपने को विद्वान समझ बैठे थे। उन्हें इसका गुमान भी हो गया था। लेकिन लन्दन विश्वविद्यालय के भारतीये छात्रों ने ही उनका घमंड तोडा था। तिलमिला गए थे वो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देशवासियों ने विद्वता के दायरे को इतना संकुचित समझ लिया है की मामूली साहित्यकारों को भी वे विद्वान मान बैठते हैं। किसी वामपंथी कार्यकर्ता से बात कर देख लीजिये । वो फक्र से कहेगा वामपंथी नेता विद्वान होते हैं। यही हाल बीजेपी वालों का है। इनके कार्यकर्ता बीजेपी को विद्वानों से भरी पार्टी बताते नही थकते। देश के कथित बोध्हिजीवी तो पहले से ही अपने को विद्वान समझने में गर्व करते हैं। बड़ी ही निर्लज्जता से रोमिला थापर , राम चंद्र गुहा जैसों को विद्वान बताने &lt;span style="font-size:0;"&gt;के &lt;/span&gt;लिए गिरोह सक्रिय रहते हैं। उधर बीजेपी वालों के लिए अरुण शौरी , के आर मलकानी और मुरली मनोहर जोशी से बड़ा विद्वान इस जहाँ में नही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब थोडी बात बिहार की भी कर लें । यहाँ सामान्य समझ वाले सज्जन हैं जिनका नाम है शैबाल गुप्ता। लालू राज के दौरान इन्हे विद्वान् बनने पर जो कुछ लोग तुले तो बना कर ही छोड़ा । वे भी गौरब्मय महसूस करते हैं। जी हाँ ये दयनिए हालत उस राज्य का है जहाँ जनक जैसे राजर्षि हुए ,याज्ञवल्क्य , आर्यभट , कुमारिल, मंडन, पक्षधर , गार्गी, भारती जैसे लोग हुए । चोमस्की जब भी भारत आते हैं, मनेका, अरुंधती जैसे लोग उन्हें सुनने जाते हैं। क्या इन्हे ये सवाल नही सताता की भारत में कोई क्यों नही जिसे सुनने जायें। पुजिवादियों के खिलाफ माओवादियों के समर्थन में खड़े तथाकथित बुधीजीवी उसी पूजीवादी देस अमेरिका के विद्वान चोमस्की से सहयोग की गुहार लगते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये नौबत क्यों आई । क्योंकि देश में राजनितिक साजिश के &lt;span style="font-size:0;"&gt;तहत &lt;/span&gt;विद्वत परम्परा को सुख जाने के लिए कदम उठाये गए। सिक्षा के मंदिरों को विचारधारा का अखारा बनाया गया। विद्वान होंगे तो निरंकुशता पर भी आगाह किया जाएगा। कुर्सी का सुख मिलता रहे इसके लिए पब्लिक ओपिनियन को प्रभावित करना जरूरी । और इसके लिए मीडिया के साथ सिक्ष्सा केन्द्रों पर अपने पसंद की विचारधारा के लोगों को भरने की परम्परा बुलंदी पर पहुंचाई गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोहिया प्रखर थे और उन्हें विद्वान सहयोगिओं का साहचर्य मिला। बिहार में उनके कई ऐसे ही सहयोगियों को जेपी और कांग्रेस ने हाशिये पर डालने की कोशिश की और सफल भी हुए। इंदिरा के शासन के दौरान वामपंथी लोग शिक्षण संस्थानों पर काबिज हुए और वे आज तक जामे हुए हैं। एनडीए की सत्ता आई तो &lt;span style="font-size:0;"&gt;जे &lt;/span&gt;एस राजपूत ने खूब मजे किए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समस्याएं विकराल होती जा रही हैं । भारत ६० सालों से विकासशील ही बना हुआ है। पर किसी को फिकर नही। माओवाद, सेकुलरवाद, और राष्ट्रवाद के नाम पड़ सत्ता छीनने और बनाये रखने में सभी लगे हुए हैं। स्वार्थ की ऐसे घिनोनी सूरत में आशा की किरण कहाँ से आएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विद्वान अपने आप पैदा नही होते। इसके लिए सही माहौल की जरूरत होती है। अब प्राचीन भारत की तरह गुरुकुल नहीं बनाये जायेंगे। मौजूद विस्वविद्यालयों को ही सत्ता के दखल से मुक्त करने की जरूरत है। पढ़ाई का अस्तर ऊँचा करना होगा। शिक्षा मद में बजट को खूब बढ़ाना होगा। क्या भारतीये राजनीती इसके महत्वा को समझेगी। फिलहाल तो उसे जनता की नासमझी पड़ ही भरोसा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-3965208077799005402?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/3965208077799005402/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=3965208077799005402' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/3965208077799005402'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/3965208077799005402'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='भारत क्या करे'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7910871545615350572.post-8429691446535118836</id><published>2009-10-26T00:34:00.000-07:00</published><updated>2009-10-26T03:56:41.442-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><title type='text'>मीडिया की त्रासदी</title><content type='html'>संजय मिश्र&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;मीडिया दोराहे पर खड़ा है । एक तरफ़ पेशे से विलग गतिविधियों के कारण ये आलोचना के केन्द्र में है तो दूसरी ओर विकासशील भारत की परवान चढ़ती उम्मीदों पर खरा रहने की महती जिम्मेदारी का बोझ । मीडिया पर उठ रही उंगली अ़ब नजरंदाज नही की जा सकती । ये विश्वसनीयता का सवाल है...सर्विवल का सवाल है । आवाज बाहर से ज्यादा आ रही है पर इसकी अनुगूंज पत्रकारों में भी कोलाहल पैदा कर रही है । लेकिन अन्दर की आवाज दबी ...सहमी सी ...बोलना चाहती पर जुबान हलक से उपर नही उठ पाती। ऐसे में शुक्रगुजार वेब पत्रकारिता का जिसने एक ऐसा प्लेटफार्म दिया है जहाँ इस पेशे की सिसकी धीरे धीरे शब्द का आकार ले रही है । &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;बहुत ज्यादा बरस नही बीते होंगे जब पत्रकारिता पर समाज की आस टिकी होती थी । आज़ादी के दिनों को ही याद करें तो मीडिया ने स्वतंत्रता की ललक पैदा करने में सराहनीय योगदान दिया था। कहा गया की ये मिशन पत्रकारिता थी । बाद के बरसों में भी मिशन का तत्त्व मौजूद रहा । कहीं इसने विचारधारा को फैलाने में योगदान किया तो कहीं समाज सुधार के लिए बड़ा हथियार बनी । लेकिन इस दौरान मिशन के नाम पर न्यूज़ वेलू की बलि नहीं ली गई । ये नहीं भुलाया गया की कुत्ता काटे तो न्यूज़ नहीं और कुत्ते को काट लें तो न्यूज़ ...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;कहते हैं विचारधारा की महिमा अब मलिन हो गई है और विचार हावी हो गया है । ग्लोबल विलएज के सपनो के बीच विचार को सर पर रखा&lt;span class=""&gt; गया । इस बीच टीवी पत्रकारिता फलने फूलने लगी । अख़बारों के कलेवर बदले ...रेडियो का सुर बदला । संपादकों की जगह न्यूज़ मैनेजरों ने ले ली । ये सब तेज गति से हुआ । मीडिया में और भी चीजें  तेज गति से घटित हुई हैं । समाज में पत्रकारों की साख गिरी है । यहाँ तक की संपादकों के धाक अब बीते दिनों की बात लगती । कहाँ है वो ओज । &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;आए दिन पत्रकारों के भ्रस्त आचरण सुर्खियाँ बन रही हैं । फर्जी कामों में लिप्तता ..महिला सहकर्मियों के शारीरिक शोषण ..मालिकों के लिए राजनितिक गलियारों में दलाली ..जुनिअरों की क्षमता तराशने की जगह गिरोहबाजी में दीक्षित करने से लेकर रिपोर्टरों के न्यूज़ लगवाने के एवज में वसूली अब आम है । नतीजा सामने है । कई पत्रकार जहाँ करोरों के मालिक बन बैठे हैं। वहीँ अधिकाँश के सामने रोजीरोटी का संकट पैदा हो गया है। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;दरअसल girohbaajon ने मालिकों की नब्ज टटोली और मालिकों ने इनकी अहमियत समझी । कम खर्चे में संस्थान चला देने और दलाली में ये फिट होते । फक्कर और अख्खर पत्रकार हाशिये पर दाल दिए गए । गिरोह के बाहर की दुनिया मुश्किलों से भरी । अखबार हो या टीवी की चौबीस घंटे की जिम्मेदारी । काम का बोझ और छोटी सी गलती पर नौकरी खोने की दहशत। हताशा इतनी की सीखने ki ललक नहीं। सीखेंगे भी किस्से ..असरदार पदों पर काबिज उन पत्रकारों की कमी नहीं जिन्हें न्यूज़ की मामूली समझ भी नहीं । &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;टीवी की दुनिया चमकदार लगती। है भी ...कंगाली दूर करने लायक salary , खूबसूरत चेहरे, कमरे के कमाल, देस दुनिया को चेहरा दिखने का मौका ... और इस सबसे बढ़कर ख़बर तत्काल फ्लैश करने का रोमांच । पहले ख़बर परोसी जाती ... अब बेचीं जाने लगी । तरह तरह के प्रयोग होने लगे । इसके साथ ही trp का खेल सामने आया। ख़बरों के नाम पर ऐसी चीजें दिखाई जाने लगी जिसमे आप न्यूज़ एलेमेन्ट खोजते रह जायेंगे। भूत प्रेत से लेकर स्टिंग ऑपरेशन के दुरूपयोग को झेलने की मजबूरी से लोग कराह उठे। इनके लिए एक ही सछ है --एनी थिंग उनुसुअल इस न्यूज़ --...न्यूज़ सेंस की इन्हें परवाह कहाँ। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;शहर डर शहर टीवी चैनल ऐसे खुल रहे हैं जैसे पान और गुटके की दूकान खोली जाती । वे जानते हैं की चैनल खर्चीला मध्यम है फिर भी इनके कुकर्मों पर परदा डालने और काली कमाई को सफेदपोश बनने के लिए चैनल खोले ही जा रहे हैं । इन्हें अहसास है की गिरोहबाज उन्हें संभाल लेंगे। कम पैसों में सपने देखने वाले पत्रकाr  भी मिल जायेंगे। और वसूली के लिए चुनाव जैसा मौसम तो आता ही रहेगा। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;अब वेब जर्नालिस्म दस्तक दे रही है । कल्पना करें इसके आम होने पर पत्रकारिता का स्वरुप कैसा होगा । अभी तो टीवी पत्रकारिता में ही बहाव  नही आ पाया है । न तो इसकी भासा स्थिर हो paai  है और न ही इसकी अपील में दृढ़ता । विसुअल का सहारा है सो ये भारतीय समाज का अब्लाम्ब बन सकता है लेकिन ...&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;चौथे खम्भे पर आंसू बहने का अ़ब समय नही ...पत्रकारों को अन्दर झांकना होगा । उन्हें अपनी बिरादरी की कराह सुन्नी ही होगी । मुद्दे बहूत हैं ...आखिरकार कितनी फजीहत झेलेगी पत्रकारिता । &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7910871545615350572-8429691446535118836?l=ayachee.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://ayachee.blogspot.com/feeds/8429691446535118836/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7910871545615350572&amp;postID=8429691446535118836' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/8429691446535118836'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7910871545615350572/posts/default/8429691446535118836'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://ayachee.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='मीडिया की त्रासदी'/><author><name>sanjay mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05519303415967930259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' 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